भगौरिया-भ्रमण

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उमराली में भगौरिया

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उमराली में भगौरिया

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उमराली में भगौरिया

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बालपुर में भगौरिया

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बालपुर में भगौरिया

सभी चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

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हँसते इश्कियाते मुस्कुराते

मुद्दा तो यही है न, इश्क़ और हँसी पर लिखना है| वो भी अपने “बैटर हाफ” वाला इश्क़; यानि, वो इश्क़ जो होता है तो कोई बताता नहीं, नहीं होता तो सब बताते हैं| तो भाई, बैटर हाफ के साथ, इश्क़ की ईमानदार बात उन्हीं दिनों सो सकती है जब वो वास्तव में बैटर हाफ न हों|

दरअसल, बात उन दिनों की है जब न इश्क़ था, न इश्क़ की बातें, न शादी थी, न बेग़म| घर वाले जान के पीछे पड़े थे| और सारे नाते रिश्तेदार सब साजिश में शमिल थे| कहा गया, मिल लो, बाद में चाहो तो मना कर देना|

लाला की नौकरी में छुट्टी मिलना भी बोनस मिलने की तरह होता है| दोनों तरफ से कहा गया, हम आते हैं किसी इतवार| जिस शहर में मैं नौकरी करता था वहाँ, रहने का ठिकाना सब गड़बड़ था| तो मुलाकत के लिए कॉफ़ी हाउस तय हुआ| साथ में बता दिया गया कि लड़की हमारी चाय कॉफ़ी तक नहीं पीती, तो उसके लिए पानी, दूध या जूस का इंतज़ाम किया जाये| पहली बार कोई आ रहा था मुझे से मिलने और वो भी शिकार फांसने; उस पर खातिरदारी के भी नखरे उठाने थे|

दुआ – सलाम हाय – हेलो के बाद आप बैठिये आप बैठिये हुआ| मेजबानी करने की जिम्मेदारी मेरी थी| सेल्फ सर्विस कॉफ़ी हाउस में मैं सबके लिए पानी और कॉफ़ी लाकर रखने लगा| मेरी होने वाली सासू माँ अपनी बिटिया जी के चाय-कॉफ़ी तक को हाथ न लगाने के किस्से बता बता कर माहौल बनाने की कोशिश कर रहीं थी| मेरे पिताजी डर कर बैठे थे कि कहीं ये लड़की शादी के बाद घर में चाय – कॉफ़ी  पीना भी न बंद करा दे| सबके लिए कॉफ़ी लाते लाते मुझे डर लगा कि कहीं घर में नुक्सानदेय काली – पीली बोतलें न आने लगें| सर्विस काउंटर पर सेल्स गर्ल ने चुहल की, सर, शादी के बाद तो आपको बराबर के ठेके वाला ड्रिंक ही पीना पड़ा करेगा|

जब में होने वाली पत्नी जी के लिए मौसमी का ताजा जूस लेकर सर्विस काउंटर से वापिस मुड़ा, तो मेरे पिताजी मुस्करा रहे थे, ससुर साहब कॉफ़ी हाउस का मीनू उल्टा ही पढ़ रहे थे, उनका भाई मोबाइल में स्नेक खेल रहा था, मेरी बहन अपनी होने वाली भाभीजी को अजीब से देख रही थी| सासू माँ, अपनी साड़ी के पल्लू से वो कॉफ़ी साफ कर रहीं थी जो अभी तक नहीं गिरी थी|

मेरी सीट हाथ से जा चुकी थी, मेरी पसंदीदा कॉफ़ी हाथ से जा चुकी थी| उस दिन इश्क़ तो हुआ, समय की नज़ाकत देखकर हँसी बाद के लिए टाल दी गई|

मेरी सासू माँ आज भी कायम है कि उनकी बेटी चाय – कॉफ़ी नहीं पीती| ससुर साहब को लगता है शादी के बाद लड़कियों में कुछ परिवर्तन हो जाता है| पत्नी के ससुराल वाले जब तब इस किस्से को लेकर हम दौनों पर हँसते हैं|

मैं रोज पत्नी के लिए भी कभी कभी चाय – कॉफ़ी बनाता हूँ और मुस्कराहट के साथ सर्वे करता हूँ| पत्नी जी आज भी मेरे साथ हँस हँस कर दावा रखतीं हैं कि वो चाय कॉफ़ी नहीं पीतीं|

