आलू बीनता बचपन

दिनांक: 1 मार्च 2013

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कार्य विवरण:

कार्य: खेत में से आलू बीनना

कार्य अवधि: रोज 12 से 15 घंटा, (महीना – दो महीना सालाना)

आयु: 9 वर्ष से १२ वर्ष

लिंग: पुरुष (अथवा महिला)

आय: कुल जमा रु. 60/- दैनिक

वेतन वर्गीकरण: रु. 50/- माता – पिता को, रु. 10 अन्य देय के रूप मे कर्मचारी को

पता: जलेसर जिला एटा, उ. प्र.

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कर्मचारी विवरण

नाम: अज्ञात

शिक्षा: कक्षा 2 से 5 (हिंदी माध्यम)

ज्ञान: मात्र वर्ण माला, गिनती,

भोजन: रूखी रोटी, तम्बाकू गुटखा, पानी, (और बेहद कभी कभी दारु, आयु अनुसार)

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मैंने यह स्वयं ऊपर दी गयी दिनांक को स्वयं देखा| जलेसर से सिकंदरा-राऊ के बीच कई खेतो में आलू बीनने का काम महिला और बच्चे कर रहे थे, पुरुष बोझ धो रहे थे| खेत मजदूरों के लिए तो चलिए ये सपरिवार बोनस कमाने के दिन हैं, मगर दुःख की बात थी कि कुछ अन्य लोग भी अपने बच्चों से काम करने में गुरेज नहीं करते|

किस घर में बच्चे माँ – बाप का हाथ नहीं बंटाते हैं?

क्या बच्चे से एक वक़्त पंसारी की दुकान से सामान मांगना बाल मजदूरी नहीं है?

क्या बच्चे काम करने से नहीं सीखते? अगर नहीं तो स्कूलों में लेब किसलिए होतीं हैं?

क्या फर्क पड़ता है कि बच्चे जिन्दगी की पाठशाला में कमाई का कुछ पाठ पढ़े, कुछ बोझ उठाना सींखे?

क्या बुराई है अगर बच्चे साल भर की अपनी किताबों, पठाई लिखाई का खर्चा खुद निकाल लें?

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मिटी न मन की खार – (कुण्डलिया)

 

एक शहीद पैदा किये,

एक दुश्मन दिए मार|

दंगम दंगम बहुत हुई,

मिटी न मन की खार|| दोहा १||

 

मिटी न मन की खार,

दर्पण भी दुश्मन भावे|

दर्प दंभ की पीर,

अहिंसा किसे सुहावे|| रोला||

 

दुनिया दीन सब राखे,

सब झगड़ा व्यापार|

मार काट बहुत बिताई,

अमन के दिन चार|| दोहा २||

 

उपरोक्त कुण्डलिया छंद की रचना के कुछ छिपे हुए उद्देश्य हैं| उन्हें जानने के लिए इसके छंद नियमावली पर एक निगाह डालनी होगी|

दोहा + रोला + दोहा = कुण्डलिया|

ये रचना प्रक्रिया रसोई घर में सेंडविच बनाने की प्रक्रिया से बिलकुल मिलती जुलती है|

यह रचना समर्पित है कश्मीर के लिए| कश्मीर जो आज कुण्डलिया बन गया है; भारत पाकिस्तान के बीच, भारत की सत्ता और विपक्ष के बीच, पकिस्तान के सत्ता विपक्ष के बीच, हिन्दू और मुसलमान के बीच, हमारी खून की प्यास के बीच| कुण्डलिया की एक और खासियत है, पहले दोहे का अंतिम चरण, रोले का पहला चरण होता है| यहाँ पर मैं इसे आज के सन्दर्भ में घिसे पिटे तर्क – कुतर्क के बार बार दोहराव के रूम में देखता हूँ| अगली विशेष बात जो ध्यान देने योग्य है, वह है कुण्डलिया का पहला और अंतिम शब्द एक ही होता है| जैसे जीवन में बातचीत में ही झगडे शुरू होते है और घूम फिर कर बात चीत से ही समाप्त करने पड़ते हैं|

एक दूसरा कारण इस कुण्डलिया को लिखने का और भी रहा है| अफजल गुरु की फांसी| कई खबरें आतीं हैं, जिनसे लगता है कि उसे पूरी तरह न्याय नहीं मिला और देश की जनता के आक्रोश को शांत करने और असली दोषियों तक न पहुँच पाने के सत्ताधारियों की निराशा ने उसे येन केन प्रकारेण दोषी ठहरा दिया| साथ ही मैं किसी भी दशा में फांसी की सजा को न्याय के विरुद्ध मानता हूँ| फांसी दोषी को मार तो देती है पर न तो उसे पूरी सजा देती है, न पीड़ित को पूरा न्याय| युद्ध, छद्म युद्ध, गृह युद्ध, महा युद्ध आदि के मामलों में तो यह दुसरे पक्ष के लिए शहादत का उदाहरण तक बना देती है| यह कुण्डलिया इसी प्रसंग में लिखा गया है|

