हमारी गोमती

अलीगढ़ शहर में जब आप थोड़ा बड़े होने लगते हो तो आगरा या दिल्ली में से एक आपको अपना दूसरा घर लगने लगता है| आजकल विकास की मार के कारण आगरा छूट गया है और दिल्ली – नॉएडा ही विकल्प बचे हैं| अलीगढ़ शहर से दिल्ली जाने के साधन कुछ भी हों, पर वो रेलवे ट्रैक पर ही चलते हैं| बस का विकल्प हमने एटा–मैनपुरी–कासगंज वालों के लिए छोड़ रखा है| पुराने समय में कभी एज़ीएन सुबह अलीगढ़ वालों को दिल्ली पहुंचा देती| बाद में ईएमयू ट्रेन नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली तक जाने लगीं| बचे खुचे लोगों को हाथरस वालों को एचेडी और टूंडला वालों की टीएडी का आसरा रहता| मगर जलवा अगर रहा तो गोमती का, जिसे मगध के अलावा किसी ने चुनोती न दी|[1] भले ही दोनों ट्रेन आजकल भारत सरकार की गति की तरह ही ढुलमुल चलतीं हैं, मगर जलवा कायम है|

जिस ज़माने में बिहार की राजधानी से मगध सुबह सवा नौ तक आ जाती थी, अलीगढ़ वाले औकात से गिरना कम ही पसंद करते थे| मजबूरी को छोड़ दें तो, छोटे बनिए और उनके कुली ही मगध से जाते थे| उन दिनों और आजकल भी, लटककर ही सही मगर आन बान के साथ गोमती से जाना ही समझदारी है| गोमती में भले ही दो- चार अनारक्षित डिब्बे होते हैं मगर ये कहाँ होते हैं इसका पता लेखक को नहीं है| इसके चौदह पंद्रह आरक्षित कुर्सीयान डिब्बों में आरक्षण पागल, सनकी, बूढ़े, गर्भवती, बच्चेवालियाँ या नई-नवेलियाँ करातीं है| ये तो होली मिलन के दिनों में टीटी मिलने और अपने सालाना टारगेट का रोना सुनाने न आये तो पता भी न चले कि इसका आरक्षण किधर होता है| इन डिब्बों में बैठना, खड़े होना, लड़ना और लटकना मिलकर दोसौ से तीनसौ भलेमानस प्रति डिब्बा यात्रा करते हैं| इन डिब्बों में आप नैसर्गिक मनोरंजन करते, लड़ते – झगड़ते, कूदते-फाँदते, कोहनीबाजी और उंगलबाजी करते हुए आराम से सफ़र कर सकते हैं, वर्ना गप्प मारने और ताश पीटने के काम तो निठल्ले भी कर ही लेते हैं|

नए पैसे वाले लौड़े–लौंडियाँ आजकल एसी वैसी में चलने लगे हैं| इनकों दादरी और गाज़ियाबाद तक ही टिकना होता हैं| ये मोबाइल पकड़ प्रजाति कंप्यूटर की गुलामी करने को देश का विकास समझती है और इन्टरनेट पर भगत सिंह की क्रांति करती रहती है| धीरे धीरे अधेड़, परिवारीजन भी इस एसी में जाने लगे हैं; मगर जाड़ों में इसमें इतना दम घुटता है कि लालू याद आते हैं और चारा चोटाला तेल लेने चला जाता है| बकौल रेलवे, वोट के अलावा कुल जमा इन दो डिब्बों के लिए ही हो तो पूरी गोमती चलाई जाती है|

एक नेताजी टाइप डिब्बा भी है, उसका न पूछे| एक बार हमने पूछा था तो पता चला उसमें अम्बानी का चाचा, अखिलेस का ताऊ, माया का भाया, टाइप कोई होता है – कभी कभी| डिब्बा इसलिए होता है कि कहीं चाइना पाकिस्तान को पता न चल जाये कि इत्ती बड़ी गाड़ी में एक पिद्दी एसी फर्स्ट क्लास नहीं है|

[1] कृपया भूलकर भी इन्हें मगध एक्सप्रेस और गोमती एक्सप्रेस के वाह्यात सरकारी नामों से न पुकारें, भावनाएं आहत हो सकतीं हैं|

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भारतीय रेलवे जनता खाना

बचपन में जब भी लम्बी दूरी की यात्रा पर जाना होता – पूड़ी, आलू टमाटर की सूखी सब्जी, आम, मिर्च या नीबू का आचार और सलाद के नाम पर हरी मिर्च या प्याज हमेशा साथ होती| पता नहीं क्यों यूँ लगता था कि सफ़र के दौरान इस खाने का स्वाद कुछ अलग ही बढ़ जाता है| प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव के आर्थिक सुधार और छठे वेतन आयोग की सिफ़ारिशें देश में कुछ ख़ुशहाली लायीं और पुरानी ख़ुशियाँ छिनने लगीं| भारतीय रेल की पेंट्री और रेलवे प्लेटफ़ॉर्म का महंगा खाना खरीदने के पैसे लोगों के पास आ गए| कहिये कि संदूक का वजन कम करने के चक्कर में जेब का वजन भी भारी पड़ने लगा और हल्का किया जाने लगा|