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पुश्तेनी गाँव की यात्रा

शहर में पले बढ़े बाबू साहब लोग गाँव – देहात के बारे में इस तरह बात करते हैं जैसे किसी जंगल की बात कर रहे हों| हम एक अनपढ़, असभ्य, अविकसित, लोक की कल्पना करते हैं जिसमें घासफूस खाने वाले जानवर आदमखोर आदमियों के साथ रहते है|

गाँव का एक अलग लोक होता है| परन्तु हमारी कल्पनाशीलता उस कच्चे माल से बनती है जिसे गाँव से आने वाले लोग अनजाने में ही हमें दे जाते हैं| बड़ी बड़ी ऊँची इमारतें, कंक्रीट की सड़कें, फ्लाईओवर, ब्लीच और क्रीम से नहाये हुए चिकने चुपड़े चहरे उन्हें शहर में परीलोक का आभास देते हैं| भौचक ग्रामीण अक्सर उन बातों और चीजों के बारे में बताते हैं जो शायद उनके पास नहीं होतीं हैं|

जब तक शहरी लोग गाँव नहीं जाते तब तक हमें उन बातों और चीजों का अहसास नहीं होता जो शहर में नहीं बचीं है|

अक्सर हम शहर की भागदौड़, भीड़, अकेलेपन और बनावट को दुत्कारना चाहते है और यह चीजें गाँव से लौटें पर खटकने लगतीं है|

लगभग पंद्रह वर्ष पहले मैं उस गाँव में गया था जहाँ आजादी के समय पुरखों की जमींदारी हुआ करती थी| गाँव में कुल जमा सत्तर घर थे, शायद चालीस से भी कम घरों में खेतीबाड़ी का काम होता था| दस घरों के लोग सरकारी नौकरी और मास्टरी की नौकरी में थे| बाकी के घरों में अन्य काम थे, जिन्हें हम प्रायः छोटा मोटा काम कहते हैं|

गाँव में एक चीज बहुत थी; प्रेम| हमारे गाँव में घुसते ही हमारे आने की खबर सारे गाँव को लग चुकी थी| सोशल नेटवर्क आज के फेसबुक और ट्विटर से तगड़ा था| जिन लोगों को हमारे उस गाँव से रिश्ते के बारे में नहीं पता था वो शर्मिंदा होकर किस्से सुन रहे थे और गाँव में हमारे परिवार के पुराने निशान पहचान रहे थे| हम गाँव के बीचों बीच के बड़े घेर में बैठे थे और किसी एक घर के मेहमान नहीं थे| हर घर में कुछ न कुछ हमारे लिए पक रहा था| जो लोग हमारे पुराने पडोसी थे उनमे खींचा तान थी कि कों हमने दोपहर का भोजन कराएगा| हमने नाश्ते का तो इतना ही पता है की हमने खाया कम बिगाड़ा ज्यादा; मगर दोपहर खाना हमने तीन घरों में खाया|

लेकिन सबसे मजेदार बात थी पानी!!

जी हाँ, हमें गाँव का पानी बहुत पसंद आया उसमें एक खारी – मीठा सा स्वाद था| हम उस पानी को पीकर तृप्त हो जाना चाहते थे| जब बहुत पी चुके तो हमने उस पानी की तारीफ करनी शुरू कर दी| मगर जो लड़की हमें पानी पिलाने पर लगी हुई थी वो हँसते हँसते लोट पॉट ही गयी, “शहर वाले तो बहुत सीधे होते हैं, खारे भारी पानी में चीनी मिला कर पिलाया जा रहा है|”

आज की शहरी भाषा में कहें तो “एक्स्ट्रा रिच मिनरल वाटर”!!

 

हर पल मेरी बातें

 

हर पल

मेरी बातें करता|

 

सुबह शाम

मोबाइल मचलता|

 

जागना, सोना, खाना, पीना,

बिन मेरे न जीना|

 

चल दीं, पहुँचीं,

हर जगह पर क्यों होती हो,

बारिश धूप में क्यों रोती हो|

 

चिंता, हर दम हर पल,

नींद उड़ा बैठा है|

 

सुबह छोड़ना दफ्तर तक,

लेने आना रोज,

हरपल उसकी आँखें

करती मुझको खोज|

 

न चिंता खुद के खाने की

न अपने दफ्तर जाने की|

 

कितना ही अच्छा है,

कितना ही भोला है,

कितना प्यार भरा है,

कितना ध्यान धरा है||

 

न पूछो उसकी बातें,

सोचती हूँ,

क्या होगा जब पाऊँगी,

उसने जीवन में सिर्फ प्यार करा है,

मुझको पाने की खातिर,

सोंप सका क्या मुझको,

अपने जीवन की थाती?

