विस्थापित कंपनी सेक्रेटरी


 

रोजगार की तलाश हमें विस्थापित कर देती है| अगर कंपनी सेक्रेटरी जैसे मान्य प्रोफेशन को एक केस स्टडी की तरह देखता हूँ तो देश और युवा पीढ़ी को लेकर दिल में कहीं कुछ टूट सा जाता है|

ICSI Logoदेश के एक चौथाई कंपनी सेक्रेटरी आज दिल्ली एनसीआर में रोजगार में हैं, परन्तु आधे से अधिक अंडर एम्प्लॉयमेंट में हैं या योग्यता के मुकाबले आधे वेतन पर काम करते हैं|

देश में बहुसंख्या कंपनी सेक्रेटरी की बहुसंख्या देश के पूर्वी भाग, बिहार और उड़ीसा से आती है| पहली  बात की वो लोग इस पढाई को क्यों पसंद करते हैं? मित्र बताते हैं कि पूर्व क्षेत्र में उन्हें विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए उच्च मानदंड वाले संस्थानों की कमी है| दूसरा, औद्योगिक विकास इतना कम है कि यह क्षेत्र इस तादाद में कंपनी सेक्रेटरी को रोजगार के अवसर नहीं दे पाता| अधिक पड़ताल करने पर पता लगता है कि पूर्वी भारत में स्थानीय मूल के लोगों के मुकाबले आप्रवासी मारवाड़ी समुदाय का इस प्रकार के रोजगार पर पूरा कब्ज़ा है| आप दिल्ली और मुंबई में पूर्वी भारत से आये आप्रवासी कंपनी सेक्रेटरी की बहुतायत देख सकते है| हिंदी भाषा की बोल सकने सुविधा उन्हें दिल्ली की और अधिक आकर्षित करती है|

दक्षिणी भारत में कंपनी सेक्रेटरी के मध्य आप्रवासन की बड़ी समस्या नहीं है| इसका श्रेय बंगलौर, हैदराबाद और अन्य क्षेत्रों के हालिया विकास को दिया जा सकता है| परन्तु आप पाएंगे, इस भूभाग में आज भी छोटे शहर से बड़े शहर की और विस्थापन जारी है| कुछ साधारण उपायों के साथ छोटे शहर में भी कंपनी सेक्रेटरी के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जा सकते हैं|

पश्चिम भारत की स्तिथि विचित्र प्रतीत होती है| गुजरात में संख्या के तौर पर बहुत बड़ी तादाद में कंपनी सेक्रेटरी नहीं आते और उन्हें राज्य के अन्दर प्रायः रोजगार उपलब्ध है मगर वहां भी छोटे शहर के हालत भिन्न नहीं हैं| मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में शिक्षा का माध्यम हिंदी हैं और कंपनी सेक्रेटरी के रोजगार का अंग्रेजी| विकास में अभी गति पकड़ना अभी बाकी है और निकट भविष्य में सम्भावना हो सकतीं है परन्तु अभी आश्वस्ति से दूर है| महाराष्ट्र का पूर्वी भाग शिक्षा और रोजगार दोनों मामलों में चिंता का विषय है, तो पश्चिमी महाराष्ट्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, सारे देश से आने वाले विस्थापित कंपनी सेक्रेटरी यहाँ पर उचित रोजगार पा लेते हैं|

