कई चाँद थे सरे – आसमां


शम्सुर्हमान फ़ारुक़ी का यह उपन्यास पढ़ने में बहुत रोचक लगा और समय लगाकर पढ़ा| इसमें हिंदुस्तान के इतिहास के उन रोचक स्याह – सफ़ेद पन्नों को उकेरा गया है जिनका जिक्र आजकल कम ही किया जाता है| उपन्यास में इतिहास, इमारत, झगड़े, जंग, षड्यंत्र, सियासत, कल्पना, कहानी, साहित्य, शेरोशायरी ख़ास और आम जिन्दगी अपने आप आती गाती सुनाती सुनती चली गयी है|

उपन्सास एक ऐसी औरत की जिन्दगी की अजब दास्ताँ है जिसे बेहद आम औरत होने से अपने जीवन की शुरुआत की और किस्मत की कहानी उसे देश के सबसे खास औरतों में से एक बनाते हुए धूल में मिलाने के लिए ले गई| ये दास्ताँ उस औरत की है जिसने और जिसकी किस्मत ने कभी हार नहीं और वो और उसकी किस्मत कभी जीत भी नहीं पाए| ये कहानी उस औरत की है जिसके पाकीज़ा होने पर सबको उतना ही यकीं था जितना उसके घटिया – बाजारू होने का| ये कहानी उस मुल्क की है जिसे ज़न्नत समझ कर कारवां आते गए और अपने घर बनाते गए| ये कहानी उस मुल्क की है जिसको लूटने उजाड़ने का सपना बहुत सी आँखों ने देखा| ये कहानी उस बर्बादी की है जो सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि बर्बाद होने वालों को अपने हजारों साल के वजूद पर कुछ ज्यादा भरोसा था|

उपन्यास बहुत लम्बे बारीक़ विवरणों से भरा पड़ा है जो शायद चाह कर भी उतने ऊबाऊ नहीं बन पाए हैं जितने बनाने चाहे गए हैं| आपको अपनी कल्पना शक्ति को प्रयोग करने की जरूरत नहीं पड़ती|

उपन्यास कई बार पाठ्य पुस्तक की भूमिका भी निभाता है तो बार बार आगाह भी करता है कि यह मूलतः कहानीकार की वो कल्पना है जिसे वो इतिहास के दो मोती साथ पिरोने के लिए करता जाता है|

उपन्यास की सबसे बड़ी खूबसूरती इस बात में है कि ये लिखा आज की हिंदी – उर्दू – रेख्ता में है मगर उस ज़माने की हिंदी – उर्दू – रेख्ता में अपने को बयां करता जाता है|

वह भी कोई देस है महराज


जब मैंने इस पुस्तक के बारे में पहली सुना था तो शीर्षक से लगा था कि हिंदी पट्टी का कोई आंचलिक यात्रा – वृतांत है| यह भारत के छोटे से अंचल मुख्यभूमि की निगाह से उस उत्तर पूर्व का शोध – विवेचन है, जिसे भारतीय देशप्रेम चीन समझने की हठ करता रहता है| पुस्तक खुद को बिना विराम और लघु विराम के पढ़ाती है| आपको “चिकेन नेक कॉरिडोर” (जलपाईगुड़ी) से आगे ले जाने के बाद सरल बारीक़ विस्तृत रोचक विवरण के साथ यह पुस्तक आपकी गर्दन पकड़ कर रखती है और बार बार पढ़े जाने के आग्रह रखती है| यह मेरे जैसे अधजल गगरी मुख्यभूमि वालों के लिए सन्दर्भ ग्रन्थ का काम कर सकती है मगर लेखक कहीं भी इस प्रकार का कोई आग्रह करता हुआ प्रतीत नहीं होता| पुस्तक के पीछे छपे ज्ञानरंजन के शब्द मुझसे यह आग्रह जरूर करते प्रतीत होते हैं मगर दुर्भाग्य से आधुनिक भारत तो ज्ञानरंजन को भी नहीं जानता|

आप कब दिल्ली से चलते चलते उत्तरपूर्व के दूरदराज में पहुँचते जाते है पता ही नहीं लगता| पुस्तक का प्रताप है कि जब अभी नागालैंड में एक आरोपी को जेल से बाहर कर क़त्ल कर दिया गया तो मैं मीडिया में दिए गए सारे दृष्टिकोण आसानी से समझ पाया|

