विश्व-बंदी २१ मई


उपशीर्षक –  परदेशी जो न लौट सके

इस से पहले कि अर्थव्यवस्था चले, उसका आधार डोलने लगा है| जिन्हें कुछ माह पहले तक मानव संसाधन कहा जा रहा था – अपनी असली औकात यानि मजदूर के रूप में औद्योगिक परिदृश्य से दूर हो चुके हैं| जो मजदूर दो जून की रोटी की आशा में बंधुआ की तरह जीता मरता है – लौटा है|

अब इस बात पर बहस की गुंजायश नहीं रह गई है कि मजदूर अपने मूल स्थानों की ओर क्यों लौटे? सब जानते हैं उनकी मातृभूमि कम से कम तुरंत उनका स्वागत नहीं करेगी| उनके गाँव और उनके परिवार उन को शायद तुरंत न अपनाएँ| जिस गाँव कुल चार रोटी हैं वहां खाने वाले चार से बढ़कर सोलह हो गये हैं|

परन्तु सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि लौटा कौन कौन नहीं है?

जिनके पास जमीन में गड़ी अपनी नाल का पता है – वो लौट गए हैं| जिनके पास माँ – बाप – भाई – भाभी गाँव घर है लौटे हैं भले ही यह सब नाम मात्र की आशाएं हैं| वो लौट गये हैं जिनकी जड़ों में अभी जुड़ाव की आशा है| मगर क्या उन्होंने रोज़ी- रोटी वाले अपने नए वतन से जुड़ाव नहीं महसूस किया| किया तो मगर जुड़ाव में आसरा और आश्वस्ति की कमी थी| जिन्होंने किसी पुराने राहत शिविर की काली कहानियाँ सुनी थीं और जिन्हें रेन बसेरों के बास अपनी नाक में आज भी सुंघाई देती थी – लौट गए|

वो लोग नहीं लौटे जिनके पास अपना एक कमरा – एक छप्पर – एक झौपड़ – एक टपरी – एक चाल थी| नौकरी की आस थी| सड़क पर फैंक दिए जाने का भय न था|

वो नहीं लौटे जिनके पास जड़ें नहीं थीं – जिनके नाम कुछ भी हों मगर पुराने धाम देश के नक़्शे के बाहर हैं| नेपाली लौटे – बंगाली नहीं| वो नहीं लौटे जो घर से भाग कर आये थे| वो लडकियाँ नहीं लौंटी जिन्हें कोई घर नहीं अपनाएगा| वो भाई भी नहीं लौटे जिनके भाई के हाथ में खंजर हैं|

पाठकों से अनुरोध हैं बताएं उनके बारे में हो नहीं लौटे|

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विश्व- बंदी ३ अप्रैल


उपशीर्षक – मोमबत्ती 

मुग़ल काल में एक प्रथा थी जो सल्तनत में ज्यादा उत्पात मचाता था उसे जबरन हज पर भेज देते थे| अगर औरंगज़ेब भी जिन्दा होता तो तब्लिग़ वालों को किसी जहाज में चढ़ा कर हज के लिए भेज देता और कहता कि जब मक्का और हज खुलें तब पूरा करकर ही लौटना|

जिन्हें इलाज़ नहीं कराना उनके लिए आम समाज से दूर अलग मरकज़ खोल देने चाहिए| वहीं रहें, अपना बनायें खाएं, मरें या ठीक हो जाएँ| सरकार, चिकित्सकों, समाज सेवियों, मिडिया और गैर मुस्लिमों को उनकी चिंता से अपने आप को अलग कर लेना चाहिए| ईश्वर का दिया कष्ट भोगने से शायद उनके इस जन्म के अलाल्ही कर्त्तव्य और अगर गलती से पिछला जन्म रहा हो तो पिछले जन्म के पाप का प्रायश्चित हो जाएगा| अन्य धर्मों में भी जिन्हें अपने इस या उस जन्म के पाप का प्रायश्चित करना हो उन्हें भी यह सुविधा मिलनी चाहिए| धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यही है कि हर किसी को दूसरों को परेशां किए बिना अपनी समझ के अनुसार अपने धर्म का पालन करने की छूट होनी चाहिए|

इधर प्रधानमंत्री जी ने फिर नीरो साम्राज्य के दिनों को याद लिया| अब इटली की तर्ज पर मोमबत्ती जलेगी रविवार को| भारतीय कारण करने के लिए दीपक और लॉक डाउन में कहाँ खरीदने जाओगे इसके लिए मोबाइल की लाइट का विकल्प दिया गया है| मोदी जी का यह घटना प्रबंधन प्रायः चिंतित करता है कि असली समस्या से ध्यान हटाया तो नहीं जा रहा| परन्तु जनता का हौसला बनाये रखना जरूरी है|

 वैसे प्रधानमंत्री ने दूरी बनाए रखने की बात कहकर भक्तों को मूर्खता न करने का सन्देश भी दिया है|

घर को बच्चों को लग रहा है कि दुनिया भर की छुट्टी चल रहीं हैं| वैसे यह भी ठीक है कि अगर घर में दो एक लोग साफ सफाई, रसोई और बच्चे संभाल लें तो बाकि दस लोग घर से आराम से काम कर सकते हैं| दफ्तर, आवागमन, और ऐसे ही तमाम खर्च बच सकते हैं| अर्थव्यवस्था के आंकड़े में जरूर कमी आएगी परन्तु पर्यावरण, सड़कों की भीड़ भाड़ कम हो जाएगी|

शायद प्रकृति हमारे धर्मों और अर्थव्यवस्थाओं को सुधरने का मार्ग स्पष्ट कर रही है|