उत्तर भारत में कंपनी सेक्रेटरी के सबसे अधिक छात्र हैं जिनमें पूर्वी भारत से दिल्ली आकर पढ़ने वाले छात्र भी बहुतायत में हैं| यहाँ के बड़े शहर में बड़ी संख्या में कंपनी सेक्रेटरी उपलब्ध है और रोजगार के अवसर कम हैं| अंडर एम्प्लॉयमेंट एक बड़ा दुखद परिदृश्य है| विकास के केंद्र केवल दिल्ली रह गया है| जहाँ समूचे उत्तरी और पूर्वी भारत से बहुसंख्य कंपनी सेक्रेटरी विस्थापित होकर आते हैं| यह विस्थापन कंपनी सेक्रेटरी की शुरुवाती पढाई के दौरान ही शुरू हो जाता है| अधिकांश लोग पढाई का दूसरा आधा भाग दिल्ली में आकर पूरा करते है| देश के एक चौथाई कंपनी सेक्रेटरी आज दिल्ली एनसीआर में रोजगार में हैं, परन्तु आधे से अधिक अंडर एम्प्लॉयमेंट में हैं या योग्यता के मुकाबले आधे वेतन पर काम करते हैं| मुकाबला इतना कड़ा है कि बहुत से कंपनी सेक्रेटरी अपने ट्रेनी को भी क्लाइंट की छाया से भी दूर रखते हैं| कंपनी में काम करने वाले कंपनी सेक्रेटरी, अपने किसी प्रक्टिसिंग साथी को अपने ऑफिस में नहीं आने देते| इस सबके बाद भी आपसी सम्बन्ध इतना गहरा है कि रोजगार आपसी रिफरेन्स से ही मिलते है|

ढांचा पढ़िए!!


 

अलीगढ़ शहर का विष्णुपुरी और सुरेन्द्र नगर इलाका; जून १९८२ या जून १९८३; शाम के चार या पांच बजे हैं|

बिजली अगर आती भी तो रेडियो और पंखे चलते हैं; कूलर, एयर कंडीशनर, फ्रिज, टेलीविजन, नहीं| बिजली का पंखा ज्यादातर चलता नहीं और हाथ का पंखा जब तक है जान कि तर्ज पर झला जाता है, वरना गर्मी झेल ही ली जाती है| ज्यादा गर्मी होने पर सरकार को नहीं कोसा जाता, बल्कि भगवान् से दया मांगी जाती है; खुद को कोसा जाता है, पाप शांत कराये जाते हैं| सुबह सत्यनारायण की कथा, उसके बाद मोहल्ले का स्त्री –  सम्मलेन, और बाद में मोहल्ले का एक ही समय पर सामूहिक शयन| जागने के लिए किसी घड़ी की जरूरत नहीं है, न ही किसी अलार्म की| प्राग ऑइल मिल का सायरन समय बताता है| भले ही इस इलाके में कोई मिल में काम नहीं करता मगर इस इलाके पर प्राग ऑइल मिल का नहीं तो उसके सायरन की हुकूमत चलती है| गर्मी के इस हुकूमत की ताकत बहुत बढ़ जाती है| क्योंकि इस मिल में एक बर्फखाना भी तो है, जहाँ बर्फ की बड़ी बड़ी सिल्लियाँ बनती है और पैसे वाले लोग खरीदने के लिए इंतजार करते हैं|

दोपहर के साढ़े तीन बजे सायरन बजता है, आलस दम तोड़ता है, गर्मी में सुस्ताये घर जगने लगते हैं| लगता है दिन दोबारा निकल आया है| बच्चे बहुत जल्दी में हैं, माएं उनको काबू में रखने की मशक्कत में परेशान हैं| उसके बाद स्वर्ग का आनंद; सत्तू, फालसे, खरबूज, तरबूज, कुल्फी या सॉफ्टी, जलजीरा, लस्सी, मट्ठा, छाछ, और कई तरह के शर्बत| शर्बत; बेल, बादाम, सौफ, फालसे, और बाजार का रसना| विविध भारती पर गाने सुनते हुए, मजा दोगुना हो जाता है| स्वाद ले लेकर पिया जा रहा है, जन्नत को जिया जा रहा है| वक़्त की कमी नहीं है; मगर जीभ बहुत छोटी है, जितना देर इस पर स्वाद बना रहे, यह खुश रहेगी; वर्ना आने वाले कल तक लपलपाती रहेगी|

और सड़क पर आवाज गूंजती है:

मतलब अब धूप अपने उतार पर है| खेलने का समय है| बच्चे बाहर सड़क पर दौड़ पड़ते हैं| कुछ बड़ी उम्र के बच्चे अखबार वाले की तरफ हाथ बढ़ा देते है और उन्हें एक अखबार मिल जाता है| न पैसा माँगा गया, न दिया गया| एक मुस्कराहट से कीमत वसूल हो गयी है| दिल खुश हो गए हैं| रास्ते में जो भी बच्चा, बूढ़ा, जवान, स्त्री, पुरुष, नपुंसक, हाथ बढ़ा देता है, उसे अखबार मिल जाता है| आखें टकरातीं हैं, मुस्कराहट फ़ैल जाती है| मांगने वाला अपनी हैसियत के हिसाब से मांगता है, देने वाला उम्मीद से देता है| अगर कोई भी लगातार तीसरे दिन अखबार मांगता है तो अखबार वाला साईकिल से उतर जाता है, और घर का पता पूछता है| बिना और कुछ कहे सौदा तय, कल से सुबह घर पर अखबार आएगा| हाँ, वही, अमर उजाला|

एक शाम मैं हाथ बढ़ा देता हूँ, छोटा बच्चा अख़बार मांग रहा है| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है|

अखबार पढ़ोगे| पढ़ना आता है|

हाँ|

पढ़ कर दिखाओ|

मैं धीरे धीरे पढ़ता हूँ| सिर पर हाथ फेरा जाता है| अखबार मिल जाता है| बहुत सारे आशीर्वाद भी|

मैं अगले दिन फिर खड़ा हूँ| अखबार वाला साइकिल से उतर जाता है| कल का अखबार पूरा पढ़ा|

नहीं|

क्या किया|

फोटो देखे और रख दिया|

मेरे हाथ में अखबार का मुखपृष्ठ और सम्पादकीय है| केवल दो कागज| पूरा अखबार क्यूँ नहीं| मैं सोचता हूँ| मगर जितना मिला है, वो भी हाथ से न चला जाये|

कल ये पूरा पढ़ लेना तभी और अखबार मिलेगा| मैं अगले दिन, पूरा पढ़कर फिर खड़ा हूँ| अखबार सुनना पड़ रहा है|

अखबार वाला खुश है| अब हर हफ्ते अखबार मिलेगा| रोज नहीं| किसी भी एक व्यक्ति को लगातार तीन दिन मुफ्त में अखबार दिया जाता|

मुझे पढ़ने की लत लग रही है| गर्मी ख़त्म हो गयीं हैं| मुझे हर हफ्ते अखबार मिलता है| नियम बंध गया है| हफ्ते भर एक अखबार पढ़ो| सुनाओ और नया अखबार पाओ| मगर क्रम ज्यादा दिन नहीं चलता|

पंजाब में किसी को मार दिया गया है| पापा उसका अखबार रोज खरीदना चाहते हैं| वही अखबार वाला| वाही समय| पापा ने अखबार वाले को रोका| रोज का अख़बार तय हो गया| और मेरा हर हफ्ते अखबार मांगना भी|

मगर मुझे हर रोज आवाज सुनाई देती है| एक उम्मीद आवाज दे रही है| शायद कोई नया ग्राहक मिलेगा| कोई नया बंदा चाय पानी पिलाएगा| या नया बच्चा अख़बार मांगेगा| कई साल मैं उस आवाज को सुनता रहा| वो गुमनाम आवाज| आज भी याद है| उस आवाज का चेहरा नहीं है|  कई साल गुजर गए| पता नहीं चला, कब वो आवाज आना बंद हो गया| मगर मेरे कान आज भी पहचान सकते हैं, सुन सकते हैं|

अमर उजाला… ढांचा पढ़िए….||

 

उत्तर भारत खोज-चित्रमाला


[पिछले महीने ११ अप्रैल के दिन ख्यातिप्राप्त चिट्ठाकार जिओ पार्किन ने अपने भारत भ्रमण के दौरान बनाये गए रेखाचित्र “North India explorer Sketchbook” प्रकाशित किए| रुचिपूर्ण लगने के कारण उनकी अनुमति के साथ मैं इस आलेख को यहाँ हिंदी में प्रस्तुत कर रहा हूँ, साथ में रेखाचित्र भी उपलब्ध हैं – आनन्द लीजिये, टिप्पणियों का स्वागत है|   

