अंधेर नगरी, चौपट सरकार| कितनी कच्ची इनकी धार||


 

 

ट्विट्टर पर पिछले कई महीनो से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चर्चा देखी जा रही है| हमारी सरकार द्वारा पिछले कुछ दिनों में लगाए गए दुर्भाग्यपूर्ण प्रतिबंधों ने इस चर्चा को एक व्यापक आयाम दे दिया है|

जब भी मई स्वतंत्र दृष्टिकोण से इन सामाजिक माध्यमों को देखने का प्रयास करता हूँ तो बचपन के दिनों को चाय/पान की दुकानें बहुत याद आती है| [i] माताजी कभी भी इन दुकानों पर हमें नहीं जाने देती थी| मोहल्ले के कई घरों में जब कोई नाते रिश्तेदार आने वाला होता तो घर के लडको को विशेष हिदायत दे दी जाती कि वो इन मनहूस जगहों पर खड़े न हुआ करें| कारण सामान्य था, इन दुकानों पर बेरोजगार और सड़क छाप सज्जन ही पाए जाते थे| अपना जीवन तो राम भरोसे होता था मगर राजीव गाँधी को देश चलाने की सभी सलाहे ये दे सकते थे| लड़किया छेड़ना इन सभी लोंगो का प्रिय शगल था जो महिलाओं, बुजुर्गो से लेकर सज्जन अधेड़ो तक विस्तारित हो जाता था|

परन्तु, महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि जब भी कोई नए स्थापित कवि, लेखक, विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता, क्रांतिकारी, आंदोलनकारी नगर भ्रमण पर निकलते, इन पान और चाय की दुकानों पर अवश्य ही विचार विनिमय करते| एक महत्वपूर्ण बिन्दु यह भी है कि इन सभी सम्मानित बुद्धिजीवी विचारकों को अपने नगरों में चाय की दुकानों प नहीं वरन काफी हॉउस में विचार विनिमय करने की आदत थी|

अब सूचना क्रांति का समय है| पान, चाय और काफी हॉउस की जगह पर फ़ेसबुक,[ii] ट्विट्टर और ब्लॉग ने ले ली है| [iii] इस समय सभी विचारकगण [iv] प्रायः ब्लॉग पर पाए जाते है और कुछ कुछ पलों के बाद ट्विट्टर पर भ्रमण कर लेते है, इन सभी प्रथम श्रेणी विचारकों के फ़ेसबुक पृष्ठ उसी प्रकार से बने हुए है जैसी उस समय पान कि दुकानों पर इनकी विशेष सभा होती थी या अपनी सामाजिक पकड़ नापने के लिए इनका प्रातः भ्रमण होता था| इसी प्रकार से द्वितीय श्रेणी के विचारक ट्विट्टर पर चहकते है और फ़ेसबुक पर महकते है| फ़ेसबुक की स्तिथि सामाजिक नौसिखियों का है, जहाँ आप किसी को, उसके फोटो और कथा को बस पसंद कर सकते है|

अब स्तिथि यह है की सामाजिक सूचना क्रांति के बाद हम सभी को यह सामाजिक माध्यम अतिरिक्त आसानी से उपलब्ध है तो देश और समाज के दुश्मनों को भी| आज यहाँ सूचना तंत्र का प्रयोग प्रोपेगंडा में भी हो रहा है साधारण सूचना उपयोक्ता को पता ही नहीं चलता कि यह सूचना है या प्रोपेगंडा| सूचना का यह युद्ध दो मोर्चो पर है: आंतरिक राजनीति का घमासान और विश्व राजनीतिक परिदृश्य| दोनों के बीच में हानि राष्ट्र की सर्वाधिक हो रही है|