 

क्या माता की आशा,

क्या पिता का तप,

क्या भाई के बल,

क्या बहन का स्नेह,

कुछ मान रख पाया है?

 

पढ़ न सके तुम मेरी खातिर,

कर न सके तुम मेरी खातिर,

उन्नति के पथ की बातें?

 

प्रेम की पोथी बांची थी जब,

ज्ञान की पोथी क्यों छोड़ी?

करते थे आने जाने का क्रम,

कर न सके तुम थोड़ा श्रम?

 

मैं प्रेम तुम्हारा हूँ,

जीवन का धिक्कार नहीं,

जो उन्नति को रोके,

वो सच्चा प्यार नहीं||

 

महंगी गाड़ी और हीरा

एक प्रसिद्ध फ़िल्मी संवाद है; “अगर लड़की स्कूटी पर हो तो प्यार हो जाता है, मगर मर्सडीज़ में हो तो करना पड़ता है|”

साथ ही एक पुरानी कहावत भी है; “लडकियों का सच्चा दोस्त हीरा ही होता है”|

अपने विद्यार्थी जीवन से ही हम उन युगल को देखते आयें हैं जिनमें एक पक्ष प्रायः पढाई, कमाई, या चमकाई में अपने साथी के मुकाबले बहुत कम होता है| परन्तु इन सभी मामलों में दूसरा साथी, प्रायः, पहले साथी को बहुत ही हंसमुख, ध्यान रखने वाला, पूर्णकालिक वफादार साथी मानता है| इन जोड़ों के बारे में प्यार अँधा है वाली कहावत का हम उदाहरण हमेशा देते रहते हैं|

मगर क्या यह जोड़े सदा साथ रहते है; शायद नहीं| मुझे लगता है बराबरी के प्रेम विवाह ज्यादा सफल होते हैं| प्रायः समाज असमान विवाह नहीं होने देता और अगर किसी प्रकार यह विवाह होते हैं तो कई समस्या आतीं हैं| मैं मानता हूँ कि यह समस्याएं परिवार द्वारा तयशुदा भारतीय शादियों में भी उतनी ही होतीं हैं, मगर पारिवारिक विवाहों में सारे लड़ाई- झगड़ें, मान- मुअव्वल और समझौते पूरे परिवार के होते हैं|

बेमेल प्रेम संबंधों पर भले ही परिवारों ने मुहर लगा दी हो तब भी परिवार कभी भी इन जोड़ों के आपसी समस्या सुलझाने के लिए आगे नहीं आते| 

विवाह, प्रेम और कामुकता

 

यह प्रेममयी सप्ताह है| प्रेम आज सबसे कम चर्चित और सबसे अधिक विवादास्पद शब्द है| धार्मिक कट्टरपंथियों  ने इसे ममता, वात्सल्य, स्नेह, मित्रता और आदर का पर्याय बनाने का प्रयास किया है तो सांसारिक अतिवादियों ने कामुकता का|

विवाह और प्रेम की आपसी स्तिथि तो और भी खराब है| विवाह जहाँ धार्मिक या अधिक से अधिक सामाजिक सम्बन्ध है तो प्रेम हार्दिक या आत्मिक|

प्रेम विवाह के बाद भी प्रेम बरकरार रहेगा अथवा विवाह में प्रेम उत्पन्न होगा?

प्रेम में कामुकता आएगी या कामुकता में भी प्रेम बना रहेगा?

जीवन की वास्तिविकता को स्वीकार करें या न करें, परन्तु स्तिथि कुछ इस प्रकार है:

सप्रेम अवैवाहिक कामुक सम्बन्ध!   

अप्रेम अवैवाहिक कामुक सम्बन्ध!

सप्रेम वैवाहिक कामुक सम्बन्ध!           

अप्रेम वैवाहिक कामुक सम्बन्ध!

सप्रेम वैवाहिक सामाजिक सम्बन्ध!  

