अनुपालन के खिलाफ दुष्प्रचार

राजनीति को भारत में दुष्प्रचार का एक गंदा खेल माना जाता है और जनता ने इसे जीवन की वास्तविकता के रूप में स्वीकार कर लिया है। दुर्भाग्य से, कुछ भारतीय पेशेवरों ने अनुपालन और अनुपालन पेशेवरों के खिलाफ दुष्प्रचार करना प्रारंभ किया है| मीडिया की भूमिका भी प्रश्नचिन्हों में घिरने लगी है। यह स्पष्ट है कि भारतीय मीडिया प्रकाशन करने से पहले कोई शोध नहीं करता है और तथ्यों को सत्यापित भी नहीं करता है। 12 जून 2019 को डेक्कन क्रॉनिकल द्वारा प्रकाशित और कुछ अन्य पत्रों द्वारा नक़ल कर छापे गए गए दुष्प्रचार का “वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण से फर्मों के लिए ई-फॉर्म 22 ए को माफ करने का आग्रह” शीर्षक से प्रकाशित किया गया था।

ऐसा लगता है कि एक चार्टर्ड अकाउंटेंट ने फॉर्म आईएनसी – 22 ए, जिसे लोकप्रिय रूप से प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) कहा जाता है, में दिये गए एक जाँच बिंदु के विरुद्ध पांच पृष्ठ का एक लम्बा ज्ञापन प्रस्तुत किया है। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा अच्छी तरह से तैयार किए गए इस प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का उद्देश्य किसी कंपनी की अनुपालन स्थिति की जांच करना है। पूर्णतः अनुपालित कंपनी के मामले में कंपनी के पंजीकृत कार्यालय के अक्षांश देशान्तर (जियो टैगिंग) को छोड़कर यह प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) लगभग स्वतः भर जाता है। हमने प्रपत्र सक्रिय के बारे में पहले भी विस्तार से चर्चा की है| उसके बाद फॉर्म भरने का समय बढ़ाये जाने के समय; हमने किसी भी पेशे या अनुपालन शासन का को विरोध किये बिना एक व्यावहारिक समस्या के समाधान के लिए एक उचित तरीके पर भी चर्चा की थी। हालांकि, इस फॉर्म को भरने की तारीख को कुछ कठिनाई के आधार पर एक बार फिर से बढ़ाये जाने (आज 15 जून 2019 से आगे) की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन उपरोक्त दुष्प्रचार प्रचार में उल्लेखित कुछ भी निश्चित जमीन आधार पर नहीं है।

कुछ महीनों पहले, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय ने लगभग 5 लाख कंपनियों का नाम कम्पनी पंजी से हटा दिया था| इन कंपनियों ने अपने वार्षिक खातों और वार्षिक रिटर्न तीन या अधिक वित्तीय वर्षों से पंजीकरण कार्यालय में नहीं किये थे। दिलचस्प बात यह है कि कंपनी प्रवर्तकों, शेयरधारकों, निदेशकों, लेखा परीक्षकों, देनदारों और लेनदारों सहित इन कंपनियों के 0.01% हितधारकों ने भी इसपर कभी कोई आपत्ति भी नहीं जताई| केवल मुट्ठी भर हितधारकों ने ही अपनी कंपनियों के पुनर्जीवन के लिए राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया। यह समझा जाता है कि पंजी से हटाई गईं आधे से अधिक कंपनियों के हितधारकों ने कुछ विशेष उद्देश्यों के लिए इन कंपनियों का उपयोग किया या यूँ कहें कि दुरुपयोग किया| वास्तव में इन कंपनियों को दुरुपयोग के बाद यूं ही छोड़ दिया गया था। इन कंपनियों में, जहां कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग किया गया था, उन्हें सही मायनों में शेल कंपनियां कहा जा सकता है। बाकी बंद की गई कंपनियां या तो उचित व्यवसाय योजना के बिना काम शुरू करने वाले निर्दोष प्रमोटरों से संबंधित हैं या उनके प्रमोटर अब जीवित नहीं हैं या कारोबार करने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके हैं जिन्होंने अपनी कंपनियों को बंद किए बिना कारोबार को बंद कर दिया है।

हालाँकि, भारत में वर्तमान में संदिग्ध अनुपालन वाली भारतीय कंपनियों के बीच प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) का शुरू से ही दबा छिपा विरोध रहा है। यह भारत में एक कठोर वास्तविकता है कि कुछ हितधारक और कंपनियां व्यापार करने की कठिनाई के बहाने बुनियादी कानूनों का पालन नहीं करना चाहती हैं। सभी आलोचनाओं के बावजूद, भारत ने कंपनी अधिनियम, 2013 आने से बाद से कॉर्पोरेट अनुपालन पर ध्यान केंद्रित करते हुए भी सरल व्यापार इंगिता में श्रेष्ठता की और कदम बढ़ाये हैं| वर्तमान में, प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) के खिलाफ चल रही आलोचना उन कुछ हितधारकों की निराशा का प्रतिबिम्ब है जो कॉर्पोरेट संरचना का दुरुपयोग कर रहे हैं। सरकार के पास इस तरह के दुरूपयोग के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने और “नई शेल कंपनियों के बनने” पर यथासमय निगाह रखने का यह सही समय है। प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) ऐसी प्रभावी और यथासमय जाँचों में से एक है।

