प्रभावहीन भारतीय विपक्ष


नाकारा – 21वीं शताब्दी के भारतीय विपक्ष के लिए यह शब्द सम्मानपूर्वक प्रयोग किया जा सकता है|

24 फरवरी 2016 का दिन संसद में भारतीय विपक्ष द्वारा दिशाहीन, प्रभावहीन, तर्कहीन, विचारहीन, विमर्शहीन, इच्छाशक्तिविहीन, सामंजस्यवादी बहस के लिए याद किया जायेगा| परिश्रम से बचने के लिए तथ्य इकट्ठे नहीं किये गए, तर्कों और तथ्यों में सामंजस्य नहीं बिठाया गया| विपक्ष प्रति – आक्रमण के डर से बहस की आड़ में बहस से ही बचता रहा| विपक्ष के नेता अपनी धारदार – ओजस्विता के अभिमानित मोह में इतना मुग्ध हुए कि उन्होंने अपने तथ्य कौशल, विचार कौशल, वाक् कौशल, नेतृत्व कौशल और राजनीतिक कौशल का परिचय देना भी उचित न समझा|

एक ऐसा समय जब सत्ता जन – विमर्श के भंवर में डोल उठी थी; अपनी जबावदेही के लिए तैयारी कर रही थी, भारतीय विपक्ष जनता को किसी भी प्रकार का नेतृत्व देने की कोशिश करने में भी नाकाम रहा|

भारत में अंतिम मजबूत, मेहनती, विचारवान विपक्ष शायद प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के समय था, जब देश में एक कमज़ोर सत्ता को मजबूत प्रधानमंत्री सम्हाल रहा था और एक प्रभावी विचारवान परिश्रमी विपक्ष भारतीय राजनीति में मजबूत पकड़ बनाये हुए था| स्वाभाविक लोकतान्त्रिक विचारात्मक मतभेद के बाद भी, विपक्ष सत्ता जबाबदेह बनाये रखने में सक्षम था|

प्रधानमंत्री बाजपेयी के समय भारत में कमजोर विपक्ष का दौर शुरू हुआ| मजबूत सत्ता और मजबूत प्रधानमंत्री के सामने विपक्ष फ़ीका लगे यह स्वाभाविक है मगर भारतीय विपक्ष ने कमज़ोर होना स्वयं चुना था| भारतीय विपक्ष उस समय पूरी तरह से व्यक्ति केन्द्रित होकर रह गया और विचार का उसमें कोई स्थान नहीं बचा| साम – दाम सत्ता सुख भारतीय विपक्ष की न सिर्फ लालसा रही विपक्ष में रहकर भी उसने अपने को सत्ता से दूर नहीं किया| निसंदेह, ऐसा करते हुए वह जनता से नहीं जुड़ पाया| सत्ता से दूरी का यह समय अध्ययन, विचार, विमर्श, जन – संपर्क, व्यापक राजनीतिक समझ आदि के लिए नहीं किया गया| विपक्ष संसद में बाजपेयी सरकार को जबाबदेही की चुनौती नहीं दे पाया| इंडिया – शाइनिंग का मतिभ्रम चुनौती – विहीन बाजपेयी सरकार को ले डूबा|

कमज़ोर बूढ़े उच्च नेतृत्व के साथ विपक्ष में आई युवा बहुल भाजपा ने वही गलतियाँ शुरू कीं जो बाजपेयी सरकार के समय में कांग्रेस कर रही थी| उन्हें न सरकार से प्रश्न करने की इच्छा थी न जबाब की उम्मीद| संसद में प्रश्नकाल मजाक के रूप में स्थापित होता गया| बहसें शोर बनकर रह गयीं| सदन से बहिर्गमन विरोध न होकर बहस न कर पाने की कमजोरी का पर्दा बन गया| कांग्रेस और भाजपा विचार, कार्य और शैली में एक दूसरे का प्रतिबिम्ब मात्र बन गए|

प्रथम यूपीए सरकार को विपक्ष ने गैर जबाबदेही प्रदान की वह दूसरे कार्यकाल में निरंकुशता में बदल गई| यह निश्चित था कि यह सरकार अपने गैर जिम्मेदार बोझ के साथ सत्ता ज्यादा दिन नहीं संभाल पायेगी| उस समय में विपक्ष के राजनीतिक शून्य को केंद्र में नरेन्द्र मोदी और राज्य में अरविन्द केजरीवाल ने भरा| विपक्ष में मजबूत केंद्रीय नेतृत्व न होना तत्कालीन भाजपा और वर्तमान में कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी है|

