ले साँस भी आहिस्ता

आज पर्यावरण की बात सबके दिल-ओ-दिमाग़ में कहीं न कहीं घर किये रहती है| दूर तक सोचने वाले बहुत पहले से इन बातों पर सोच-विचार करते रहे| ख़ुदा-इ-सुखन मीर तकी मीर अठाहरवीं सदी में कहे अपने एक शेर में कहते हैं:

ले साँस भी आहिस्ता कि नाज़ुक है बहुत काम,
आफ़ाक़ की इस कारगह-ए-शीशागरी का |

सांस भी सोच समझ कर लीजिये, यह दुनिया कांच का कारखाना है| कांच के कारखाने में उड़ता हुआ बुरादा, शायद उस वक़्त प्रदुषण को समझने का सबसे बढ़िया जरिया रहा हो| आज कांच का बुरादा अकेला नहीं है, तमाम ख़राब चीज़े हैं, जो हमारे पर्यावरण को और दुनिया को गन्दा करती हैं और सांस लेना दूभर हो चला है| आज प्रदुषण आज सड़क पर या नदियों में नहीं रहता, यह घर में भी है|

यहाँ तक कि जो एयर फ्रेशनर हम घर को तरोताजा करने के लिए दिन भर उड़ाते रहते हैं, वह खतरनाक प्रदूषण है| इस तरह की बहुत सी चीज़ों से हमारा रिश्ता आज ऐसा हो गया है कि पहचान नहीं आता कि ये आस्तीन के सांप हैं, इनसे बचना चाहिए|

प्रदूषण घटाने के लिए प्रयोग होने वाला हमारा गैस का चूल्हा जहरीली कार्बन मोनोआक्साइड से रसोई भर देता है| एक अदद छोटे से मच्छर से बचने के लिए हम मच्छरदानी की जगह न दिखाई देने वाले जहरीले धुंए का इस्तेमाल तो हम ख़ुशी से करते ही हैं| वक़्त-बेवक़्त कीड़ेमकोड़े मारने के लिए जहर तो पूरे होश हवास में छिड़का ही जाता है|

आज प्रदूषण घर के दर-ओ-दीवार में छिपा बैठा है| घर के दीवारों और छतों में लेड और एस्बेस्टस छिपे रहते हैं, जो पेंट, टाइल्स, और कई अन्य उत्पाद में प्रयोग होते हैं| इसी तरह से स्टोव, हीटर, चिमनी, एयरकंडीशनर, फ्रिज भी घरेलू प्रदूषण अपना योगदान देते हैं| सिगरेट पीने वाले मेहमान आ जाएँ तो बात ही क्या हैं?

खाने में जो प्रदूषण हम प्रयोग करते हैं उसका कुछ कहना बेकार है| बिना जहर का खाना हमें रास नहीं आता| क्या कभी मैंने या आपने यह कहकर कोई सब्ज़ी खरीदी है जिसमें कीड़े मारने का ज़हर न लगा हो? बिना ज़हर की सब्ज़ी अक्सर कीड़े पकड़ लेती है, थोड़ा भी बासी होने पर जल्द ख़राब हो जाती है|

आज बाहर के मुकाबले घर पाँच गुना तक अधिक प्रदूषित है| भारत में यह आंकड़ा ख़तरनाक हो जाता है जब देखते हैं की दुनिया के बीस में से तेरह सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर भारत में हैं|

संत कबीर कहते है:

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप| 
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अगर हम अपने घर में होने वाले अतिरक्त उपभोग को कम कर दें तो प्रदुषण कम कर दें| जैसे ऐसे उपाय की रसोई गैस, हीटर, स्टोव आदि का प्रयोग कम हो| इससे इनसे निकलने वाली गैस को कम किया जा सकता है| मच्छर मक्खी कीड़ेमकोड़े मारने के जहरों का प्रयोग कम करें और मच्छरदानी का प्रयोग हो| बढ़िया पेंट, टाइल्स, आदि का प्रयोग हो| प्राकृतिक हवा की घर में आवाजाही हो तो घरेलू प्रदूषण को घर से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा| घर में लगाये जाने वाले कई पौधे भी प्रदूषण से लड़ सकते हैं| कुछ विशेष प्रकार के पेंट घरेलू प्रदुषण न सिर्फ कम फैलाते हैं बल्कि कुछ प्रदूषक तत्वों को सोख भी लेते हैं|

 

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इस दिसंबर – दिल्ली और चेन्नई

प्रकृति एक निर्दय न्यायाधीश है| वो गलतियाँ करने वालों को ही नहीं गलतियाँ करने सहने वालों को भी सजा देती है| चेन्नई में हालत की ख़बरें भी हमारे राष्ट्रीय मीडिया में कदम फूंक फूंक कर आ रहीं है| दिल्ली की हवा में हमनें खुद जहर घोल दिया है और बनिस्बत कि सरकार पर हम दबाब बनायें कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सामुदायिक यातायात को सुधारा जाएँ हम और हमारी सरकार बचकानी बातों में लगे हैं| दिल्ली और चेन्नई में किसका दुःख ज्यादा है कहना कठिन है; चेन्नई में दुःख सामूहिक और प्रत्यक्ष है जबकि दिल्ली में वो एकल और अप्रत्यक्ष है|

tangytuesday Tangy Tuesday Picks – December 22, 2015

दिल्ली और चेन्नई इस दिसंबर पर्यावरण के साथ मानवीय खिलवाड़ की सजा भुगत रहे है|

 

हम इस दुनिया को अपने लिए जन्नत बनाने का सपना लेकर एक ऐसा स्वप्नलोक रच रहे हैं जो दुनिया को एक चमकीला सुन्दर नरक बना रहा है| भोजन, पानी, हवा और सुरक्षित रिहायश का मूलभूत  सुविधाएँ अब विलासिता के उस चरम पर पहुँचीं है जहाँ वो एक नशा, एक लत, एक फरेब, एक नरक बन जातीं हैं|

क्या हजारों करोड़ के घर में तमाम अत्याधुनिक सुविधाओं में हम रात को उस नींद से अच्छी नींद ले पाते है, जो हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज लेते होंगे? क्या हम उस प्राकृतिक भोजन से अधिक स्वादिष्ट  – स्वास्थ्यकर भोजन कर पा रहें हैं जो हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज करते होंगे? क्या हम उस हवा से बेहतर हवा में सांस ले पा रहें हैं जिसमें हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज लेते होंगे? क्या प्रकृति के क्रोध से हमारे घर उन हजारों लाखों साल पुराने घरों के मुकाबले सुरक्षित हुयें हैं?

सभी प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है| हमारा अत्याधुनिक अँधा विकास सिर्फ मन को समझाने की मानसिक विलासिता है; इसका कोई भौतिक आनंद  – सुख – भोग – विलास भी वास्तव में नहीं है| हम किस विकास के लिए दौड़ रहें हैं; हम किस विकास को आलोचकों से बचाना चाहते हैं|

संसार का एक ही सत्य है: जिन्दगी भर तमाम विकसित भौतिक और मानसिक भोग – विलासों के बाद भी मानव उन आदिम सुखों की ओर भागने के किये भागता है जिन्हें वो नकारना चाहता है: तन और मन की तृप्ति और शान्ति; ॐ शान्ति|

क्या दिल्ली में कारें अपने अधिकांश जीवन बैलगाड़ियों की रफ़्तार से नहीं चलतीं? क्या रफ़्तार हमने बढाई है हमारे विकास ने?