विश्व-बंदी ६ मई


उपशीर्षक – गिरमिटिया

हिंदुस्तान में वक़्त सिर्फ़ पञ्चांग के लिए बदलता है, इंसान के लिए नहीं|

हम कितनी भी बड़ी बड़ी बात करें, कितना भी अपनी पुरानी और नई महानता का गान करें, हम नहीं सुधरते| उस पर तुर्रा यह है गिने चुने बे-अक्ल लोग गाना गाते रहते हैं कि देश बुरा लग रहा है तो देश से चले जाओ| मगर असलियत है थी है और देश का हर पिछड़ापन, महानता के इन्हीं चारणों पर टिका हुआ है|

भारत द्वारा अपने मजदूरों के साथ किया जा रहा व्यवहार दुनिया भर में बेइज्जती का उदहारण बना हुआ है| पहले मजदूरों और दैनिक कामगारों की स्तिथि पर विचार किए बिना तालाबंदी कर दी गई| कोई बात नहीं, सबने माना यह अतिव्याधि का समय है सरकार ने जल्दी में जो बना कर दिया| काम धंधा, रोजी रोटी, ठौर-ठिकाना हर चीज का सवाल लिए मजदूर जब निकल पड़ा घर जाने के लिए तो नाक बचाने के लिए खैराती इंतजामात किये गए| मजदूर भले ही रोटी के साथ करोना का शिकार हो जाए| जिन्हें इज्जत की रोटी की आदत हो वो या तो बेइज्जत महसूस करें या फिर हमेशा के लिए बेइज्जती की आदत पाल लें|

लॉक डाउन के लगभग खुलने के दो दिन पहले अचानक सरकार ने मजदूरों को घर जाने की अनुमति दी| मगर दुर्भाग्य! महंगे रेल किराए की वसूली हुई| इतने से भी काम नहीं बना तो पहले गुजरात से उन्हें जबरन रोके जाने की ख़बरें आईं बाद में कर्णाटक ने खुलकर उन्हें वापिस जाने देने से मना कर दिया|
क्या वो बंधुआ, गुलाम या गिरमिटिया हैं, कि आज़ाद नहीं किए जायेंगे?

मगर यह गुलामी इतने पर ही नहीं रूकती| सरकार हर किसी के लिए माई-बाप बनना चाहती है| सुरक्षित क्षेत्रों में हर काम की अनुमति देना और काम लेना समझ आता है| परन्तु असुरक्षित क्षेत्र में किसे अनुमति है किसे नहीं इसका कोई भी सुरक्षित मानदंड नहीं है| बहुत से काम जो घरों से हो सकते थे उन्हें घरों से किए जाने पर प्राथिमिकता दी जानी चाहिए| परन्तु न व्यवसायी न सरकार इस बात पर विचार कर रहे हैं| जिन्होंने रोजगार के समय अनुबंध किये हैं वो अपनी मानसिकता में नए किस्म के गिरमिटियों और आक़ाओं में बदल चुके हैं|

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विश्व-बंदी ५ मई


उपशीर्षक – सुरारसिक सम्मान

सुरा रसिकों का सम्मान सदा ही रहा है| यह ही कारण है देवता भी स्वर्ग में इसका सेवन करते हैं| परंपरागत रूप से कहा जाता रहा है सुरा का सेवन करे वह सुर और जो न करे असुर| राक्षस आदि अन्य गैर-असुर समुदायों में भी सुरा सेवन की वर्णनीय परंपरा रही है| अति सर्वस्त्र वर्जनीय है, उस में हम संदेह नहीं रखते| जिन्हें सुरा नहीं मिलती उन्हें भाँग अफ़ीम प्रकृति प्रदत्त साधन उपलब्ध हैं| इस्लाम में सुरा पर प्रतिबन्ध इसके इस्लाम-पूर्व असीरियाई मूल में मालूम होता है –हो सकता है असीरिया का सम्बन्ध प्राचीन असुरों से रहा हो| सुरा का समर्थन या विरोध करते समय तथ्य कौन देखता है, मैं भी नहीं देखता|

कल से देश के हर सभ्य राज्य ने सुरा से प्रतिबन्ध हटा लिया है – गुजरात और बिहार की गणना नासमझों में पहले से है अतः उनपर फ़र्क नहीं पड़ता| सरकारी कोषागार में धन धान्य की वर्षा हो रही है| यह सुरा का ही प्रताप है| कभी मंहगाई बढ़े, कर लगाए जाएँ, सुरा-रसिक कभी विरोध नहीं करते| अधिकांश तो मात्र इसलिए सुरा क्रय करते हैं कि सरकारी कोष में गुप्त दान दे सकें|