भारतीय रेल नेटवर्क में मिलने वाले सभी खानों में स्वाद, मूल्य और उपलब्धता की दृष्टि से अगर किसी खाने का चुनाव करना हो तो जनता खाना उत्तम विकल्प हो सकता है| जिन दिनों मैंने जनता खाने का पैकेट पहली बार खरीदा तब यह सात या दस रुपये का था| आज भी यह पंद्रह या बीस रूपये में आ जाता है| जिन दिनों मैं अलीगढ़ – दिल्ली रोजाना यात्रा करने लगा, उन दिनों मुझे जनता खाने से प्रेम हुआ|  मुझे घर जल्दी छोड़ना होता था, अतः लगभग रोज जनता खाना खरीदता था|

भारतीय रेल का जनता खाना भारतीय खाद्य आदतों का परिचायक है| थोड़ा अच्छी तरह सिकी हुई पुड़ी, मिर्च वाली आलू टमाटर की सूखी सब्जी, मिर्च| पैकेट का आधिकारिक वजन लगभग डेढ़ सौ ग्राम – सात पूड़ी के साथ| साथ में मिलने वाली हरी मिर्च जिस प्रकार इन पैकेट के बाहर झांकती है, उसका भी अलग आकर्षण है| आम बाजारू आलू सब्जी से अलग इसमें तेल बहुत कम है और चूता तो लगभग नहीं ही है| गाढ़ी आलू सब्जी में पानी रिसने का भी प्रश्न नहीं अतः इसके पैकेट को लोग गोद में रखकर कहते खाते हुए भी मिल जायेंगे|

जनता खाना लालू प्रसाद यादव के रेलमंत्री काल की धरोहर है| आप लालू प्रसाद यादव को राजनीतिक और निजी कारणों से नकारने का प्रयास कर सकते हैं, परन्तु उनके समय का कुशल रेल प्रबंधन का बिना शक सराहनीय रहा है| भारतीय रेल में खाना बेचना सरकार के लिए भले ही सरल हो मगर देश भर में इस काम में लगे छोटे विक्रेताओं के लिए परिवार के जीवन – मरण का प्रश्न है| एक विक्रेता एक मिनिट में चार से अधिक ग्राहक को सेवा नहीं दे पाता| एक स्टेशन पर दो मिनिट से कम देर रुकने वाली ट्रेन में जनता खाने के ग्राहक प्रायः कम ही होते हैं| ऐसे में संघर्ष बढ़ जाता है| ट्रेन समय से दो-एक घंटा देर से चल रही हो, पांच मिनिट या अधिक रूकती हो और निम्न मध्यवर्ग की सवारियों का बाहुल्य हो –  यह हर छोटे विक्रेता के जीवन यापन के लिए आवश्यक है| इन आदर्श परिस्तिथियों में एक ट्रेन से एक विक्रेता पांच मिनिट में बीस पैकेट बेचकर चालीस रुपये बनाने की उम्मीद कर सकता है|

एक दिन अचानक मैंने जनता खाना लेना बंद कर दिया| अलीगढ़ जंक्शन के चार नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर मगध एक्सप्रेस आना चाहती थी| सिंग्नल और अनाउंसमेंट हो चुका था| एक भूखा पेट वेंडर दो नंबर प्लेटफ़ॉर्म से लाइन पर कूदकर तीन नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर जा चढ़ा और चार पांच जनता खाना डिब्बे लाइन पर ठीक वहां जा गिरे जहाँ नहीं गिरने चाहिए थे| ऐसे की किसी दिन को देखकर भारतीय रेलवे को बायो-टॉयलेट का विचार आया होगा| चार डिब्बे को छोड़ने का अर्थ अगले एक घंटे की कमाई गवां देना था| वेंडर वापिस पलटा, गिरे हुए डिब्बे संभाले और भागकर चार नंबर पर रूकती हुई मगध एक्सप्रेस के अनारक्षित डिब्बे के अन्दर गरम खाना – गरम खाना चिल्ला रहा था| भाषण मत दीजिये – अपने नामचीन विदेशी भोजनालय का दो दिन बासा खाना खाते हुए नीचे दिए हुए चित्र को देखिये और लालू प्रसाद के समाजवाद और नरेन्द्र मोदी के पूंजीवाद पर बहस करते रहिए| [i] [ii] [iii] [iv] [v] [vi] [vii]

[i] http://hindi.webdunia.com/national-hindi-news/%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B2%E0%A4%B5%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B9%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE%E0%A4%B9-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%9F-107042100105_1.htm

[ii] https://www.bhaskar.com/news/CHH-RAI-HMU-MAT-latest-raipur-news-042003-2972594-NOR.html

[iii] http://paisa.khabarindiatv.com/article/tag/janta-khana/

[iv] http://www.amarujala.com/uttar-pradesh/ghaziabad/janta-food-eat-carefully

[v] http://naidunia.jagran.com/madhya-pradesh/ratlam-railway-naptoll-janata-khana-1019510

[vi] http://indianexpress.com/article/trending/this-is-serious/dead-lizard-found-in-veg-biryani-on-train-tweeple-hit-out-at-indian-railways-4767682/

[vii] http://www.financialexpress.com/economy/cag-report-calls-railway-food-unfit-for-humans-10-steps-indian-railways-says-it-is-taking-to-ensure-quality/776532/