चुनाव २०१४ चालू है…

जब से देश की राजनीति पर गैरदलीय विपक्ष का पर्दापरण हुआ है, देश में २०१४ की बातें शुरू हो गई है| सरकार और विपक्ष प्रकारांतर से इस जादुई वर्ष को याद कर कर जनता के कुशासन सहने के लिए कह रही है या अपने को आश्वस्त कर रही है कि अभी दिल्ली आम जनता से बहुत दूर है| अन्ना हजारे का आंदोलन सत्ता और विपक्ष को अपने मन में साँपनाथ और नागनाथ मानने कि जन प्रवृत्ति का खुला द्योतक था| जनता को खुले आम अपने क्रोध को जाहिर करने का मौका मिला| शायद आंदोलनकारियों के नेतृत्व ने भी इस सफलता कि उम्मीद नहीं कि थी| एक बात स्पष्ट है कि आज उस आंदोलन का राजनितिक घटक राष्ट्रिय राजनीति में अपने को तथाकथित तीसरे मोर्चे के बराबर रखने में तो समर्थ रहा ही है,  भले ही अभी उन में अपरिपक्वता, अल्प-राजनितिक इच्छाशक्ति और सरकार बनाने लायक नेतृत्व समूह नहीं है|

साफ कहे तो कम से कम मीडिया – सामाजिक मीडिया में तो दो बड़े गठबंधनों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर यही लोग खड़े है| वास्तविक राजनीति में भले ही ये न खड़े हो पाए मगर तालाब के रुके पानी में हलचल तो है ही|

इसके बाद आज काँग्रेस और भाजपा के दो राजनितिक गठबंधन है जो कुछ हद तक प्रासंगिक रह जाते  है| दोनों दलों में नेता बहुत है, नेतृत्व नहीं है| भाजपा बाजपेयी और अडवाणी जी के बाद नेतृत्व विहीन है और उसके समर्थक जिस व्यक्ति को प्रधान मंत्री पद के लिए देख रहे है उसका राष्ट्रिय चरित्र बनना अभी बाकी है| सरकार बना पाने की स्तिथि में भी प्रान्तिक छवि वाला कमजोर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय छवि वाले नेताओं से बने मंत्रिमंडल को कैसे चला पायेगा? काँग्रेस का क्या कहे, उसके पास मन मोहन सिंह का कोई विकल्प नहीं है| जो मजबूत है वो राजपरिवार के लिए खतरा बन सकते है, कमजोर नेतृत्व नहीं कर सकते| माताजी की ऊँगली पकड़ करे देश नहीं चलता और राजकुमार अभी “छोटे” हैं|

वर्तमान संसद का कार्यकाल अच्छे बुरे कामों के लिए नहीं वरन भारतीय लोकतंत्र में व्याप्त कमियों को रेखांकित कने वाले जन सेलानियों, अपनी साख बचने की लड़ाई लड़ते मीडिया और संविधान में बनाए गए सुदृण तंत्र के लिए जाना जायेगा| न्याय तंत्र, चुनाव आयोग, महालेखापरीक्षक और प्रसिद्ध और गुमनाम जन सेलानियो का समय अब आ चुका है| यह अनावश्यक रूप से मजबूत समझी जा रही “तथाकथित विधायिका” को उसकी संवैधानिक सीमा में लाने का समय है| जो नींव अनजाने में ही, सूचना के अधिकार क़ानून के द्वारा राखी गयी अब परिपक्व हो रही है|

ऐसे समय में अगला चुनावी मुकाबले साख का संकट झेल रहे दो मूलतः कमजोर धडो में है| दुर्भाग्य से वो जानते है की सरकार उनमें से किसी एक को बनानी है और दोनों जनभावना को समझे या न समझे मगर चुनावी गणित और उसके शतरंज को बेहतर समझते हैं|

अन्ना आंदोलन से जन समर्थन खो चुके और महालेखा परीक्षक की कई रिपोर्टों से अपनी साख नष्ट करा चुके काँग्रेस के पास अब खोने के लिए कुछ भी नहीं है| आप उनके व्यवहार से बेशर्मी खुलकर देख सकते है| उनके सारे पाँसे कमजोर विपक्ष को देख कर खेले जा रहे हैं|

पिछले सप्ताहांत केंद्रीय मंत्री मंडल में हुए बदलावों के बाद सरकार एक बार पुनः अपनी साख को और गिरा पाने में कामयाब रही है| युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया गया है और जैसा कि मीडिया में चर्चा कराई गयी है कि इस समय सरकार में सब कुछ बिकाऊ है, खरीददार चाहिए| सरकार आर्थिक सुधारों के नाम पर कुछ प्रयोग करने का प्रयास अवश्य करने वाली है|

