विश्व-बंदी १० मई


उपशीर्षक – श्रमिकविरोधी पूंजीपशुवाद  

देश के कथित पूंजीवादी शासक एक एक कर लगातार श्रमिक कानूनों को रद्द कर रहे हैं| एक विधि-सलाहकार होने के नाते मैं वर्तमान कानूनों का समर्थक नहीं हूँ, परन्तु इस प्रकार रद्द किए जाने का स्पष्ट नुक्सान देखता हूँ| पूंजीवादी दुर्भाग्य से यह गलत कदम उस समय उठाया जा रहा है, जिस समय उद्योगों के लिए श्रमिकों की जरूरत बढ़ रही है और जिन स्थानों पर उद्योगों की भीड़ हैं वहां श्रमिकों की भारी कमी है| ऊपर से देखने में लग सकता है कि अगर ऐसे में मजदूरों को रोका जाता है तो उद्योग को लाभ होगा| परन्तु दुर्भाग्य से रूकने के लिए मजदूर हैं ही नहीं| हर बीतते हुए दिन या तो वो लौट कर अपने गाँव घर जा रहे हैं, या असुरक्षित स्तिथियों में संक्रमण का बढ़ता ख़तरा उठा रहे हैं| साथ में महामारी और मृत्यु के नृत्य को पूँजीपशुओं की मानसिकता तांडव में बदल रही है|

यह सभी कानून इस लिए गलत नहीं हैं कि यह मजदूरों को कोई खास लाभ दे रहे हैं, न इसलिए कि मजदूर संगठनों पर कमुनिस्ट का कब्ज़ा है, यह इसलिए गलत हैं कि इनको न उद्योगपति समझ पाते हैं और न श्रमिक| ये पुराने श्रमिक कानून उस तरह का धर्म हैं जिसमें समस्त निष्ठा  ईश्वर को भुला कर कर्मकाण्डों पर टिका दी गई ही| यह क़ानून सिर्फ़ नौकरशाही के कागज़ों का पुलंदा मोटा करते हैं| इनमें सुधार के लिए, इन्हें सरल, समझने योग्य, पालन योग्य बनाने की आवश्यकता थी, न कि रद्द करने की|

वर्तमान में उद्योगों के वेतनदेय क्षमता नगण्य है, साथ ही वो मजदूरों को कोई अन्य लाभ – इज्जत, सुरक्षा, रोजगार गारंटी, स्वास्थ्य सुविधा या बीमा – कुछ देने के लिए न तो बाध्य हैं और न देने जा रहे हैं| पूँजीपशुओं की पूरी ताकत उन्हें गुलाम की तरह रखने में लगी हुई है| मगर गुलाम बनने के लिए आएगा कौन?

अगर मजदूरों का रोजगार प्रदाता उद्योग के आसपास रहने- खाने के बाद घर भेजने लायक बचत न हो, इज्जत न मिले और अगर उसे अपने गाँव के छोटे मोटे रोजगार में जीवन यापन संभव रहे और कम ख़तरा उठाना पड़े तो वो वापिस क्यों लौटेंगे|

हर बात का उचित लाभ भी होता है, अगर श्रमिक कानूनों के रद्द किए जाने के बाद भी यदि श्रमिक नहीं मिलते तो उद्योगों के लिए पूंजीपति के घर से दूर श्रमिक के द्वार पहुंचना होगा और महाराष्ट्र गुजरात की जगह अवध-मगध आना होगा

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विश्व-बंदी ७ मई


उपशीर्षक – करोना काल में कार्यालय सुरक्षा

जिन चिंताओं का निदान सरलता से संभव है, उन्हें नकारात्मक विचार नहीं कहा जा सकता| करोना काल में असुरक्षित कार्यालय की चिंता इसी प्रकार की चिंता है| सुरक्षा का सकारात्मक विचार है|

दिल्ली महानगर में करोना का शिकार हुए लोगों में एक हिस्सा उन लोगों का है, जो इस से लड़ने के लिए सड़कों या अस्पतालों में तैनात रहे है| हो सकता है इनके बचाव के लिए कुछ और कदम उठाए जा सकते थे, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि अर्थव्यवस्था खोल दिए जाने की स्तिथि में अन्य कार्यालय भी बीमारी फैलायेंगे| परन्तु असावधानी भयाभय स्तिथि उत्त्पन्न कर सकती है|