विश्व-गाँव में स्थानीय कानूनों का विश्वव्यापी प्रभाव

 

जब भी हम किसी भी दूर देश के क़ानून की बात करते हैं तो हमारी निर्लिप्तता का स्तर काफी नासमझी भरा होता है| यह बात में खुद अपने अनुभव से कह रहा हूँ| मैंने कभी नहीं सोचा था कि सात समंदर पार किसी भारतीय के साथ ऐसा कुछ होगा जो उस देश को ही नहीं इस देश को भी झकझोर कर रख देगा| मगर यह भू-मण्डलीकरण का समय है| कानून व्यवस्था को अधिक समय तक राष्ट्रों निजता के साथ नहीं जोड़ा जा सकता| आज के विश्व-गाँव में सुदूर देश के कानून अगर मुझे नहीं तो मेरी आने वाली पीढ़ी को अवश्य प्रभावित कर सकते हैं| अभी इस विषय पर मैं कोई गंभीर विचार विमर्श करने की आवश्कता नहीं समझ पा रहा हूँ परन्तु इसे नज़रअंदाज़ भी नहीं किया जा सकता है|

सविता हलाप्पनावर की आयरलैंड में हुई मृत्यु इसी प्रकार के कुछेक उदाहरणों में से एक है| सविता की मृत्यु आयरलैंड के एक चिकित्सालय में चिकित्सकों द्वारा क़ानून के डर के कारण उचित चिकित्सीय सहायता न दिए जाने के कारण हो गयी थी| कहा जा रहा है कि सविता के गर्भ में स्थित भ्रूण किसी कारणवश नष्ट होने कि कगार पर था और खुद सविता कि जान को खतरा हो गया था, परन्तु चिकित्सकों के द्वारा उन्हें आयरलैंड के भ्रूण हत्या विरोधी कानून के चलते गर्भपात कराने की अनुमति नहीं दी गई| आयरलैंड में इस घटना की जांच जरी है|

इस घटना ने कई सारे प्रश्न खड़े किये जो धर्म का शासन – प्रशासन में अनुचित हस्तक्षेप, विश्व भर में धर्म – निरपेक्ष कानूनों की आवश्यकता, और स्थानीय क़ानून के विश्व्यापी प्रभाव आदि को दर्शाती है|

विश्व भर में जिस प्रकार से आयरिश कानूनों के बारे में चर्चा की गयी है उस से यह साफ़ है कि आज विश्व – गाँव अपने नए वृहद रूप में हमारे सामने है|

१.      एक देश का क़ानून विश्व के किसी भी नागरिक को प्रभावित कर सकता है, अतः स्थानीय क़ानून केवल स्थानीय मामला नहीं है|

२.      स्थानीय कानून बाहरी व्यक्तियों, पर्यटकों, निवेशकों, कामगारों और आमंत्रित प्रतिभाओं को प्रभावित करता है|

३.      स्थानीय कानूनों के गैर-स्थानीय प्रभाव विश्व – व्यापी प्रतिक्रिया को जन्म देते है और राष्ट्र कि छवि पर असर कर सकते हैं|

४.      विश्व- जनमत, स्थानीय जन – मानस को और स्थानीय जन मत, वैश्विक जन – मानस को प्रभावित कर सकता है|

५.      कानूनों को किसी भी प्रकार के धार्मिक प्रभाव से दूर रखा जाना चाहिए|

६.      किसी भी क़ानून को उसके उचित समय पर बना कर प्रभाव में ले आया जाना चाहिए|

७.      सभी कानून समय समय पर पुन्र्विचारित किये जाने चाहिए|

सविता का मामला इस समय का अकेला मामला नहीं है जहाँ पर हमें इस प्रकार के दूर देशीय प्रभाव दिखाई दे रहे हैं| एक अन्य मामले में हाल में ही पश्चिमी देश नार्वे में एक भारतीय दंपत्ति को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें संतान से दूर रहना होगा क्योकि वो लोग बच्चे का जिस प्रकार से लालन-पालन कर रहे थे वह नार्वे के शिशु पालन स्तरों से काफी भिन्न था| इन मामलों में उन देशों के स्थानीय कानून तभी हम बहरी लोंगो को प्रभावित करते है जब हम उनके देश में जाते है| परन्तु हमेशा ऐसा नहीं होता| जब हम अपने देश में बैठे होते हैं, तब भी यह क़ानून हमें प्रभावित करते हैं| स्वित्ज़रलैंड का बैंक सम्बन्धी क़ानून सारे विश्व को प्रभावित करता है|

