वृद्धाश्रम – वानप्रस्थ की ओर


पिछली पोस्ट भूला गया वानप्रस्थ में मेरा कहना यह रहा कि माता पिता की मोह माया में लिप्त लंबी उम्र बच्चों के लिए सिरदर्द न बने, इसीलिए भारतीय परंपरा वानप्रस्थ आश्रम की बात करती है। आज के वृद्धाश्रम इस व्यवस्था का पूरक या सरलीकरण के रूप में सामने आ सकते है। वानप्रस्थ जंगल जाने का नाम यानि वनवास नहीं है, वन की तरह सहज सरल उपजाऊ सामाजिक और सार्वभौम हो जाने का नाम है, सबके हो जाने और सबको अपना लेने का नाम है। वन भारतीय परंपरा से सार्वजनिक स्थान है। राम और पांडवों के वनवास वानप्रस्थ नहीं हैं। 

मेरे बाबा सेवानिवृत्ति के बाद कर्णवास जाकर रहने लगे और बहुत बीमार होने पर घर आए। यह सब उनकी स्वतंत्र इच्छा से हुआ। उनके द्वारा निर्माण कराया गया कमरा आज भी वहीं होगा, उनके आने के बाद इन चालीस बयालीस वर्षो में परिवार से कोई उसे देखने नहीं गया। कारण स्पष्ट है, बाबा ने यह अपने लिए नहीं समाज के लिए बनवाया था। मेरी पीढ़ी ने तो खैर कर्णवास मानचित्र में ही देखा है। 

इसके विपरीत, मेरे पिता के पास घर से जाने की सुविधा नहीं रही। सरकारी सेवानिवृत्ति होने के बाद भी, उनकी सेवानिवृत्ति पारिवारिक रूप से बहुत बहुत बाद में हुई। यथाशक्ति पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह करने के बाद वह कम से कम दस वर्ष अपने घर मे अकेले रहे। धन- साधन होने के बाद भी अपना नहाना-खाना खुद करते रहे। आम तौर पर वह बहुत सामाजिक नहीं रहे थे पर अब रिश्ते नाते के मोह बहुत कम हो गए थे| गिने चुने मित्र, पड़ौसी और संबंधियों से ही उनके संबंध रहे हैं। मगर इस पूरे समय में वह किसी पर आंशिक तौर पर भी आश्रित नहीं हुए। 

फोन होने के बाद भी सामान्य तौर पर फोन पर भी हमारे जीवन ने प्रायः दखल नहीं दिया। आज वह साथ रहते हैं तो भी घर में खास दखल देने की इच्छा नहीं रखते। यहाँ तक कि कई बार हम लोगों को कोफ़्त होती है कि यह आदमी सिर्फ़ अपने सुख – दुख, खाने-पीने, हगने- मूतने के अलावा कुछ नहीं सोचता। खाने पीने को लेकर उम्र, पुरानी आदतों और हमारी निगाह के हिसाब से सनक के कारण उनकी कुछ विशेष जरूरत रहती है। मगर दूसरी ओर वह बाकी किसी मामले ले बिना आमंत्रण राय भी नहीं देते। मैं समझता हूँ, इसे भी हम वानप्रस्थ की आदर्श स्थिति नहीं है। परंतु आम वृद्ध समाज की स्थिति से बहुत बेहतर है। 

मेरे पिता एक उदाहरण है कि यह जरूरी नहीं कि आप अपना घर छोड़ें या वनवासी हो जाएँ। मोह-ममता के साथ सेवा चाहने जैसी बातों से मुक्त ही जाना क्या वानप्रस्थ नहीं है। परंतु यदि परिवार का साथ आपको मोह माया में बांधता है तो घर से निकालना होगा कम से कम तब तक के लिए जबतक आप मोह माया को मन से न निकाल दें। यह स्थान वृद्धाश्रम हो सकता है। यदि हम वानप्रस्थ और वृद्धाश्रम में तुलना करें तो पाएंगे वृद्धाश्रम वानप्रस्थ का पासंग नहीं ठहरता। यदि आप वृद्धाश्रम को स्वेच्छा से अपनाते है तो यह वानप्रस्थ के मार्ग में एक कड़ी हो सकता है। वृद्धाश्रम आपको मोह-माया त्यागने के लिए बाध्य नहीं करता परंतु आप उस दिशा में इसे एक साधन के रूप में अपना सकते हैं।

आप भविष्य में अच्छे वानप्रस्थ बनें इसके लिए अपने गृहस्थ दिनों में ही वृद्धाश्रम विरोधी भावना से मुक्त हो जाना होना होगा। 

