दक्षिण भारतीय खाना – दिल्ली बनाम चेन्नई


दिल्ली में बहुत से लोगों को लगता है चेन्नई में या तो लोगों को दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता या उनको गलत भोजनालय ले जाया गया| कारण है गलत मसालों का प्रयोग|

दिल्ली में रहकर बिना छुरी कांटे दक्षिण भारतीय खाने की बात सोचना कठिन है| चेन्नई मैं छुरा कांटा तो क्या चम्मच भी कोई शायद ही प्रयोग करता हो| हर भोजनालय में चम्मच मांगते है वेटर समझ जाता है कि बाबू बिहारी (हिंदी भाषी) है| वैसे ज्यादातर वेटर बिहार, उड़ीसा, और बंगाल से मालूम होते हैं|

मुख्य बात तो यह कि दिल्ली में मिलने वाला दक्षिण भारतीय खाना कम से कम दक्षिण भारत का खाना तो नहीं कहा जाना चाहिए| एक महीना चेन्नई और हफ्ते भर त्रिवेंद्रम रहने के बाद मुझे तो कम से कम यही लगता है| मुझे ऐसा लगता है कि किसी गुमनाम उत्तर भारतीय ने अपना धंधा चमकाने के लिए दिमागी घोड़े दौड़ा कर दक्षिण भारतीय खाने पर किताब लिख मारी हो और दिल्ली के बाकि लोग उसे पढ़कर खाना बनाने में लगे हैं| भला बताइए कोई रोज रोज अरहर में सरसों का तड़का डालकर सांभर बनाता अहि क्या? मगर ऐसा दिल्ली में संभव है| चेन्नई आने से पहले मुझे पता न था कि मूंग दाल से भी सांभर बन सकती है| दिल्ली और चेन्नई के सांभर मसलों के बीच तो विन्ध्याचल का पूरा पठार दीवार बनकर खड़ा है| मसाला डोसा ऐसा मामला भी चेन्नई में कम दिखाई देता है| दिल्ली में पायसम तो शायद खीर की सगी बहन लगती है, मगर यहाँ तो खीर और पायसम में मामा – फूफी का रिश्ता लगता है|

दोनों जगह नारियल चटनी का स्वाद बदल जाता है| इसमें नारियल के ताज़ा होने का भी योगदान होगा|

मुझे याद है कि दिल्ली में एक मित्र ने बोला था मुझे चेन्नई में लोगों को ठीक से दक्षिण भारतीय खाना बनाना नहीं आता|

जैसा कि मैं पिछली पोस्ट में लिख चुका हूँ, खाने पर स्थानीय रंग हमेशा चढ़ता ही है| दिल्ली शहर में आलू टिक्की बर्गर, पनीर – टिक्का पिज़्ज़ा और तड़का चौमिन यूँ ही तो नहीं बिकते|

काके – दी- हट्टी, फ़तेहपुरी


काके – दी – हट्टी को जब आप बाहर से देखते हैं तो समझ नहीं आता कि आखिर क्यों इस साधारण से स्थान का नाम हर दिल्ली की हर ट्रेवल गाइड और फ़ूड गाइड में है| दुकान पुरानी सी है और लगता है कि अपने स्थापना सन १९४२ में भी इसमें बैठने की खास जगह नहीं रही होगी| इसमें बैठने की जगह हो न हो, यह जगह खास तो है और हर खाने वाले के दिल्ली दिल में खास जगह बना लेती है| पहली बार जब गया तो अजीब से सवाल से उमड़ रहे थे| पुराने दुकान की पुरानी डाट की छत से लटके पुराने पंखे, पुराने तंदूर से निकलती नान की महक, आप की साँसों से होते हुए पेट में पुकारने लगती है|

आप मेनू देखते है तो धुआंधार शब्द बार बार दिखता है – धुआंधार नान, धुआंधार लच्छा परांठा, धुआंधार पनीर मख्खन मसाला| यूँ है तो यह लज़ीज, मगर आपको चेतावनी देता हूँ – न खाएं| अगर खाते हैं तो छोड़ नहीं पाएंगे और हफ्तेभर तन-मन-धन से याद करेंगें|

यह परिवार और दोस्ती में प्रेम बढ़ाने वाला भोजनालय है – यहाँ एक नान में से “हम दो – हमारे दो” खा लेते हैं, कोई मनाही नहीं| आप पहले एक नान मंगा लें, लुफ्त उठायें और बाद में जरूरत के मुताबिक दूसरा – तीसरा मंगा सकते हैं| जब आप यहाँ कोई भारी-भरकम आर्डर देते हैं तो वेटर बेहद शीघ्र-शांत सलीके से आपको ये सलाह देंगें|

मेरे बेटे को यहाँ की लस्सी और रायता पसंद है, साथ में आलू प्याज  नान| उसके लिए यहाँ कुछ और मंगाने का मतलब नहीं| मैं यहाँ के नान का मुलाज़िम हुआ जाता हूँ, किसी सब्जी- दाल की न पूछिए|

दाल और सब्जी ज्यादातर कम मसालेदार और उम्दा हैं, मगर नान का ज़ायका आपके दिल में जो घर करता है, तो बाकि चीज़ो के लिए जगह नहीं| अमृतसरी थाली भी बहुत पसंद की जाती है| यह शाकाहारी भोजनालय है, जिसके पुराने बोर्ड पर “शुद्ध वैष्णव” लिखा हुआ है| अलबत्ता, प्याज लहसुन मिल जाता है| सलाद में बिना मांगे ढेर से प्याज मिलती है|

