बलात्कार क्यों??


 

परिवार

* स्त्री ने अपनी पांच साल की बेटी को कहा; “अपने कपड़े ठीक कर कर बैठा कर, लड़कों की निगाह खराब हो जाती है|”

      बेटी कुछ नहीं समझी, डर गयी| बेटा समझा अगर मेरी निगाह खराब होने में लड़की का दोष होगा|

* स्त्री ने बेटे को बादाम दूध देकर बोला; “पी ले बेटा तुझे बड़े होकर मर्द बनना है|”

      बेटा मर्द बनने में लग गया|

* स्त्री ने स्कूल से बेटी से कहा; “बड़ी हो रही है कुछ शर्म लिहाज सीख ले| लड़कों का क्या? ये तो खुले सांड होते है|

एक इंसान को पता लगा कि उसकी असली जात खुले सांड है|

* पुरुष ने सड़क पर किसी नन्ही बच्ची को छेड़ते हुए बेटे को देख कर घर आकर स्त्री से कहा; “तुम्हारा बेटा अब बड़ा हो रहा है|” स्त्री हँस दी; “हाँ, अब उसकी शिकायतें आने लगीं है|

      बेटा बड़ा होनेलगा|

* पुरुष ने बेटी से कहा; तू उन लोगों की बातों पर ध्यान देगी तो वो ऐसा तो करेंगे ही|

* पुरुष में बेटी को बोला; “बेटा! तुम अपनी तरफ भी ध्यान दो, ताली एक हाथ से नहीं बजती|”

* स्त्री में पड़ोसन से कहा; “तुम्हारी बेटी कुछ कम है क्या? और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती|”

* पुरुष में अपनी बेटी को घर में घुसते ही पीट दिया; “साली हरामजादी’ क्या कर कर आई थी कि पान की दूकान पर लड़के तुझ पर छींटे उछाल रहे थे|”

* स्त्री में लड़कियां छेडकर घर आए बेटे को बिना डांटे, खाने खाने को दे दिया|

* स्त्री ने बेटी से कहा; “सुन अगर किसी लड़के में तेरी तरफ देखा भी तो मैं तुझे दीवार में चिनवा दूंगी|”

      बेटी ने समझा नहीं समझा, “मर्द” बेटे ने जरूर समझ लिया|

 

देश और समाज

  • सभी लड़कियां तय की गयी वर्दी पहन कर आएँगी; लड़के ….. कोई बात नहीं|
  • लड़कियों को सभ्य कपड़े पहनने चाहिए, वर्ना लड़कों का ईमान खराब होता है|
  • जब उन गालियों को समाज में स्वीकृति होती है, जिनमें स्त्री, माँ बहन बेटी, के साथ बलात्कार की बात होती है|
  • जब स्त्री का अस्तित्व समाज में मात्र योनि और स्तन तक सिमटा दिया जाता है| अधिक दुर्भाग्य यह है कि कोई उन पवित्र अंगों को जन्मदाता और बचपन में दूध पिलाने वाले अंग के रूप में आदर नहीं देना चाहता|
  • जब अपने भाई या पुरुष-मित्र से साथ घुमती लड़की को कमेन्ट किया जाता है; “हमें भी देख लो हम में क्या कांटे लगे है” कोई भी इस कमेन्ट पर कुछ नहीं कहता|
  • जब पिता अपने बेटों को ये नहीं कहता कि मर्द होने का मतलब लड़की का दिल जीतना है, शरीर पर जोर दिखाना नहीं|
  • जब लड़कियों को पर्दा करना पड़ता है कि किसी की बुरी नजर न पड़े|
  • जब लड़कियां खुद को बाजार में बिकने वाली चीज बनाने लगती है|
  • जब देश में क़ानून नेता जी के घर की पहरेदारी करता है और आम जनता को रात में घर में छिप जाने के लिए कहा जाता है|
  • जब समाज बलात्कार को “लड़की कि इज्जत लूटना” कहता है| उन दरिंदों का “ईमान-इज्जत-इंसानियत” खोना नहीं|
  • जब अदालत में लड़की को अपने बलात्कार का गवाह बनना पड़ता है जबकि किसी मुर्दे को अपनी मौत की गवाही नहीं देती पड़ती|
  • जब देश में मुक़दमे दसियों साल तक अदालत में झूलते रहते है|
  • जब देश की आम जनता पुलिस को देश का सबसे बड़ा अपराधी संगठन मानती है और एक अदने से जेब कतरे से भी पंगा नहीं लेना चाहती क्योंकि वो पुलिस का सगा छोटा भाई है|
  • जब देश में कड़े क़ानून किताबों में शोभा बढ़ाते है और उनका पालन नहीं होता|
  • जब किसी के शक की बिना पर बलात्कारी को छोड़ा जाता है और उसी शक की बिना पर पीडिता को अपराधी मान लिया जाता है|
  • जब हम बलात्कार में पीड़ित और अपराधी का देश, धर्म, जाति, काम, देखते है|
  • जब हम अपनी सेना या अपने प्रिय जन द्वारा किये बलात्कार को देख सुन कर चुप रहते है या चुपचाप सहते हैं|
  • जब हम बलात्कारी और पीडिता की शादी करने के बारे में एक पल भी सोचते हैं|
  • जब हम बलात्कारी को देश के आम नागरिक जैसे सभी अधिकार देते है; जबकि किसी और दिवालिया या पागल को ऐसे अधिकार नहीं होते|


