समान नागरिक संहिता

समान नागरिक संहिता पर वर्तमान बहस की पृष्ठभूमि कुछ अलग तरीके से पैदा हुई मगर इसने पहली बार इसपर चर्चा का अवसर दिया है|

एक मुस्लिम महिला ने कुछ सुन्नी मुस्लिम समुदायों में प्रचलित तलाक – उल – बिद्दत (जिसे अधिकतर मुस्लिम उचित नहीं मानते) भारत में समाप्त करने के लिए अदालत से गुहार की| मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अतिरिक्त विश्वभर में कुछेक मुस्लिम ही इस तलाक प्रणाली के समर्थक होंगे| दुनिया के तमाम मुस्लिम देश इसे ख़त्म कर चुके हैं, अतः मुझे नहीं लगता कि इसपर बहस करने की जरूरत है| मगर, कोई भी भारतीय राजनीतिक दल तलाक़ – उल – बिद्दत का विरोध नहीं करना चाहता और समान नागरिक संहिता पर बहस उसी विषयांतर का प्रयास मात्र है|

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक और असंख्यक सभी समुदाय अपनी विविधता और पहचान को बचाय रखना चाहते हैं| कोई भी व्यक्ति धार्मिक क्या, पारवारिक रीति-रिवाज तक नहीं छोड़ना चाहता| विविधता में एकता ही हमारी राष्ट्रीय पहचान है और इसे बचाए रखना समान नागरिक संहिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है|

अगर समान नागरिक संहिता में अब तक की आम सहमति पर बात की जाय तो बात सिर्फ इतनी है –

“सभी स्त्री और पुरुष अपनी अपनी रीति – रिवाज, परम्पराओं और विचारों के अनुसार “विषमलिंगी” विवाह, तलाक, संतान, नामकरण, मृत्यु और उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रिया का पालन करते हुए, जन्म, विवाह, मृत्यु और उतराधिकार का पंजीकरण कराएँगे और बिना वसीयत के मामलों में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम का पालन करेंगे|”

अगर सारी बहस के बाद भी मामला इतना ही निकलना है तो मुझे लगता है कि यह सारी बहस मात्र अतिवाद और अतिरंजना है| बात अगर निकली है तो दूर तक जानी चाहिए|

समान नागरिक संहिता के सन्दर्भ में दहेज़, सती, विधवा विवाह, विधुर विवाह, बालविवाह, मैत्री करार, विधवा अधिकार, सगोत्र परन्तु विधि सम्मत विवाह, विजातीय विवाह, विधर्मी विवाह, समलैंगिक सम्बन्ध, बेटियों का उत्तराधिकार, बलात्कार, बलात्कार जन्य बालक का उतराधिकार, विशिष्ठ परिस्तिथियों में स्त्रियों और पुरुषों की दूसरे विवाह की आवश्यकता, नियोग, सरोगेसी, स्त्री – पुरुष खतना, विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध, विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध, विवाह उपरांत अवांछित आकस्मिक यौन सम्बन्ध, मासिक धर्म, राजोनोवृत्ति, पारिवारिक हिंसा, व्यवसायिक हिन्दू संयुक्त परिवार, समान सम्पत्ति अधिकार संबंधी राष्ट्र व्यापी कानून, आदि पर गंभीर चर्चा का अभाव है| बहुत से लोग वर्तमान कानूनों के हवाले से इनमें से कुछ मुद्दों पर बात नहीं करना चाहते| तो कुछ इनमें से कुछ मुद्दों को मुद्दा नहीं मानते| मगर समान आचार संहिता को बिना गंभीर चर्चा किये नहीं बनाया जाना चाहिए|

एकल विवाह आज अतिवादी रूप से आधुनिक माना जा रहा है, परन्तु इस अतिवाद के चलते बहुत से लोग छिपा कर दूसरे विवाह करते हैं या विवाहेत्तर सम्बन्ध रखते हैं| इन छिपे विवाहों और विवाहेत्तर संबंधों से होने वाली संतान को अकारण एकल विवाह अतिवाद का शिकार होना पड़ता है|

मुद्दे बहुत हैं, मगर बहस और चर्चा की इच्छा शक्ति की हमारे वर्तमान इंस्टेंट नूडल समाज में बेहद कमी है|