 

हम इस बार गर्मियों की छुट्टियों पर जल्दी ही निकल पड़े, यह गंतव्य ही कुछ ऐसा था कि अजीब सा समय चुनना पड़ा| हम बहुत समय से भारत जाना चाहते थे, परन्तु अगर आपको भीषण मानसूनी बारिश के प्रति विशेष रूचि नहीं है तो अगस्त में दो सप्ताह के लिए भारत जाने की सम्भावना नगण्य है|

 

हमारा यह भ्रमण जाँची – परखी साहसिक यात्रा कंपनी Exploreने आयोजित किया था, जिसने हमें अभी तक निराश नहीं किया है| हमारा १५ दिन का “उत्तर भारत खोज’ यात्रा कार्यक्रम राजधानी दिल्ली से प्रारंभ हुआ और हमने उदयपुर, पुष्कर, जयपुर, आगरा, वाराणसी, और अंत में कोलकाता को यात्रा की|

 

इस यात्रा में ग्रहण करने के लिए काफी चीजें थीं, हमें वापस आये एक सप्ताह हो गया है पर मेरे दिमाग में यह अनुभव अभी तक घूम रहा है| इस तरह की जगह मैंने पहले कभी नहीं देखी, सर्वथा वास्तविक से लेकर उत्कृष्ट अपरिचित और असाधारण छवियाँ लगातार बिना रुके इस सामने आ रहीं हैं कि आप पहले देखी हुई को इतनी जल्दी समझ ही नहीं पाते| यदि आप थोडा भी दृश्यपरक व्यक्ति है तो यह आपके लिए छवियों का विस्फ़ोट है|

 

कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत छाविकारों के लिए सुनहरा सपना है और मैं अपने मेमोरी कार्ड को भर कर लाया हूँ| मैं अभी भी इनका संपादन कर रहा हूँ, अभी समय लेगा| हमेशा की तरह, मैंने रेखाचित्र पुस्तिका भी साथ रख ली थी –  जब भी मुझे अवसर मिला मैंने इसका प्रयोग किया|

 

हमारे यात्रा की गति काफी तेज थी और ज्यादातर जगह तो बैठ कर कुछ रेखाएं खींचने का भी समय नहीं मिल पाया| फिर भी, इस चक्कर में बहुत यात्रा की – ट्रेन से (तीन – तख्ती ट्रेन सहित, जो कि अपने में खास है), बस, नाव —  और इन सभी मौकों पर मैंने अपने सामने से कुछ न कुछ उकेर लेने का प्रयास किया| साधारणतः, इनमें मेरे साथी यात्री हैं जो किताबों और मोबाइल फ़ोन पर समय बर्बाद कर रहे हैं|

हाँ, भारतीय सड़कें भी ऐसी हैं, कि उन पर यात्रा करते हुए रेखाचित्र बनाना भी किसी रोलर कोस्टर राइड जैसा है न कि किसी आर्ट स्टूडियो जैसा शांत – सुशील माहौल| कोई फर्क नहीं पड़ता – सारे टेढ़े – मेढ़े अपूर्ण और विषय के दुहराव वाले रेखा चित्रों से उन स्तिथियों और माहौल का सही सही पता चल जाता है जिसमें यह बनाये गएँ हैं और एक ही विषय बने रेखाचित्र विभाजित प्रौस्तैन छायाचित्रकारी की तमाम विविधता के बाद भी नहीं लुभाते हैं|

जिन पृष्ठों में मैं आपको खालीपन दिखाई दे वहां मैंने अपने नोट्स मिटाए हैं – आपको उन्हें झेलने की कोई इच्छा नहीं होती – और मैंने स्कैनिंग के बाद फोटोशोप के द्वारा फ्लैट टोन जोड़ दी है|

नमस्ते!