विश्व-बंदी ३० अप्रैल


उपशीर्षक – वेतन कटौती का दिन

कोई  भी इस बार मई दिवस की शुभकामनाएं लेना देना नहीं चाहता|

इस बार किसी को वेतन का इन्तजार नहीं है, वेतन कटौती की बुरी तरह आशंका है| देश का हर अधिकारी कर्मचारी अपने मोबाइल में यह देखना चाहता है इस बार वेतन कितना कटकर आ रहा है| आज सुबह पहली चिंताजनक ख़बर यह थी की देश में १०० बड़ी कंपनियों में से २७ लम्बे समय वेतन देने की स्तिथि में नहीं हैं| दूसरी बुरी ख़बर तीसरे पहर आ चुकी थी, रिलायंस समूह वेतन कटौती कर रहा है| यह बात अलग है कि बड़ी कंपनियों की ख़बरें निचले स्तर पर वेतन कटौती अभी दर्ज़ नहीं कर रहीं हैं|

कठनाई सूक्ष्म, लघु, और मध्यम उद्यमों, दुकानदारों और उनके करोड़ों कर्मचारियों के लिए आने जा रही है| इन उद्योगों के पास न देने ले लिए पर्याप्त आय और जमा धन पूँजी है न कोई सरकारी सहायता| इन उद्योगों ने मार्च का आधा वेतन पुरानी आय और जमा धन पूँजी से दिया गया है| इसके बाद इनमें से अधिकतर उद्योगों की अप्रेल माह का पूरा वेतन देने की स्तिथि नहीं हैं| इनके कर्मचारी अघोषित रूप से बेरोजगार हैं ही, सरकारी कानूनी परिभाषा के परे अधिकतर सूक्ष्म और लघु उद्यमों के मालिक भी बेरोजगार की श्रेणी में हैं| लॉक डाउन को समर्थन देने से बाद भी यह कहना होगा कि अगर लॉक डाउन मई में जारी रहता है तो मध्यम उद्योग भी वेतन देने में अक्षम होंगे|

सरकार को यह गणना नहीं करनी कि उसे बीमारी से जीवन बचाना है या गिरती अर्थव्यवस्था से, बल्कि  यह गणना करनी है कि बीमारी से जीवन बचाने के लिए कितना खर्च उठा सकती है और कब तक| उतने दिन के भीतर बीमारी को काबू करना है और उसके बाद ही अर्थव्यवस्था को खोलना है|

निश्चित रूप से शुद्ध ग्रीन जोन में अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रूप से खोला जा सकता है| कठिनाई यह भी है कि पिछले बीस वर्ष की सरकारी अनीतियों के कारण देश की अर्थव्यवस्था कुछ खास बड़े शहरों के आगे पीछे घुमने लगी है| इसे यथासंभव रूप से शीघ्रतापूर्वक विकेन्द्रीयकृत करना होगा| परन्तु फिलहाल कुछ तो शुरू हो मगर जीवन से बिना समझौता किए और बीमारी से बिना हार माने|

अंत में इतना और कहूँगा, सच है या नहीं परन्तु बहुत से पूंजीपति अर्थव्यवस्था को जल्दी खुलवाने के लिए दबाब की नीति के रूप में भी प्रयोग करने की कोशिश कर सकते हैं, ऐसी आशंकाएं सामने आई हैं|

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विश्व-बंदी २८ अप्रैल


उपशीर्षक – करोना काल का भोजन उत्सव

ग़लतफ़हमी है कि धर्म भारतियों को जोड़ता और लड़ाता है| हमारी पहली शिकायत दूसरों से भोजन को लेकर होती है| इसी तरह भोजन हमें जोड़ता भी है| करोना काल में भारतीयों को भोजन सर्वाधिक जोड़ रहा है| यहाँ तक कि रोज़ेदार भी भोजन और पाक-विधियों पर चर्चा में मशगूल हैं| पारिवारिक समूहों से लेकर मित्रों के समूह तक पाक विधियों की चर्चा है|

मैं परिवार में भोजन रसिक के रूप में जाना जाता हूँ, परन्तु इस समय देखता हूँ कि जिन्हें बैंगन पुलाव और बैगन बिरियानी का अंतर नहीं पता वह भी उबला-बैंगन बिरियानी और भुना-बैंगन बिरियानी के अंतर पर चिंतन कर रहे हैं| जिसे देखिये नई विधियाँ खोज रहा है और पारिवारिक और निजी स्वाद के अनुसार|

