राजीव गाँधी और नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी के समर्थक, जिन्हें प्रायः मोदी भक्त या सिर्फ भक्त कहा जाता है अक्सर कांग्रेस के नेहरू – गाँधी परिवार के कट्टर आलोचक के रूप में उभर कर सामने आते हैं| राजीव गाँधी और उनके पुत्र राहुल गाँधी अक्सर उनके निशाने पर बने रहते हैं| नरेन्द्र मोदी के आलोचक मोदीकाल की तुलना आपातकाल या इन्दिराकाल से करते हैं| उधर एक समालोचकों के एक वर्ग को लगता है कि मोदी अपनी तुलना भारत के प्रथम गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल या भारत में आर्थिक सुधारों के प्रणेता पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के करना पसंद करेंगे| परन्तु नरेन्द्र मोदी की बहुत सी बात्तें राजीव गाँधी से मेल खातीं हैं|

भविष्य स्वप्न

राजीव गाँधी को अपने युवा अवस्था में राजनीति से दूर अपना करियर बनांते देखा गया था और वह एक पायलट थे| नरेन्द्र मोदी अपनी युवा अवस्था में एक ऐसे संगठन में काम करते थे जिसका कम से कम घोषित उद्देश्य समाजसेवा और धर्म का उत्थान है| भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को राजनीति में हस्तक्षेप करते देखा जाता है मगर उसके लिए कार्य करना कम से कम नरेंद्र मोदी की युवा अवस्था में राजनीति में आने का सुरक्षित मार्ग नहीं था| दोनों व्यक्तित्व अपने आप से नहीं वरन अपने आदरणीयों के निर्णय या राय के कारण राजनीति में आयें हैं| राजीव गाँधी के मामले में निजी परिवार और नरेंद्र मोदी के मामले में संघ परिवार ने मुख्य निर्णय या राय व्यक्त की|

मुख्य अनुभव

दोनों ने राजनीति कि वास्तविक शिक्षा सक्रिय राजनीति में आने के बाद ली और प्रधानमंत्री बनते समय दोनों के सहयोगी केन्द्रीय राजनीति के लिए उनको योग्य नहीं मानते थे परन्तु उनकी बढ़ती लोकप्रियता के आगे नतमस्तक थे| दोनों के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ उनके चयन से अन्दर ही अन्दर संतुष्ट नहीं माने जाते थे|

दंगे और नरसंहार

दंगे और नरसंहार से निपटने में दोनों अपने अपने शासन काल में असफल माने जाते हैं| यहाँ तक कि दोनों के ऊपर उन नरसंहारों में खुद से शामिल होने या उसका नेतृत्व करने का आरोप लगते रहते हैं| दोनों के समर्थक दुसरे के काल में हुए नरसंहार को अपने अपने नेता के राजनितिक बचाव में प्रयोग करते हुए सहअस्तित्व का परिचय देते हैं|

लोकप्रियता

दोनों नेता अपने समय के युवा वर्ग में बहुत लोकप्रिय हैं| उम्र के तमाम अंतर के बावजूद उन्हें अपने समय में युवावर्ग में लोकप्रियता हासिल हैं| दोनों नेता अपने अपने समय में संचार माध्यम में छाये रहे हैं| बुजुर्ग वर्ग दोनों के शंका से देखता था और असहाय था|

विश्व नेता

दोनों नेताओं में अपने आप को विश्व नेता के रूप में स्थापित करने की ललक देखी गयी| जहाँ राजीव गाँधी को बहुत से अन्तराष्ट्रीय महत्व के निजी सम्बन्ध विरासत में मिली, वहां नरेंद्र मोदी को ख़राब अन्तराष्ट्रीय छवि के साथ मैदान में उतरना पड़ा| मगर नरेंद्र मोदी को अपने प्रचार तंत्र और विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से समर्थन मिल रहा है| परन्तु दोनों की विदेश नीति हमेशा प्रश्नचिन्ह के साथ देखी जाएगी| जहाँ राजीव गाँधी श्रीलंका के साथ सम्बन्ध बिगड़ने के दोषी माने जाते हैं वहीँ नरेंद्र मोदी नेपाल के साथ भारत के पुराने संबंधों को कम से कम फोरी तौर पर बिगाड़ बैठे हैं|

नई सदी

राजीव गाँधी जहां अपनी सदी के अंत के डेढ़ दशक पहले २१वीं सदी की बात करते नहीं थकते थे, वहीँ मोदी अपनी सदी के प्रारंभ के डेढ़ दशक बाद २१वीं सदी की बात करते दिखाई दे जाते हैं| दोनों के भविष्य स्वप्न दूर तक जाते हैं, जिन पर जमीनी अमल के बारे में संदेह दोनों स्थिति में बना रहता है|

