साइकिल की हमारी सवारी


स्कूल में जिन दिनों पंडित सुदर्शन (मूलनाम बद्रीनाथ भट्ट)  की कहानी “साइकिल की सवारी” पढ़ी थी तब मुझे साइकिल चलानी नहीं आती थी| मुझे लगता था कि अगर साइकिल बहुत बचपन में में सीख लेने की चीज है, वर्ना किसी मुसीबत से कम नहीं है| पापा की साइकिल मोहल्ले में सबसे ऊँची और भारी साइकिल थी और उस पर हमसे लठ्ठा साइकिल नहीं चलती थी| दस पैसे रोज पर छोटी साइकिल किराये पर लाने का मतलब जेबखर्च सीधा सीधा नुक्सान था|

खैर दसवीं क्लास के बाद मैनें साइकिल जैसे तैसे सीख ली क्योंकि बारहवीं में हमारा सेंटर घर से चार किलोमीटर दूसरे कस्बे में (सिकंदराराऊ से पुरदिलनगर) था और माँ नहीं चाहतीं थी  कि मैं पैदल जाऊं|

बारहवीं के बाद मैं कभी दोबारा साइकिल चलाई हो, ऐसा याद नहीं|

अभी पिछले महीने, पत्नी जी ने साइकिल खरीदी और दिल्ली जैसे शहर में वो उसे एक दो बार दफ्तर भी ले गई, तो सोचा यार कुछ तो किया जाए| मैं बेटे तो स्कूल छोड़ने और लाने के लिए साइकिल लेकर जाने लगा| दिल्ली के भीष्म पितामह मार्ग पर साइकिल लेन तो बनी हुई है मगर उसके हालत नाजुक हैं| लगता है किसी नाले ले ऊपर कमजोर कंक्रीट से इसे बनाया गया है| जगह जगह टूटा फूटा भ्रष्टाचार दिखाई देता है| बकाया जगह पर घरविहीन लोगों की रिहायश और बैठकें हैं|

मगर पिछले हफ्ते सुबह सुबह पांच बजे घर से साइकिल पर निकले| अरविंदो मार्ग पर ट्रैफिक कम था| सुबह की ठंडक तारी थी| चिड़ियों के करलव की सुरताल कान में शहद घोलने लगी थी| लोदी रोड पर चहलकदमी करने वालों की रोनक होने लगी थी| गर्मीं की सुबह शीतल पवन, चिड़ियों की चहचाहट, आसमान में उड़ते पक्षियों की रौनक ये वो इनाम हैं जो जल्दी उठने वालों को नसीब होते हैं|

पंडारा रोड होकर मैं इण्डिया गेट पहुँचता हूँ| बहुत से तेज रफ़्तार गाड़ियाँ हैं| कई साइकिल सवार भी आये हुए हैं| बढ़िया बढ़िया साइकिल और सवार की सुरक्षा के सारे इंतजामात देख कर हैरान हूँ| साइकिल भी कोई ग़रीबी का खेल नहीं है| वैसे भी तेज रफ़्तार गाड़ियों के बीच दिल्ली में साइकिल चलाना दुष्कर कार्य है| सोचता हूँ दिल्ली के सबसे बड़े पिकनिक स्पॉट, दिल्ली के गौरव इन्डिया गेट पर साइकिल चलाना खतरनाक मगर मजेदार काम है|

तभी, तेज रफ़्तार साइकिल से एक सत्तर साला जवान मुझे पीछे छोड़ देते हैं| मैं इण्डिया गेट को चारों तरफ से देख रहा हूँ| शानदार नजारा है| तेज रफ़्तार गाड़ियाँ मुझे रास्ता दे रहीं हैं|

साईकिल बे-कार नहीं है!!


बचपन में पंडित सुदर्शन की कहानी पढ़ी थी, साईकिल की सवारी| तभी से मन में यह भाव घर कर गया कि आपका स्वास्थ्य, समय और संसार सब कुछ एक अदद साइकिल के बिना सफल नहीं को सकता| उस समय मुझे स्कूटर चलाना तो आता था पर साइकिल नहीं| हेंडल सम्हालने से साथ पैर चलाना एक मुश्किल काम था| आज भी मुझे लगता है कि साइकिल चलाना निपुण प्रवीण लोगो का काम है और आरामपसंद लोग इसे नहीं कर सकते| अब दिल्ली शहर को देखिये सब लोग दिन भर कार में चलते है, और अपनी ख़ूबसूरत शामें किसी महफ़िल कि जगह जिम में बर्बाद करते है| मजे कि बात ये कि यही लोग हर रोज पर्यावरण प्रदूषण पर बतकही करते है| दूसरी और यूरोप में बड़े बड़े लोग साईकिल पर घूमते है| सब मर्म समझने की बात है, साईकिल चलना और उसे बढ़ावा देना आज की जरूरत है| यह बढ़ती महंगाई में घर के बज़ट को ठीक रखती है, आपके एक अच्छी कसरत देती है और पर्यावरण की साफ़ सुथरा बनाने में इसका बढ़ा योगदान है|

यह देश का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि यहाँ लोग साईकिल को गाँव गँवार, नौकर मजदूर की सवारी समझते है| अरे भाई! दिखावे से न आप का घर चलता है न ही देश| सस्ती सुन्दर साईकिल दुनिया भर में शान की बात है, अपने यहाँ क्या बात हो गई| साइकिल को नीचा करके रखना तो बढ़ी बढ़ी मोटर कंपनी वालो की साजिश है, अपना माल बेचने की| मोटर कार महंगी आती है, रखरखाव पर अधिक खर्च होता है, जगह भी अधिक लेती है, ईधन भी मांगती है, बदले में आपको बिमारी ही देती है| मैं किसी भी तरह कार के खिलाफ नहीं हूँ, परन्तु दोनों की उपयोगिता भिन्न है| हमें एक दो किलोमीटर की दूरी के लिए कार के प्रयोग से बचना चाहिये|

दुनिया भर में सडको पर अलग से साईकिल लेन हैं, हमारे यहाँ उस पर सफेदपोश लोग बेकार मैं कार खड़ी कर देते है| कोई उन्हें कुछ नहीं कहता कि बाबूजी, पार्किंग में कार खड़ी करने के पैसे नहीं थे तो क्यों ये हाथी पाल लिया| खाई, छोड़िये उन बेचारों को| यहाँ तो साईकिल कि बात करनी है|

पुद्दुचेरे सहित देश के कई शहर में आज भी घूमने के लिये साइकिल किराए पर मिल जाती है| दिल्ली मेट्रो आजकल उधार पर साइकिल देती है, पार्किंग कि सुविधा भी| यह उसका अपने सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का तरीका है|साईकिल के प्रयोग को इसी तरह के प्रोत्साहन की जरूरत है|