यह जगह है, पुरानी दिल्ली की फ़तेहपुरी मस्जिद के पास| आप खारी बावली से बेहद उम्दा मेवे – मखानों की ख़रीददारी करने के बाद यहाँ आयें| आप दुकान में बाहर ढेर ग्राहक खड़े पाएंगे और दो बड़े तंदूर| परिवार वाले ग्राहक दूसरी मंजिल (first floor) पर बिठाये जाते हैं और उनके लिए अलग तंदूर वहां लगा है| तीनों तंदूर पर लगातार काम होता रहता है|

स्थान: काले – दी – हट्टी, निकट फ़तेहपुरी, चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली,

भोजन: शाकाहारी

खास: नान, धुआंधार नान,

पांच: साढ़े चार

साइकिल की हमारी सवारी


स्कूल में जिन दिनों पंडित सुदर्शन (मूलनाम बद्रीनाथ भट्ट)  की कहानी “साइकिल की सवारी” पढ़ी थी तब मुझे साइकिल चलानी नहीं आती थी| मुझे लगता था कि अगर साइकिल बहुत बचपन में में सीख लेने की चीज है, वर्ना किसी मुसीबत से कम नहीं है| पापा की साइकिल मोहल्ले में सबसे ऊँची और भारी साइकिल थी और उस पर हमसे लठ्ठा साइकिल नहीं चलती थी| दस पैसे रोज पर छोटी साइकिल किराये पर लाने का मतलब जेबखर्च सीधा सीधा नुक्सान था|

खैर दसवीं क्लास के बाद मैनें साइकिल जैसे तैसे सीख ली क्योंकि बारहवीं में हमारा सेंटर घर से चार किलोमीटर दूसरे कस्बे में (सिकंदराराऊ से पुरदिलनगर) था और माँ नहीं चाहतीं थी  कि मैं पैदल जाऊं|

बारहवीं के बाद मैं कभी दोबारा साइकिल चलाई हो, ऐसा याद नहीं|

अभी पिछले महीने, पत्नी जी ने साइकिल खरीदी और दिल्ली जैसे शहर में वो उसे एक दो बार दफ्तर भी ले गई, तो सोचा यार कुछ तो किया जाए| मैं बेटे तो स्कूल छोड़ने और लाने के लिए साइकिल लेकर जाने लगा| दिल्ली के भीष्म पितामह मार्ग पर साइकिल लेन तो बनी हुई है मगर उसके हालत नाजुक हैं| लगता है किसी नाले ले ऊपर कमजोर कंक्रीट से इसे बनाया गया है| जगह जगह टूटा फूटा भ्रष्टाचार दिखाई देता है| बकाया जगह पर घरविहीन लोगों की रिहायश और बैठकें हैं|

मगर पिछले हफ्ते सुबह सुबह पांच बजे घर से साइकिल पर निकले| अरविंदो मार्ग पर ट्रैफिक कम था| सुबह की ठंडक तारी थी| चिड़ियों के करलव की सुरताल कान में शहद घोलने लगी थी| लोदी रोड पर चहलकदमी करने वालों की रोनक होने लगी थी| गर्मीं की सुबह शीतल पवन, चिड़ियों की चहचाहट, आसमान में उड़ते पक्षियों की रौनक ये वो इनाम हैं जो जल्दी उठने वालों को नसीब होते हैं|

पंडारा रोड होकर मैं इण्डिया गेट पहुँचता हूँ| बहुत से तेज रफ़्तार गाड़ियाँ हैं| कई साइकिल सवार भी आये हुए हैं| बढ़िया बढ़िया साइकिल और सवार की सुरक्षा के सारे इंतजामात देख कर हैरान हूँ| साइकिल भी कोई ग़रीबी का खेल नहीं है| वैसे भी तेज रफ़्तार गाड़ियों के बीच दिल्ली में साइकिल चलाना दुष्कर कार्य है| सोचता हूँ दिल्ली के सबसे बड़े पिकनिक स्पॉट, दिल्ली के गौरव इन्डिया गेट पर साइकिल चलाना खतरनाक मगर मजेदार काम है|

तभी, तेज रफ़्तार साइकिल से एक सत्तर साला जवान मुझे पीछे छोड़ देते हैं| मैं इण्डिया गेट को चारों तरफ से देख रहा हूँ| शानदार नजारा है| तेज रफ़्तार गाड़ियाँ मुझे रास्ता दे रहीं हैं|

इस दिसंबर – दिल्ली और चेन्नई


प्रकृति एक निर्दय न्यायाधीश है| वो गलतियाँ करने वालों को ही नहीं गलतियाँ करने सहने वालों को भी सजा देती है| चेन्नई में हालत की ख़बरें भी हमारे राष्ट्रीय मीडिया में कदम फूंक फूंक कर आ रहीं है| दिल्ली की हवा में हमनें खुद जहर घोल दिया है और बनिस्बत कि सरकार पर हम दबाब बनायें कि पब्लिक ट्रांसपोर्ट और सामुदायिक यातायात को सुधारा जाएँ हम और हमारी सरकार बचकानी बातों में लगे हैं| दिल्ली और चेन्नई में किसका दुःख ज्यादा है कहना कठिन है; चेन्नई में दुःख सामूहिक और प्रत्यक्ष है जबकि दिल्ली में वो एकल और अप्रत्यक्ष है|

tangytuesday Tangy Tuesday Picks – December 22, 2015

दिल्ली और चेन्नई इस दिसंबर पर्यावरण के साथ मानवीय खिलवाड़ की सजा भुगत रहे है|

 

