इसकी हिंदी क्या है?

समाचार के अनुसार, एक व्यक्ति ने वित्तमंत्री अरुण जेटली से “बुलेट ट्रेन” की हिंदी पूछ ली| हिंदी वालों में हिंदी पूछ लेना उनता ही सामान्य हो चला है, जितना अंग्रेजी वालों का हर भाषा के शब्द उठाकर अंगीकार और आत्मसात कर लेना| हर बात की हिंदी करवाना गुलाम मानसिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है| हिंदीवादी लोग भाषा के स्वतंत्र व्यकित्त्व की चाह में हिंदी को मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दों समेट देना चाहते हैं| इस प्रकार हिंदी को संस्कृत की उपभाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| संस्कृत निष्ठता के पीछे फ़ारसी शब्दों को नकारने की भावना से प्रारंभ होकर अब अंग्रेजी शब्दों को नकारने तक जा पहुंची गई है| विरोध की यह भावना इस तथ्य को भी नकारती है कि फारसी और संस्कृत एक ही स्रोत को भाषाएँ हैं|

अंग्रेजी से पहले फ़ारसी विश्वभाषा के दर्जा रख चुकी है| फ़ारसी के प्रसार में उन पारसियों और ईरानियों  का हाथ कम रहा, जिनकी मूल रूप से यह भाषा है| भारत में आये अरब, तुर्क, अफगान, मंगोल, मुग़ल आदि सबने फ़ारसी को सामान्य और राजनितिक जीवन में अधिक महत्व दिया| कारण शायद यही है कि फ़ारसी में अंगीकार, आत्मसात और समाहित करने की भावना और क्षमता अधिक रही| यही स्वीकार वृत्ति एक समय में छोटे से समूह की भाषा मानी जाने वाली अंग्रेजी को विश्वभाषा बनाने में सफल रही| आज अंग्रेजी उन देशों में भी स्वीकार है जहाँ उनके लोगों का राज नहीं रहा था|

आज भारतीय समाज इस बात की चर्चा करता है कि अंग्रेजी में कितने भारतीय मूल के शब्द हैं| क्या अंग्रेजी उन भारतीय शब्दों को अपना पाती, अगर वह अपने रोमन या ग्रीक मूलों से अपने लिए शब्द गढ़ने में समय नष्ट करती| अपने भाषा मूलों से शब्द गढ़ना गलत नहीं है| परन्तु इसे हास्यास्पद नहीं हो जाना चाहिए| शब्द सरल और सर्वस्वीकार होने चाहिए| लोहपथगामिनी जैसे शब्द स्वीकार नहीं हो पाए| परन्तु इस प्रकार के शब्दों के कारण सरकारी हिंदी और साहित्यिक विश्व की सबसे दुरूह भाषाओँ में से एक बन चुकी हैं|

अगली बार अगर आपको किसी शब्द की हिंदी न आये तो शेम्पू के स्थान पर मूल भारतीय चम्पू का प्रयोग करने का प्रयास करें| बुलेट ट्रेन की हिंदी उसके बाद ढूंढेंगे| जैसा जेटली बुलेट ट्रेन की हिंदी पूछे जाने पर कहते हैं, “थोड़ा गंभीर होने का भी प्रयास कीजिये”|

 

समाज में संस्कृत

प्राचीन भारतीय भाषा संस्कृत को लेकर भारतीय विशेषकर उच्चवर्ग मानसिक रूप से लगाव रखता है| जिन लोगों को किसी भी भारतीय भाषा में बात करने में शर्म आती हैं वो भी संस्कृत का जिक्र आते ही अपने ह्रदय में राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, और संस्कार के झंडे बुलंद करने लगते हैं| मगर अगर भारतीय जनसंख्या के अनुपात में देखें तो जनसँख्या का नगण्य हिस्सा के लिए ही संस्कृत  मातृभाषा है| मुट्ठी भर भारतीय इसे समझ बोल सकते हैं| बहुसंख्य के लिए संस्कृत गायत्री मंत्र या किसी और गुरुमंत्र की भाषा मात्र है| अधिकांश “काले अक्षर भैस बराबर – यजमान” पंडितजी के सही गलत उच्चारण में बोली गई संस्कृत में वेद – पुराण मन्त्रों से अपना इहलोक और परलोक “सुधार” लेते हैं और ॐ जय जगदीश हरे या कोई फ़िल्मी आरती गाकर या सुनकर संतुष्टि प्राप्त करते हैं|

सरकारी हिंदी और धार्मिक संस्कृत की भारत में दशा इनके पोंगा प्रचारों, अनुष्ठानों और समारोहों के कारण जनता से कोसों दूर है| सरकारी हिंदी का बनावटीपन उसकी विनाशगाथा है| मगर संस्कृत का दुर्भाग्य है कि यह धर्म के ठेकेदारों के कब्जे में है और विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में भी इसके शिक्षक संस्कृत को धर्मग्रंथों से अलग कर कर नहीं देख पाते| उनके लिए संस्कृत वेद पुराण की भाषा से अधिक कुछ नहीं है| भर्तहरि बाणभट्ट, जयदेव, जैमनि, कालिदास, आदि उनके लिए संस्कृत का नहीं, सामान्य ज्ञान – अज्ञान का विषय है| आचार्यों के दीर्घबुद्धि में यह नहीं आता कि जब भाषा को साहित्य से अलग कर दिया जाय तो वह बूढी हो जाती है और जनता से कटकर मृत|

मगर संस्कृत की दुनिया में सब कुछ पंडिताऊ अंधकार ही नहीं है, जन साधारण का उजाला भी है:

देखिये सुनिए नीचे दिए गए चलचित्र –

 

 

 

 

धर्मपत्नी

सोशल मीडिया की सबसे बड़ी खूबी है कि युवा पीढ़ी अपनी अज्ञानता और अयोग्यता को भी हँसी – ख़ुशी के साथ परोस देती है और शेयर/फॉरवर्ड भी करती है|

अभी हाल में एक प्रश्न मुझतक एक बार फिर पहुंचा:

अगर धर्मपिता, धर्ममाता और धर्मभाई का अर्थ असली पिता, माता या भाई से नहीं तो फिर धर्मपत्नी का अर्थ असली पत्नी से क्यों है?