अप्रेम वैवाहिक सामाजिक सम्बन्ध!

सप्रेम विवाहेतर कामुक सम्बन्ध!          

अप्रेम विवाहेतर कामुक सम्बन्ध!

सप्रेम विवाहेतर सामाजिक सम्बन्ध!  

अप्रेम विवाहेतर सामाजिक सम्बन्ध!

मैं न तो विवाह की संस्था पर प्रश्न उठता हूँ, न प्रेम की वास्तविकता पर| परन्तु क्यों प्रेमपूर्ण सम्बन्ध समाज की वयवस्था दम घोंट दिया जाता है|

क्या हमें प्रेम की कद्र करना नहीं आना चाहिए?

यदि विवाह बहुत पवित्र है तो संन्यास का पलायन क्यों है?

यदि संन्यास संसार की पूर्णता है तो स्त्री का त्याग क्यों है? घर छोड़कर भागना क्यों है?

यदि विवाह की संस्था इतनी पवित्र है तो तलाक का बबाल क्यों है?

यदि तलाक, विवाह का कलंक है तो विवाह में कुंठा क्यों है?

प्रेम को जीवन की पूर्णता मानने से हमारा इन्कार क्यों हैं? केवल विवाह को ही प्रेम मानने की हठ क्यों है?

शब्दहीन संवाद मेरे

शब्दहीन संवाद मेरे
जाने कितने सार्थक हैं
जाने कितने कारगर हैं
जाने कितने नाटकीय हैं?
 
परन्तु हैं अवश्य
कुछ न कुछ|
 
सुनता है कोई
आँखों से, ह्रदय से,
पर कैसे, कितना
जाने किस अर्थ में?
 
उनकी सरलता और गूढता के मध्य
संघर्ष रत ह्रदय के साथ,
साथ साथ नहीं चल पाता
मैं सदा मष्तिष्क के|
 
या मष्तिष्क पिछड़ता है
ह्रदय के इस दौर में|
 
शब्द हीन संकेत कहता हूँ
शब्द परक संकेत करता हूँ,
कंगाली के गीले आते सी
दुविधा बढ़ जाती है|
 
दूरियों के इस ओर मेरा साकार
दूरियों के उस ओर निराकार
कोई समझ नहीं पाता कुछ
सही, सटीक, सार्थक|
 
जो कि मैं समझाना चाहता हूँ
दूरियों के इस पार से|
 
क्योकि मेरे संवाद
शब्दहीन होते हैं बेशक
संकेत हीन नहीं रह पाते
हीनता के चंगुल में|
 
मेरा ह्रदय और मष्तिष्क
ढूंढता हैं क्रिया – प्रतिक्रिया
सुसमय, सटीक, सम्पूर्ण,
प्रतिक्रियाएँ सदा नहीं आतीं|
 
तपता रहता है ह्रदय
टीपता सा उस पार|
 
दूरियों के उस पार का
धुंधला सा प्रकाश बिंदु
निराशा मुक्त रखता है
आभायुक्त रखते हुए|
 
मुझे आशा है निरंतर
यह क्षितिज का सूर्य है
शिशु – बाल से यौवन तक
विस्तार पायेगा, उठते हुए|
 
ह्रदय में टिमटिमाता है भय
यह दिशा पश्चिम न हो|
 
संवाद प्रेषित करता हूँ निरंतर
शब्द हीन, यदा-कदा संकेत हीन
बेखबर इस भय से, कहीं
अन्धकार में न पाया जाऊं||
 
ऐश्वर्य मोहन गहराना
(यह कविता अप्रेल 1994 में लिखी थी, उस समय नव युवक के
 मन में उमड़ती प्रेम की व्यथा, दिमाग में घुमती ईश्वर की सम्भावना,
 जीवन की नितांत अनिश्चितता की कथा कहीं थी शायद मैंने|
उस समय जो टिप्पणी लिखी थी, प्रस्तुत है:
 “यह कविता किसी भी वाक्य में मेरी
 मेरी बात का एक वाक्य भी पूर्णता से
 नहीं कह पाती| परन्तु लिखने के बाद मुझे 
 निश्चिंतता है, मैं भाव व्यक्त कर सका|
 भले ही उस से नहीं, उन से नहीं जिनसे
 व्यक्त करना चाहता हूँ|”)