माना जाता रहा है कि स्विट्जरलेंड में बैंकों को दी गयी विशेष छूटें, विश्व  भर में भ्रष्टाचार फैलाने में मदद करती रही है| अमेरिकी संस्था सीआईए इसे काले धन को वैध बनाने सम्बन्धी गतिविधियों का केन्द्र बताती रही है| साथ ही आरोप है की, विश्व भर के आतंकी संगठन इस व्यवस्था को अपने हित साधने में प्रयोग करते रहे हैं| दरअसल, स्विस बैंक अपने ग्राहकों की सभी जानकारियां गोपनीय रखती हैं, और इस गोपनीयता का उलंघन करने की उन्हें कोई अनुमति नहीं है केवल नयायालय के आदेश पर ही इस प्रकार की जानकारी मुहैया कराइ जा सकती है| स्विस कानून विश्व भर में कर चोरी के मामले में भी सहयोग न करने के लिए बदनाम रहा है|

साथ है इस समय अमेरिका और ब्रिटेन के भ्रष्ट्राचार विरोधी कानूनों को इस प्रकार से बनाया गया है कि वो किसी में अमेरीकी और ब्रिटिश नागरिक या कंपनी या उनसे सम्बन्ध रखने वाले किसी भी व्यक्ति को विश्व में कहीं भी भ्रष्ट गतिविधियों में शामिल होने पर अपने देश में कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं|

कुल मिला कर विश्व में आज किसी भी क़ानून को केवल अपने नागरिकों के लिए बनाये गए क़ानून के रूप में नहीं लिया जा सकता है| सभी देशों के क़ानून सारी मानवता को प्रभावित कर सकते हैं|

एक देश के रूप में हमें भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे क़ानून भी दूरगामी प्रभाव रख सकते है और उन्हें इस प्रकार का होना चाहिए कि नागरिक और गैर-नागरिक सभी उन्हें आसानी से समझ सकें और उनका दुरूपयोग न हो सके|

 

 

दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012

हमारे देश के शौचालय से अधिक मोबाइल फोन है.

ब्लैकबेरी की हानि अपने कौमार्य की हानि से भी बड़ा मुद्दा है.

यह और अन्य मोबाइल संबंधित चुटकुले हमारे तेजी से बदलते जीवन शैली में मोबाइल के बढ़ते महत्व की बड़ी कहानी बताते है|

मोबाइल के बढ़ते प्रयोग

आधुनिक मोबाइल पोस्ट कार्ड (लघु संदेश), कलाई घड़ियों, मेज घड़ी (सुबह अलार्म), रेडियो, व्यक्तिगत कंप्यूटर, गणक (calculators), ई-किताब पाठक, कैलेंडर, निजी डायरी, नक्शे, स्कैनर, रिकार्डर, संगीत उपकरणों, कैमरा, वीडियो गेम और  कई अन्य उपकरणों और साधनों की जगह ले रहा है| ऑस्ट्रेलिया में एक ही विज्ञापन में उपयोगकर्ता अपनी प्रेमिका के मोबाइल में डालकर जेब में लेकर घूमते दिखाया गया है (मैंने इस विज्ञापन यौनाचार और नैतिकता की दृष्टि से गलत पाया)| परन्तु यह सभी, हमारे जीवन में इस मोबाइल के बढते महत्व को दर्शाता है|

हमारे मोबाइल पर अधिसंख्य सेवाएं मुफ्त है; परन्तु हम सभी को मोबाइल का मूल उपयोग कभी नहीं भूलना चाहिए| यह निसंदेह दूरसंचार है| दूरसंचार ऑपरेटर द्वारा प्रदान की गई सेवायें यह हमारी जेब के लिए सबसे अधिक लागत लेकर आती है| जाहिर है, जहाँ सेवाएं है वहाँ नियमित रूप से उपभोक्ता द्वारा इन सेवाओं से संबंधित शिकायतों भी हैं| भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने इन सेवाओं से संबंधित उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012 को जारी किया हैं. यह विनियम सामान्य उपभोक्ता संरक्षण कानून के अलावा हैं|

यह विनियम मोबाइल कनेक्शन के  प्रारंभिक – किट और योजना वाउचर को स्पष्ट रूप से अलग करते हैं| प्रारंभिक अप किट केवल एक नया मोबाइल कनेक्शन सिम, एक मोबाइल संख्या और कुछ विवरण प्रदान करेंगे| प्रारंभिक किट के अतिरिक्त तीन प्रकार के वाउचर, अर्थात् – (क) योजना वाउचर, (ख) टॉप अप वाउचर और (ग) विशेष टैरिफ वाउचर होंगे| इन तीन वाउचर क्रमशः लाल, हरे और पीले रंग बैंड में होगा|

