विश्व-बंदी ११ मई


उपशीर्षक – मौत का मार्ग

हमेशा से पक्का विचार रहा है है कि मजदूर किसान को सड़क या सार्वजनिक जगहों पर नज़र नहीं आना चाहिए| वास्तव में, इनको दिन में नज़र ही नहीं आना चाहिए| पहले ज़माने में निपट मजदूरों के एक तबके को फटा हुआ बाँस लेकर चलना होता था जो इंसानों को बताता कि फलां तबके का मजदूर आ रहा है| उस व्यवस्था की निंदा होनी चाहिए| उन्हें दिन में निकलने की जरूरत ही क्या थी?

चलिए महान राज्य आ गया है| सरकार ने आदेश दिया है – श्रमिकों को  सड़क और पटरियों पर चलने से रोकें| कितनी मज़ेदार बात है| माफ़ कीजिए – सरकार ट्रेन चला दी हैं – मजदूर अब घर जा सकते हैं| यह अलग बात है कि श्रमिक स्पेशल ट्रेन के लिए भी कुछ लोगों के पास पैसे नहीं हैं और उन्हें शौक लगा है कि मरेंगे मगर पैदल ही घर पहुचेंगे|

आज से तो और भी ट्रेन चलाई गई हैं – वातानुकूलित| और अगले छः दिन की वातानुकूलित ट्रेन पहले आधा घंटे में पूरी बुक हो चुकी है| ट्रेन में न खाना, न कम्बल, न चादर – मगर लोग जा रहे हैं| और वो लोग जा रहे हैं जो लॉक डाउन हो या न हो, जहाँ हो वहीँ रुको का उपदेश दे रहे थे| यह उच्च मध्य वर्ग है – वह वर्ग जो धर्म जाति के भेदभाव के बिना देश में करोना फ़ैलाने के लिए बेहिचक जिम्मेदार है| जाने की शर्त भी तो सामान्य है – लक्षण न दिखाई दें तो चले जाइएगा|

कई लोग पूछते हैं आखिर इतने सारे सरकारी, खैराती, निजी अस्पतालों, मकानों, दुकानों और जमीन ज़ायदाद के बाद भी सरकार बहादुर ने वातानुकूलित ट्रेनों को ही एकांतवास केंद्र में क्यों बदला? यह अंदाज लगाना अब कठिन नहीं रहा| ट्रेन उन्हें हवा खाने ले जाया करेगी – सरसों के खेत, नारियल के पेड़, चम्बल को बीहड़, हिमालय के हिमयोगी सब धाम के दर्शन होंगे|

वक्त आ गया है कि वसीयतें लिख ली जाएँ – त्रियोदशी कर कर निपटा दी जाए| पितृपक्ष छोडिए – आए न आए!!

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विश्व-बंदी १० मई


उपशीर्षक – श्रमिकविरोधी पूंजीपशुवाद  

देश के कथित पूंजीवादी शासक एक एक कर लगातार श्रमिक कानूनों को रद्द कर रहे हैं| एक विधि-सलाहकार होने के नाते मैं वर्तमान कानूनों का समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस प्रकार रद्द किए जाने का स्पष्ट नुक्सान देखता हूँ| पूंजीवादी दुर्भाग्य से यह गलत कदम उस समय उठाया जा रहा है, जिस समय उद्योगों के लिए श्रमिकों की जरूरत बढ़ रही है और जिन स्थानों पर उद्योगों की भीड़ हैं वहां श्रमिकों की भारी कमी है| ऊपर से देखने में लग सकता है कि अगर ऐसे में मजदूरों को रोका जाता है तो उद्योग को लाभ होगा| परन्तु दुर्भाग्य से रूकने के लिए मजदूर हैं ही नहीं| हर बीतते हुए दिन या तो वो लौट कर अपने गाँव घर जा रहे हैं, या असुरक्षित स्तिथियों में संक्रमण का बढ़ता ख़तरा उठा रहे हैं| साथ में महामारी और मृत्यु के नृत्य को पूँजीपशुओं की मानसिकता तांडव में बदल रही है|

यह सभी कानून इस लिए गलत नहीं हैं कि यह मजदूरों को कोई खास लाभ दे रहे हैं, न इसलिए कि मजदूर संगठनों पर कमुनिस्ट का कब्ज़ा है, यह इसलिए गलत हैं कि इनको न उद्योगपति समझ पाते हैं और न श्रमिक| ये पुराने श्रमिक कानून उस तरह का धर्म हैं जिसमें समस्त निष्ठा  ईश्वर को भुला कर कर्मकाण्डों पर टिका दी गई ही| यह क़ानून सिर्फ़ नौकरशाही के कागज़ों का पुलंदा मोटा करते हैं| इनमें सुधार के लिए, इन्हें सरल, समझने योग्य, पालन योग्य बनाने की आवश्यकता थी, न कि रद्द करने की|