देश और देवता

 

  • जब “देवराज” इन्द्र तपस्वी गौतम की सती पत्नी अहिल्या का बलात्कार करते है; अहिल्या से दुश्मनी के लिए नहीं वरण गौतम से इर्ष्या के कारण; शायद कोई इन्द्र के इस कुकृत्य की निंदा नहीं करता|
  • जब अहिल्या के बलात्कार का शिकार हो जाने पर पति गौतम अहिल्या को श्राप देते है| जो श्राप अहिल्या को पत्थर बना सकता है वो इंद्र को नाली का कीड़ा क्यों नहीं बनाता|
  • जब राम अहिल्या को सम्मान देकर पत्थर से वापस स्त्री बनाते है और उन्ही राम का भक्त हम इस देश के वासी बलात्कार पीडिता को पत्थर बनाने में लगे रहते हैं|
  • देश में राम राज्य का सपना स्त्री को अहिल्या / शबरी जैसा आदर देने के लिए नहीं वरन स्त्री को सीता जैसा वनवास देने के लिए देखा जाता है|
  • जब हर साल रावण को जलाने वाला समाज/देश ये भूल जाता है की रावण ने राक्षस होकर भी अपहृत सीता के साथ कोई बलात्कार या छेड़खानी जैसी कोई घटिया हरकत नहीं की थी|

अंत में मैं कहना कहता हूँ; जब समाज में कोई भी गलत बात होती है तो मुझे भी देखना चाहिए क्या मैंने तो इस समाज में ये गलत बात होने में कोई योगदान नहीं दिया| कोई गलत बात कहकर, सहकर||

मैं आज खुद के होने पर शर्मिंदा हूँ||

 

 

 

भारत में इस्लामिक बैंकिंग की संभावनाएँ


 

अब से लगभग चार वर्ष पूर्व वैटिकन ने पश्चिमी देशों के बैंकों से कहा था कि उन्हें इस्लामिक बैंकिंग के सिद्धांतों से आधार पर व्यवसाय करने के बारे में सोचना चाहिए| अभी कुछ दिन पूर्व भारतीय रिजर्व बैंक ने भारत सरकार से कहा है कि देश में इस्लामिक बैंकिग की अनुमति दी जानी चाहिए| ध्यान देने की बात है कि इस्लामिक बैंकिंग मुस्लिम कहे जाने वाले शासनों और देशों में भी बीसवीं शताब्दी में जाकर प्रचलित हुई है| रिजर्व बैंक के मुताबिक इस समय मौजूद भारतीय क़ानून देश में औपचारिक रूप से इस्लामिक बैंकिंग की इजाजत नहीं देते, परन्तु नॉन – बैंकिंग सेक्टर में इस प्रकार के कुछ संस्थान है जो इस्लामिक बैंकिंग के आधार पर सीमित रूप से कार्य कर रहे हैं|

इस बात में कोई शक नहीं है कि मानवता शताब्दियों से सूदखोरी के विरुद्ध रही है| कुरान पाक सूदखोरी सात बड़े पापों में गिनता है| सूद को आप मेहनत की कमाई की परिभाषा में नहीं ला सकते हैं| आप यदि जाति आधारित भारतीय समाज पर भी निगाह डालें तो पाएंगे की सूदखोरी का धंधा करने वाले समुदायों को समाज में अधिक सम्मान नहीं दिया जाता| अब प्रश्न उठता है कि बिना सूद बैंकिंग कैसी?