देश को सुधारों के आवश्कयता है| विपक्ष किसी भी प्रकार के आर्थिक सुधार का विरोध करने की स्तिथि में नहीं है| लोकसभा का गणित ऐसा है कि विपक्ष या तो सदन से भाग खड़ा हो या सरकार गिरने का खतरा मोल लेकर जनता के सामने बुद्धू बनकर खड़ा हो जाये| देश की विकास दर विश्व्यापी संकट के बाद भी ठीक है और पूंजीपति “आर्थिक सुधारों को खरीदने के लिए तैयार है”|

अगर चुनावों के पहले वर्ष में सरकार अपना आर्थिक सुधार कार्यक्रम संसद में जोरदार तरीके से रखने में कामयाब रही तो वह चुनावों में इसका सीधा लाभ ले पायेगी| कम से कम कोई एक वर्ग तो खुश होगा|

मैं इस समय आशा करता हूँ कि सरकार कंपनी विधेयक और इस प्रकार के अन्य कुछ कानून अवश्य पारित करवा पायेगी|

क्या मुझे ये भविष्य वाणी कर देनी चाहिए कि अगले चुनावों में काँग्रेस दोबारा सरकार बनाने जा रही है और देश पुनः सत्ता के कुशासन और आत्मघाती विपक्ष कि और बढ़ रहा है|

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नॉएडा में माओ का भूत

 

“ग्रेटर नॉएडा में कोई किसान सरकार का विरोध नहीं कर रहा है, कुछ “सशस्त्र असामाजिक तत्त्व” अराजकता फैला रहे है|”

 “किसी के माओवादी होने का निर्धारण इस बात से होता है की वह दिल्ली से कितना दूर रहता है, वरना नॉएडा के लोगो को अब तक माओवादी कहकर मार दिया जाता|”

 क्या कारण है कि हमें जगह जगह सरकार के विरोध में लगातार उग्र होते प्रदर्शनों की खबरें सुनाई पड रही है| सारे देश में क्या कोई गृह युद्ध चल रहा है? क्यों है इस लोकतंत्र में यह उथलपुथल?

कोई भी व्यवस्था हो सभी को संतुष्ट नहीं कर सकती है| लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था समझी जाती है, जिसमे बहुसंख्या को अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है और यह बहुसंख्या संतुष्ट पाई जाती है| परन्तु आज देश में बहुसंख्य का असंतोष व्यवस्था के परिपालन में किसी कमी का संकेत करता है| देश की बहुसंख्या मताधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहती| पहले राजतंत्र के समय में लोक कहावत थी, “कोई नृप हो हमें क्या हानि?” आज जनतंत्र में कहावत है, “कोई नृप हो हमें क्या लाभ?”

आज के निर्वाचित नृप नग्न नृत्य में लगे है और जनता की समस्याओं से उनके सरोकार नहीं जुड पा रहे है. वह न तो राजधानी में जाकर प्रतिनिधित्व करते है, न क्षेत्र में जाकर जनता से जुड़ते है| नेता, अधिकारी, व्यापारी और अपराधी के बीच का गठजोड़; भ्रष्टाचार बनकर, जनता और देश को असामान्य क्षति पहुंचा रहा है| पत्रकारों के रूप में खडा रहने वाला लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ नष्ट-भ्रष्ट होकर अपनी भूमिका निभाने मे असफल रहा है.

देश भर मे फ़ैल रहे असंतोष को कोई नहीं सुन रहा है, मजबूरन आमजन उग्र हो रहा है| आज के निर्वाचित नृपो को लग रहा है कि इस सब को देशद्रोह कहकर दबा लेंगे| हमारे तंत्र की प्रवृत्ति हो गयी है कि पहले असंतोष को बढ़ने दो, फिर उसको उग्र होने पर हथियारों की राह दिखाओ, उसके बाद क्रूर सैनिक कार्यवाही कर कर उसको गृह युद्ध में बदल दो| जब सत्ता किसी को राजद्रोही करार देती है तब हमारा सारा तंत्र उसके पीछे पड़ जाता है| उसे न्याय की आशा मिटने लगती है और विद्रोह को और बढ़ावा मिल जाता है| हमारी सरकारों को इस सबसे बचना चाहिए|

आज जो कुछ नॉएडा में हो रहा है उससे देश का संभ्रांत समझा जाने वाला समाज भी सोच रहा है कि माओ का भूत हमारे भ्रष्ट निर्वाचित नृपों का खड़ा किया गया बबंडर तो नहीं| कहीं नेताजी, सेठजी से पगार लेकर कोई बाबूजी को बन्दर बना कर नचा रहे हो और दिल्ली में हम बंदरों के नाच पर ताली बजा रहे हों|

देश में भ्रष्ट पूंजीवाद और पंगु लोकतंत्र ही वास्तविक समस्याए है|