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति दो दशक से अधिक समय से एक महत्त्वपूर्ण अनुपालन आवश्यकता है। कंपनी में नियुक्त कंपनी सचिव कंपनी के अनुपालन की स्थिति पर यथासमय निगाह रखते हैं और प्रबंधन को कानून का पालन करने के लिए यथासमय सलाह देते हैं। पूर्ण कालिक कंपनी सचिव गैर-अनुपालन से कंपनियों, उनके प्रमोटर और प्रबंधन को आगाह करते हैं। हालाँकि, एक कर्मचारी के रूप में वह गैर-अनुपालन को रोकने में असमर्थ हो सकते है, लेकिन वह निश्चित रूप से किसी भी नियोजित गैर-अनुपालन पर लाल झंडी जरूर दिखाते हैं| हालाँकि, लाल झंडी उठाने की उनकी भूमिका का इस्तेमाल कुछ विशेष हितधारकों द्वारा एक नकारात्मक पेशे के रूप में किया जाता है, जो उनके दुष्प्रचार के हिसाब से व्यवसाय और “व्यावसायिक लाभ” में बाधा डालते हैं। क्या फुटबॉल मैच में रेड कार्ड दिखाने वाले रैफरी को नकारात्मक व्यक्ति कहा जा सकता है? या कि वह खिलाड़ियों को सुचारू रूप से सुरक्षित और प्रसन्नता पूर्वक खेलने में मदद करने वाला सकारात्मक व्यक्ति को है?

पूर्ण कालिक कंपनी सचिव की नियुक्ति पूरी तरह से कानून की भावना का अनुपालन है और इससे अधिक ईमानदार व्यवसाय के लिए यथासमय कानूनी मदद और अनजाने में होने वाले उल्लंघन से खुद को बचाएं रखने का जरिया है। विवेकपूर्ण प्रबंधन वाली कई कंपनियां कानूनी आवश्यकता न होने पर भी या तो स्वेच्छा से कंपनी सचिव को नियुक्त करती हैं या यथासमय मदद पाने के लिए अभ्यासरत कंपनी सचिव की सेवाएं लेती हैं।

संख्या की कमी

आमतौर पर यह दावा किया जाता है कि सक्रिय कंपनियों की कुल संख्या लगभग 10 लाख है लेकिन उपलब्ध कंपनी सचिव संख्या मात्र 50 हजार ही हैं। हालांकि, सभी कंपनियों को एक पूर्णकालिक कंपनी सचिव को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन केवल पाँच करोड़ या उस से अधिक भुगतान पूंजी वाली कंपनियों को ही पूर्ण कालिक कंपनी सचिव रखने की कानूनी आवश्यकता होती है। यह दावा किया जाता है कि 90 हजार कंपनियों के लिए मात्र 45 हजार कंपनी सचिवों की उपलब्धता है| परन्तु आजकल दुर्भाग्य से आधे से अधिक कंपनी सचिव बेरोजगार या अर्धबेरोजगार हैं| यह लोग अपने वृद्ध माता-पिता और परेशान परिवारीजनों के सामने अपना चेहरा बचाने के लिए अभ्यास प्रमाण पत्र ले लेते हैं और व्यवसायिक संघर्ष में जुट जाते हैं। वर्तमान में किये जा रहे दुष्प्रचार के अनुसार उपलब्ध ४५ हजार कंपनी सचिवों में से 20 हजार पहले से ही कार्यरत हैं। हमारे पास लगभग 2 हज़ार के ऐसे कंपनी सचिव हो सकते हैं जो सफलतापूर्ण व्यावसायिक अभ्यास कर रहे हैं। शेष 23 हजार कंपनी सचिवों के बारे में क्या सूचना है? वह किसी लाभकारी कार्य के न होने कसे कारण जीवनयापन के लिए संघर्षरत हैं| जब तक ये सभी कंपनी सचिव उचित रूप से कार्यरत नहीं हो जाते, तब तक यह दावा नहीं किया जा सकता है कि कंपनी सचिवों की मांग और उपलब्धता में बहुत बड़ा अंतर है। पहले उपलब्धता को तो उचित उपयोग में आने दें।