अगर आप बैंक के पास जाकर कहे कि आपको जर्मनी से एक करोड रुपये की कुछ मशीन खरीदनी है, और बैंक आपको मशीन खरीद कर दे दे और कहे कि आप कुल जमा सवा करोड रुपया अपनी पसंद की किस्तों में दे देना| जमानत के तौर पर दो करोड की जमीन रखने होगी|

अगर आप को एक करोड की जमीन अपना उपक्रम लगाने के लिए चाहिए और बैंक वो जमीन आप को खरीद कर प्रयोग करने के लिए दे दे.| आपको किस्तों में इतना पैसा बैंक को देना है जो आखिरी किस्त के दिन जमीन की पहले से अनुमानित कीमत के बराबर हो जाये|

अब अगर आप बैंक के पास जाए घर खरीदने का कर्जा लेने और बैंक कहे कि आपके द्वारा पसंद किया गया घर बैंक आपको खरीद कर किराये पर दे देगा और दस साल कुछ रकम माहवार किराये पर देने के बाद मकान आपका|

आपको कुछ धंधा करना है और बैंक आपकी कुल पूँजी लागत का ५० फीसदी आपको कर्जा दे और कहे कि आप जब तक जब तक मूल धन नहीं चूका देते, तब तक मुनाफे में २० फीसदी का हिस्सा देते रहे|

आप एक करोड के सोने के बदले बैंक से सवा करोड का उधार दे और कहे की आप दो साल के भीतर इस सोने को दो करोड में वापस खरीद सकते है|

बैंक आपके बचत खाते में जमा रकम के बदले हर साल ब्याज न देकर कुछ उपहार दे| बैंक आपके सावधि जमा के आधार पर आपको अपने कुल लाभ में से कुछ हिस्सेदारी दे|

बैंक आपको वेंचर कैपिटल मुहैया करा दे| आपके धंधे में प्रेफेरेंस शेयर खरीद ले| अगर दिमाग में विचारों का मंथन चले तो ऐसे कई और तरीके ओ सकते है जो इस्लामिक बैंकिंग के मूलभूत तरीकों से मेल खायेंगे|

मैं मानता हूँ कि पूरी तरह से आप इस्लामिक बैंकिंग के सिद्दांत पर सभी कार्य नहीं कर सकते परन्तु आप आज के सूदखोर बैंक के सिद्दांत पर भी पूँजीवाद नहीं चला पाए हैं| समाजवादी सिद्दांतों से ख़ारिज किये जाने के बीस वर्ष के भीतर ही पूंजीवाद के महारथी कई बैंक दिवालिया हो चुके है| आपको समय से साथ न सिर्फ नए वरन पुराने विचारों को भी बार बार अजमाना होगा|

इस्लामिक बैंकिंग एक ऐसा विचार है जो मुझे सदा ही आकर्षित करता रहा है और इसे मुझ सहित बहुत से लोग पूंजीवादी सिद्धांत के कमियों को दूर करने के प्रमुख प्रयास के रूप में देखते हैं| दुर्भाग्य से भारिबैं इस्लामिक बैंकिंग को मात्र वर्ग विशेष को बैंकिंग तंत्र से जोड़ने के एक साधन मात्र के रूप में देखती है| मैं विश्व भर के मुस्लिम – विरोधिओं और मुस्लिमों की भावनाओं का आदर करते हुए यह कहना चाहता हूँ कि जिस प्रकार योग, विज्ञान, वैदिक गणित, यूनानी चिकित्सा और आयुर्वैद किसी धर्म विशेष के विचार नहीं है बल्कि मानवीय धरोहर है उसी प्रकार इस्लामिक बैंकिंग किसी की बापौती न होकर मूलतः एक मानवीय विचार है और इसे सभी के द्वारा अपनाया जाना चाहिय|

चुनाव २०१४ चालू है…


जब से देश की राजनीति पर गैरदलीय विपक्ष का पर्दापरण हुआ है, देश में २०१४ की बातें शुरू हो गई है| सरकार और विपक्ष प्रकारांतर से इस जादुई वर्ष को याद कर कर जनता के कुशासन सहने के लिए कह रही है या अपने को आश्वस्त कर रही है कि अभी दिल्ली आम जनता से बहुत दूर है| अन्ना हजारे का आंदोलन सत्ता और विपक्ष को अपने मन में साँपनाथ और नागनाथ मानने कि जन प्रवृत्ति का खुला द्योतक था| जनता को खुले आम अपने क्रोध को जाहिर करने का मौका मिला| शायद आंदोलनकारियों के नेतृत्व ने भी इस सफलता कि उम्मीद नहीं कि थी| एक बात स्पष्ट है कि आज उस आंदोलन का राजनितिक घटक राष्ट्रिय राजनीति में अपने को तथाकथित तीसरे मोर्चे के बराबर रखने में तो समर्थ रहा ही है,  भले ही अभी उन में अपरिपक्वता, अल्प-राजनितिक इच्छाशक्ति और सरकार बनाने लायक नेतृत्व समूह नहीं है|