योजना वाउचर कोई भी मौद्रिक मूल्य उपलब्ध कराये बिना किसी एक विशेष टैरिफ योजना में एक उपभोक्ता सेवा में सम्लित करते है| टॉप – अप वाउचर भारतीय रुपए में व्यक्त एक मौद्रिक मूल्य को प्रदान करते है और इनकी कोई वैधता अवधि या अन्य उपयोग नहीं होगा| इनके अतिरिक्त एक विशेष टैरिफ वाउचर होगा, जो स्पष्ट रूप से योजना विशेष जिसपर यह लागू है तथा विशेष दर और इन दरों की वैधता अवधि आदि को इंगित करेगा|

किसी भी योजना के चालू होने और टॉप – अप वाउचर से प्रयोग होने पर प्रदाता द्वारा उपभोक्ता को एक एसएमएस भेजना होगा| योजना वाउचर को सक्रिय करते समय एसएमएस से इस वाउचर के योजना का शीर्षक बताया जायेगा| दूसरी ओर, टॉप – अप वाउचर के सक्रियण के पर भुगतान में ली गयी राशि, प्रकिया राशि, कर तथा उपलब्ध मौद्रिक राशि आदि की जानकारी देगा|

प्रत्येक कॉल के बाद एसएमएस के द्वारा कॉल अवधि, भुगतान राशि, बकाया राशि तथा विशिष्ट टेरिफ वाउचर के मामले में, प्रयुक्त मिनिट और बकाया मिनिट बताएगा| डाटा प्रयोग के मामले में, प्रत्येक सत्र के बाद एक एसएमएस प्रयोग किये गए डाटा, भुगतान राशि और बकाया राशि के बारे में बताएगा| किसी अन्य मूल्य वर्धक सेवा की स्तिथि में एसएम्एस भुगतान राशि, उसके काटे जाने का कारण, बकाया राशि और बकाया समय के बारे में जानकारी देगा|

उपभोक्ता अब रुपये 50/-  एक नाममात्र कीमत पर के अपने पिछले उपयोग के सभी विवरण की मांग कर सकते हैं| इसमें सभी कॉल का मद बार विवरण, एसएमएस की संख्या, भुगतान राशि, मूल्य वर्धक सेवाएं, प्रीमियम सेवाएँ, और रो़मिंग आदि का विवरण दिया जायेगा| ध्यान देने की बात यह है कि उपभोक्ता पिछले छः महीने का ही विवरण विवरण मांग सकते है|

टोल फ्री शॉर्ट कोड के प्रावधान करने से उपभोक्ता, एसएमएस के माध्यम से टैरिफ की योजना के बारे में जानकारी, उपलब्ध संतुलन और मूल्य वर्धित सेवाएं सक्रिय करने के आदि के लिए सक्षम होगा|

उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास
उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास

किसी प्रीमियम दर सेवाओं की सक्रियता से पहले, अंग्रेजी या क्षेत्रीय भाषा में बोलकर एक चेतावनी दी जायेगी|

इसके अलावा, उपभोक्ताओं की शिकायत निवारण के लिए, ट्राई ने दूरसंचार उपभोक्ताओं के शिकायत निवारण विनियम, 2012 भी जारी किए हैं| इसके अनुसार, हर सेवा प्रदाता को शिकायत के निवारण के लिए और सेवा अनुरोध के समाधान के लिए एक शिकायत केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है| सेवा प्रदाता के द्वारा ग्राहक सेवा के लिए एक मुफ्त नंबर दिया जाएगा| इसके अतिरिक्त अन्य जाकारी करने के लिए एक सामान्य जानकारी नंबर होगा जिसे शॉर्ट कोड से भी प्रयोग किया जा सकेगा| हर सेवा प्रदाता भी एक वेब आधारित शिकायत निगरानी प्रणाली की स्थापना करेगा|

हर शिकायत केंद्र में, डॉकेट संख्या हर शिकायत के लिए आवंटित किया जाएगा और यह एसएमएस के माध्यम से शिकायतकर्ता को भेजा जाएगा| कार्रवाई के पूरा होने पर भी शिकायतकर्ता को एसएमएस मिल जाएगा| शिकायतकर्ता को शिकायत केंद्र के खिलाफ एक अपीलीय प्राधिकारी को अपील करने का अधिकार दिया गया है|
हर सेवा प्रदाता एक नागरिक अधिकार पत्र तैयार करेगा|

विधायिका को विधेयक न दे कोई ! जनता रोई !!