हम इस दुनिया को अपने लिए जन्नत बनाने का सपना लेकर एक ऐसा स्वप्नलोक रच रहे हैं जो दुनिया को एक चमकीला सुन्दर नरक बना रहा है| भोजन, पानी, हवा और सुरक्षित रिहायश का मूलभूत  सुविधाएँ अब विलासिता के उस चरम पर पहुँचीं है जहाँ वो एक नशा, एक लत, एक फरेब, एक नरक बन जातीं हैं|

क्या हजारों करोड़ के घर में तमाम अत्याधुनिक सुविधाओं में हम रात को उस नींद से अच्छी नींद ले पाते है, जो हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज लेते होंगे? क्या हम उस प्राकृतिक भोजन से अधिक स्वादिष्ट  – स्वास्थ्यकर भोजन कर पा रहें हैं जो हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज करते होंगे? क्या हम उस हवा से बेहतर हवा में सांस ले पा रहें हैं जिसमें हजारों –  लाखों साल पहले हमारे आदिवासी पूर्वज लेते होंगे? क्या प्रकृति के क्रोध से हमारे घर उन हजारों लाखों साल पुराने घरों के मुकाबले सुरक्षित हुयें हैं?

सभी प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है| हमारा अत्याधुनिक अँधा विकास सिर्फ मन को समझाने की मानसिक विलासिता है; इसका कोई भौतिक आनंद  – सुख – भोग – विलास भी वास्तव में नहीं है| हम किस विकास के लिए दौड़ रहें हैं; हम किस विकास को आलोचकों से बचाना चाहते हैं|

संसार का एक ही सत्य है: जिन्दगी भर तमाम विकसित भौतिक और मानसिक भोग – विलासों के बाद भी मानव उन आदिम सुखों की ओर भागने के किये भागता है जिन्हें वो नकारना चाहता है: तन और मन की तृप्ति और शान्ति; ॐ शान्ति|

क्या दिल्ली में कारें अपने अधिकांश जीवन बैलगाड़ियों की रफ़्तार से नहीं चलतीं? क्या रफ़्तार हमने बढाई है हमारे विकास ने?

प्रदूषित दिल्ली!!


देश की राजधानी दिल्ली को देश की जनता राजनीति के पवित्र धर्मस्थल की तरह सम्मान देती है| उसे दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर का दर्जा दिया जा रहा है| दिल्ली में सारे ऑटो टैक्सी सबको तो गैस पर चलवा रहे है| प्रदूषण फ़ैलाने वाले हर मिल और कारखाने को दिल्ली के बाहर निकलवा दिया गया है| बाहर से आने वाले हर ट्रक, टैक्सी पर टोल लगा दिया गया है|

मगर कहते हैं न, जब दुनिया में सब गन्दा दिखाई देने लगे तो अपने अन्दर झाँक लेना चाहिए| दिल्ली का भी यही हाल है| दिल्ली से दुनिया गन्दी, पिछड़ी, गरीब, नजर आती हैं| अगर दिल्ली अपने अन्दर झांके तो दिल्ली की हवा इतनी गन्दी कि साँस न ले पायें, दिल्ली इतनी पिछड़ी कि खुद को साफ़ न कर पाए और इतनी गरीब की साफ़ हवा भी न खरीद पाए|

दिल्ली में आदमी के पास घर हो या न हो गाड़ी होनी चाहिए| एक गाड़ी भले ही वो रोज मेट्रो पर पार्क हो जाए मगर दिखावे का गुरूर हो पूरा हो| दिल्ली के लोग टहलने भी गाड़ी से जाते है| हर घर में दो चार गाड़ियाँ मिल जाएँगी| अगर शादी ब्याह दावत या कोई भी सामाजिक काम हो तो घर का हर सदस्य जाये या न जाये गाड़ी जरूर भेजी जाती है|

अगर दिल्ली के प्रदूषण की बात की जाये तो अगर फालतू कारें हटा ली जाएँ तो ट्रैफिक भी कम हो और प्रदूषण भी| सबसे पहली बात दिल्ली में हर जगह पार्किंग का दाम बेहद कम हैं या अवैध पार्किंग के ऊपर कोई कार्यवाही नहीं होती| दिल्ली के हर कॉलोनी में सड़कें शाम ढलते ही पार्किंग में तब्दील हो जातीं हैं| इस जबरन और अवैध पार्किंग व्यस्था पर उसी प्रकार नाक मूंह सकोड़ने की जरूरत है जिस प्रकार अवैध बस्तियों और झुग्गी – बस्तियों के बारे में किया जाता है|

जब तक कोई खरीददार अपने घर में में निजी क्षेत्र में पार्किंग की व्यस्था न दिखा दे तब तक उसे कर खरीदने की अनुमति नहीं होनी चाहिए और हर कार के लिए अलग अलग पार्किंग की व्यवस्था न होने पर भी कार लेने की अनुमति नहीं होनी चाहिए| कंपनी आदि के नाम पर खरीदीं गयीं कारों के लिए भी सामान व्यवस्था होनी चाहिए| पार्किंग क्षेत्र का वेरिफिकेशन करने के लिए उसी प्रकार से कंपनी सेक्रेटरी या अन्य प्रोफेशनल्स को जिम्मेदारी दी जा सकती है जिस प्रकार से कंपनी के रजिस्टर्ड ऑफिस के वेरिफिकेशन के लिए दी गयी है| सड़क पर पार्क की जाने वाली गैर व्यवसायिक गाड़ियों से बाजार दर पर कम से कम महीने भर का किराया वसूला जाना चाहिए|