प्रवासन का मुद्दा

यह दावा किया जाता है कि कंपनी सचिव विभिन्न कारणों से छोटे शहरों में जाने को तैयार नहीं हैं। यह कोई बढ़िया तर्क नहीं है। क्या छोटे शहरों में कॉरपोरेट कार्यालय या पंजीकृत कार्यालय वाली कंपनियों के साथ अन्य पेशेवर काम नहीं कर रहे हैं? मुद्दा हितधारकों की कंपनी सचिव की नियुक्ति के लिए अनिच्छा का है और इसलिए वे कंपनी सचिव को उचित पारिश्रमिक की पेशकश नहीं कर रहे हैं।

बजट की कमी

वर्तमान दुष्प्रचार में दावा किया कि कंपनी सचिव की नियुक्ति छोटी कंपनियों के बजट में नहीं समाती।यदि संस्थापकों ने अपने व्यवसाय के लिए एक निश्चित संगठनात्मक रूप का विकल्प चुना है तो उन्हें उस संगठनात्मक संरचना से जुड़े कानून का पालन करने की आवश्यकता होती है। क्या संस्थापकों को पिछले तीन दशकों से कंपनी सचिवों की नियुक्ति के आवश्यकता के बारे में पता नहीं है? क्या पांच करोड़ रुपये की चुकता पूंजी वाली कंपनी एक कम बजट की कंपनी है? ऐसा तभी होना चाहिए जब कि कंपनी ने अनुचित वित्तीय सलाह और योजना के आधार पर उच्च भुगतान पूंजी का चयन किया हो। ऐसी कंपनियां कानूनी रूप से अनुमत मार्ग का उपयोग करके अपनी भुगतान पूंजी को कम करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन वित्त सलाहकार इस तरह से सलाह क्यों देगा क्यों कि भुगतान पूंजी बढ़ाने के लिए पहली वाली सलाह बिना उचित कसौटी के दी थी।

सरकार को उच्चतर भुगतान पूंजी कंपनियों पर निगाह रखनी चाहिए क्योंकि गैर अनुपातिक उच्च भुगतान पूंजी का उपयोग अधिकतम बैंक ऋण प्राप्त करने के लिए किया जाता है| ऐसे ऋण बाद में समस्यापूर्ण परिसंपत्तियों में बदल जाते हैं।

अन्य नियुक्तियाँ

कंपनी सचिव का अनुपालन अधिकारी रूप में विरोध प्रपत्र सक्रिय (फॉर्म एक्टिव) को ठीक से देखे बिना लक्षित प्रचार के तहत किया जा रहा है| मुख्य वित्तीय अधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रबंध निदेशक जैसे अन्य प्रमुख प्रबंधकीय कर्मियों की नियुक्ति न होने की स्थिति में भी फॉर्म अनुपालन सम्बन्धी त्रुटियां इंगित करता है| इन अन्य पदों पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की बहुत अधिक आपूर्ति हो सकती है क्योंकि इन पदों के लिए कोई विशिष्ट योग्यता निर्धारित नहीं है। यह एक विशेष कारण से है – कंपनी सचिव को यथासमय बेहतर अनुपालन में मदद करनी होती है और उसे अतियोग्य होने की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

इस समय सरकार को हस्तक्षेप बनाये रखना चाहिए ताकि कंपनियों को अपने रोजगार में भले ही जबरन पर बेहतर प्रशिक्षित और जानकार पेशेवर बनाने में मदद मिल सके। सभी उपलब्ध योग्य कंपनी सचिवों की नियुक्ति हो जाने के बाद भी, सरकार को कंपनी सचिव नियुक्त करने की आवश्यकता को कम नहीं करना चाहिए, बल्कि छोटी कंपनियों के लिए योग्यता मानदंड में ढील देने की यह अनुमति दी जा सकती है कि, जो प्रशिक्षित कंपनी सचिव की निगरानी के अधीन एक अर्ध योग्य कंपनी सचिव की नियुक्ति की जा सके। यह निगरानीकर्ता प्रशिक्षित कंपनी सचिव होल्डिंग या सहायक या संबंधित कंपनी में सेवातर हो सकता है। कुछ मामलों में ऐसी निगरानी अभ्यासरत कंपनी सचिव को दी जा सकती है, लेकिन प्रत्येक अभ्यासरत कंपनी सचिव को 20 से अधिक कंपनियों के लिए नहीं यह जिम्मेदारी नहीं दी जाये।

जब सरकार शैशवावस्था में होती है तो कंपनियों के मस्तिष्क में कंप्लायंस डालने के लिए सरकार से आग्रह किया जाता है अन्यथा हम शेल कंपनियों को जारी रखेंगे।

व्यवहार में एक कंपनी सचिव होने के नाते, मैं कह सकता हूं कि रोजगार में कंपनी सचिव वास्तविक समय अनुपालन सलाहकार के साथ मदद करते हैं। निवारण हमेशा इलाज से बेहतर है। सरकार अनुपालन के अभाव में अन्य पाँच लाख शेल कंपनियों को बनना वहन नहीं कर सकती है।