गुरुवार प्रातः इकोनोमिक्स टाइम्स में खबर दी थी कि सरकार में भारतीय जनता पार्टी के दबाब में आकर कंपनी विधेयक २०११ को एक बार फिर से स्थायी समिति को भेज दिया गया है| कंपनी विधेयक सदन और समिति के बीच कई वर्षों से धक्के खा रहा है| आर्थिक सुधारों का जो बीड़ा पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने उठाया था वह इस समय खोखली राजनितिक अवसरवादिता के कारण दम तोड़ रहा है|  पिछले कई वर्षों से हम देख रहे है कि हमारी सरकार नए कंपनी क़ानून की बातें करतीं रहतीं है परन्तु उन्हें मूर्त रूप देने में असमर्थ रहती है| जब हम सरकार की बात करते है तब हम किसी दलगत सरकार की बात नहीं कर रहे वरन पिछले बीस वर्षों में सत्ताधारी सभी दलों की बात करते है; भले ही वह कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, वामपंथी कोई भी हों| अफ़सोस की बात है कि संसद में बैठे लोग संसद के प्रमुख कार्य, विधि-निर्माण और कार्यपालिका नियंत्रण के स्थान पर शोरगुल, हल्लाबोल, कूदफांद आदि कार्यों में व्यस्त हैं| दुखद बात है कि हमारे राजनीतिज्ञ संसद को राजनितिक उठा पटक का अखाड़ा समझ रहे हैं और संसद के पवित्र गलियारा  सड़क की गन्दी राजनीति की चौपाल भर बन कर रहा गया है|

 

 

पिछले एक वर्ष से हम देख रहे है कि देश की जनता देश हित के एक क़ानून को बनबाने के लिए सड़क पर उतर आई है| आखिर क्यों?? पहले हमें कार्यपालिका के गलत आचरण, दु-शासन, क़ानून सम्मत अधिकारों के लिए ही सड़क पर आती थी और अधिकतर आंदोलन सत्ता की लड़ाई ही थे| परन्तु, हमारा दुर्भाग्य है कि जनतांत्रिक देश की जनता आज अपने को जनतंत्र और उसके मुख्य स्तंभ संसद और विधान सभाओं से कटा हुआ पाती है| कार्यपालिका का भ्रष्टाचार आज विधायिका का अभिन्न अंग बन गया है और खुले आम जनता कह रही है कि अब भ्रष्टाचार की लूट में भागीदार होने के लिए सत्ता का गलियारा जरूरी नहीं| सांसदों के संसद में व्यवहार को आज लूट में हिस्सेदारी की रस्साकशी के रूप ले देखा जा रहा है| यदि यह सब सत्य है तो देश और जनता दोनों का दुर्भाग्य है| परन्तु लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सत्य है; देश में विधायिकाएं विधि-कार्य के अतिरिक्त सभी कुछ कर रही हैं| कई महत्वपूर्ण विधेयक संसद में भूखी गरीब बाल विधवा की तरह मुँह लटकाए खड़े है और सरकार से लेकर उप-सरकार (विपक्ष बोलना गलत होगा) तक कोई उनकी सुध-बुध नहीं ले रहा है|

लोकनायक जय प्रकाश नारायण, नवनिर्माण आंदोलन, गुजरात, १९७४

क्या कारण हैं कि देश की विधायिका आज देश की कानूनी आवश्यकता को समझ में नाकाम सिद्ध हों रही है? संस्थान दर संस्थान, भ्रष्टाचार की मार से नष्ट हों रहे है, तकनीकि परिवर्तन जीवन में नए विकास लाकर नए संवर्धित कानूनों की मांग खड़ी कर रहे हैं, समय नयी चुनौती पैदा कर रहा है| परन्तु; हाँ, परन्तु; विधायिका खोखली राजनीति के घिनोने नग्न नृत्य का प्रतिपादन, निर्देशन और संपादन में अतिव्यस्त है| अब यह दूरदर्शिता की कमी मात्र रह गयी है या इच्छा-शक्ति का नितांत आभाव है| इस समय जनतांत्रिक विचारधारा के बड़े बड़े स्तंभ यह विचार करने पर मजबूर है कि क्या वह संसद और संसदीय प्रणाली में आस्था रखते है? हमारी आस्था संसद में भले ही बनी रही हों परन्तु निश्चित रूप से हमारे सांसदों में तो नहीं बची रह गयी है|