“लघु राज्यों के राजा अपने लोगों को समझा रहे थे की १५ जनवरी १९४७ को असं के राज्यपाल अकबर हैदरी और खासी राज्यों के बीच जो समझौता हुआ था उसके मुताबिक रक्षा, मुद्रा और विदेश मसलों को छोड़कर बाकी सारे मामले उनके अधीन होने चाहिए| बाद में धोखे से इन राज्यों को संविधान की छठी अनुसूची में डालकर पारंपरिक ढंग से प्रशासन चलाने के लिए खासी, गारो और जयंतिया जिलों में स्वायत्तशासी परिषदों की स्थापना की गई| इस कारण सीयेम नाम के राजा रह गए हैं| अब परिषदें उन्हें मोहरों की तरह हटाती और बिठाती रहती हैं|”

यह सुचना पुस्तक में बहुत साधारण तरीके से दी गई है| परन्तु जब मैं इसे जोधपुर समेत कई रियासतों के विरोध के भारत में विलय के सेकड़ों समझौतों, और बाद में इंदिरा गाँधी द्वारा संविधान संशोधन के साथ भूतपूर्व रजवाड़ों के प्रिवीपर्स ख़त्म करने के लोकप्रिय और अदूरदर्शी निर्णय के साथ पढ़ता हूँ तो चिंता होने लगती है| शुक्र है कि वह मामला अभी क़ानूनी विश्लेषणों में ही फंसा हुआ है|

“ज्यादातर असमिया हिन्दू गाँव किसी न किसी मठ से सम्बद्ध हैं और वहाँ के सामाजिक जीवन में नामघर की केन्द्रीय भूमिका होती है|… … इधर हिन्दू कट्टरपंथ के प्रभाव में कुछ इलाकों में महिलाओं के महीने में पाँच दिन नामघर आने पर रोक लगा दी गई है, जिसका विरोध शहरों के नारीवादी संगठन कर रहे है|”

“ये फुल बिरले ही खिलते हैं लेकिन जब आते हैं तो प्रकृति नया असंतुलन पैदा करती है|… … इन्हीं फूलों ने मिजोरम में उग्रवाद की नींव रखी थी और पूर्वोत्तर का इतिहास, भूगोल दोनों बदल दिया था| तब मिजोरम असम का एक जिला हुआ करता था जिसे लुसाई हिल्स कहा जाता था|”

“सब्जी मंडी का हर्बल देखकर समझ आ गया कि दीमापुर से यहाँ के रास्ते में इतना सन्नाटा क्यों था| जानवर और पक्षी पीढ़ियों के अनुभव से जानते हैं, वन्यजीवप्रेमियों और पर्यावरणविदों के चिकने काग़ज वाले दस्तावेज़ों से पुकार कितनी ही काव्यात्मक क्यों न हो, इक बार छेमोकेडिमा का इनरलाइन बैरियर पार करने के बाद वे जिन्दा वापस नहीं लौट पाएँगे|”

इसी तरह की कुछ साधारण सी सूचनाएं इस पुस्तक में लगभग हर पृष्ठ पर अंकित है जिन्हें समझने के लिए समय, सुविधा, संस्कार और समृद्धि की आवश्यकता नहीं है| बहुत कुछ है जिसे पढ़ा जाना चाहिए| सब कुछ यहाँ बता देना पुस्तक की रोचकता को समाप्त कर देगा| पुस्तक किसी पुस्तकालय में बैठ कर नहीं लिखी गई है, सामान्य जन जीवन की वह कहानी है जिसे हम अक्सर नहीं देख पाते| हर दिन को आँख कान नाक खोल कर जिया गया है, बंदूकों और मौत के साये में| जहाँ सेना और ढेर सारे उग्रवादी दिन के हिसाब से लड़ रहे है, आकड़ों के हिसाब से मर रहे है, बयानों के हिसाब से नकारे जा रहे है, राजनीति के हिसाब से प्रयोग हो रहे है और वक्त के हिसाब से काटे जा रहे है| इस किताब को पढ़ने से पहले और बाद, मैं अक्सर पूछता रहा हूँ, चम्बल के डकैत और भारत भर के उग्रवादियों में कितना अंतर हैं, जबाब आसन तो नहीं है, मगर मैंने उसे इस पुस्तक में भी ढूंडा है|

जीवन और भारतीयता के बहुत सारे जबाब प्रश्न बनकर यहाँ खड़े हुए हैं| अनिल यादव पढ़े जाने योग्य नहीं लिखकर लाये हैं वरन वो खुद को पढ़ा लिए जाने का माद्दा रखते हैं| अमृतलाल बेगड़ जिस श्रृद्धा से नर्मदा यात्रा करते हैं शायद अनिल यादव ने उस तरह का ही कोई विचार रख कर उस देस की यात्रा की है|

पुस्तक: वह भी कोई देस है महराज

लेखक: अनिल यादव

प्रकाशन: अंतिका प्रकाशन

वर्ष: २०१२

श्रेणी: यात्रा – वृतांत,

मूल्य: रुपये १५०

Street


A narrow lane of a northern Indian village near city of Aligarh.

Brick Lane

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