सामान्यतः सुरक्षित माने जाने वाले कार्यालयों को लेकर आम अधिकारीयों, कर्मचारियों और उनके परिवारों में अधिक चिंता है| क्योंकि इस प्रकार के कार्यालयों में लापरवाही का स्तर अधिक पाया जाता है|

मेरा स्पष्ट मत है, इन कार्यालयों में किसी भी प्रकार की लापरवाही के कारण किसी भी कर्मचारी या अधिकारी को बीमारी या एकांतवास का सामना करना पड़ता है तो इसकी आपराधिक जिम्मेदारी उस कार्यालय या संस्था के कार्यपालक अधिकारियों और कार्यकारिणी के सदस्यों की होगी – कंपनी के मामले में मुख्य कार्यपालक अधिकारी और निदेशक मंडल, संस्थाओं के मामले में सचिव और कार्यपालक कार्यकारिणी|

सुरक्षा के दो स्तर हैं जिनका पालन होना है – भले ही वह सरकारी दिशानिर्देशों का भाग हो या न हो: पहला कार्यालय स्तर पर और दूसरा कर्मचारी से सुरक्षित आवागमन को लेकर|

कार्यालय स्तर पर:

  • जबतक असंभव न हो जाए, अधिकारी व कर्मचारी घर से काम करें| उन्हें अपने सप्ताह से ४० ४५ घंटे स्वयं सुनने की सुविधा दें परन्तु कार्य अवश्य पूरा करवाएं|टीसीएस का उदहारण लेकर चलें|
  • कार्य के आवश्यक उपकरण – कलम, कंप्यूटर, काग़ज आदि कार्यालय दे सकता है और अगर अधिकारी व कर्मचारी अपने निजी उपकरण प्रयोग करता है तो मानदेय दिया जा करता है|
  • केवल स्वस्थ्य अधिकारी व कर्मचारी को ही कार्यालय आने की अनुमति दें| सभी अधिकारियों व कर्मचारियों को दैनिक स्वास्थ्य सूचना दर्ज करने के लिए कहा जा सकता है|
  • हर अधिकारी व कर्मचारी को अपने साथ रह रहे परिवारीजनों के स्वस्थ्य की सूचना देने की अनुमति रहे और अगर साथ रह रहे किसी परिवारीजन को स्वास्थ्य सम्बन्धी असुविधा या कठिनाई महसूस हो तो सम्बंधित अधिकारी या कर्मचारी को तुरंत घर से ही कार्य करने के लिए कहा जाए|
  • कार्यालय में तापमापक, साबुन, सेनिटाईज़र, जल, पेय जल, आदि की सम्पूर्ण व्यवस्था हो| सफाई का उच्च कोटि का प्रबंध हो| कड़ाई से दैनिक उच्चस्तरीय जाँच सुनिश्चित हो|
  • हर व्यक्ति मास्क, मुखोटे, घूँघट, पर्दा, बुर्का, हिज़ाब, चादर, दुप्पटे, अगौछे, गमछा आदि का अवश्य प्रयोग करे|
  • यथा संभव अधिकारियों व कर्मचारियों के कार्यालय पहुँचने और निकलने के समय अलग अलग हों| भोजनावकाश समय भी भिन्न रहे|

आवागमन स्तर पर

  • अधिकारी व कर्मचारी घर से निकलने से एक घंटे पूर्व और पहुँचने के एक घंटे बाद तापमान ले और स्वस्थ्य दर्ज करे|
  • भीड़ से बचे| कार्यालय प्रदत्त या निजी वाहन का प्रयोग हो| अनावश्यक गप्पों, मुलाकातों, बैठकों और सम्मेलनों से बचें|
  • बिना स्वास्थ्य जाँच किए किसी अधिकारी व कर्मचारी को कार्यालय में प्रवेश न करने दिया जाए|
  • हर अधिकारी व कर्मचारी को यह दर्ज करना अनिवार्य हो कि वह आज का काम घर से क्यों नहीं कर सकता था? कार्यालय में उसकी कितने समय के लिए उपस्तिथि आवश्यक है और उसके बाद उसे घर बिना दोबारा पूछे घर जाने की सामान्य अनुमति होनी चाहिए|
  • सरकारी छुट्टियों के दिन कार्यालय कतई न खुलें| काम की दैनिक लेखा-जोखा लिया जा सकता है|