पहले आंतरिक स्तिथि की चर्चा करते हैं| आज देश में स्पष्ट रूप से एक नाकामयाब सरकार और अस्तित्व विहीन विपक्ष है| जनलोकपाल आन्दोलन का राजनीतिक रूप अभी स्पष्ट नहीं है| राजनीतिक विचार शून्यता इस स्तिथि तक है की सत्ता और विपक्ष दोनों संसद में बहस आदि से बच रहे हैं| जनता के बीच सरोकार विहीन मुद्दों पर अगले चुनावों की लड़ाई ले जाने की पूरी तैयारी है| भावनात्मक मुद्दे मुख्य माध्यमों से लेकर समिक माध्यमों तक चर्चा का विषय हैं| पिछले कई वर्षो में भ्रष्ट्राचार के अतिरिक्त किसी अन्य आधारभूत मुद्दे पर चर्चा नहीं हो रही, और दुर्भाग्य से यह चर्चा भी राजनीतिक और विधियिक नहीं रही है और इसका स्वरुप भावनात्मक अधिक रहा है| अन्य भावनात्मक मुद्दों को देश की राजनीति भुना रही है| व्यक्तिगत प्रहार, अभद्र भाषा, अपुष्ट सूचना आदि को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सूचना की आजादी का नाम नहीं दिया जा सकता| कई बार कहा जाता है कि प्रेम और जंग में सब जायज है| राजनीति न प्रेम है न जंग| सभी राजनीतिक और वैचारिक मतभेद और उनपर होने वाली बहसें संघर्ष है युद्ध नहीं| मुझे लगता है कि साधारण संघर्ष ही नहीं वरन गीता और गाँधी के उपदेशो के सहारे गए बड़े बड़े संघर्ष भी सच्चाई और माध्यम की पवित्रता और उद्देश्य की स्पष्टता के कारण जीते गए है|

सामाजिक माध्यम में दुष्प्रचार का अंतहीन सिलसिला है| बर्मा में नरसंहार, असम के महादंगे, से लेकर निर्मल बाबा तक के नाम पर दुष्प्रचार हो रहा है| फ़ेसबुक पर देखने को मिला कि निर्मल बाबा हिन्दू है इसलिए गिरफ्तार कर लिया मुसलमान को नहीं करते| जिन सज्जन ने इस प्रोपेगंडा को शेयर किया था मैंने उनसे कहा कि जो हिन्दू को बेवकूफ बना रहा था उसे गिरफ्तार कर लेते है और मुसलमान को बेवकूफ बनाने वाले को छोड़ देते है क्योकि वो शायद पाकिस्तानी दामाद होता है| मेरे तात्पर्य है कि आप सही गलत देखे जाति धर्म नहीं| ये सज्जन तो बात समझ गए मगर किस किस को समझाये|

अब ज़रा विश्व परिदृश्य को देखें| पहले एक पुरानी बात, “जब दोस्त आपके मुकाबिले नाकामयाब होता है तो दुःख होता है और जब दोस्त आपके मुकाबिले अधिक कामयाब होता है तो बहुत ज्यादा दुःख होता है”|  दोस्त का अगर ये हाल है तो दुश्मन की बात क्या की जाये| आज दुनियां भर में चर्चा है कि भारतीय जनता स्रोत का पता किये बिना हल्ला मचा देती है| एक बारगी ठीक है कि किसी ऐसे अखबार या ट्विट्टर हेंडल जो जाना पहचाना हो, से कोई खबर आये तो चलो कोई बात भी की जाए| हालात ये है की बस आपको नाम पसंद आना चाहिए बस उस पर भरोसा कर लेते है| अगर आज पाकिस्तान की कोई संस्था या कोई साधारण पाकिस्तानी किसी हिन्दू देवी देवता या संस्था के नाम पर ट्वीट करना शुरू कर दे और कुछ दिन मीठी मीठी बाते लिख दे, देश के सारे हिन्दू उसकी बात पर तन मन धन रोटी बेटी दे बैठते है| यही बात भारतीय मुस्लिम और अन्य समुदाय पर लागू है|

शर्म की बात है कि देश में एक हाई स्कूल फेल लड़का फेसबुक पर एक नकली फोटो डालता है और देश भर के मुसलमान “इस्लाम खतरे में है” चिल्लाने लगते है| [v] देश भर के हिन्दू भी बस असम के दंगो पर हल्ला मचाये है, भाई बोडो का झगडा किस से नहीं है मारवाड़ी, मुस्लिम या और स्थानीय जातियाँ|

कोई धार्मिक दंगा नहीं था वहाँ| मूल मुद्दे की जगह दुसरे मुद्दे पर बहस हो रही है, वो मारा वो काटा| भाई, मानता हूँ बंगलादेशी बड़ा मुद्दा है पर सही से बहस कीजिये| बात होगी तो हल भी निकलेगा|

आज दुनिया हँस रही है देखिये इन पांच हजार साल के विश्व गुरूओं को, आपस में बात करने का सलीका नहीं|