यथार्थवादी चित्रण – “सिर्फ एक बंदा काफी है”


मई 2023 भारतीय व्यावसायिक सिनेमा को दो महत्वपूर्ण फ़िल्में देने के लिए याद किया जाएगा। “कटहल” और “सिर्फ एक बंदा काफी है” बॉक्स-ऑफिस के आंकड़ों के इतर सफल हिन्दी फिल्मों के तौर पर याद की जाएंगी।

जब आप किसी कानूनी करिश्मे पर काम कर रहे हों तो आप पर कानून की सही ओर बने रहने का दबाब होता है। आप नहीं चाहते कि ऐसा कुछ कहा या किया जाए जिस आप मानहानि या अदालत की अवमानना का सामना करना पड़े। बात-बात में भावना आहत कर लेने वाले वर्तमान संदर्भों में फिल्म की कथावस्तु यथार्थ चित्रण की मांग करती है।

यह कटु यथार्थवाद की फ़िल्म है और उस उद्देश्य में निर्विवाद रूप से सफल रही है। यथार्थवादी चित्रण के बाद फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसके प्रमुख अभिनेताओं का मँझा हुआ अभिनय है। अधिकतर अभिनेता कठिन स्थितियों में संयत रहकर भाव-विन्यास प्रदर्शित कर सके हैं। कम बोलकर अधिक समझने-समझाने पर ज़ोर दिया गया है।

अभिनय संवादों पर भारी पड़ता रहा है। फ़िल्म में सार्वजनिक सूचना की सीमा में कथानक और संवाद को बनाकर रखने का दुःसाध्य प्रयास हुआ है। स्वभावतः संवादों में कल्पना का नमक कम है। कानूनी और अदालती संवाद में उपलब्ध सूचना को आपस में जोड़ने मात्र से रचनात्मकता नहीं न्यूनतम आवश्यक श्रम किया गया है। यह बात सराहनीय और यदा कदा असहनीय हो जाती है। किसी भी फालतू शब्द को खर्च न कर-कर फिल्म अपने मूल आधार और गति पर कायम रहती है।

अपने नाम के अनुरूप इस फ़िल्म में मनोज बाजपेयी पूरी तरह छाए हुए हैं। सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ शब्दहीन दृश्यों में बेहद मुखर अभिनय करने में सफल रहे हैं। है। मां बाप की भूमिका में जयहिंद कुमार और दुर्गा द्वंद दिखाने में कामयाब रहे, परंतु उनसे अधिक बेहतर काम लिया जा सकता था। विपरीत परिस्थिति के बावजूद विपिन कुमार शर्मा प्रभाव छोड़ पाए हैं।

परंतु संवाद और सूचना की कमी के चलते वरिष्ठ अधिवक्ताओं की भूमिका में आते जाते अभिनेता प्रभाव डालने में सफल नहीं हो सके। जबकि यथार्थ में उनकी भूमिकाएँ केन्द्रीय होती हैं। क्योंकि फ़िल्म अधिवक्ता के दृष्टिकोण से बनाई गई जय, यह बात कहना महत्वपूर्ण है।

वास्तविक जीवन में वरिष्ठ वकील किसी मुकदमे में तथ्य या कानून की गलत ओर पाए जाते हैं तो उनका हावभाव अतिक्षुब्ध या कुटिल दिखाई देता है। अदालत के कमरे से बाहर आने तक उनका चेहरा सपाट नहीं होता और उसके बाद वह निर्लिप्त हो जाते हैं। फ़िल्म में केवल दो अधिवक्ता ही अपने मुकदमे में दिलोजानोदिमाग़ से लगे हैं, बाकी लगता है, चुपचाप नोट छाप कर चले गए। लगभग हारे हुये मामलों में ऐसा होता भी है, परंतु वास्तविक घटनाक्रम पर ध्यान दें तो इसकी संभावना कम लगती है। फिल्म में इन वरिष्ठ अधिवक्ताओं को अपनी जिरह का थोड़ा और मौका मिलता, तो अभियोजिका के वकील साहब भी अधिक निखरते।

वरिष्ठ वकीलों के बेहद महंगे चमकीले काले कोट, गाउन और कनिष्ठ अधिवक्ताओं की भीड़ गायब हैं। उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के अंदरूनी कमरों की कल्पना यथार्थ से मेल नहीं खाती। फिल्म अपने यथार्थवादी चित्रण, अभिनय और बजट के लिए जानी जाएगी। जहाँ कुछ भी फालतू खर्च नहीं किया गया है। पार्श्व संगीत का एक सुर भी नहीं। कसे हुए निर्देशन के लिए अपूर्व सिंह कर्की को बधाई देना बनता है। कुल मिलाकर फिल्म का निर्देशन, अभिनय, लेखन, स्क्रीनप्ले, एडिटिंग बेहतर कहा जाएगा।