सभी उच्च अधिकारीयों के लिए यह आवश्यक है कि कम से कम अपने स्तर से तीन स्तर नीचे के सभी अधिकारियों व कर्मचारियों के स्वास्थ्य पर निगाह रखें और उनसे अधिकतम कार्य घर से ही करवाने का प्रबंध करें|

अगर कोई भी अधिकारी, संस्था, कंपनी, कार्यालय या विभाग सामान्य आवश्यक सावधानियों का पालन नहीं करता तो आपराधिक कार्यवाही के लिए तैयार रहे, भले ही सजा आपको सेवानिवृत्ति के बाद ही क्यों न मिले| न तो सरकार और न ही सरकार के दिशा-निर्देश (भले ही आधे- अधूरे रह गए हों) इस आपराधिक लापरवाही की सजा दिलवाने से आपको रोक पायेगी, जब तक की सामान्य बुद्धि युक्ति सुरक्षा न अपनाई गई हो|

अगर सुरक्षा के सामान्य बौद्धिक नियमों का पालन करने की ठान ली जाए तो सावधानियाँ न तो कठिन हैं न ही महंगी हैं|

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विश्व-बंदी ४ मई


उपशीर्षक – कैद से छूटे कुत्ते बिल्ली

मुझे कोई सभ्य तुलना समझ नहीं आ रही| तालाबंदी का सरकारी ताला अभी ढीला ही हुआ कि दिल्ली वाले सड़कों पर ऐसे निकले हैं जैसे कई दिन के भूखे कुत्ते बिल्ली शिकार पर निकले हों| जिसे जो हाथ लगा मूँह पर लपेट लिया – रूमाल, मफ़लर, दुप्पटा, अंगौछा, तहमद, लूँगी| कुछ ने तो अपने दो-पहिया चौ-पहिया को धोने नहलाने की जरूरत भी नहीं समझी| शराब के आशिकों की भीड़ का क्या कहना – लगता था कि इस ज़िन्दगी का आख़िरी मौका हाथ ने नहीं जाने देना चाहते|

करोना भी बोला होगा – गधों, सरकार थक गई है तुमसे, इसलिए लॉक डाउन कम किया हैं| मगर मैं नहीं थका – मेरा काम चालू है|

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस समय करोना के मौजूदा मरीज़ों का चौथाई पिछले तीन दिन में आया है| साथ ही करोना के मौजूदा मरीज़ों का एक-तिहाई दिल्ली-मुंबई और आधा बड़े नामी शहरों से आता है|

ख़बरों में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का बयान छपा है, जो बहुत चिंताजनक तस्वीर हमारी पढ़ी-लिखी नासमझ जनता के बारे में पेश करता है| उनके बयान से कोई भी कह सकता है कि:

  • अन्तराष्ट्रीय यात्रियों की बड़ी संख्या बड़े शहरों से है और उनकी मुख्य भूमिका बीमारी फ़ैलाने में रही है|
  • ग्रामीण भारत अधिक अनुशाषित व्यवहार कर रहा है| बड़े शहरों में ठीक से लॉक डाउन का पालन नहीं किया गया|
  • मजूदूरों को और उनसे शायद कोई ख़तरा नहीं, क्योंकि विदेश से आने वालों से उनका संपर्क बहुत कम होता है|

भले ही सरकार से कितनी भी कमियां रहीं हो मगर जनता ने सरकार के प्रयासों को पूरा नुक्सान पहुँचाया है| इसमें सरकार समर्थकों का प्रदर्शन सबसे ख़राब रहा – जब उन्होंने ढोल नगाड़ों के साथ साड़ों पर नाच गाना किया बाद में आतिशबाजी की| अपने समर्थकों से प्रधानमंत्री की निराशा तो उनके पिछले दो महीने के उनके भाषणों में भी झाँकती नज़र आती है|

इस बीच सरकार को घर लौटते प्रवासी मजदूरों से किराया वसूलने के मुद्दे पर व्यापक जन-आलोचना का सामना करना पड़ा है और वह बात घुमाने में लगी है|

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