कृण्वन्तो भारत शूद्रं!


भारतीय प्रधानमंत्री महोदय में अभी हाल में ही “मेक इन इण्डिया” यानि “भारत में निर्माण” का आह्वान किया| किसी को भी इस बात से आपत्ति नहीं हो सकती कि जब निर्माण कार्य प्रारंभ नहीं होते तो विकास करने और गरीबी हटाने के लक्ष्य मात्र बातें ही रह जाने वाली हैं|

पुरातन काल से निर्माण और सेवा क्षेत्र भारत में महत्वपूर्ण समझे गए हैं इस बात का सीधा प्रमाण है भारत जाति व्यवस्था का जन – सांख्यिक अनुपात| भारत में सेवा और निर्माण के सभी कार्य उन लोगों जिन लोगों ने अपनाये उन्हें बाद जाति व्यवस्था के प्रारंभ में शूद्र कहा गया| जाति व्यवस्था के तीन वर्ग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य देश भले ही सत्ता और सुख का लाभ उठाते रहे हों मगर जनसंख्या अनुपात में उनका कुल जोड़ शूद्रों के मुकाबले सदा ही कम रहा है| हम जाति व्यवस्था पर विस्तृत चर्चा किये बिना भी इस बात को समझ सकते हैं कि सदा ही इस बात का महत्त्व समझा गया है कि जनशक्ति की बहुसंख्या उत्पादक कार्यों में लगे| यह भी विडम्बना हैं कि उत्पादक और सेवा क्षेत्र के लोग प्रायः सत्ता और सुख से वंचित रहते हैं और उनमें खुद को और  अपनीं अगली पीढ़ियों को अपने वर्तमान स्तिथि से से ऊपर या हो सके सत्ता केंद्र में देखने की प्रवृत्ति होती है| हो सकता है कि विकास की इसी प्रवृत्ति को रोकने के लिए जाति व्यवस्था में कट्टरता का समावेश किया गया हो जो बाद में और अधिक अनुचित शोषण का रूप लेता गया| दुर्भाग्य से इस सबका एक परिणाम यह हुआ कि भारत में बहुत से उत्पादक और सेवा कार्यों को निम्न स्तर का माना जाने लगा|

अभी बड़े उद्योगों पर जोर दिया जा रहा है, मगर किसी भी बड़े उद्योग की सफलता के पीछे बहुत से छोटे और मझोले उत्पादक और सेवा प्रदाता होते हैं| भारत में निर्माण कार्यों को तभी प्राथमिकता मिल सकती है जब उत्पादन और सेवा कार्यों विशेषकर छोटे और मझौले उत्पादकों और सेवा प्रदाताओं को उचित सम्मान मिले और शूद्र हो जाना लज्जा की बात न समझी जाये| साथ ही जातिगत और पैतृक रूप से निर्माण, उत्पादन और सेवा कार्यों में लगे  लोगों को आधुनिक प्रशिक्षण के साथ अपने परंपरागत काम को सम्मान से करने का और उनके कार्य में यदि कोई अमानवीय तकनीकि प्रयोग हो रही है तो उसके स्थान पर आधुनिक मानवीय  तकनीकि का प्रशिक्षण दिया जाये|