मांडू के राजमहल


मांडू जाकर लगा कि कभी यहीं जन्नत बसती होगी| अगर पुरातत्व विभाग के सूचनापट्ट की मानें तो ४८ पुरातत्व महत्त्व के स्थान आज भी मांडू में हैं| बताया गया कि कभी मांडू में ७०० मंदिर थे जिनमें से ४०० जैन मंदिर थे| अपने स्वर्णकाल में विश्व के सबसे बड़े महानगर में से एक मांडू को देखने से उस समय की वास्तुकला के गौरव को समझा जा सकता है| बहुत से समकालीन भवनों में मुझे उस भव्यता और समझ – बूझ का अनुभव नहीं होता जितना पंद्रहवीं शताब्दी के जहाज महल में होता है| खासकर महल के जल प्रबंधन को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता| जिस वर्षा जल संचयन (rain water harvesting) की बात आज हम रोज कहते सुनते हैं, वो वहां बहुत सुन्दर रूप में मौजूद है| आज भी मांडू में पानी की किल्लत है मगर उस काल के संघर्षपूर्ण जीवन में पानी का न होना राज्य के लिए तुरंत जीवन – मरण का प्रश्न हो सकता था| शायद, मांडू का पतन पानी के रख रखाव के पुराने तरीकों को छोड़ दिए जाने के कारण ही हुआ होगा| इस माह जब फरक्का शहर के विद्युत् संयंत्र को पानी की कमी के कारण बंद करना पड़ा, मांडू का बूढ़ा जल – प्रबंधन हमारी आधुनिक मूर्खता का मजाक उड़ाते हुए खड़ा है| मुझे लगता है केवल जहाज महल का जल – प्रबंधन देखना ही मांडू जाने को सार्थकता देने के लिए काफी है| जहाज महल में आपको चौथे और छठे मंजिल पर तरणताल (swimming pool) देखने को मिलते है तो उन तक साफ पानी पहुँचाने का शानदार तरीका भी मिलता है| पानी के साफ़ करने के लिए पूरा संयंत्र भी उस समय बनाया गया था, जिसके अवशेष मन मोह लेते हैं|

छत पर तरणताल

छत पर तरणताल

मांडू पहुँचते ही सबसे पहले आपको आदिवासी घरों की बाहरी दीवारों पर बने चित्रण का देखकर आनंद होता है| आज मांडू की अधिकतर आबादी आदिवासी है जो छोटे छोटे घरों में रहती है|

मांडू में यूँ तो हर चप्पे पर इतिहास मौजूद है, मगर शाही महल परिसर का आनंद अलग ही है| हम मांडू पहुँचते ही जहाज महल और हिंडोला महल देखने चल देते हैं| मगर परिसर विशाल है और इसमें बहुत से भवन हैं| हिंडोला भवन की दीवारें आज भी दावत देतीं हैं किसी राजसभा के लिए|

मुझे शाही हमाम बहुत आकर्षित करता है| बहुत रूमानी हैं, उसकी छत में बनाये गए चाँद –सितारे| उस ज़माने में गर्म और ठण्डे पानी के दो नल एक साथ मौजूद हैं| जन्नत का शाही गुसल और कैसा होता होगा?

मांडू - शाही हमाम : स्नानागार

मांडू – शाही हमाम : स्नानागार

नाट्यशाला में आवाज को सबसे पीछे तक पहुंचाने के लिए दीवारों में खोखले रास्ते बनाये गए हैं| प्रकाश संयोजन बेहद उम्दा बन पड़ा है| रिहायश के लिए शानदार इंतजाम है| आप अन्दर रहकर भी दुश्मन से बच सकते हैं| पानी और ठंडी ताजी हवा की कोई कमी नहीं होती| आज यहाँ उस ज़माने में अफ्रीका से लाई गयीं चमगादड़ें अमन – शान्ति से रहतीं है|

मांडू लोहानी दरवाज़े से आप शानदार सूर्यास्त देख सकते हैं| यह दिन का आख़िरी पड़ाव है| हम बहुत बड़ी झील के किनारे बने मध्य प्रदेश पर्यटन के मालवा रिसोर्ट में पहुँच रहे है| शांत सुन्दर सुरीली शाम हमारा स्वागत करती है| हम आराम करने के लिए खुली हवा में बैठे खिरनी के बड़े पेड़ के नीचे बैठे है| देशी विदेशी सेलानी रानी रूपमति और बाज बहादुर के बारे में चर्चा कर रहे हैं| संगीत के दो महान फ़नकारों का मांडू में प्रकृति का संगीत हमें रूमानी रूहानियत की ओर ले जा रहा है| सामने पहाड़ी के पीछे हो तो उन दोनों की आत्माएं बसती हैं|

मालवा की शाम ख़ूबसूरत और सुबह शानदार है| हम सुबह छः बजे रानी रूपमती के महल के लिए चल देते हैं| नर्मदा मैया का प्रतीक रेवाकुण्ड यहीं पास में है| रानी रूपमती बिना नर्मदा के दर्शन किये अन्नजल ग्रहण नहीं करेंगी| इसलिए नर्मदा की ओर अंतिम पहाड़ी पर है रानी रूपमती का महल| वैसे रहती हो रानी बाज बहादुर के साथ ही हैं, मगर रोज आती हैं, मीलों दूर स्तिथ नर्मदा के दर्शन करने के लिए| आज धुंध है, हमें नर्मदा मैया दर्शन नहीं देतीं| इतना दूर देखना यूँ भी मुश्किल है| यहाँ अस्तबल होता था और यह दूर पूर्व में होने वाली गतिविधि पर निगाह रखने के लिए निगरानी चौकी भी था| बाज बहादुर का महल यहाँ से दिखाई देता है|

बाज बहादुर का महल, जहाँ संगीत रचता – बसता था| यहाँ की दीवारें और कमरे संगीत के हिसाब से बनवाए गए हैं| अन्यथा यह महल साधारण दिखाई देता है| यहाँ पर होतीं थीं रानी रूपमती, बाज बहादुर और अन्य बड़े संगीतकारों की महफ़िलें|

थोड़ी दूर पर हैं दाई माँ के मकबरे| बताया गया, यह कभी जच्चा – बच्चा अस्पताल की तरह प्रयोग हुए और बाद में मकबरे बने| मगर आज यह इको – पॉइंट की तरह प्रयोग होते हैं|

अब जामी मस्जिद की ओर जा रहे हैं| यह देखने में काफी शानदार ईमारत है| इसके पीछे है होशंगशाह का मकबरा, जिसमें वास्तव में कोई दफ़न नहीं हैं मगर ताजमहल बनाने वालों ने इस से प्रेरणा ली| इसे भारत में संगमरमर की सबसे प्राचीन इमारतों में माना जाता है| इसके साथ बने दालान को हिन्दू शैली में बने होने के कारण धर्मशाला कहा जाता है| एक कथा यह भी है कि जामी मस्जिद, मस्जिद के रूप में प्रयोग होने से पहले यह शाही दरबार के रूप में प्रयोग होती थी और तब शायद यह धर्मशाला शाही मेहमानों के लिए अतिथि गृह रही हो|

मांडू अपने शानदार समय में मालवा की दीर्घकालीन राजधानी धार से टक्कर लेता रहा| मगर इसका इतिहास और भूगोल धार से हमेशा प्रभावित रहा| राजा भोज की नगरी धार के लिए भले ही यह सेन्य दुर्ग के रूप में बसाया गया हो, मगर यह पूरी शान से धार या किसी भी अन्य ऐतिहासिक महानगरी को टक्कर देता है|