कंपनी विधेयक पिछले कई वर्षों से उठ गिर रहा है| पेंशन विधेयक अभी सोच विचार में डूबा है| भ्रष्टाचार उन्मूल्यन पर कोई उचित विचार नहीं है| गलत आचारण को उजागर करने वाले लोगो को सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हों रही है| आम नागरिक रिश्वत देने पर मजबूर है और शिकायत करने पर शोषित और दण्डित हों रहा है| न्यायपालिका पर अत्याधिक दबाब है और आवश्यक कानूनी व्यवस्था नहीं बन पा रही है| दूसरी ओर यही सांसद दमनकारी क़ानून बिना किसे हील-हुज्जत बहस आदि के पारित कर देते हैं|

सड़क पर जनता, मुंबई, २१ अगस्त २०११ (The Hindu)

क्या हमारा देश सदन में की गयी नारेबाजी, कुछ-एक स्थगन प्रस्ताव, विधायिक कार्यों में रोजमर्रा की बाधा आदि के सहारे ही चलेगा?? क्या हम चुनाव के दौरान दिए गए कुछ गलत वोट के कारण चुने गए ऐसे सांसद पांच वर्ष तक झेलने के लिए अभिशप्त है?? क्या हम अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को यह नहीं कह सकते कि वह फालतू के हल्ले-गुल्ले में न पड़े और कुछ काम-धाम कर ले? क्या हम अपने प्रतिनिधि से नहीं कह सकते कि वह आवश्यक क़ानून बनाएँ?

क्या संसदीय व्यवस्था निर्वाचित तानाशाही है? क्या संसदीय जनतंत्र दम तोड़ रहा है?? क्या प्रतिनिधिक जन तंत्र को भागीदारी जनतंत्र से बदलने पर यह संसद हमें मजबूर करने जा रही है???

 

 

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

क्या कहा जाए? जो कहना है ज़रा जल्दी कहना है, जल्दी जल्दी कहना है| बाद में क्या बोलेंगे जब होगा बंद मुँह, कटी जुबान|

पहले *** जनसंघी लोग लठ्ठ लेकर खड़े थे, उनकी सी न बोलो तो बोलने नहीं देते थे और खुद बहुत खूबी के साथ खूब बोलते थे| अब ये *** कांग्रेसी भी आ गए है मैदान में| नहीं नहीं दिशा-मैदान के लिए मैदान में नहीं आये मगर कर वही सब रहे है| *** टोपी वाले भी आधे भारत में रायफल लिए खड़े है| माफ कीजियेगा! इससे ज्यादा हम बोलेंगे नहीं वरना वो हमारे लिए बोल देंगे|

इन सब ** ** लोंगो की क्या कहे; पहले ये अपने निचले ** से ही *** फैलाते थे, मगर अब तो इनका मुखारविंद भी ** फैलाता है| कुछ *** लोंगो को महारत ही हासिल है उनके नाम *** **** **** **** *** अदि है| इन *** को अपने ** में कन्नौज की इत्र की गंध आती है और हमारे गुलाब जल में इन्हें अपने ** से भी अधिक बदबू आती है|

ये *** लोग खुद तो बहुत लिखते-बोलते है और इनता लिखते-बोलते है कि बस रामचरित वाले गोसाईं जी क्या और टीवी वाले गोसाईं जी भी क्या? मगर कुल मिला कर इन *** को कोई भी काम कि बात नहीं बोलनी| बाबासाहेब आंबेडकर इन ** को बोलने चालने के लिए संसद की पूरा आलिशान इमारत दे गए है मगर ये ** वहाँ पर अपनी ***** चिल्ल-पों करते है और कोई बात नहीं करते| वहाँ पर ये बस एक दूसरे की तरफ ऊँगली करते है और एक दूसरे * *** करते है| ये दोनों तीनों *** का अप्राकृतिक *** है जो खुले आम मेल मिलाप के साथ चल रहा है| अगर संसद चलेगी तो कुछ तो बोला जाएगा, बोलेंगे तो कुछ तो सच उगलेगा, सच उगलेगा तो बबाल मच जायेगा और इनके ** ** हो जायेगी| देश इनकी * *** एक कर देगा|

पहले तो जनता के हाथ बंधे थे और वो बूढी हो चली बाल विधवा की तरह सब कुछ सह रही थी| इन् ****** ने आजादी से लेकर आज तक जनता के साथ इनता ****** किया कि भारतीय दंड संहिता कि धारा 376  में इनके दी जा सकने वाली सजा का प्रावधान ही नहीं मिल सका| आज जब जनता कुछ बोलने की स्तिथि में आई तो ये बिलबिला गए है| पहले एक दो अखबारों में जनता की चिठ्ठी पत्री छप जाती थी और अगले दिन रद्दी हो जाती थी| अब कुछ लोग पढ़ लिख गए है और कुछ नए हथियार आ गए है| ट्विट्टर, फ़ेसबुक, ब्लॉग, एस एम् एस, पता नहीं क्या क्या| लोग हर तरह से अपना गुस्सा उतार है| अब लोगों को पता है कि हमारी बन्दूक इनकी तोप से कमजोर है, और लोग इन ** का ** ** नहीं ** सकते|