अभी पिछले सप्ताह परवल की चटनी बनाई थी तो मित्रों, सम्बन्धियों और रिश्तेदारों ने उसके तीन अलग अलग परिवर्धित संस्करण बनाकर उनके चित्र प्रस्तुत कर दिए| मैं गलत हो सकता हूँ, मगर स्वाद के हिसाब से लॉक डाउन के पहले ७-१० दिन साधारण घरेलू खाने के रहे, उसके बाद नए नाश्तों ने ७-१० दिन रसोई सजाई| उसके बाद भारतीय रसोइयों में दोपहर और शाम के पकवानों की धूम मची – मुगलई, पंजाबी, कायस्थ, लखनवी, बंगाली, उड़िया, गुजरती, मराठी, बिहारी, आन्ध्र, उडुपी, चेत्तिनाड, केरल, आदि अलग अलग पाक परम्पराओं को खोजा और समझा गया है| मगर गूगल बाबा जरूर सही जानकारी दे पाएंगे| अगर कोई सही दिशा निर्देशक जनता को सर्व-भारतीय पाक विधियों के बारे में बताने लगे तो राष्ट्रीय एकता को मजबूत होने में एक अधिक समय नहीं लगे| अब हम मिठाइयों की और बढ़ रहे हैं| मैं अगले महीने इटालियन, मेक्सिकन, थाई, जापानी आदि पाक-विधियों के भारत में प्रयोग की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकता|

भोजन प्रेमी भारतीयों के लिए सबसे बड़ी कठिनाई पाक सामिग्री की कम उपलब्धता है तो सबसे बड़ा प्रेरक भी यही है – उपलब्ध सामिग्री के नए नवेले प्रयोग, नए स्वाद, नया आपसी रिश्ता|

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विश्व-बंदी २७ अप्रैल


उपशीर्षक – प्रकृति का पुनर्निर्माण

करोना के फैलाव के साथ साथ प्रकृति का विजयघोष स्पष्ट रूप से सुना गया है| दुनिया में हर व्यक्ति इसे अनुभव कर रहा है| सबसे बड़ी घोषणा प्रकृति ने ओज़ोनसुरक्षाकवच का पुनर्निर्माण के साथ की है| दुर्भाग्य से मानवता अभी भी प्रकृति के विजयघोष पर गंभीर नहीं है| अगर वर्ष २०२० में मानवता डायनासोर की तरह प्रकृति विलुप्ति का आदेश दे दे तो शायद पृथ्वी के नए सम्राट शायद १० लाख साल बाद मूर्ख मानवों की आत्मविलुप्ति को सहज ही पढ़ा रहे होंगे| यह ठीक वैसा ही है जैसे हम डायनासोर की विलुप्ति पढ़ते हैं| आज हम प्रकृति की यह चेतावनी स्पष्ट सुन सकते हैं: अगर मानव नहीं सुधरे तो पृथ्वी पर सबसे कब समय तक विचरण करने वाली प्राणी प्रजाति में मानव की गिनती की जाएगी|

ओज़ोन सुरक्षा कवच में अभी और भी छेद हैं और यह वाला सुराख़ इसी साल देखा गया था और इसे भरने में प्रकृति को मात्र दो या तीन महीने लगे| यह कार्य शायद करोना जन्य लॉक डाउन के कारण जल्दी संपन्न हो गया| इसके बनने और बिगड़ने का कारण जो भी रहा हो, दोनों घटना प्रकृति का स्पष्ट शक्ति प्रदर्शन हैं| यदि मानव अपनी बिगड़ीं हरकतें करने से कुछ और दिन रोका जा सका तो प्रकृति चाहे तो शेष ओज़ोन सुरक्षा कवच की मरम्मत भी कर सकती है|

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों की बैठक के बाद यह स्पष्ट लगता है कि लॉकडाउन प्रतीकात्मक ढील के साथ बढ़ने जा रहा है| शहरी मध्यवर्ग आर्थिक दबाब के बाद भी डरा हुआ है और मुझे नहीं लगता कि स्तिथि जल्दी सामान्य होगी| गाँव और वन क्षेत्र को कदाचित इतनी चिंता न हो या फिर उनपर दबाब बहुत अधिक होगा| किसी मामूली इलाज के लिए भी अस्पताल जाने से लोग बचना पसंद करेंगे| इसका कारण मात्र भय नहीं बल्कि अस्पतालों को करोना के प्रति ध्यान केन्द्रित करने की भावना है| आश्चर्यजनक रूप से लोग अस्पतालों की कम जरूरत महसूस कर रहे हैं| स्वस्थ पर्यावरण, समुचित शारीरिक व मानसिक आराम और घर का ताजा खाना अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी बनकर उभरे हैं|

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