साईकिल बे-कार नहीं है!!


बचपन में पंडित सुदर्शन की कहानी पढ़ी थी, साईकिल की सवारी| तभी से मन में यह भाव घर कर गया कि आपका स्वास्थ्य, समय और संसार सब कुछ एक अदद साइकिल के बिना सफल नहीं को सकता| उस समय मुझे स्कूटर चलाना तो आता था पर साइकिल नहीं| हेंडल सम्हालने से साथ पैर चलाना एक मुश्किल काम था| आज भी मुझे लगता है कि साइकिल चलाना निपुण प्रवीण लोगो का काम है और आरामपसंद लोग इसे नहीं कर सकते| अब दिल्ली शहर को देखिये सब लोग दिन भर कार में चलते है, और अपनी ख़ूबसूरत शामें किसी महफ़िल कि जगह जिम में बर्बाद करते है| मजे कि बात ये कि यही लोग हर रोज पर्यावरण प्रदूषण पर बतकही करते है| दूसरी और यूरोप में बड़े बड़े लोग साईकिल पर घूमते है| सब मर्म समझने की बात है, साईकिल चलना और उसे बढ़ावा देना आज की जरूरत है| यह बढ़ती महंगाई में घर के बज़ट को ठीक रखती है, आपके एक अच्छी कसरत देती है और पर्यावरण की साफ़ सुथरा बनाने में इसका बढ़ा योगदान है|

यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि यहाँ लोग साईकिल को गाँव गँवार, नौकर मजदूर की सवारी समझते है| अरे भाई! दिखावे से न आप का घर चलता है न ही देश| सस्ती सुन्दर साईकिल दुनिया भर में शान की बात है, अपने यहाँ क्या बात हो गई| साइकिल को नीचा करके रखना तो बढ़ी बढ़ी मोटर कंपनी वालो की साजिश है, अपना माल बेचने की| मोटर कार महंगी आती है, रखरखाव पर अधिक खर्च होता है, जगह भी अधिक लेती है, ईधन भी मांगती है, बदले में आपको बिमारी ही देती है| मैं किसी भी तरह कार के खिलाफ नहीं हूँ, परन्तु दोनों की उपयोगिता भिन्न है| हमें एक दो किलोमीटर की दूरी के लिए कार के प्रयोग से बचना चाहिये|

दुनिया भर में सडको पर अलग से साईकिल लेन हैं, हमारे यहाँ उस पर सफेदपोश लोग बेकार मैं कार खड़ी कर देते है| कोई उन्हें कुछ नहीं कहता कि बाबूजी, पार्किंग में कार खड़ी करने के पैसे नहीं थे तो क्यों ये हाथी पाल लिया| खाई, छोड़िये उन बेचारों को| यहाँ तो साईकिल कि बात करनी है|

पुद्दुचेरे सहित देश के कई शहर में आज भी घूमने के लिये साइकिल किराए पर मिल जाती है| दिल्ली मेट्रो आजकल उधार पर साइकिल देती है, पार्किंग कि सुविधा भी| यह उसका अपने सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का तरीका है|साईकिल के प्रयोग को इसी तरह के प्रोत्साहन की जरूरत है|

निगमों के अभौतिक सूचनापत्र


पर्यावरण प्रदुषण हमारी चिंता का एक प्रमुख विषय है| समुचित विकास की अवधारणा का मात्र अवधारणा बने रह जाना, अनियंत्रित पूंजीवाद एवं भौतिकतावाद और बढता भ्रष्टाचार इसके प्रमुख कारणों के रूप में शुमार है| परन्तु अब इन सब चीजों पर विचार करना बेमानी होता जा रहा है| इस सब के बीच कुछ अच्छी बातें भी हो रही है| उनपर विचार करना उचित है जिससे हम अपना योगदान दे सकें, दूसरों के लिए भी प्रेरणा हो सके|

अभी भारत सरकार के निगमित कार्य मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) ने बड़ी बड़ी कंपनियों के द्वारा होने वाली कागज़ की बर्वादी को कम करने के लिए नए नियम बनाए है|

अब तक होता यह था की कंपनियों को अपने अंशधारको को अपना वार्षिक सूचनापत्र कागज़ पर छपा हुआ भेजना होता था| इस समय देश में ऐसी कई निगम है जिनके अंशधारको की सूची लाखों में है| एक सफल, सुलझी हुई निगम कार्यप्रणाली वाली निगमों के सूचनापत्र १०० पृष्ठों से अधिक के भी होते है| सामान्य अंशधारक इन सूचनापत्रों को सही से पढ़ना भी नहीं जानता, समझना तो दूर की बात है| इस प्रकार सेकडो सेर कागज़ रद्दी हो जाता है| नए नियमों के अनुसार अब निगम अपने अंशधारको को इ – मेल पर इन सूचानापत्रो को मंगवाने को विकल्प दे सकती है| इसके लिए अंशधारक निगम के पास अपना अधिकृत इ – मेल पता पंजीकृत करा सकते है, इसके बाद निगम उन्हें सूचनापत्र की अभौतिक प्रति प्रषित कर देगी| अन्य सामान्यजन भी इन सूचानापत्रो की अभौतिक प्रति कंपनी के वेबपृष्ठ पर जाकर देख सकते है|

हालाँकि; कई विश्लेषक यह मानते है कि छपे विवरण पढ़ना, अभौतिक प्रति पढ़ने के मुकाबले आसान है| परन्तु पर्यावरण को होने वाले लाभ को भी हमें ध्यान में रखने चाहिए|

इसी प्रकार हम अन्य कई सूचनाए भी अभौतिक प्रति में प्राप्त कर सकते है| जैसे मेरे पास बैंक खाता विवरण, कई  प्रकार के बिल आदि की अभौतिक प्रतियां आती है, यह तीव्र सुरक्षित और पर्यावरणसमर्थक तरीका है|