पिता, माता, पुत्री, पुत्र, भाई और बहन यह सब वह सम्बन्ध हैं जिन्हें हम जन्म से लेकर आते हैं और भले ही हमें उन रिश्तों के बारे में किसी भी कारण जानकारी न हो मगर यह सभी सम्बन्ध मौजूद रहते है और इनका वैज्ञानिक प्रमाण भी दिया जा सकता है| जैसे बिछुड़ा भाई, हमेशा हमेशा भाई ही रहेगा; चाहे यह बिछुड़ना मानसिक (मन – मुटाव), भौतिक (कुम्भ मेले में बिछुड़ना) या आत्मिक (मृत्यु) कुछ भी हो| इन सम्बन्धों में असली या नकली नहीं होता, भाषा की दृष्टि से इन्हें “सगा” सम्बन्ध कहा जा सकता है| यह सम्बन्ध भौतिक और वैज्ञानिक सत्य हैं| भारतीय भाषाओँ के सम्बन्ध में सगे के अतिरिक्त अन्य सम्बन्ध चचेरे ममेरे फुफेरे मौसेरे भी हैं, जिन्हें अंग्रेजी में कजिन कहते हैं|

धर्मपिता, धर्ममाता, धर्मपुत्र, धर्मपुत्री, धर्मभाई, धर्मबहन आदि रिश्ते इस जन्म में बनते है| ऐसा नहीं है कि हमने किसी को पकड़ा और उसे भाई बोल दिया तो वह धर्म भाई हो गया| इस प्रकार तो शहर के सभी रिक्शेवाले और गोलगप्पे वाले सबके धर्मभाई हो जायेंगे|

धर्म सम्बन्ध में धर्म का अर्थ कि किसी धार्मिक या विधिक समारोह से नहीं है| गोद लेना एक धार्मिक और साथ ही विधिक समरोह है मगर इस से बनने वाला रिश्ता “सगा” होगा; इस से परिवार में पुत्र या पुत्री का प्रवेश होता है न कि धर्मपुत्र या धर्मपुत्री का| इसी प्रकार, विवाह के धार्मिक या विधिक समारोह से परिवार में पत्नी और पुत्रवधु का प्रवेश होता है न कि धर्मपत्नी या धर्मपुत्रवधु का|

धर्मसम्बन्ध में धर्म का अर्थ कर्तव्य से है, जो धर्म शब्द के मूल अर्थों में से एक है| वह व्यक्ति जो पिता का धर्म निभाए वह धर्मपिता; वह व्यक्ति जो माता का धर्म निभाए वह धर्ममाता; वह व्यक्ति जो पुत्र का धर्म निभाए वह धर्मपुत्र; वह व्यक्ति जो पुत्री का धर्म निभाए वह धर्मपुत्र; वह व्यक्ति जो भाई का धर्म निभाए वह धर्मभाई; वह व्यक्ति जो बहन का धर्म निभाए वह धर्मबहन; वह व्यक्ति जो पत्नी का धर्म निभाए वह धर्मपत्नी; और वह व्यक्ति जो पति का धर्म निभाए वह धर्मपत्नी| “धर्मपति” नहीं सुना शायद आपने; और इसके न सुनने में ही “धर्मपत्नी” का भाव, अर्थ और दुर्भावना छिपी हुई है| पहले इस बात से सहमत हो लें कि धर्मपत्नी है तो धर्मपति भी होगा ही| मगर “धर्मपति” शब्द प्रचलन में नहीं है|

प्रायः धर्मपत्नी शब्द का प्रयोग पत्नी के समक्ष यह कहने का प्रचलित तरीका है कि उसे पत्नी से बढ़कर होना चाहिए और पत्नी के साथ साथ धर्मपत्नी भी बनना चाहिए| अर्थात सभी पत्नी के कर्तव्यों का पालन करना चाहिए| दुखद यह है कि धर्मपत्नी, पत्नी, उपपत्नी, रक्षिता और प्रेमिका के रूप में पति के साथ रहने वाली स्त्रिओं को धर्मपत्नी बनने का दबाब रहा है| जब पति अपनी पत्नी को धर्मपत्नी कहता है तो वो अपने निजी संबंधों के अच्छे होने के “निर्लज्ज” सार्वजानिक घोषणा करता है, जो मेरे विचार से पति – पत्नी आवश्यक कतई नहीं है| ऐसा इसलिए कि पति कभी भी अपने धर्मपति होने का दावा करते नहीं देखे जाते|

पत्नी के लिए धर्मपत्नी और अर्धांगिनी शब्द का प्रयोग मैं अनुचित हैं क्योंकि धर्मपति और अर्धंगना शब्द भाषा में मान्य नहीं हैं| अंग्रेजी का spouse और हिंदी का जीवनसाथी, पति पत्नी दोनों के लिए अधिक उचित शब्द हैं|