कम अध्ययन, कम विचार – विश्लेषण, अल्पविचारित त्वरित प्रतिक्रिया, क्षणिक लोकप्रियता लाभ, आदि उस समय से भारतीय विपक्ष के मूल आधार बन गए है| भारतीय विपक्ष का व्यक्तिवादी बिखराब वैचारिक गिरावट का कारण बन रहा है| भारतीय राजनीतिक दलों का यह भ्रम कि जनता भावनात्मक मुद्दों पर मूर्ख बनते रहना पसंद करती है भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक बन कर उभरी है|

यह भारतीय राजनीतिक नेतृत्व का निराश समय है, जिसके गर्भ से युवा आशाजनक नेतृत्व का जन्म अवश्यंभावी है|

सराजकता का अंत


दिल्ली में पंद्रह साल की सराजकता अभी हाल में लहूलुहान हो गयी और सत्ता के राजपथ पर इसकी आनंद – सभा का आयोजन सड़कछाप भीड़ ने कर दिया| यद्यपि मरण और तर्पण अभी शेष है|

भारतीय लोकतंत्र की अवधारणा के मूल में संसदीय लोकतंत्र और अनेकता के संस्कृति है| जिसमें सत्ता का प्रवाह पदबिंदु के प्रारंभ होकर शीर्ष – ध्वजा तक जाने की परिकल्पना जनमन में निहित है| परन्तु तात्कालिक विवशता के कारण सामंत – कुलीन – विशिष्ठबुद्धि वर्ग इसे अपनी सुविधा अनुरूप चलाता आ रहा है|

कुलीनलोकतंत्र में चुनावी घोषणापत्र और नामधारी योजनायें खजूर के पेड़ से लटकी और टपकती प्रतीत होतीं हैं| यहाँ समाज के निम्न पायदान का व्यक्ति परिपाटी की अग्नि और कुलीनता की कसौटी के बाद लालकिले की प्राचीर छूने की बात सोच सकता है| यह वही पगडण्डी है जिसपर मोदी जी चल रहे है| इसमें सत्ता परिवर्तन तो है मगर व्यवस्था परिवर्तन…

नहीं मित्र! व्यवस्था परिवर्तन के कई अवसर इस मार्ग पर आये और गुपचुप चले गए| हाँ; इस रेशमी – टाट पर कुछ सूती पैबंद अवश्य लगे|

कुलीनलोकतंत्र की विवशता रही कि समय के साथ इसमें संसदीयता के स्थान पर अध्यक्षता का प्रत्यारोपण हो गया| संसदीय विमर्श हवा हो गए| संसद में सचेतक वैचारिक संचेतना पर हावी हो गए| संसदीय मार्गदर्शन क्षेत्र की जनता के मनमंथन के स्थान पर कुलीन दिवास्वप्नों से अवतरित होने लगे| क्या मुझे युवा- गाँधी, अधेड़ – मोदी और उनके सिपहसालारों का उदहारण देने की आवश्यकता है?

विपक्ष का काम सदन में अन्दर शोर – सन्नाटा फ़ैलाने का रह गया है| शासन को इस चुनाव से उस चुनाव तक की निरंकुशता उपहार में मिल रही है| सफलता –  असफलता देश और संसद की सांझी परिणति न रहकर सत्ताधारी कुल विशेष कार्यव्यवहार बताई जाने लगी है| विपक्ष का यही अवकाश दिल्ली में अनगढ़ता के लिए अवसर बन गया है|

पिछले दशकों में विचार के स्थान पर व्यक्ति के नाम पर चुनाव लड़ें लादे जा रहे है| भारतीय लोकतंत्र के कुलीनतंत्र को अब निर्वाचित निरंकुशता में बदला जा रहा है| यह चाहे गाँधी के नाम पर हो रहा हो या मोदी के नाम पर|

मुझे यह तथ्य भी आशंकित करता है कि “अनगढ़ अराजकता” भी एक व्यक्ति के नाम पर सिमटती और विमर्श बिछुड़ता दिखाई देने लगता है| मुझे कुछ आशा बंधती है जब यह व्यक्ति मात्र एक प्रतीक बनकर जनपथ पर गण – गणेश के बीच ठण्ड में ठिठुरता है|

संसद और संसदीय लोकतंत्र के अन्दर पसरी रहने वाली अव्यवस्था यदि सराजकता है, तो मुझे वर्तमान अराजकता से पंचायती लोकतंत्र की आशा है|