राष्ट्रीय और मानवीय विकास के नाम पर बारह-बीस घंटे काम करने की इस चर्चा में प्रभावित होने वाली सबसे पहली इकाई कोई ‘तुम’ या ‘वह’ नहीं ‘मैं’ है। यहाँ कर्मभूमि में बलिदान होने के लिए भगत सिंह पड़ोसी के घर से नहीं आ रहा। क्या ‘मैं’ चौबीस घंटे काम करने की स्थिति में हूँ?
हमें अपने ‘मैं’ को कतई कमतर नहीं आंकना चाहिए परंतु शारीरिक क्षमता क्या है?
विशेष व्यक्तित्वों के सच झूठ की बात नहीं है पर सामान्य जीवन जीने के लिए मनुष्य को लगभग आठ घंटे बिस्तर पर सोते और आराम करते हुए होना चाहिए। उसके बाद अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं के लिए लगभग दो घंटा निजी समय चाहिए। क्या हमने शौच, स्नान ध्यान व्यायाम आदि के लिए दो घंटे नहीं चाहिए?
जैविक और मानवीय आवश्यकता किसी भी राष्ट्रीय और मानवीय आवश्यकता से बड़ी हैं। यदि मानव नहीं होगा तो न राज्य होगा, न राष्ट्र और न धर्म। ध्यान रहे, सरकारी, धार्मिक, या आर्थिक प्रोपेगंडा इतर वास्तविक धरातल पर इस समय में ऐसी कोई प्रलयकारी स्थिति मानवता, राष्ट्र और धर्म के सामने नहीं है कि मानवीय जीवन को हाशिए पर डाल दिया जाए। मानव की जैविक और मानवीय पहली आवश्यकता शुद्ध सहज शब्दों में भोजन और यौन संबंधी आवश्यकता हैं। इनके पूरा न होने पर मानव स्वस्थ्य रहकर काम नहीं कर सकता। वह न गृहस्थ आश्रम का पालन नहीं कर सकता, पितृ ऋण नहीं चुका सकता। हमारे समय की अधिकांश मानवीय समस्याएँ इन्हीं दो आवश्यकताओं के समुचित, समन्वित और संतुलित रूप से पूरा न होने के कारण पैदा होती हैं। जिनके बाद अन्य शारीरिक और मानसिक विकारों का स्थान है।
इस प्रकार एक मनुष्य के लिए नितांत प्राकृतिक और जैविक आवश्यकताओं के बाद बारह घंटे से अधिक का समय नहीं बचता। यदि कोई भी व्यक्ति इन बारह घंटे से अधिक काम कर रहा है तो वह कर्मलोभी या कर्मलती तो हो सकता है कर्म योगी नहीं। कर्म योगी वह विशिष्ट व्यक्ति है जो पूरे ध्यान, मन कर्म वचन के साथ अपने काम को करता है। यह आवश्यक नहीं कर्म योगी बारह-बास घंटे काम करे।
आप इन बारह घंटे रोजाना काम कर सकते हैं परंतु यह सामाजिक संबंधों की कीमत पर होगा और इससे भी अधिक यह किसी भी व्यक्ति के अपनी संतान और माता-पिता के साथ सम्बन्धों की कीमत पर भी होगा। मेरी चिंता संतान है जो भले ही हमें माता-पिता का भविष्य नजर आतीं हैं परंतु वास्तव में देश और मानवता का भविष्य अधिक होती हैं। कोई संतान माता पिता के लिए कितनी ही कुसंतान हो, परंतु यदि उसका लालन पोषण शिक्षा दीक्षा सही रही तो वह मानवता, राष्ट्र और धर्म के लिए कुछ न कुछ सकारात्मक योगदान अवश्य देती है। राष्ट्र का वर्तमान नहीं राष्ट्र की संतानों का सामुहिक विकास ही राष्ट्र का भविष्य तय करता है। इसलिए हमें हर नागरिक के द्वारा अपनी संतान को दिए जाने वाले स्तरीय समय को सुनिश्चित करना ही चाहिए।
मुझे लगता है की कोई भी माँ-बाप मिलकर सोलह घंटे से अधिक काम करते हैं तो वह उनकी संतान और राष्ट्र के भविष्य के लिए उचित नहीं है।
यदि हम प्रति व्यक्ति आठ घंटे से अधिक काम पर जोर देते हैं तो वास्तव में प्रति युगल (पत्नी-पति) के सोलह घंटे काम के बदले प्रति युगल मात्र बारह घंटे काम को चुनते हैं। सामान्य सामाजिक पर्यवेक्षण से यह बहुत स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ को जैविक, मानवीय और सामाजिक दबावों के कारण संतान का भविष्य सँवारने पर अधिक ध्यान देना होता है। यदि हम स्त्रियों से आठ घंटे से अधिक काम का दबाव बनाते हैं तो वास्तव में हम उनकी प्रतिभा और श्रम से राष्ट्र और मानवता को वंचित कर रहे होते हैं। वह नौकरियाँ छोड़ देने के लिए विवश हो जातीं हैं। यह भी ध्यान रहे कि आठ घंटे के काम और दो-चार घंटे के आवागमन के समय के बाद वास्तव में सही प्रकार से जीवन शैली को बनाकर रखना कठिन होता है। साथ ही कार्यालय में थके मांदे लोग पूरा समय काम को नहीं दे पाते। वास्तव में हमें छह-आठ घंटे के स्तरीय और उचित कोटि का कार्य समय चुनना चाहिए। ऐसा कहते समय मैं कार्यालय के लिए होने वाले आवागमन समय को आठ घंटे की समय सीमा में रखूँगा। हो सके तो हमें घर से कार्य के तरीके को बढ़ाना चाहिए।