और हमारी सरकार, क्या कहें; जब हमने चुनी है तो हम से बढ़िया तो हो ही नहीं सकती न| जैसे पहले राजतन्त्र के समय कहते थे, यथा राजा, तथा प्रजा| आज लोकतंत्र में यथा प्रजा तथा प्रधानमंत्री तो होना ही चाहिए| समय पर बोलेंगे नहीं, निर्णय ले नहीं सकते, जब कुछ करना हो तो होश खो देंगे जोश पर उतर आयेंगे| और जो गलत बोल रहा है, उससे कुछ मत बोलो बस माध्यम को बंद कर दो| हर किसी को पता है, आज सामाजिक माध्यम में आप पांच मिनिट में नए नाम से अपना काम करना शुरू कर सकते है| सरकार को चाहिए यह था कि कुछ ऐसे लोगो को चिन्हित करती जो अफवाहें फैला रहे है और उन्हें थाने में बिठा लेती| ट्विट्टर और फेसबुक पर इन लोगों को चिन्हित करना कठिन नहीं है, पुलिस को केवल इतना पता करना है कि किस इंटरनेट प्रोटोकॉल से ये गलत सन्देश आ रहे है| मजे की बात तो यह है कि प्रतिबंधित किये गए कई नामों को तो सरकार के महानुभाव लोग रोज मिलते है जैसे कंचन गुप्ता और शिव अरूर| पर लगता है कि सरकार की नीयत कुछ और थी|

सरकार द्वारा लगाये गए प्रतिबन्ध में कई खामियां और अव्यवहारिक बाते हैं| पहला तो मोबाइल पर सन्देश भेजने की संख्या पर लगा प्रतिबन्ध| मूलतः एक दिन में किसी को भी २०० सन्देश भेजने की अनुमति थी| इसे घटा कर पांच कर दिया गया| यद्यपि, यह प्रतिबन्ध उठा लिया गया है परन्तु सरकार ने मजाक को आम जनता तक पहुँचा दिया| अफवाह फ़ैलाने वाले दो सौ लोगो को सन्देश नहीं भेजते वरन उस चिन्हित समूह को भेजते है जो उसे आगे फैला दे| एक प्रमुख प्रश्न यह भी है क्या मोबाइल आने से पहले अफवाहें नहीं फैलती थी? और उस समय सरकार कैसे उस का मुकाबला करती थी? अलीगढ में मैंने देखा है कि अधिकारी समझदार लोंगो की बैठक बुला कर उन्हें तथ्यों से अबगत करते थे और उनसे आग्रह करते थे कि इन बातों को जनता में फैलाए| अलीगढ में हर चौराहे पर ध्वनिविस्तारकों के माध्यम से पुलिस तथ्य बताती थी और गाने भी सुनाये जाते थे| आज इन्टरनेट, टी वी  और एफ एम् रेडियो इस सुविधाओं के बाद भी सरकार कुछ विशेष प्रकार के नाकारा कदम क्यों उठा रही है?

जिस देश में सरकार के पास भारी भरकम पत्र सूचना कार्यालय, जन सम्पर्क निदेशालय, दूरदर्शन, आकाशवाणी, कई सारे मंत्रियो और विभागों के ट्विट्टर खाते और फेसबुक पृष्ठ हों, उस देश में सरकार की ओर से ऐसे कदम वाकई भद्दा मजाक हैं|

अंधेर नगरी, चौपट सरकार|


[i] दादाजी अगर होते तो शायद गाँव की चौपाल को याद कर लेते|

[ii] मेरे विचार से फेसबुक प्रोफाइल और फ़ेसबुक पेज दो भिन्न स्तिथि है. पहला नेटवर्किंग है दूसरा सोशल मीडिया|

[iii] स्पष्ट है कि इंडिया काफी हॉउस के बंद होने के पीछे किस विदेशी ताकत का हाथ है|

[iv] विचारकगणिका लिखने सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है,क्योकि गणिका शब्द का अर्थ गलत लोगो ने गलत किया है वरन सम्मानित स्त्रियों के लिए इसे प्रयुक्त होना चाहिए था|

दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012


हमारे देश के शौचालय से अधिक मोबाइल फोन है.

ब्लैकबेरी की हानि अपने कौमार्य की हानि से भी बड़ा मुद्दा है.