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पढ़ी लिखी अयोग्यता

पिछले एक  आलेख में मैंने कंपनी सेक्रेटरी के बहाने देश के रोजगार परिदृश्य की विवेचना की थी| आज कंपनी सेक्रेटरी के बहाने देश में शिक्षा के स्तर की चर्चा करेंगे|

दिल्ली रेडिमेड कंपनी सेक्रेटरी का उत्पाद केंद्र है| यहाँ के उच्च स्तरीय कोचिंग सेंटर परीक्षा की बहुत श्रेष्ठ तैयारी कराते हैं| साथ ही बहुत से श्रेष्ठ कंपनी सेक्रेटरी बिना पैसे लिए संस्थान की ओर से छात्रों के ज्ञान बाँटते हैं|

परन्तु, पिछले वर्ष एक कंपनी के डायरेक्टर ने मुझे कहा था कि एक बार में कंपनी सेक्रेटरी परीक्षा पास कर कर आने वाले दस प्रत्याशी उसे पब्लिक कंपनी और पब्लिक सेक्टर कंपनी का अंतर नहीं बता सके| इसके लिए प्रायः भारतीय कंपनी सेक्रेटरी संस्थान को दोष दिया जाता हैं| मगर इसके कहीं अधिक दोषी हमारा समाज और शिक्षा के प्रति सामाजिक धारणा है| 

यह सब हुआ कैसे?

कहा जा रहा है कि कंपनी सेक्रेटरी मिनटबुक में दो लाइन भी बिना नक़ल के नहीं लिख सकते| कहीं यह भारतीय शिक्षा तंत्र का सामान्य परिदृश्य तो नहीं?

पहला तो छात्र ज्ञान प्राप्त करने के लिए नहीं वरन परीक्षा पास करने के लिए पढने लगे हैं| परीक्षा पास करने के लिए उन गूढ़ प्रश्नों के उत्तर याद कर लिए जाते हैं जिन्हें प्रायः परीक्षा में पूछा जाता है या पूछा जा सकता है| याद करने की यह प्रक्रिया इतनी मशीनी है कि उसमें कानूनी गहराई समझने के लिए गुंजाईश ही नहीं बची है|

जब यह छात्र किसी भी कोचिंग सेंटर में जाते हैं तो कोचिंग सेंटर का लक्ष्य होता है, पास हुए छात्रों की संख्या और प्रतिशत बनाये रखना| उनके यहाँ किसी भी सवाल जबाब का कोई स्थान नहीं रहता| केवल बचकाने प्रश्न छात्रों के सामने रखे जाते है जो उन्हें जबाब याद करने की ओर ले जायें, न कि समझने दें| हाँ, अगर कोई छात्र प्रश्न पूछता है तो उसे उत्तर दिया जाता है मगर इस भगदड़ में प्रायः छात्र प्रश्न पूछने की जगह उत्तर याद करने में लगे रहते है|

संस्थान अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा है| प्रायः कोचिंग सेंटर और छात्र पूछे जाने वाले सवालों का पहले से जो अंदाजा लगाते हैं उस से मिलते जुलते सवाल आते है| परीक्षा में बहुत सटीक उत्तर के कमी रहती है| अभी हाल ही में एक सम्म्मेलन में बात उठी थी की अगर कोई परीक्षक जरा भी सख्ती से नंबर देता है तो उसके पास संस्थान की ओर से चेतावनी सन्देश आ जाता है|

जब यह छात्र उत्तीर्ण होकर नौकरी के लिए जाते हैं तो कंपनियां उनको अनुकूल नहीं पातीं| बहुत सी बातें जो छात्र जीवन में डट कर पढ़ी गयीं है वो कई बार कंपनी में नहीं होनी होतीं; जैसे मर्जर| जो कार्य कंपनी में रोज होते हैं उनपर छात्र जीवन में कभी ध्यान नहीं दिया गया होता जैसे; कानूनी विवेचना, रेजोलुसन, बोर्ड मीटिंग, समझौते| यह केवल छात्र की ही गलती है नहीं है वरन उस सिस्टम की भी है जो कोर्स को तैयार करता है| रोजमर्रा के काम पढाई में हल्के लिए जाते हैं जबकि उनमें अगर एक्सपर्ट हों  तो समय भी बचेगा और बोर्ड की निगाह में जगह भी बनेगी| मगर कहा जा रहा है कि आज कंपनी सेक्रेटरी मिनटबुक में दो लाइन भी बिना नक़ल के नहीं लिख सकते|

मगर क्या यह देश का परिदृश्य नहीं हो गया है| इसी कारण अंडर एम्प्लॉयमेंट भारत का एक स्वीकार्य सच बन गया है|