व्यावसायिक वाहनों और पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्हीकल को कुछ छूट दे जा सकती है क्योकि वो न सिर्फ देश के सकल उत्पाद में योगदान देते है बल्कि यातायात व्यवस्था को सुचारू बनाते हैं|

पुनःश्च –भारत में अधिकतर कार या तो दहेज़ में आती है या कर्जे में| अतः निजी कारों को हेयदृष्टि से देखे जाने की महती आवश्यकता है|

लूज़र कहीं का


भले ही यह किताब २०१३ में प्रकाशित हुई मगर मैंने इसी साल पुस्तक मेले में इसे खरीदा|

कथानक अंत से लगभग कुछ पहले तक गठीला है मगर अचानक “कहानी ख़त्म होने के बाद” जैसा कुछ आ जाता है और पाठक के हाथ इस कहानी के दुसरे भाग “गेनर कहीं का” (जो अलिखित होने के कारण अप्रकाशित है) के कुछ अंतिम पन्ने हाथ आ जाते हैं| अगर आप इस कहानी को पढ़े तो अंतिम तो पृष्ठ फाड़ कर फैंक दें और दो चार महीने के बाद किसी पुस्तकालय से मांग कर पढ़ लें| इन दो पृष्ठों के साथ इस किताब की कीमत १२५ रुपये कुछ ज्यादा है और इनके बगैर कम|

यह पैक्स की कहानी है जो “साला” बिहारी है और पिछली शताब्दी के अंतिम दशक में मगध एक्सप्रेस टाइप किसी ट्रेन से जीवन भर की पढाई करने दिल्ली आया है| जिसके पास “जाओ जीत लो दुनिया का” आदेश है| विद्यार्थ पलायन की भारतीय विडंबना इस कथा का विषय न होकर भी एक गंभीर प्रश्न की तरह प्रस्तुत है| दुनिया जीतने का लक्ष्य हमेशा ब्याह के बाजार में उतरने तक हासिल करना होता है जो कथानायक और अन्य पात्रों का सबसे बड़ा दबाव है|

अगर आपने दिल्ली में यूपी – बिहार बनाम हरियाणवी – पंजाबी द्वन्द अपने छात्र जीवन में महसूस किया है तो आप इस पुस्तक से जुड़ा महसूस करेंगे| कुछ स्थानों पर दो – तीन बार की लिखत महसूस होती है| गंभीर पाठकों को पुस्तक में बिहारी पुट के ऊपर चढ़ाया गया बीबीसी हिंदी तड़का भी कुछ जगह महसूस हो सकता है, यह पंकज दुबे के लिए दुविधा और चुनौती है| दरअसल पुस्तक को आम हिंदी पाठक के लिए सम्पादित किया गया है जिससे भाषाई प्रमाणिकता में कमी आती है और महानगरीय पठनीयता में शायद वृद्धि होती है| पुस्तक को दोबारा पढ़ते समय, आपको चेतन भगत का बाजारवादी तड़का महसूस होने लगता है|

भले ही पुस्तक के पीछे इसे हास्य कथा कहा गया हो, मगर यह साधारण शैली में लिखा गया सामाजिक व्यंग है जो समकालीन दिल्ली पर हलके तीखे कटाक्ष करता है और अगर आपको वर्तमान दिल्ली का मानस समझना है तो इसे पढ़ा जाना चाहिए| इसके साधारण से कथानक की गंभीर समाजशास्त्रिय विवेचना की पूरी संभावनाएं है, यद्यपि साहित्यिक चश्मे से यह किताब कुछ गंभीर विवेचन नहीं देती|

अगर आप खुद को साधारण हिंदी साहित्य से जोड़ते है तो इसे जरूर पढ़ें|

रंगशाला


 

रंगमंच और युवा रंगकर्मियों को आगे बढाने हेतु “रंगशाला” का आयोजन होला एंटरटेनमेंट द्वारा निपा रंगमण्डली के सहयोग से किया जा रहा है| युवा प्रतिभा को परखना और निखारना, समय की मांग है| रंगशाला का उद्देश्य रंगकर्मी को दर्शक और अवसर को रंगकर्मी तक पहुँचाने का माध्यम प्रदान करना है|

 

 https://www.facebook.com/events/614839621944176/

 

साथ ही, इस उदेश्यपूर्ण आयोजन से बिना आर्थिक लाभ उठाये समाज को कुछ देने का प्रयास भी है; किसी भी प्रकार का आर्थिक लाभ गैर सरकारी संगठन स्पर्श को दिया जायेगा| “स्पर्श” विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए काम करता है|

 

“निपा रंगमण्डली” भारतीय रंगमंच के लिए विभिन्न स्तरों पर काम करने वाला सुपरिचित नाम है; जिसे विभिन्न राष्ट्रिय और अन्तराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए| निपा रंगमण्डली ने कई बेहतरीन रंगकर्मी और फ़िल्मकर्मी दिए हैं|

 

प्रतिभागी:

ग्रैंड फिनाले से पहले, दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी ड्रामा संगठनोंऔर अन्य रंगसमूहों को अपना पंजीकरण कराया गया है और अपनी वास्तविक रंग प्रस्तुति का चलचित्र अवलोकन के लिए भेजा है|
अयोग्य पाई गई प्रस्तुतियों को हटा देने के बाद भारतेंदु नाट्य केंद्र के पूर्व निदेशक श्री सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ द्वारा चयनित प्रविष्टियों की सूचना होला एंटरटेनमेंट के वेबसाईट और फेसबुक पेज पर २० मई को दी जाने वाली है|  इस प्रकार प्रयास होगा मंत्रमुग्ध करने वाली प्रस्तुतियां ग्रैंड फिनाले के दिन दर्शकों के सामने प्रस्तुत हों| विजेताओं को जानने के लिए तैयार रहिये|

 

रंगशाला के रंग होंगे: हास्य, रुदन, जाग्रति और विचारों का नवजीवन|

 

ग्रैंड फिनाले (४ जून):

ग्रैंड फिनाले श्री राम कला केंद्र में होगा| तीन चयनित रंग समूह ग्रैंड फिनाले में प्रस्तुति देंगे और जन समूह से प्रसन्नता पूर्ण सराहना की आशा रहेगी|

 

अधिक जानकारी:

इस आयोजन के बारे में अधिक जानकारी जुटाने और इसका समर्थन और सहयोग करने के लिए इस लिंक पर आयें|

इस आयोजन के समर्थन के लिए टिकट प्राप्त करने के लिए इस लिंक पर जा सकते हैं| जिनकी कीमत मात्र पांच सौ रूपये है| 

उत्तर भारत खोज-चित्रमाला


[पिछले महीने ११ अप्रैल के दिन ख्यातिप्राप्त चिट्ठाकार जिओ पार्किन ने अपने भारत भ्रमण के दौरान बनाये गए रेखाचित्र “North India explorer Sketchbook” प्रकाशित किए| रुचिपूर्ण लगने के कारण उनकी अनुमति के साथ मैं इस आलेख को यहाँ हिंदी में प्रस्तुत कर रहा हूँ, साथ में रेखाचित्र भी उपलब्ध हैं – आनन्द लीजिये, टिप्पणियों का स्वागत है|   

 

हम इस बार गर्मियों की छुट्टियों पर जल्दी ही निकल पड़े, यह गंतव्य ही कुछ ऐसा था कि अजीब सा समय चुनना पड़ा| हम बहुत समय से भारत जाना चाहते थे, परन्तु अगर आपको भीषण मानसूनी बारिश के प्रति विशेष रूचि नहीं है तो अगस्त में दो सप्ताह के लिए भारत जाने की सम्भावना नगण्य है|

 

हमारा यह भ्रमण जाँची – परखी साहसिक यात्रा कंपनी Exploreने आयोजित किया था, जिसने हमें अभी तक निराश नहीं किया है| हमारा १५ दिन का “उत्तर भारत खोज’ यात्रा कार्यक्रम राजधानी दिल्ली से प्रारंभ हुआ और हमने उदयपुर, पुष्कर, जयपुर, आगरा, वाराणसी, और अंत में कोलकाता को यात्रा की|

 

इस यात्रा में ग्रहण करने के लिए काफी चीजें थीं, हमें वापस आये एक सप्ताह हो गया है पर मेरे दिमाग में यह अनुभव अभी तक घूम रहा है| इस तरह की जगह मैंने पहले कभी नहीं देखी, सर्वथा वास्तविक से लेकर उत्कृष्ट अपरिचित और असाधारण छवियाँ लगातार बिना रुके इस सामने आ रहीं हैं कि आप पहले देखी हुई को इतनी जल्दी समझ ही नहीं पाते| यदि आप थोडा भी दृश्यपरक व्यक्ति है तो यह आपके लिए छवियों का विस्फ़ोट है|

 

कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारत छाविकारों के लिए सुनहरा सपना है और मैं अपने मेमोरी कार्ड को भर कर लाया हूँ| मैं अभी भी इनका संपादन कर रहा हूँ, अभी समय लेगा| हमेशा की तरह, मैंने रेखाचित्र पुस्तिका भी साथ रख ली थी –  जब भी मुझे अवसर मिला मैंने इसका प्रयोग किया|

 

हमारे यात्रा की गति काफी तेज थी और ज्यादातर जगह तो बैठ कर कुछ रेखाएं खींचने का भी समय नहीं मिल पाया| फिर भी, इस चक्कर में बहुत यात्रा की – ट्रेन से (तीन – तख्ती ट्रेन सहित, जो कि अपने में खास है), बस, नाव —  और इन सभी मौकों पर मैंने अपने सामने से कुछ न कुछ उकेर लेने का प्रयास किया| साधारणतः, इनमें मेरे साथी यात्री हैं जो किताबों और मोबाइल फ़ोन पर समय बर्बाद कर रहे हैं|

हाँ, भारतीय सड़कें भी ऐसी हैं, कि उन पर यात्रा करते हुए रेखाचित्र बनाना भी किसी रोलर कोस्टर राइड जैसा है न कि किसी आर्ट स्टूडियो जैसा शांत – सुशील माहौल| कोई फर्क नहीं पड़ता – सारे टेढ़े – मेढ़े अपूर्ण और विषय के दुहराव वाले रेखा चित्रों से उन स्तिथियों और माहौल का सही सही पता चल जाता है जिसमें यह बनाये गएँ हैं और एक ही विषय बने रेखाचित्र विभाजित प्रौस्तैन छायाचित्रकारी की तमाम विविधता के बाद भी नहीं लुभाते हैं|

जिन पृष्ठों में मैं आपको खालीपन दिखाई दे वहां मैंने अपने नोट्स मिटाए हैं – आपको उन्हें झेलने की कोई इच्छा नहीं होती – और मैंने स्कैनिंग के बाद फोटोशोप के द्वारा फ्लैट टोन जोड़ दी है|

नमस्ते!