यह और अन्य मोबाइल संबंधित चुटकुले हमारे तेजी से बदलते जीवन शैली में मोबाइल के बढ़ते महत्व की बड़ी कहानी बताते है|

मोबाइल के बढ़ते प्रयोग

आधुनिक मोबाइल पोस्ट कार्ड (लघु संदेश), कलाई घड़ियों, मेज घड़ी (सुबह अलार्म), रेडियो, व्यक्तिगत कंप्यूटर, गणक (calculators), ई-किताब पाठक, कैलेंडर, निजी डायरी, नक्शे, स्कैनर, रिकार्डर, संगीत उपकरणों, कैमरा, वीडियो गेम और  कई अन्य उपकरणों और साधनों की जगह ले रहा है| ऑस्ट्रेलिया में एक ही विज्ञापन में उपयोगकर्ता अपनी प्रेमिका के मोबाइल में डालकर जेब में लेकर घूमते दिखाया गया है (मैंने इस विज्ञापन यौनाचार और नैतिकता की दृष्टि से गलत पाया)| परन्तु यह सभी, हमारे जीवन में इस मोबाइल के बढते महत्व को दर्शाता है|

हमारे मोबाइल पर अधिसंख्य सेवाएं मुफ्त है; परन्तु हम सभी को मोबाइल का मूल उपयोग कभी नहीं भूलना चाहिए| यह निसंदेह दूरसंचार है| दूरसंचार ऑपरेटर द्वारा प्रदान की गई सेवायें यह हमारी जेब के लिए सबसे अधिक लागत लेकर आती है| जाहिर है, जहाँ सेवाएं है वहाँ नियमित रूप से उपभोक्ता द्वारा इन सेवाओं से संबंधित शिकायतों भी हैं| भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने इन सेवाओं से संबंधित उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा के लिए दूरसंचार उपभोक्ताओं के संरक्षण विनियम, 2012 को जारी किया हैं. यह विनियम सामान्य उपभोक्ता संरक्षण कानून के अलावा हैं|

यह विनियम मोबाइल कनेक्शन के  प्रारंभिक – किट और योजना वाउचर को स्पष्ट रूप से अलग करते हैं| प्रारंभिक अप किट केवल एक नया मोबाइल कनेक्शन सिम, एक मोबाइल संख्या और कुछ विवरण प्रदान करेंगे| प्रारंभिक किट के अतिरिक्त तीन प्रकार के वाउचर, अर्थात् – (क) योजना वाउचर, (ख) टॉप अप वाउचर और (ग) विशेष टैरिफ वाउचर होंगे| इन तीन वाउचर क्रमशः लाल, हरे और पीले रंग बैंड में होगा|

योजना वाउचर कोई भी मौद्रिक मूल्य उपलब्ध कराये बिना किसी एक विशेष टैरिफ योजना में एक उपभोक्ता सेवा में सम्लित करते है| टॉप – अप वाउचर भारतीय रुपए में व्यक्त एक मौद्रिक मूल्य को प्रदान करते है और इनकी कोई वैधता अवधि या अन्य उपयोग नहीं होगा| इनके अतिरिक्त एक विशेष टैरिफ वाउचर होगा, जो स्पष्ट रूप से योजना विशेष जिसपर यह लागू है तथा विशेष दर और इन दरों की वैधता अवधि आदि को इंगित करेगा|

किसी भी योजना के चालू होने और टॉप – अप वाउचर से प्रयोग होने पर प्रदाता द्वारा उपभोक्ता को एक एसएमएस भेजना होगा| योजना वाउचर को सक्रिय करते समय एसएमएस से इस वाउचर के योजना का शीर्षक बताया जायेगा| दूसरी ओर, टॉप – अप वाउचर के सक्रियण के पर भुगतान में ली गयी राशि, प्रकिया राशि, कर तथा उपलब्ध मौद्रिक राशि आदि की जानकारी देगा|

प्रत्येक कॉल के बाद एसएमएस के द्वारा कॉल अवधि, भुगतान राशि, बकाया राशि तथा विशिष्ट टेरिफ वाउचर के मामले में, प्रयुक्त मिनिट और बकाया मिनिट बताएगा| डाटा प्रयोग के मामले में, प्रत्येक सत्र के बाद एक एसएमएस प्रयोग किये गए डाटा, भुगतान राशि और बकाया राशि के बारे में बताएगा| किसी अन्य मूल्य वर्धक सेवा की स्तिथि में एसएम्एस भुगतान राशि, उसके काटे जाने का कारण, बकाया राशि और बकाया समय के बारे में जानकारी देगा|