सुरा नकारात्मक भाव से ही नहीं नकारात्मक रोगों से भी मुक्ति का रामबाण माना गया है इसके औषध रूपों की महिमा आयुर्वेद में आसव और अरिष्टों के रूप में ख्यात होती है| इस समय भय, निराशा, रोग, मनोरोग, मन-व्याधि आदि का जो साम्राज्य व्याप्त है, सुरा उसे तोड़ने में नितांत सहायक है| यही कारण है कि राष्ट्र-हितैषी गृहस्थ-संत साधारण से साधारण वस्त्रों में बिना किसी मोह माया के जीवन- मृत्यु के अविनाशी काल चक्र का मर्म समझते हुए राष्ट्र कोष में गुप्त दान का पुण्य प्राप्त करते हुए सुरा का क्रय करने अवतरित हुए और लगभग विधि विधान के साथ सुरा का क्रय-अनुष्ठान संपन्न किया| अर्थशास्त्र में इस प्रकार सुराक्रय का पुण्य प्रधानमंत्री के कोश में दान देने के समकक्ष माना जाता रहा है|

सुरा को कभी भी गलत नहीं कहा जा सकता| इसका विलोप सदा ही आपराधियों द्वारा स्तरहीन सुरा के उत्पादन और अवैध बिक्री के रूप में सामने आता है| आवश्यकता उचित सेवन विधि का प्रचार करने में है| सुरा-रसिकों को गंदगी में वास न करना पड़े| उनके सुकोमल हाथों से हिंसा न हो, इसका प्रबंध हो| सुरा-रसिकों को अपनी कारों का सारथी न बनना पड़े, यही इच्छा है|

मरने वालों और नए बीमारों की संख्या पर क्या विचार किया जाए, यह व्यर्थ लगता है|

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विश्व-बंदी ४ मई


उपशीर्षक – कैद से छूटे कुत्ते बिल्ली

मुझे कोई सभ्य तुलना समझ नहीं आ रही| तालाबंदी का सरकारी ताला अभी ढीला ही हुआ कि दिल्ली वाले सड़कों पर ऐसे निकले हैं जैसे कई दिन के भूखे कुत्ते बिल्ली शिकार पर निकले हों| जिसे जो हाथ लगा मूँह पर लपेट लिया – रूमाल, मफ़लर, दुप्पटा, अंगौछा, तहमद, लूँगी| कुछ ने तो अपने दो-पहिया चौ-पहिया को धोने नहलाने की जरूरत भी नहीं समझी| शराब के आशिकों की भीड़ का क्या कहना – लगता था कि इस ज़िन्दगी का आख़िरी मौका हाथ ने नहीं जाने देना चाहते|

करोना भी बोला होगा – गधों, सरकार थक गई है तुमसे, इसलिए लॉक डाउन कम किया हैं| मगर मैं नहीं थका – मेरा काम चालू है|

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस समय करोना के मौजूदा मरीज़ों का चौथाई पिछले तीन दिन में आया है| साथ ही करोना के मौजूदा मरीज़ों का एक-तिहाई दिल्ली-मुंबई और आधा बड़े नामी शहरों से आता है|

ख़बरों में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का बयान छपा है, जो बहुत चिंताजनक तस्वीर हमारी पढ़ी-लिखी नासमझ जनता के बारे में पेश करता है| उनके बयान से कोई भी कह सकता है कि:

  • अन्तराष्ट्रीय यात्रियों की बड़ी संख्या बड़े शहरों से है और उनकी मुख्य भूमिका बीमारी फ़ैलाने में रही है|
  • ग्रामीण भारत अधिक अनुशाषित व्यवहार कर रहा है| बड़े शहरों में ठीक से लॉक डाउन का पालन नहीं किया गया|
  • मजूदूरों को और उनसे शायद कोई ख़तरा नहीं, क्योंकि विदेश से आने वालों से उनका संपर्क बहुत कम होता है|

भले ही सरकार से कितनी भी कमियां रहीं हो मगर जनता ने सरकार के प्रयासों को पूरा नुक्सान पहुँचाया है| इसमें सरकार समर्थकों का प्रदर्शन सबसे ख़राब रहा – जब उन्होंने ढोल नगाड़ों के साथ साड़ों पर नाच गाना किया बाद में आतिशबाजी की| अपने समर्थकों से प्रधानमंत्री की निराशा तो उनके पिछले दो महीने के उनके भाषणों में भी झाँकती नज़र आती है|

इस बीच सरकार को घर लौटते प्रवासी मजदूरों से किराया वसूलने के मुद्दे पर व्यापक जन-आलोचना का सामना करना पड़ा है और वह बात घुमाने में लगी है|

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