आम आदमी पार्टी संसदीय दल के लिए चुनौती


Arvind Kejriwal and friends
Arvind Kejriwal and friends (Photo credit: vm2827)

नवोदित आम आदमी पार्टी को दिल्ली चुनाव के रोचक परिणामों से उत्पन्न चुनौती का सामना कर पाने के लिए मेरी शुभकामनायें|

चुनाव परिणामों को देखने के बाद मेरी यह धारणा प्रबल हुई कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अहंकार का शिकार हुई|

साथ ही भाजपा सही समय के तुरंत बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के विरुद्ध उत्पन्न जन आक्रोश को समझने में सफल हुई| साथ ही भाजपा ने उचित समय पर न केवल चुनावी रणनीति में बदलाव किये वरन समय पूर्व ही चुनाव उपरांत की संभवनाओं पर भी मंथन किया|

भाजपा ने सही छवि के व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी बनाया| भाजपा ने अपने प्रमुख प्रतिद्वंदी के रूप में आआपा की पहचान की और उसकी छवि बिगाड़ने के सारे प्रयास किये अथवा उनमें भाग लिया| भाजपा के पास क्षेत्र वार समीकरणों, मतदान परिणामों और उनके दूरगामी प्रभावों का पूरा आंकलन था|

आप देख सकते है कि रामकृष्णपुरम से आआपा प्रत्याशी शाज़िया इल्मी को बेहद प्रभावी तरीके से चिह्नित किया गया| उन पर लगाये गए आरोप भले ही कहीं से भी आये हों, परन्तु भाजपा में उन्हें प्रभावी तरीके से प्रचारित किया| भाजपा ने इल्मी को आआपा के तथाकथित असल चहरे के रूप में पेश करने का प्रयास किया जिसे सोशल मीडिया पर बार बार शेयर किया गया|

इल्मी का उस क्षेत्र से चुना जाना संघ परिवार के लिए आत्महत्या करने जैसा होता क्योंकि उस क्षेत्र में विश्व हिन्दू परिषद् का मुख्यालय है और मुस्लिम आबादी का कोई बड़ा प्रभाव नहीं है| भाजपा हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से “पढ़ी लिखी मुस्लिम महिला” को जीतने देकर, देश भर के कट्टरपंथी हिन्दू समाज को नया सन्देश नहीं जाने दे सकती थी| हिन्दू बाहुल्य क्षेत्र से “पढ़ी लिखी मुस्लिम महिला” का जीतना कई नए सन्देश देता –

अ)    सुशासन के बढ़ा हुआ महत्त्व,

आ)  हिन्दू मुस्लिम खाई को भरना,

इ)      हिन्दू समाज में मुस्लिम समाज की सकारात्मक छवि

ई)      मुस्लिम महिला और समाज को विकास और खुली सोच का आदर्श

उ)     सांप्रदायिक राजनीति का अंत

मतदान के दिन उसके पोलिंग एजेंट पूरी तन्मयता से हर मतदाता को चिन्हित कर रहे थे और उसके मूड को भांपने का प्रयास कर रहे थे| उन्हें तीसरे पहर तक यह सही जानकारी थी कि किस पोलिंग बूथ पर किसको कितना मतदान हुआ है| भाजपा के बंधे हुए समर्थकों को शाम से ही बुला बुला कर मतदान कराया गया|

आप देख सकते हैं कि बहुत से चुनाव क्षेत्रों में अंतिम समय में हुए मतदान से ही भाजपा ने जीत हासिल की है| देर शाम के इस मतदान ने अन्य चुनावी रणनीतिकारों को सकते में डाल दिया था|

मतगणना के दिन जब यह तय हुआ कि समस्त परिश्रम के बाद भाजपा पूर्ण बहुमत के पास नहीं पहुँच रही है तो उन्होंने बहुत शीघ्र उन्हें अपनी आगे की रणनीति के पासे चलने प्रारंभ कर दिए हैं| मुझे भाजपा की प्रशंसा करने चाहिए कि उसने दिल्ली में दंभ का प्रदर्शन नहीं किया और मंझे हुए राजनीतिक दल की तरह अपने कदम उठाने का निर्णय किया है|

 इस समय भाजपा ने सबसे बड़ा दल होने के बाद भी सरकार बनाने की पहल करने से मन कर दिया है| हम इस समय बाजपेयी जी की तेरह दिन की सरकार से इसकी तुलना नहीं कर सकते| उस समय भाजपा अपनी सरकार को शहीद कर कर हिन्दू जनता को यह सन्देश दे रही थी कि अन्य सारे दल उसके विरुद्ध साजिश कर रहे हैं| आज अगर भाजपा सरकार बना कर सत्ता लोलुप होने की छवि नहीं बनाना चाहती| दूसरा सरकार बनाने के लिए होने वाली जोड़तोड़ उसे आआपा के मुकाबले में बेहद कमजोर नैतिक पायदान पर ले आएगी| अगर जल्द ही चुनाव होते हैं तो उसे अपने सारे राजनैतिक दाँव पेच चलाने का पूरा समय मिल जायेगा| यदि यह चुनाव लोकसभा चुनावों के साथ होते हैं तो उस समय दिल्ली के स्थानीय मुद्दों और आआपा के सत्तर स्थानीय घोषणापत्रों पर राष्ट्रीय मुद्दे छाये रहेंगे| उस समय भाजपा दिल्ली में मोदी – केजरीवाल मुकाबले में मोदी की शक्ति को बढ़ा कर देखती है|