उपभोक्ता अब रुपये 50/-  एक नाममात्र कीमत पर के अपने पिछले उपयोग के सभी विवरण की मांग कर सकते हैं| इसमें सभी कॉल का मद बार विवरण, एसएमएस की संख्या, भुगतान राशि, मूल्य वर्धक सेवाएं, प्रीमियम सेवाएँ, और रो़मिंग आदि का विवरण दिया जायेगा| ध्यान देने की बात यह है कि उपभोक्ता पिछले छः महीने का ही विवरण विवरण मांग सकते है|

टोल फ्री शॉर्ट कोड के प्रावधान करने से उपभोक्ता, एसएमएस के माध्यम से टैरिफ की योजना के बारे में जानकारी, उपलब्ध संतुलन और मूल्य वर्धित सेवाएं सक्रिय करने के आदि के लिए सक्षम होगा|

उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास
उपभोक्ता संरक्षण के लिए बढ़ते प्रयास

किसी प्रीमियम दर सेवाओं की सक्रियता से पहले, अंग्रेजी या क्षेत्रीय भाषा में बोलकर एक चेतावनी दी जायेगी|

इसके अलावा, उपभोक्ताओं की शिकायत निवारण के लिए, ट्राई ने दूरसंचार उपभोक्ताओं के शिकायत निवारण विनियम, 2012 भी जारी किए हैं| इसके अनुसार, हर सेवा प्रदाता को शिकायत के निवारण के लिए और सेवा अनुरोध के समाधान के लिए एक शिकायत केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है| सेवा प्रदाता के द्वारा ग्राहक सेवा के लिए एक मुफ्त नंबर दिया जाएगा| इसके अतिरिक्त अन्य जाकारी करने के लिए एक सामान्य जानकारी नंबर होगा जिसे शॉर्ट कोड से भी प्रयोग किया जा सकेगा| हर सेवा प्रदाता भी एक वेब आधारित शिकायत निगरानी प्रणाली की स्थापना करेगा|

हर शिकायत केंद्र में, डॉकेट संख्या हर शिकायत के लिए आवंटित किया जाएगा और यह एसएमएस के माध्यम से शिकायतकर्ता को भेजा जाएगा| कार्रवाई के पूरा होने पर भी शिकायतकर्ता को एसएमएस मिल जाएगा| शिकायतकर्ता को शिकायत केंद्र के खिलाफ एक अपीलीय प्राधिकारी को अपील करने का अधिकार दिया गया है|
हर सेवा प्रदाता एक नागरिक अधिकार पत्र तैयार करेगा|

विधायिका को विधेयक न दे कोई ! जनता रोई !!


गुरुवार प्रातः इकोनोमिक्स टाइम्स में खबर दी थी कि सरकार में भारतीय जनता पार्टी के दबाब में आकर कंपनी विधेयक २०११ को एक बार फिर से स्थायी समिति को भेज दिया गया है| कंपनी विधेयक सदन और समिति के बीच कई वर्षों से धक्के खा रहा है| आर्थिक सुधारों का जो बीड़ा पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव जी ने उठाया था वह इस समय खोखली राजनितिक अवसरवादिता के कारण दम तोड़ रहा है|  पिछले कई वर्षों से हम देख रहे है कि हमारी सरकार नए कंपनी क़ानून की बातें करतीं रहतीं है परन्तु उन्हें मूर्त रूप देने में असमर्थ रहती है| जब हम सरकार की बात करते है तब हम किसी दलगत सरकार की बात नहीं कर रहे वरन पिछले बीस वर्षों में सत्ताधारी सभी दलों की बात करते है; भले ही वह कांग्रेस, जनता दल, भाजपा, वामपंथी कोई भी हों| अफ़सोस की बात है कि संसद में बैठे लोग संसद के प्रमुख कार्य, विधि-निर्माण और कार्यपालिका नियंत्रण के स्थान पर शोरगुल, हल्लाबोल, कूदफांद आदि कार्यों में व्यस्त हैं| दुखद बात है कि हमारे राजनीतिज्ञ संसद को राजनितिक उठा पटक का अखाड़ा समझ रहे हैं और संसद के पवित्र गलियारा  सड़क की गन्दी राजनीति की चौपाल भर बन कर रहा गया है|

 

 