 

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वेश्या की असहमति

माननीय अदालतें जब बलात्कार आरोपी को यह कहकर दोषमुक्त कर देतीं है कि उनकी शिकार महिला एक वेश्या थी, मुझे निराशाजनक आश्चर्य होता है| असहमति के साथ हुआ कोई भी यौन सम्बन्ध बलात्कार है| शायद वेश्या एक ऐसी स्त्री है, जिसकी सहमति लेना सबसे सरल है| अगर, कोई व्यक्ति/आरोपी एक वेश्या की भी सहमति नहीं ले सकता तो यह बेहद निम्न दर्जे की बात है| अगर वेश्या असहमति व्यक्त  करती है तो उसकी असहमति का भी माननीय अदालतों द्वारा सम्मान किया जाना चाहिए|

कुछ तर्क दिए जाते हैं, अधिक धन की लालसा से वेश्या ने यह आरोप लगाया है| इस तर्क पर न जाने कैसे माननीय अदालतें भरोसा कर लेतीं हैं| तथ्यों की गूढ़ता एक मुद्दा हो सकती है, मगर न्याय के हिट में समस्या नहीं| बेहतर हो, माननीय अदालतें इस मामले में कोटेशन (Quotation) और इनवॉइस (Invoice) की व्यवस्था कर दें|

प्यारी पवित्र पुलिस

भारत का शायद ही कोई गाँव या शहर ऐसा होगा जहाँ घर द्वार पर पुलिसवाले को देख कर घर के लोग सहम न जाते हों| पुलिस का अपनी गली में आना ही एक गाली है और घर के सब लोगों की गर्दन झुका देने के लिए काफी है| घर की बैठक में पुलिस वाला रोज हुक्का पीने आये और सलाम ठोंक का जाए तो दस कोस तक इज्जत अपना झंडा लहराती है| जिन गांवों में खाप पंचायत या जात पंचायत या नक्सल आदि का दबदबा हो तो उस गांव में पुलिस बिना अनुमति घुसने नहीं दी जाती, यह अक्सर दावा किया जाता है|

कोई भी शरीफ़ आदमी अभी किसी पुलिस वाले से रास्ता नहीं पूछता, किसी पुलिस वाले की दी बीड़ी नहीं पीता, किसी पुलिस वाले दुआ सलाम नहीं करता| अगर गलती से कोई पुलिस वाला रास्ता काट जाये तो लोग भैरों बाबा का नाम जपते हैं| ऐसे में पुलिस वाले को और हनुमानजी को प्रसाद चढ़ा कर अपने पिछले पापों का प्रायश्चित करते हैं|

देश में हर गली, मोहल्ले, प्रान्त और यहाँ तक थानों में भी पुलिस के प्रति इसी तरह का अविश्वास है|

मगर, मगर…

इस देश में सबसे अधिक पुलिस पर विश्वास करते हैं –

  • अगर पुलिस किसी मजदूर किसान को विकास विरोधी बता दे;
  • अगर पुलिस किसी गंवार देहाती आदमी को नक्सल बता दे;
  • अगर पुलिस किसी दलित को चोर, डकैत, अपराधी प्रवृत्ति बता दे;
  • अगर पुलिस किसी सरकारी अधिकारी और कर्मचारी को भ्रष्ट बता दे;
  • अगर पुलिस किसी औरत को वैश्या, चरित्रहीन, कुलटा, बता दे;
  • अगर पुलिस किसी मुस्लिम को आतंकवादी बता दे;
  • अगर पुलिस किसी अच्छे पढ़े लिखे को उपरोक्त में से किसी के प्रति सहानुभूति रखने वाला बता दे;

देश की पुलिस पवित्र है, उनका मनोबल ऊँचा रहना चाहिए… तब तक … जब तक वो पड़ौसी को झूठे मुकदमें में फंसाती हैं; पसंदीदा नेता के तलबे साफ़ करती है; जिनके खिलाफ डटकर दुष्प्रचार है उन्हें ख़त्म करती है|

किसी को पुलिस का ऊँचा मनोबल देश के हित में नहीं चाहिए; निष्पक्ष न्याय के लिए नहीं चाहिए|
इस देश का एक सपना है, पुलिस का मनोबल देश गाय – भैंस – भेड़ –बकरी के रेवड़ की तरह ऊँचा होना चाहिए…
इति शुभम…||

