शाकाहारी – हाहाकारी


हमारे देश की शाकाहारी – हाहाकारी परंपरा में शाकाहार कम हाहाकार ज्यादा है| देश में अगर खाने को लेकर वर्गीकरण कर दिया जाए तो शायद लम्बी सूची तैयार हो जाएगी|

पूर्ण जैन, अर्ध जैन, शुद्ध शाकाहारी, लहसुन – प्याज शाकाहारी, लहसुन – प्याज अंडा आहारी, मांसाहारी, गौ-मांसाहारी, शूकर – मांसाहारी और न जाने क्या क्या| कुछ विद्वान कीटाहारी, मूषकाहारी, विशिष्टाहारी  आदि की बातें भी करते हैं|

इन सभी वर्गों में दोगले लोगों का भी अपना अलग वर्ग भी है| कुछ लोग घर पर शाकाहारी और बाहर मांसाहारी होते हैं| कुछ हफ्ते में तीन दिन सर्वभक्षी होते हैं मगर अन्य दिन शुद्ध वाले सात्विक शाकाहारी| कुछ केवल ईद वाले दिन प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेते हैं| आजकल फेसबुकिया जात वाले  कुछ लोग केवल बकर ईद वाले दिन शाकाहारी रहते हैं मगर अगले दिन…|

अब यह मत पूछिए कि मेरा आहार पुराण क्यों चल रहा है|

अभी एक यात्रा के दौरान मित्र मिले| उन्हें बताया गया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और अंडा – दूध का सेवन नहीं करता| सौभाग्य से हम एक लम्बी दूरी की बस में सहयात्री थे, जिस निर्जन स्थान पर बस रोकी गई वहां अंडा और चाय के अलावा कुछ खाने के लिए नहीं था| मेरी पत्नी जी ने मेरे लिए भी आमलेट बोल दिया, मगर बेचारे हमारे (हाहाकार – ग्रस्त) मांसाहारी मित्र अपनी शुद्ध शाकाहारी पत्नी के हाहाकार में विदेशी ब्राण्ड का वरक (चिप्स) चबा कर काम चला रहे थे| मुझ “शाकाहारी” के सहारे उन्होंने अपनी पत्नी को समझा बुझा कर आमलेट की अनुमति प्राप्त की| मगर मुझसे बार बार हकीकत में आने का आग्रह करते रहे| मैंने उन्हें बताया कि दूध चिकित्सक ने बंद किया है और अंडा स्वभाव बस नहीं खाता| मेरी पत्नी द्वारा आमलेट खाने के बाद भी उन्हें लगता रहा कि या तो मैं पत्नी के दबाब में शाकाहारी हूँ या हम दोनों ही डरपोक हैं|

मजे की बात यह रही की उस शाम जब हम कई लोग मिलकर साथ खा रहे थे तो अपनी मांसाहारी थाली लेकर आ पहुंचे| उनकी पत्नी बिफर गयीं, सब “अच्छे लोगों” के बीच “जंगली खाना” खाना लेकर क्यों आ गए| उन्होंने हम सबकी थालियों की ओर कसकर निगाह डाली, और बात बढ़ने से पहले वो सरक लिए| अगले शाम चुपके से मेरे पास आये और साथ टहलने चलने का आग्रह हुआ| जैसे ही अंडे का ठेला दिखा बोले चलो, एक एक आमलेट हो जाए; मेरी हालत हँस हँस कर ख़राब हो गई|

मैंने बोला, भाई आप खाइए, स्वाद से खाइए, मन से खाइए, मन में अपराधबोध मत पालिए, दूसरे का बहाना मत देखिये, सुखी रहेंगे|

बोले आप वाकई नहीं खाते| मैंने कहा; वाकई खाने न खाने का पता नहीं, मगर जीभ पर स्वाद नहीं चढ़ा है|

बोले मेरी पत्नी को मत बताना, कि मैं आमलेट खा रहा हूँ| मैं मुस्करा कर रह गया|

पर्युषण में फल, क्रिसमस में वाइन


सभी धर्मों का आदर किया जाना चाहिए| इसके लिए निजी विश्वास, मान्यता, शौक और लत से भी उठा जाना चाहिए|