यह भी देखना है की भाजपा किस प्रकार सरकार बनाने की जिम्मेदारी से भागने का दोष संभालती है|

 आआपा के किये यह अभी नयी शुरुवात है और अभी उसका राजनैतिक अन्नप्राशन होना है| उसके लिए सौभाग्य की बात है कि वह दूसरा बड़ा दल है| अगर वह सरकार बनाती है तो सत्ता लोलुपता के स्तर पर उसमें और अन्य दलों में कोई अंतर नहीं रह जायेगा| सरकार बनाने के बाद उसके उसके ऊपर अपने घोषणापत्र लागू करने का दबाब होगा जिसे बिना पूर्ण बहुमत लागू करना कठिन है| लेकिन उसे यह भी नहीं दिखाना है कि वह विरोध की राजनीति में इतनी रम गयी है कि आज सत्ता से भी भाग रही है|

आआपा पर यह चुनौती है कि वह किस तरह भाजपा को सरकार बनाने के लिए प्रेरित करे| उस से भी बड़ी चुनौती यह है कि किस तरह से आआपा इस विधानसभा के भंग होने की स्तिथि में जनता को यह सन्देश देती है कि गलत प्रकार की राजनीति ने दिल्ली में दोबारा चुनावों की स्तिथि पैदा कर दी है|

 यदि आआपा किसी अन्य दल की सरकार को चलने देकर बेहद सकारात्मक विपक्ष की भूमिका अपना सकती है| आआपा भाजपा के घोषणापत्र से वह मुद्दे जनता को बता सकती है जिनसे उसकी सहमति है| खुले मंच से यह घोषणा की जा सकती है कि यदि भाजपा अपने घोषणा पत्र में से चिह्नित घोषणाओं पर पहले तीन महीने के भीतर अमल का भरोसा दे तो आआपा उसकी सरकार को अन्य मामलों पर मुद्दों के आधार पर समर्थन दे सकती है|

 

 

दो ऑटोरिक्शा चालक


अभी गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में अपना पर्चा प्रस्तुत करने के लिए जाना हुआ| जाते समय अहमदाबाद रेलवे स्टेशन से विश्वविद्यालय तक और लौटते समय दिल्ली कैंट से लोदी रोड तक ऑटो रिक्शा की सवारी का लुफ्त उठाया और सामायिक विषयों पर चर्चा हुई| दोनों रिक्शा चालकों की समाज और देश के प्रति जागरूकता और उस पर चर्चा करने की उत्कंठा ने मुझे प्रभावित किया|

गुजरात:

मुझे नियत समय पर पहुंचना कठिन लग रहा था और रास्ता भी लम्बा था| बहुत थोड़े से मोलभाव के बाद, मैं अपनी दाढ़ी और पहनावे से मुस्लिम प्रतीत होने वाले चालक के साथ चल दिया| मैंने सामान्य शिष्टाचार के बाद सीधे ही प्रश्न दाग दिया. अगले चुनावों में वोट किसे दोगे| बिना किसी लाग लपेट के उत्तर था, मोदी| मैंने दोबारा पूछा, भाजपा या मोदी? मोदी सर| मैंने कहा, वो तो कसाई है, उसे वोट दोगे| चालक ने शीशे में मेरी शक्ल देखी, आप कहाँ से आये है? मैंने कहा दिल्ली से, अलीगढ़ का रहने वाला हूँ| उसने लम्बी सांस ली और शीशे में दोबारा देखा| मैंने उचित समझा कि बता दूँ कि हिन्दू हूँ|

“हिन्दुओं से डर नहीं लगता सर, सब इंसान हैं|” थोड़ी देर रुका, सर ये गुजरात है, “जिन हिन्दुओं ने बहुत सारे मुसलामानों की जान बचाई थी वो भी सबके सामने मोदी ही बोलते है| बोलना पड़ता है सर| वोट का पता नहीं, अगर दिया तो मोदी को नहीं देंगे और कांग्रेस या और कोई हैं ही नहीं तो देंगे किसे?” अब मेरे चुप रहने की बारी थी|

काफी देर हम लोग चुप रहे, फिर उसने शुरू किया, “सरकार बड़े लोगों की होती है और हम तो बस वोट देते हैं| अगर वोट भी न दें तो ये लोग तो हमें कभी याद न करें| इस देश में वोट बैंक और नोट बैंक दो ही कुछ पकड़ रखते हैं| हम कोशिश कर रहे हैं, वोट बैंक बने रहें| इसलिए वोट देंगे|”

Drive thru
Drive thru (Photo credit: Nataraj Metz)

दिल्ली:

दिल्ली कैंट स्टेशन पर उतरने ऑटो रिक्शा दलाल से मीटर किराये से ऊपर पचास रुपया तय हुआ| ऑटो चालक सिख था| उसने बताया कि ज्यादातर जगहों पर अवैध पार्किंग ठेके है और ये लोग पचास रुपया लेते है| पुलिस इन ठेके वालों से हफ्ता वसूलती है और ये बिना रोकटोक ऑटो खड़ा करने की जगह देते हैं| दिल्ली एअरपोर्ट पर ऑटो के लिए कोई वैध – अवैध पार्किंग नहीं है क्योंकि ऑटो रिक्शा देश की शान के खिलाफ हैं| ऑटो पर विज्ञापन से लेकर पुलिस भ्रष्टाचार तक लम्बी चर्चा हुई| उसने भाजपा और कांग्रेस को सगा भाई बताया| “हिस्सा तय है जी सारे देश में इनका ७० – ३० का|” “कॉमनवेल्थ की समिति में दोनों के लोग थे साहब|” “क्रिकेट का रंडीखाना तो दाउद चलाता है साहब और भाजपा – कांग्रेस के लोग उसमें नोट बटोरने जाते हैं|” उसके मन और जुबान की कडुवाहट बढती रही और मेरे लिए सुनना कठिन हो गया|

अंत में उसने कहा, “साहब हमें नहीं पता कि केजरीवाल कैसा करेगा, क्या करेगा और उसके पास मंत्री बनाने लायक अच्छे समझदार लोग हैं या नहीं; मगर हम उसे वोट देकर जरूर देखेंगे|”

मैं सोचता हूँ, अगर देश की आम जनता के मन में लोकतंत्र की भावना मजबूत हैं, यही अच्छी बात दिखती है| वरना तो लोग हथियार उठाने के लिए भी तैयार ही जाएँ| कहीं पढ़ा था न इन्ही दो चार साल में “शहरी नक्सलाईट”| 

रेलवे की साजिशाना लूट


 

 

जी हाँ| मैं यही कह रहा हूँ कि हमारी प्यारी “भारतीय रेल” हमें साजिश कर कर लूटती है| और मेरे पास ये कहने की पर्याप्त आंकड़े है, जो मैंने खुद रेलवे से सूचना के अधिकार का प्रयोग कर कर प्राप्त किये है| मैंने अपनी आँखों से इस लूट को देखा जिसका विस्तृत ब्यौरा आप यहाँ पढ़ सकते है|

आइये देखें, ये लूट किस प्रकार हो रही है| अपने अध्ययन के लिए मैंने अपने गृहनगर अलीगढ़ और दिल्ली के बीच की रेल सेवा को चुना|

मैंने रेलवे से दो अलग अलग प्रार्थना पत्र भेज कर पूछा:

१.       अलीगढ़ पर दिल्ली और नई दिल्ली जाने के लिए रुकने वाली सभी ट्रेनों में कुल मिला कर सामान्य अनारक्षित श्रेणी की कितनी यात्री क्षमता है? कृपया ई.ऍम.यु.,एक्सप्रेस, सुपरफास्ट, शताब्दी, सभी श्रेणियों का अलग अलग ब्यौरा दें|

२.       अलीगढ़ जंक्शन से दिल्ली जंक्शन और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के लिए टिकटों की बिक्री का ब्योरा दें|

रेलवे ने अपने जबाबों में कहा:

१.       अलीगढ़ से दिल्ली और नई दिल्ली के लिए तीन ई.ऍम.यु. ट्रेन चलती हैं| जिनमे से एडी १ और एदी ३ दिल्ली और एअनडी – १ नई दिल्ली के लिए जाती हैं| इन में से पहली ट्रेन में १३ और अन्य दो में १५ डिब्बे रहते हैं| हर डिब्बे में ८० यात्रियों के बैठने की सुविधा है|

२.       टिकटों के बारे में उन्होंने मुझे एक चार्ट संलग्न कर कर भेजा| इन आंकड़ों का मैंने अध्ययन किया\

अनारक्षित डिब्बा
अनारक्षित डिब्बा

एक वर्ष में भारतीय रेल के पास अलीगढ़ से दिल्ली के बीच कुल ४३८,००० सीटें हैं| इन सीटों ४३८००० सीटों के बदले में रेलवे में २००९ – १० में ५२०५२२, २०१० – ११ में ५२७,५८९ और २०११ – १२ में ५५१०६२ टिकटों की बिक्री की| और इन सभी यात्रियों को या तो खड़े हो कर यात्रा करनी पड़ी या फिर उन्हें मजबूरी में आरक्षित डिब्बों में जाकर दूसरों की सीट पर बैठना पड़ा|

जब ये यात्री उन डिब्बों में पहुंचे तो रेलवे में अर्थ – दंड के नाम पर कमाई की या उसके कर्मचारियों में इन यात्रियों से अवैध वसूली की|

क्या रेलवे को उपलब्ध सीटों से अधिक सीटें बेचने का अधिकार है?

क्या रेलवे को सीट उपलब्ध न होने पर टिकट बेचते समय यात्री को इस बाबत सूचना नहीं देनी चाहिए थी?

क्या सीट न उपलब्ध होने की स्तिथि में यात्री के उपर अर्थ – दंड लगाया जाना चाहिए?

अगर इस तरह का अर्थ – दंड लगता है तो इसका पैसा रेलवे को मिलना चाहिए? क्या वह सहयात्री जो इस पीड़ित यात्री को अपनी सीट पर यात्रा करने देता है उसे इस रकम से कुछ हिस्सा नहीं मिलना चाहिए?

क्या कहते है आप? कृपया अपनी टिप्पणियों में लिखे!!

(हिंदी में अपने विचार लिखने में आपकी सहायता के लिए इस पृष्ट पर एक लिंक दिया गया है जहाँ से आप सम्बंधित सॉफ्टवेयर प्राप्त कर और अपने यन्त्र पर उतार सकते हैं|)