महान का निर्माण

अलीगढ़ से पुरानी दिल्ली की ईएम्यू ट्रेन चल चुकी है और नई दिल्ली की ट्रेन प्लेटफार्म पर सही जगह लेने के लिए आगे बढ़ रही है| जी हाँ, ठंडी सुबह का सवा छः बजा है| मैं सहमा, मगर एकदम चौकन्ना बैठा हूँ| मेरी आँख ट्रेन की खिड़की के बाहर मगर कान ट्रेन के अन्दर देख रहे हैं| “चाय ले लेना” अचानक आवाज आई| मैंने उनकी ओर देखा और डिब्बे के दरवाजे की और बढ़ गया| ट्रेन रुकते ही मैंने उस परिचित चायवाले को ढूढने के लिए नजर दौड़ाई| वो नहीं दिखा, किसी और से चाय लेकर मैं अन्दर आया| उन्होंने कप उठाया और उसकी गंध महसूस करते ही चाय बाहर फैंक दी| “काम अगर अपने हिसाब से न हो तो मत करो” मेरे लिए आकाशवाणी थी| किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की|

***

उत्तर भारत में दिसंबर के बेहद ठंडी सुबह थी| बड़े दिन की छुट्टियाँ| सुबह सुबह पापा के साथ मैं मेरिस रोड इलाके में उनके हवेलीनुमा घर पर पहुंचा| लकड़ी की मजबूत पुरानी ऊँची कुर्सी पर खादी की शानदार लोई ओढ़े मोटी फाइल उलट – पुलट रहे थे| इशारे से बैठने के लिए कहा और अपने काम में लगे रहे| कमरे के एक कौने मैं एक शख्स टाइपराइटर के आगे शांत मूर्तिवत मगर चौकन्ना बैठा था| अन्दर से बिना कुछ कहे सुने हमारे लिए पहले पानी और बाद में तले हुए काजू बादाम के नाश्ते के साथ तुलसी अदरक की चाय आ गयी| यह उपक्रम और नाश्ता अलीगढ़ के पुराने परिवारों में खानदानी चलन की तरह आज भी होता है| मगर खास बात थी कि हमारे मेजबान ने अभी तक कोई शब्द नहीं बोला था; साथ में चाय न पीने के लिए माफ़ी मांगना तो दूर की बात थी| मैं अस्सी – पिच्यासी साल खूसट सनकी सठियाए बूढ़े के बारे में राय बना रहा था|

अचानक बोलना शुरू कर दिया और कौने में टाइपराइटर की खटखट शुरू हो गई| जमींदारी, परिवार और अफ़सरी शान को नाक पर रखने वाले मेरे पिता पूरे रूआब के साथ मगर शांत बैठे वहीँ तिपाही पर रखी कोई किताब पढ़ रहे हैं| मैं जानता हूँ, स्वतंत्र भारतीय सामंतवादी अलीगढ़ी समाज में इस समय मेरा काम मात्र चौकन्ने होकर बैठना है| अचानक उनका बोलना और टाइपराइटर की खटखट रुक गई|

“क्या पढ़ रहे हो आजकल” मुझे पता था, यह प्रश्न मेरे लिए हैं| “कॉन्ट्रैक्ट एक्ट”| “बेयर??” “जी, बेयर के साथ दो एक कमेन्ट्री भी है”| “ज़रा, साहबजादे को कागज देखने के लिए दे दो|” ताजा टाइप किये हुए कागज मेरे हाथ में थे| मैं नहीं जानता क्या करना है| मगर पूछना तब तक गलत है, जब तक पूछने के लिए न कहा जाए| अपने हिसाब से व्याकरण, कहानी की तारतम्य और टाइप की गलतियों के हिसाब से पढ़ने लगा| कुछेक ही सुधार करने थे, ज्यादातर टाइप के| “पूरी फाइल पढ़ कर कल इन्हें दोबारा देखना, फिर बताना|” फाइल हिंदी में थी, मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का कोई निर्णय था, जिसकी अपील होनी थी|