शाकाहारी होने के नाते मुझे निजी रूप से इस बात से कोई कष्ट नहीं है कि मांसाहार को पर किसी त्यौहार के नाम पर प्रतिबन्ध लगाया गया है| मगर एक नागरिक होने के नाते मुझे हर किसी के धर्म, आचार, विचार, व्यक्तित्व, आदर, शौक, स्वाद, भोजन आदि की स्वंत्रतता के हित में बोलना चाहिए|

जब भी मेरे मांसाहारी रिश्तेदार मुझे मांसाहार के लिए दबाब डालते है, जब भी मेरे पियक्कड़ मित्र मदिरापान के लिए दबाब डालते है, जब भी मेरे सिनेमा प्रेमी मित्र मुझ पर सिनेमा देखने का दबाब डालते हैं – मुझे कष्ट होता है|

जब भी मेरे रिश्तेदार मुझे स्ट्रीट फ़ूड खाने से रोकते हैं, मेरे मित्र साहित्य पढने से रोकते हैं, मेरे सहयोगी हिंदी बोलने पर टोकते हैं, हितैषी साधारण कपड़े पहने से रोकते है – मुझे कष्ट होता है|

हमें कष्ट होता है जब हमें हमारे हिसाब से जीने के लिए नहीं मिलता| प्रकृति ने हर प्राणी, हर शरीर, हर आत्मा, हर मन, हर सोच को अलग बनाया है| तो हम प्रकृति में हस्तक्षेप नहीं कर सकते| कष्ट होता है|

  • यदि किसी जीव को कष्ट होता है, क्या यह उचित है?
  • यही मेरे कारण किसी और को कष्ट होता है तो यह मेरी हिंसा है|
  • यदि मुझे कष्ट होने से भी किसी को प्रसन्नता होती है तो यह मेरा परोपकार है|
  • यदि मुझे कष्ट न हो इसलिए मैं किसी को प्रसन्न नहीं होने देना चाहता तो यह भी हिंसा है|
  • क्या मांसाहार पर प्रतिबन्ध, मांसाहारी समुदाय के विरुद्ध हिंसा नहीं है?

सिंह और हिरण के जीवन संघर्ष में सिंह प्रकृति से हिंसक है| हिरण कष्ट के साथ मर जायेगा |

हम सिंह और हिरण के जीवन संघर्ष में जब भी हिरण को बचाने की बात करते हैं, तो हम अति हिंसक है, क्योकि उस सिंह के प्रति भी हिंसा कर लेते है जो प्रकृति से ही हिंसक है| हिरण के बचने से सिंह निश्चित ही कष्ट से मर जायेगा|

(कु)तर्क दिया जाता है कि सिंह प्रकृति से मांसाहारी है, मानव नहीं| परन्तु प्रकृति में हमें मांसाहारी मानव  बहुतायत में मिलते हैं और शाकाहारी अपवाद में {भारत जैसे कथित शाकाहारी देश में शाकाहारी मात्र 30% प्रतिशत हैं}| जो भी हो, हम किसी के मन को आहत क्यों करें, क्यों कष्ट दें, क्यों उसके प्रति हिंसा करें??

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अभी जो प्रतिबन्ध आदि भोजन पर लग रहें है; यह आगे प्रतिक्रिया नहीं देंगे क्या?

अगर पर्युषण पर सभी एक मत के अनुसार सभी भारतीय शाकाहारी रहेंगे तो क्रिसमस पर सभी भारतीय प्रसाद में वाइन क्यों न पीयें? क्यों न दुर्गा पूजा पर सभी बलि का प्रसाद लें? क्यों न ईद पर सभी क़ुरबानी का प्रसाद आदर पूर्वक लें|

भारत हैं, बहुत से धर्म ने ३६५ दिन के एक वर्ष में हम ५०० उत्सव मनाते हैं? क्यों न सभी के भावनाओं का आदर कर कर सभी भारतीय लोग अपनी निजी धर्म, आस्था, विश्वास, मान्यता, शौक और लत से ऊपर उठकर क़ानूनी बंधन के साथ सभी धर्मों का पालन करें? क्यों न हम शाकाहार के उत्सव पर  जबरन शाकाहार और मांसाहार के उत्सव पर जबरन मांसाहार करें?

जिनसे नहीं हो पाएगा वो, दूसरों पर जबरन अपनी खाद्य मान्यताएं न थोपें| शाकाहारी हिंसा न करें|