सीमान्त प्रदेश में कुछ बोला आये तो आतंकवादी; काले क़ानून उनके * *** करने के लिए|
आदि वासी कुछ बोलते है तो माओवादी; मार दो ** को|
जब शहरी युवा कुछ बोलें तो जेल दो *** और उनपर विदेशी हाथो में खेलने का इल्जाम लगा दो|
ये देश को लूट लें तो देश भक्त; आवाज उठाने वाले युवा पाकिस्तानी ***|
अन्ना को जेल और राजा को महल – दुमहले|

अब कलम की ताकत का नया पर्याय है इन्टरनेट| देखन में छोटो लगे, घाव करे गंभीर| हालात ये है कि घाव भी सीधे इन *** के **** पर हो रहा है और इनकी *** ** है| अब बिलबिलाई जनता ने नए साधनों का इस्तेमाल कर कर हल्ला मचाना शुरू किया तो इनको वहाँ पर सारी गंद दिखाई दे गयी| असलियत में इनकी **** गई है|मानते है कि कई बार लोग गुस्सा में इन *** की थोड़ा ज्यादा ही *** देते है मगर गुस्सा में किसको होश| मैं मानता हूँ कि लोंगो को गुस्सा शांत रखना चिहिये, मगर क्या करें पिछले पचास सालो में इन ** ने कुछ ढंग का पढ़ने लिखने ही नहीं दिया तो तमीज कहा से आती|

पहले इन *** के पाकिस्तानी भैया लोगो ने एक लंबी फेहरिश्त निकाल दी काफी शब्दों की| अगर मोबाइल पर उनमे से कुछ भी लिखा तो बस गए आप काम से| आपके चरित्र का पूरा चित्रण कर दिया जायेगा| हिंदी – उर्दू वाले *** *** * आप जानकारी बढ़ने की लिए पढ़े और पढाए http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-URDU-tsk-tsk-PTA-why-oh-why.-courtesy-of-shobz.pdf और अंग्रेज के *** पढ़े: http://www.spittoon.org/wp-content/uploads/2011/11/content-filtering-ENGLISH-made-me-LOL-courtesy-of-shobz.pdf | अगर आपको न अर्थ समझ आये http://www.urbandictionary.com/ पर सबके मायने दिए है, समझे और गलती न दुहरायें| हमें तो लगता है कि इन शब्दों पर सभी दक्षिण एशियाई सरकार लोग सहमत है इसलिए किसी भी जन मोर्चा पर इन शब्दों का प्रयोग कतई न करें|

हाँ! अब हमारे *** साहब को लगा कुछ तो बड़ा किया जाय, आखिर उनका *** किसी **** से छोटा थोड़े ही है| अब देखिये, ये विलायत के पढ़े लिखे *** लोग, अपने दफ्तर में विलायती बाबू लोग को बुला लिया और घर कि औरत का फोटो दिखा कर स्यापा कर डाला, बोला मेरे लोग आपकी वेबसाइट और फोरम पर हमारी *** की *** *** कर रहे है और उसका ***, उनका ***, उसकी *** कर रहे है| देखो मेरी तो *** कर कर रख दी है| इन *** सड़क छाप **** की जीभ काट दो, इनकी *** कर दो| इन ***** की पहचान मिटा दो अपने प्लेटफोर्म, फोरम, वेबसाइट पर से|

पहले ही आम जनता परेशान है, अपनी परशानी और भड़ास कैसे निकाले| बन्दूक उठाए या इस दुनिया से अपना संदूक उठाये| अब कलम पर भी जनता का जोर नहीं रहा| अगर कोई गलत बात हो रही है तो उस गलत बात करने वाले को पकड़ो न  सरकार, सबकी ***** क्यों करते हो; ****| अगर आपकी आदरणीय ***** की मानहानि होती है तो अदालत का दरवाजा देखो न, मेरे पीछे ******* कर क्यों पड़े हो| मानते है कि मुक़दमे में “मान हानि” से पहले “मान” को साबित करना पड़ेगा, तो करो न| अब आप विलायत में अपनी ****** *** क़ानून की उपाधि हासिल की है (अगर खरीदी हो तो माफ करें, मुझे हो सकता है की सही जानकारी न हो), आप कोई ***** थोड़े है|

