आधुनिकता की मैं मैं – हमारा हम


दिल्ली से अगर आप पूर्व दिशा की ओर जाती हुई किसी ट्रेन में बैठ जायेंगे तो आपको मैं – मैं  कम सुनाई देगा, हम – तुम अधिक| तू में भी महानगरी हेकड़ी नहीं होगी, प्यार बरसेगा|

मैं – मैं में अजब ही बात है| जिन्दगी में हम – आप मैं के फेर में इतने फिर जाते हैं कि इकठ्ठे होकर भी हम नहीं हो पाते| मैं अहंकार के अहम् का अनुवाद बन गया है| भले ही जरूरत हो या न हो; हम मैं ये, मैं वो, मैं तेरा, मैं तेरी, के चक्कर में अपने मैं को साबित करने के फेर में लगें हैं| भूल जाते हैं साबित होने के लिए तो आज तक भगवान् भी साबित नहीं हुआ| न ही आज तक भगवान् नकारा जा सका है| हाड़ – मांस का इंसान क्या एक दूसरे को साबित करेगा या नकारेगा|

मैं का चक्कर है कि लोग बहुत दिनों बाद मिलते हैं और रीयूनियन का फ़ोटो खींच कर फेसबुक पर डालने के बाद दोस्तों की भीड़ में अकेले हो जाते हैं| दोस्तों में महफ़िल में, हर कोई अपना मैं  जापता है, दोस्त भी मैं मैं में हम नहीं हो पाते|

महानगर से बाहर लोग अपने एकांत में भी महफ़िल सजा लेते हैं – हम बने रहते हैं| मैं दूर रहता है उनसे| उन्हें अपना मैं साबित नहीं करना होता|

मैं के साथ दिक्कत यह भी है कि हमेशा तू तू मैं मैं करता है यह| हम वाला कभी इतना नहीं गिर पाता कि अनजान को भी तू बोल दे, दुश्मन भी आप कहकर पुकारा जाता है|

कुछ अंग्रेजीदां कहते हैं कि हम वालों का हम कब एक वचन है कब बहुवचन, समझ नहीं आता| अंग्रेजी का यू कब आप की इज्ज़त देता है, कब तुम का अपनापन और तू की मार? यह नहीं समझ आता अगर तो आप अपनी धरती से कट गए हो और पराई से जुड़ना तुम्हारे बस का नहीं| मिमियाते रहिये – बकरा बोल|