सूचना प्रद्योगिकी

राजीव गाँधी का कंप्यूटर प्रेम उनके काल में चर्चा का विषय था| उन्हें देश में सूचना क्रांति का मसीहा कहा जा सकता है| उनके समय में उनके विरोधी कंप्यूटर पर सरकार और देश के बहुत अधिक आश्रित हो जाने का खतरा देखते थे| इधर नरेंद्र मोदी को भी सामाजिक सूचना क्रांति के मसीहा के रूप में देखा जाता है| निर्वावाद रूप से वो सामाजिक सूचना क्रांति का अपना चेहरा हैं| भले ही सामाजिक सूचना पटल पर उनके समर्थकों से समाज परेशान होने की बात करता है|

कैमरा

राजीव गाँधी के समय में मोबाइल फ़ोन का प्रचार नहीं था न ही डिजिटल कैमरा था| मगर राजीव देश – विदेश में पर्याप्त घूमे और उनके चित्र मीडिया में आते रहे| दोनों नेताओं को फ़ोटो खींचने का भी बहुत शौक माना जाना है| क्योंकि उस समय सेल्फी नहीं थे, राजीव अक्सर फ़ोटो खींचते भी नजर आते थे| वर्तमान में मोदी को सेल्फी खींचने का शौक है| मोदी का कैमरा प्रेम अगर आज मुहावरा है तो राजीव ने भी कैमरे के लिए कम काम नहीं किया|

राजीव गाँधी और नरेंद्र मोदी के समर्थकों को समझना होगा कि दुनिया छोटी है और एक ही धुरी पर घुमती है|

मोदी और विवाह

नरेन्द्र मोदी के विवाह के बारे में जबरन दबाये और उठाये जाते विवाद से केवल दो बातें सामने आतीं है:

१.      भारतीय समाज में बाल विवाह न केवल दो व्यक्तिओं बल्कि तो परिवारों को कई दशक का दुःख देने वाली बुराई है जिसे समाप्त होना चाहिए|

२.      धार्मिक अतिवादिता न तो किसी को तलाक लेने देती है न ही इतनी हिम्मत ही देती है कि वह खुल कर अपने विवाह और उसके असफल होने की बात स्वीकार कर सके| असफल विवाह बुरी याद की तरह ढोए जाते हैं या उन्हें धोये जाने का यत्न किया जाना होता है|

भारतीय समाज में विवाह एक सामाजिक सम्बन्ध है और पति –पत्नी का आपसी सम्बन्ध उनका निजी मसला है| यह एक गहन अंतर है|

हम नरेन्द्र मोदी से यह तो पूछ सकते हैं कि उनकी पत्नी का नाम क्या है, हम यह पूछ सकते हैं कि पहले किसी दस्तावेज (एफिडेविट) में उन्होंने पत्नी का नाम क्यों नहीं बताया; हम यह पूछ सकते हैं कि इस बार उन्होंने नाम क्यों बताया, हम हम यह भी पूछ सकते हैं कि कौन सा दस्तावेज झूठ है|

हम पति –पत्नी के आपसी सम्बन्ध और उसकी सफलता – असफलता के बारे में नहीं पूछ सकते|

हम मोदी को भगौड़ा इस लिए नहीं कह सकते कि उनका विवाह असफल रहा या नगण्य रहा| उन्हें विवाह से भगौड़ा कह सकने का अधिकार अगर किसी को है तो उनकी पत्नी को है, अथवा पत्नी की शिकायत पर उनके दोनों परिवारों और न्यायलय को है|

हम मोदी को भगौड़ा इसलिए मात्र कह सकते है कि वो पत्नी होने का सच बताने से भागते रहे| पत्नी का नाम न बताना झूठ नहीं है बस वो सच से भागना या सच छुपाना है|

साथ ही हम भारतीय नारी की अवधारणा पर कितना भी गर्व करें, क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भारतीय परित्यक्ता स्त्रिओं के पास हमें विकल्प ही क्या छोड़ा है?

नोट: पिछले वर्ष आया नया हिन्दू विवाह कानून हिन्दू पुरुष को तलाक लेने की हिम्मत करने की अनुमति नहीं देता| हिन्दू पुरुष के लिए पत्नी त्याग पत्नी को तलक देने से अधिक सस्ता सुन्दर तरीका बन गया है|