साफ कहे तो कम से कम मीडिया – सामाजिक मीडिया में तो दो बड़े गठबंधनों के बाद राष्ट्रीय स्तर पर यही लोग खड़े है| वास्तविक राजनीति में भले ही ये न खड़े हो पाए मगर तालाब के रुके पानी में हलचल तो है ही|

इसके बाद आज काँग्रेस और भाजपा के दो राजनितिक गठबंधन है जो कुछ हद तक प्रासंगिक रह जाते  है| दोनों दलों में नेता बहुत है, नेतृत्व नहीं है| भाजपा बाजपेयी और अडवाणी जी के बाद नेतृत्व विहीन है और उसके समर्थक जिस व्यक्ति को प्रधान मंत्री पद के लिए देख रहे है उसका राष्ट्रिय चरित्र बनना अभी बाकी है| सरकार बना पाने की स्तिथि में भी प्रान्तिक छवि वाला कमजोर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय छवि वाले नेताओं से बने मंत्रिमंडल को कैसे चला पायेगा? काँग्रेस का क्या कहे, उसके पास मन मोहन सिंह का कोई विकल्प नहीं है| जो मजबूत है वो राजपरिवार के लिए खतरा बन सकते है, कमजोर नेतृत्व नहीं कर सकते| माताजी की ऊँगली पकड़ करे देश नहीं चलता और राजकुमार अभी “छोटे” हैं|

वर्तमान संसद का कार्यकाल अच्छे बुरे कामों के लिए नहीं वरन भारतीय लोकतंत्र में व्याप्त कमियों को रेखांकित कने वाले जन सेलानियों, अपनी साख बचने की लड़ाई लड़ते मीडिया और संविधान में बनाए गए सुदृण तंत्र के लिए जाना जायेगा| न्याय तंत्र, चुनाव आयोग, महालेखापरीक्षक और प्रसिद्ध और गुमनाम जन सेलानियो का समय अब आ चुका है| यह अनावश्यक रूप से मजबूत समझी जा रही “तथाकथित विधायिका” को उसकी संवैधानिक सीमा में लाने का समय है| जो नींव अनजाने में ही, सूचना के अधिकार क़ानून के द्वारा राखी गयी अब परिपक्व हो रही है|

ऐसे समय में अगला चुनावी मुकाबले साख का संकट झेल रहे दो मूलतः कमजोर धडो में है| दुर्भाग्य से वो जानते है की सरकार उनमें से किसी एक को बनानी है और दोनों जनभावना को समझे या न समझे मगर चुनावी गणित और उसके शतरंज को बेहतर समझते हैं|

अन्ना आंदोलन से जन समर्थन खो चुके और महालेखा परीक्षक की कई रिपोर्टों से अपनी साख नष्ट करा चुके काँग्रेस के पास अब खोने के लिए कुछ भी नहीं है| आप उनके व्यवहार से बेशर्मी खुलकर देख सकते है| उनके सारे पाँसे कमजोर विपक्ष को देख कर खेले जा रहे हैं|

पिछले सप्ताहांत केंद्रीय मंत्री मंडल में हुए बदलावों के बाद सरकार एक बार पुनः अपनी साख को और गिरा पाने में कामयाब रही है| युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया गया है और जैसा कि मीडिया में चर्चा कराई गयी है कि इस समय सरकार में सब कुछ बिकाऊ है, खरीददार चाहिए| सरकार आर्थिक सुधारों के नाम पर कुछ प्रयोग करने का प्रयास अवश्य करने वाली है|

देश को सुधारों के आवश्कयता है| विपक्ष किसी भी प्रकार के आर्थिक सुधार का विरोध करने की स्तिथि में नहीं है| लोकसभा का गणित ऐसा है कि विपक्ष या तो सदन से भाग खड़ा हो या सरकार गिरने का खतरा मोल लेकर जनता के सामने बुद्धू बनकर खड़ा हो जाये| देश की विकास दर विश्व्यापी संकट के बाद भी ठीक है और पूंजीपति “आर्थिक सुधारों को खरीदने के लिए तैयार है”|

अगर चुनावों के पहले वर्ष में सरकार अपना आर्थिक सुधार कार्यक्रम संसद में जोरदार तरीके से रखने में कामयाब रही तो वह चुनावों में इसका सीधा लाभ ले पायेगी| कम से कम कोई एक वर्ग तो खुश होगा|

मैं इस समय आशा करता हूँ कि सरकार कंपनी विधेयक और इस प्रकार के अन्य कुछ कानून अवश्य पारित करवा पायेगी|

क्या मुझे ये भविष्य वाणी कर देनी चाहिए कि अगले चुनावों में काँग्रेस दोबारा सरकार बनाने जा रही है और देश पुनः सत्ता के कुशासन और आत्मघाती विपक्ष कि और बढ़ रहा है|