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जब मैं क़ानून की पढाई के पहले साल में परीक्षा देने गया तो बोले अगर जबाब ठीक न आये तो मत लिखना, जितना सही आये उतना लिखना| कम बोलना बचपन से सीखा था तो मैं उन दिनों भुलाने की कोशिश कर रहा था| वो कम शब्द लिखने और बोलने के कायल थे| मगर एक भी तथ्य छूटना नहीं चाहिए|

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यह उनका तरीका था| जब क्लाइंट आता, तो उस से पूरी कहानी जुबानी जरूर सुनते| वो जज और बाकी हम सब जूरी| क्लाइंट की बात में से बहुत प्रश्न पूछे जाते और नोट किये जाते| अधिकतर उन्हें घड़ी भर में पता लग जाता कि मामला क्या है और उसका आगे क्या होने वाला है| झूठे मुक़दमे वाले मामलों में लोग खुद ब खुद भाग खड़े होते| एक हफ्ते में एक ही नया मामला पकड़ते| उनके पास काम करने वाले लोग अक्सर बहुत सीधे सादे थे| थोडा भी चालाक चतुर आदमी उनके पास नहीं टिकता| यहाँ तक कि उनके अपने बच्चे भी नहीं| उन्हें होशियार लोग बहुत पसंद थे मगर होशियारी बिलकुल नहीं| उनके हिसाब से चालाक चतुर होशियार लोग कंपनी में जाकर गंजे को कंघा बेचने के लिए पैदा होते हैं|

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लगभग दो साल मैं हर हफ्ते उनके पास जाता था| दिन भर उनके साथ बैठना, सुनना, समझना, सीखना, और काम ख़त्म होने पर टहलना या कुछ देशी किस्म का नाश्ता| वो राजनीति से ज्यादा क़ानून की चर्चा करते| कानून पढने की चीज नहीं है, अक्सर कहते और साथ में चार पांच किताब पकड़ा देते| जब पढ़ लेते तो पढ़ा हुआ भूल जाने के लिए कहते| मगर उन्हें ढेरों कानूनी किताबे खुद याद थीं| बहुत से मुक़दमे याद थे| जब हम खाली होते तो किसी पुराने मुक़दमे को कहानी की तरह सुनाते| क़ानून के नुक्ते और नुस्खे कहानी में आते जाते रहते|

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उनके किसी काम में कोई गलती नहीं होती थी| उनकी बात कोई नहीं काटता| सिविल जज जूनियर डिवीज़न से लेकर जिला जज तक के पूरे जीवन में उनका कोई निर्णय कभी नहीं पलटा| उनके जो निर्णय उच्च न्यायालय में बदले तो उच्चतम न्यायालय में बहाल हो गए| वो कभी क्रोधित नहीं होते, सिर्फ अपने हिसाब से काम करते| उनकी सलाह आदेश होते और आदेश वो देते नहीं थे| वो अलीगढ़ से उच्चतम न्यायालय रोज जाते और मृत्यु से कुछ दिन पहले तक रोज ही जाते रहे| उनकी शाही सादगी, अनगढ़ परिपक्वता सब काबिले तारीफ| वो #MadeOfGreat थे|

गदर्भ न्याय

भारतीय पुलिस को के बार आतंकवाद के आरोपी गीदड़  पकड़ने के आदेश मिले| पुलिस वाले बस इतना ही जानती थी कि गीदड़  कोई जानवर होता है| साल भर कुर्सी तोड़ने के बाद भी उन्हें गीदड़  नहीं मिला| एक दिन थाने के सामने घास चरता हुआ गधा मिल गया| तो उसे गीदड़  बना कर पकड़ लिया|

लात घूसे और लाठियां खाते खाते गधे को पता चला कि इन पुलिसियों को गीदड़  चाहिए| तो मार से बचने के लिए उसने खुद का गीदड़  होना कबूल कर लिया| अपराध में अपने शामिल होने के बारे में एक कहानी सुना दी|

सरकारी वकील ने अदालत को बताया हुजूर जानवरों के बारे में लिखी सबसे बड़ी किताब में लिखा है गीदड़  के सींग नहीं होते और पूँछ होती है| जो कि आरोपी के है| तो अदालत ने गधे को गीदड़  करार दे दिया|