पिछले एक वर्ष से हम देख रहे है कि देश की जनता देश हित के एक क़ानून को बनबाने के लिए सड़क पर उतर आई है| आखिर क्यों?? पहले हमें कार्यपालिका के गलत आचरण, दु-शासन, क़ानून सम्मत अधिकारों के लिए ही सड़क पर आती थी और अधिकतर आंदोलन सत्ता की लड़ाई ही थे| परन्तु, हमारा दुर्भाग्य है कि जनतांत्रिक देश की जनता आज अपने को जनतंत्र और उसके मुख्य स्तंभ संसद और विधान सभाओं से कटा हुआ पाती है| कार्यपालिका का भ्रष्टाचार आज विधायिका का अभिन्न अंग बन गया है और खुले आम जनता कह रही है कि अब भ्रष्टाचार की लूट में भागीदार होने के लिए सत्ता का गलियारा जरूरी नहीं| सांसदों के संसद में व्यवहार को आज लूट में हिस्सेदारी की रस्साकशी के रूप ले देखा जा रहा है| यदि यह सब सत्य है तो देश और जनता दोनों का दुर्भाग्य है| परन्तु लगता है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सत्य है; देश में विधायिकाएं विधि-कार्य के अतिरिक्त सभी कुछ कर रही हैं| कई महत्वपूर्ण विधेयक संसद में भूखी गरीब बाल विधवा की तरह मुँह लटकाए खड़े है और सरकार से लेकर उप-सरकार (विपक्ष बोलना गलत होगा) तक कोई उनकी सुध-बुध नहीं ले रहा है|

लोकनायक जय प्रकाश नारायण, नवनिर्माण आंदोलन, गुजरात, १९७४

क्या कारण हैं कि देश की विधायिका आज देश की कानूनी आवश्यकता को समझ में नाकाम सिद्ध हों रही है? संस्थान दर संस्थान, भ्रष्टाचार की मार से नष्ट हों रहे है, तकनीकि परिवर्तन जीवन में नए विकास लाकर नए संवर्धित कानूनों की मांग खड़ी कर रहे हैं, समय नयी चुनौती पैदा कर रहा है| परन्तु; हाँ, परन्तु; विधायिका खोखली राजनीति के घिनोने नग्न नृत्य का प्रतिपादन, निर्देशन और संपादन में अतिव्यस्त है| अब यह दूरदर्शिता की कमी मात्र रह गयी है या इच्छा-शक्ति का नितांत आभाव है| इस समय जनतांत्रिक विचारधारा के बड़े बड़े स्तंभ यह विचार करने पर मजबूर है कि क्या वह संसद और संसदीय प्रणाली में आस्था रखते है? हमारी आस्था संसद में भले ही बनी रही हों परन्तु निश्चित रूप से हमारे सांसदों में तो नहीं बची रह गयी है|

कंपनी विधेयक पिछले कई वर्षों से उठ गिर रहा है| पेंशन विधेयक अभी सोच विचार में डूबा है| भ्रष्टाचार उन्मूल्यन पर कोई उचित विचार नहीं है| गलत आचारण को उजागर करने वाले लोगो को सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं हों रही है| आम नागरिक रिश्वत देने पर मजबूर है और शिकायत करने पर शोषित और दण्डित हों रहा है| न्यायपालिका पर अत्याधिक दबाब है और आवश्यक कानूनी व्यवस्था नहीं बन पा रही है| दूसरी ओर यही सांसद दमनकारी क़ानून बिना किसे हील-हुज्जत बहस आदि के पारित कर देते हैं|

सड़क पर जनता, मुंबई, २१ अगस्त २०११ (The Hindu)

क्या हमारा देश सदन में की गयी नारेबाजी, कुछ-एक स्थगन प्रस्ताव, विधायिक कार्यों में रोजमर्रा की बाधा आदि के सहारे ही चलेगा?? क्या हम चुनाव के दौरान दिए गए कुछ गलत वोट के कारण चुने गए ऐसे सांसद पांच वर्ष तक झेलने के लिए अभिशप्त है?? क्या हम अपने निर्वाचित प्रतिनिधि को यह नहीं कह सकते कि वह फालतू के हल्ले-गुल्ले में न पड़े और कुछ काम-धाम कर ले? क्या हम अपने प्रतिनिधि से नहीं कह सकते कि वह आवश्यक क़ानून बनाएँ?

क्या संसदीय व्यवस्था निर्वाचित तानाशाही है? क्या संसदीय जनतंत्र दम तोड़ रहा है?? क्या प्रतिनिधिक जन तंत्र को भागीदारी जनतंत्र से बदलने पर यह संसद हमें मजबूर करने जा रही है???