वैसे भी आप क़ानून के *** है, जो चाहे वो क़ानून पैदा कर दें| आप अपने सुचना तकनीकी क़ानून को देख लीजिए| नियम उपनियम बनाए है, उन्हें देख लीजिए| मगर साहब-ए- आलम! आप इस मुल्क के सारे फोन टेप करते है, तो क्या आपको आतंकवादी, तस्कर और अपने और किसी भाई बंधू की कोई खास खबर मिल पाई? आप अपनी सरकार ठीक से चला पा रहे है, जो इस इंटरनेट को ठीक से चला लेंगे? क्या आप इस देश में रोज रोज जहर खा कर मर रहे किसान की कोई सुध बुध ले पा रहे है, जो इस देश के सभी इन्टरनेट उपयोग की निगरानी कर पायेंगे? आपकी सीमा को पार कर आतंकवादी इसे आ रहे है जैसे गली का कोई खुला सांड, क्या आप उन्हें रोक पा रहे है?

तो भैया! अभी तो हाथ जोड़ कर समझा रहे है कि ढंग से देश चला तो, फसबूक, ट्विट्टर को पढकर अपने काम के बारे में हो रहे असंतोष को समझो और उसे सुधारो| मैया की आरती से वोट नहीं मिलेगा, न ही भैया की पाँय लागी करने से|

भगवान की लाठी और जनता के वोट में आवाज नहीं होती मगर चोट बहुत लगती है| अपने सीधे और उलटे भाई लोग को भी बता देना|

बंद मुँह, कटी जुबान; फिर भी कड़वी मेरी तान|

 

 

चेक और बैंक ड्राफ्ट की वैधता समय सीमा

भारत में सामान्यतः सभी चेक और बैंक ड्राफ्ट की वैधता समय सीमा ६ महीने रही है| इसका तात्पर्य यह था कि कोई भी व्यक्ति विशेष किसी भी चेक और बैंक ड्राफ्ट का भुगतान उस पर डाली गयी दिनांक के छः माह के भीतर ही ले सकता था| इस अवधि के बाद, उसका भुगतान बैंक नहीं करता और हमें चेक लिखने वाले व्यक्ति से नया चेक लिखने का अनुरोध करना पड़ता है| इसी प्रकार प्रकार बैंक ड्राफ्ट को पुनः बनबाना या वैध करना पड़ता है|

इस सुविधा के कुछ लाभ थे:

१. आप ६ महीने में एक बार बैंक जाकर पिछले ६ महीने में प्राप्त सभी चेक का भुगतान प्राप्त कर सकते थे|

२. आप किसी व्यकि को एक चेक जमानत के तौर पर दे कर छः माह के लिए उधार ले सकते थे|

अब भारतीय रिज़र्व बैंक का कहना है कि उसकी सुचना के मुताबिक कुछ लोग इन चेक आदि को मुद्रा के रूप में प्रयोग कर रहे थे|

पहले चेक आदि की वैधता की अवधि शायद इसलिए अधिक रखी गई होगी क्योंकि अंतरराज्यीय व्यापार में इन मौद्रिक कागजातों को डाक द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजा जाता था और यह एक बेहद समय खर्च सेवा थी| मुझे लगता है कि पन्द्रह बीस वर्ष पहले तक, गोवाहाटी से गोवा तक डाक पहुँचने में पन्द्रह दिन का समय लगना तो सामान्य बात थी| इस कारण, चेक और बेंक ड्राफ्ट की वह वैधता समय सीमा उचित थी| उसके बाद धारक अपने बैंक में चेक जमा करता था और पुनः यह चेक अपने मूल स्थान थक की यात्रा करता था| जब चेक काटने वाले व्यक्ति का बैंक, उस व्यक्ति का खाता देखकर अनुमति देता था, तभी चेक धारक के खाता में धन राशि का हस्तांतरण होता था| इस कार्यवाही में उन दिनों दो तीन महीने लगने साधारण बात थी|

आज के समय में चेक का लेनदेन कोरियर सेवा या डाकघर की स्पीड पोस्ट सेवा के मार्फ़त होता है| सभी चेकों पर MICR (चुम्बकीय स्याही अंकन पहचान) अंकन होता है| जिसके कारण चेक को मशीन द्वारा ही निबटा लिया जाता है| साथ ही चेक छंटनी व्यवस्था [Cheque Truncation System (CTS) ] के आने से चेक के रूपचित्र के माद्यम से बैंक आपस में संवाद करने के उपरान्त चेक सम्बन्धी निपटान कर सकेंगे| इन सभी कारणों से चेक की वैधता समय सीमा घटा देना एक उचित निर्णय जान पड़ता है|