इस बीच मंत्रीजी ने लालदीवार से गीदड़  पकड़ने वाले पुलिसियों को पुरुस्कार घोषित कर दिया| उधर अगले दिन वकील सफाई ने दलील दी कि आरोपी के खुर है, जो गीदड़  के नहीं होते| तो मंत्रीसेवकों ने उनको देशद्रोहियों का साथी बताना शुरू कर दिया| देश भर में अपराध पीड़ितों के लिए न्याय की मांग जोर पकड़ गई|

अदालत ने देश की भावना का सम्मान किया और गधे को गधा मानते हुए खुर न होने  की असमानता परन्तु अन्य समानता के आधार पर गीदड़  का भाई और उस के अपराध स्वीकार करने के आधार पर उसको अपराधी घोषित कर दिया|

मोमबत्तीवालों ने बड़ेदरवाजे जाकर मोमबत्ती जलाईं| मंत्रीजी ने पुलिसियों का मोरल डाउन करने के आरोप में मोमबत्ती वालो ने पीछे कुत्ते छोड़ दिए| और पटाखे वालों ने पटाखे फोड़े|

कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| कहानी चलती रही| … कहानी यूँ ही चलती रही|

मंत्री जी की कुर्सी सालों साल बैठे रहने से चरमराने लगी| बढई ने बताया कुर्सी ठीक करने के लिए गीदड़  का खून लगेगा| पुलिस ने बताया, हमारे कब्जे में तो गीदड़  का भाई गधा है|

आनन फानन में मंत्री जी, अदालत, पुलिस, मोमबत्ती और पटाखे हरकत में आये|

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अख़बार ने लिखा “नरक में जा गधे|” गीदड़  ख़ुश हुआ| मोमबत्ती और पटाखे बिके| मंत्री जी ने बिरयानी खाई| पुलिस का मोरल आसमां से चिपक गया| कुछ गधों को कुछ यकीन आया|

बाद में एक किताब आई….

क़ानून पर आम भारतीय नजरिया

क़ानून के हाथ लम्बे होते हों या न हों उसका डंडा बहुत लम्बा, मजबूत, कंटीला और कठोर होना चाहिए, जिस से कि पडौसी का सिर एक बार में फूट जाये| आज डंडे का जमाना नहीं है तो आप रिवाल्वर या रायफल कर लीजिये| मगर यह एक आम भारतीय नजरिया है|

दूसरा फ़लसफा खास भारतीय यह है कि क़ानून एक भैंस है जिसे कोई भी अपनी लाठी से हांक सकता है बशर्ते उसकी लाठी उस चौकी, थाने, जिले या सूबे में सब पर भारी होनी चाहिए| इस फ़लसफ़े का दूसरा तर्जुमा है, क़ानून एक ऐसी रांड है जिसे कोई भी अपनी रखैल बना कर उसका मजा मार सकता है|[i]

तीसरा और सबसे खास भारतीय क़ानूनी फ़लसफा ये है कि अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए| इसलिए हम भारतीय ऊपर लिखे सभी फ़लसफ़ों को दिल से लगाकर रखते है और तब तक ज़ुबान पर नहीं लाते| इसीलिए भारतीय पडौसी का सिर और अपना पिछवाड़ा फूटने तक चुप रहते है और हाकिमों के तलवों ने सिर छिपाए रखते हैं|

अब साहब अगर इन सादा सरल फ़लसफ़ों को समझने में कोई दिक्क़त तो तो कुछ वाकये सुनते हैं, जो कुछ दूर पास का ताल्लुक इन फ़लसफ़ों से रखते हैं| क़ानूनन आपको को बता दे कि सभी वाकयात एकदम बेहूदा और वाहियात हैं और उनका किसी सच से कोई ताल्लुक नहीं है| अगर आपको सच लगें तो ऊपर लिखा तीसरा फ़लसफ़ा दोबारा पढ़ें|

जब क़ानून किसी किसी कुर्ता- पायजामा को जूते पहना रहा हो या कुर्ता – पायजामा क़ानून के जूते बजा रहा हो तो आपके पास दूसरा फ़लसफ़ा पढने का वक़्त नहीं है| आप अगर शरीफ़ हैं तो चुपचाप घर जाकर बच्चों को कबीरदास का “सांच बराबर तप नहीं” वाला दोहा सुनाएँ| अगर आप झाड़ पौंछ शरीफ़ हैं तो कुर्ता – पायजामे का रंग देखें| अगर आपका और उसका रंग एक है तो भारत माता की जय बोलें और अगर रंग अलग है तो उसका फ़ोटो और फोटोशॉप सामाजिक क्रांति के लिए प्रयोग कर दें|