वर्तमान में उद्योगों के वेतनदेय क्षमता नगण्य है, साथ ही वो मजदूरों को कोई अन्य लाभ – इज्जत, सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य सुविधा या बीमा – कुछ देने के लिए न तो बाध्य हैं और न देने जा रहे हैं| पूँजीपशुओं की पूरी ताकत उन्हें गुलाम की तरह रखने में लगी हुई है| मगर गुलाम बनने के लिए आएगा कौन?

अगर मजदूरों का रोजगार प्रदाता उद्योग के आसपास रहने- खाने के बाद घर भेजने लायक बचत न हो, इज्जत न मिले और अगर उसे अपने गाँव के छोटे मोटे रोजगार में जीवन यापन संभव रहे और कम ख़तरा उठाना पड़े तो वो वापिस क्यों लौटेंगे|

हर बात का उचित लाभ भी होता है, अगर श्रमिक कानूनों के रद्द किए जाने के बाद भी यदि श्रमिक नहीं मिलते तो उद्योगों के लिए पूंजीपति के घर से दूर श्रमिक के द्वार पहुंचना होगा और महाराष्ट्र गुजरात की जगह अवध-मगध आना होगा

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विश्व-बंदी ८ मई


उपशीर्षक – लैपटॉप – तालाबंदी में अत्यावश्यक उपकरण

इस तालाबंदी के दौरान सबसे अधिक प्रयोग के बाद भी कम चर्चा में रहा है ऑफिस प्रदत्त लैपटॉप|

हर ऐसी कंपनी जिसने अपने अधिकारीयों और कर्मचारियों को लैपटॉप दिए हैं, वह इस समय सबसे अधिक सुविधाजनक स्तिथि में हैं| उनके लोग बेहतर काम कर पा रहे हैं और उनमें आपकी समूह भावना अधिक विकसित होकर उभरी है| मिलजुल कर समय पर भली प्रकार से समय पर काम कर कर दे पाना, और परिवार में शांति बहाल रखना जैसे काम इन लैपटॉप की प्रमुख उपलब्धि रहे हैं| अगर कंपनी प्रदत्त वाई-फाई भी है तो आप निश्चित ही अच्छी कंपनी के अच्छे अधिकारी/कर्मचारी हैं| बधाई|

दूसरे स्तर पर वो लोग हैं जिनके पास घर में अपना लैपटॉप या डेस्कटॉप हैं जिसे वह कार्यालय के लिए प्रयोग कर रहे हैं| इनका काम चल रहा है| परन्तु इसमें कंपनी की छवि अच्छी नहीं उभर रही है| घर में झगड़ा है कि कौन कब उपकरण का प्रयोग करेगा| समय पर काम नहीं हो पा रहा और शांति घर से गायब है|

सबसे ख़राब स्तिथि उन लोगों की है जिनके नियोक्ता ने उन्हें लैपटॉप नहीं दिया हैं और न ही उनके पास घर में समुचित संख्या में निजी लैपटॉप हैं|

यह स्तिथि उस समय भयाभय हो जाती हैं जब पति पत्नी दोनों को ऑफिस का काम करना हैं, बच्चों की भी ऑनलाइन पढाई होनी है| मोबाइल बहुत देर तक साथ नहीं दे पाता – आप न ठीक से लिख सकते हो न ठीक से बात कर सकते हो| न नियोक्ता ख़ुश, न कर्मचारी, न अधिकारी और न परिवार|

कंपनियों को समझना होगा – एक लम्बा समय ऐसा जाने वाला है जिसमें कर्मचारियों को कार्यालय में कम से कम बुलाए जाने में ही भलाई है| वरना बिना चेतावनी कभी भी चौदह दिन के लिए कार्यालय बंद करना पड़ेगा|

भले ही सरकारें श्रमिक कानूनों को रद्द करने की गलती कर रही हैं, इसे स्वीकार करना भारतीय कंपनियों के लिए बहुत नुक्सानदेह होने जा रहा है – जैसे १९५०-१९९० तक का संरक्षणवाद| देश का सबसे बड़ा आर्थिक सम्पदा – मानव मूल्यहीन होने जा रहा है| प्रतिफल की आशा करना त्रुटि होगी|

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