अगर क़ानून किसी अदालत में गोल गोल घूम रहा है तो दूसरा फ़लसफ़ा जेहन में आता है| अदालतें लाठी वालों का पिकनिक स्पॉट हैं जहाँ क़ानून की भैंस हर कोई दुहता है|

सूट बूट हिंदुस्तान में सबसे ताकतवर होता है| सूट बूट का दिमाग उतना ही वातानुकूलित रहता है जितना उसके फार्महाउस का अय्याशखाना| यह हमेशा तफ़रीह के सीरियस मूड में रहता है और क़ानून खुद-ब-खुद इसकी बाँहों में| क़ानून इसके भाव – भंगिमा को खूब पहचानता हैं और हमेशा एक खास तरह में मूड में रहता है| अब, दूसरा फ़लसफ़ा का दोबारा न पढ़े|

अब बात आती है इस पूरी बकवास से मतलब क्या निकल रहा है| हमारे मुल्क में जो बात सबको पता हो, उसे बताना बकवास ही तो है| रे भाई, बताया था न, अगर क़ानून की बात हो तो उसमें अपना सिर नहीं अड़ाना चाहिए|

बाकि जो मतलब जो बकबास है वो अगली बार बताई जाएगी| तब तक क़ानून से बचकर रहें| सलामत रहें और हमेशा की तरह ऑफिस में सूट – बूट और सोशल मीडिया पर कुर्ता – पायजामा के सामने नतमस्तक रहे| अपने ईश्वर और ईमान को औक़ात में बनाये रखें|

[i] सुसंस्कृत अनुवाद:- “भारत की सर्वमान्य नगरवधु विधि, समस्त योग्यजन के लिए प्रसन्नताकारक होती है|”

वैश्या का बलात्कार

 

किसी भी पीडिता स्त्री को वैश्या साबित किया जाना, भारतीय न्यायालयों में बलात्कार के आरोप के बचाव के रूप में देखा जाता है| प्रायः स्त्री को चिकित्सकीय जाँच में यह बताया जाता है कि “यह आदतन” है| परन्तु, विवाहिता स्त्री अथवा लम्बे समय से शोषण का शिकार रही स्त्री को यह जाँच क्या बताती है? मैं दो प्रश्नों पर विचार का आग्रह करूँगा|

लेकिन क्या किसी वैश्या से “जबरन यौन सम्बन्ध” बनाना अपराध नहीं हैं? किसी भी वैश्या की सहमति लेना शायद समाज में सबसे आसान होता होगा; परन्तु जो पुरुष यह आसान सी सहमति भी नहीं ले सकते…|

मेरे विचार से यदि किसी भी स्त्री को वैश्या साबित किया जाता है तो आरोपी पर बलात्कार के साथ साथ धन वसूली का मुकदमा भी चलना| उसे साबित करना चाहिए कि उसने धन दिया था और पैसे लेने के बाद भी यह वैश्या पूर्व सहमति से मुकर गई|

मेरी पूरी सहानुभूति उस समाज के साथ है जो उस पुरुष को हेय दृष्टि से नहीं देखता जिसका पुरुषार्थ इतना भी नहीं है कि वह एक वैश्या की सहमति भी हासिल कर सके|

जिस समाज में वैश्या भी अपने को असुरक्षित और ठगा हुआ महसूस करतीं हैं उस समाज में एक घरेलू स्त्री का तो घर से बाहर निकलना ही बहुत असुरक्षित है| क्योंकि वैश्याएँ जितने अच्छे से पुरुष वासना को समझती है उतना और कौन समझता होगा|

समाज को सुरक्षित बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम अंग्रेजों द्वारा लादे गए धर्म और क़ानून को छोड़ें और उस पुराने भारतीय समाज की और लौटें जहाँ वेश्याओं का भी सम्मान और सुरक्षा थी| निश्चित रूप से यौनकर्म का सुरक्षित, नियंत्रित, और नियमित होना सुरक्षित होना, सारे समाज में सुरक्षा का मानदंड है|