भूला गया वानप्रस्थ 


सरस्वती पूजन के समय भारतीय बच्चे पूछ लेते हैं, माँ के हाथ में अजीब सा गिटार क्या है? संस्कृति के जयघोष लगाने वाले भी जीवन में शायद कभी भारतीय शास्त्रीय संगीत सुन लेते हैं। यह लंबे समय तक मुग़लों, सुल्तानों और तवायफ़ों का मोहताज रहा और आज देश छोड़ कर विदेश में अपने को रोपने का प्रयास कर रहा है। जब कोई ईनाम मेहरबान हो जाए तो जयघोष की रस्म भी अदा हो जाती है। 

वानप्रस्थ भारतीय संस्कृति का वह पहलू है जिसे विस्मृत कर देना संस्कृति में आवश्यक माना जा रहा है। छात्र जीवन के बाद विरले ही कोई इस आश्रम का नाम लेता हो और चालीस पार करने के बाद तो इसका नाम लेना पाप माना जाता है। आजकल हम सयुंक्त परिवार, माता पिता की सेवा और श्रवण कुमार की गाथा गाते हैं। ध्यान नहीं देना श्रवण ने माता पिता की क्या इच्छा पूरी की? तीर्थ यात्रा!! आपने कब सोचा तीर्थ जाने के लिए? उन्हें तो अंधेपन ने बेटे का सहारा लेने के लिए बाध्य किया वरना वह खुद वानप्रस्थ लेते और चल देते। बस अपने मतलब की प्रेरणा लीजिएगा?

आजकल चलन हुआ है, शायद पुरुषों में अधिक है, बुढ़ापे में की साथ नहीं बैठता जैसी कहानियाँ किस्से और फ़ेसबुकिया पोस्ट लिखने का। बहुत कमा लिया आपने और अब सेवा चाहिए – उलहना यह – पत्नी भी ध्यान नहीं देती – रसोई में और बच्चों में लगी रहती है। सोचता हूँ, इनकी पत्नियाँ इनके बुढ़ापे के साथ बूढ़ी क्यों नहीं होतीं। 

आपने भी रसोई जैसे किसी रचनात्मक काम में ध्यान लगाया होता तो शायद कुछ दिन और जवान रहते। 

वैसे भी यह बुढ़ापा और नीरसता मध्य वर्ग का रोग है। सेवानिवृत्त जज साहब बाबू साहब प्रोफ़ेसर साहब किसी न्यायाधिकरण, प्राधिकरण, आयोग या समिति में बैठकर राष्ट्र करते हैं तो बड़े उद्योगपति किसी फाउंडेशन, समिति, संस्था, ट्रस्ट आदि में जा समाज की सेवा करते हैं। वकील साहब, डाक्टर साहब सब अपने धंधे नाम प्रकार आकार बदल कर मरने तक खोले रहते हैं। इनमें से तो कोई नहीं कहता, बहुत सेवा कर ली, अब बच्चे सेवा करें। निम्न वर्ग तो चर्चा से बाहर ही है, मरने तक कमाते रहिए। 

मध्यवर्ग को मात्र रोना आता है – मात्र हम कर देते हैं जैसे निम्न वर्ग जीएसटी न देता हो, सरकार हमें कुछ नहीं देती – जैसे यह बहुत मतदान करते हों, उद्योग किसान को सबसिडी मिलती है – जैसे उसका सस्ता उत्पाद यह न खाते हों, स्पेक्ट्रम घोटाला हो जाता है – जैसे सस्ती दर पर बात यह न करते हों। यह आदत ही इनका बुढ़ापा हो जाती है। ऊपर से यह लोग बिना बुलाए भगवान के घर न जाएँ और जब घूमने का मन हो तो चलो बुलावा आया है माता ने बुलाया है। वर्षों देशाटन के विचार बनेंगे पर यात्रा का कष्ट होगा। अपनी हारी-बीमारी सब आएं पर जाने के नाम पर यह याद है कि कौन कब नहीं आया था। मनपसंद का खाना न मिले तो कोई सुनता नहीं, मनपसंद का खाना मिले तो हम सुनते नहीं, अगले दिन बुढ़ापे में पेट खराब ही रहता है। 

जिस ने भी अपनी जवानी में अपने बूढ़े माँ बाप को गाँव में छोड़ दिया और अपनी पत्नी को दोष पड़ते रहने दिया, अब “बच्चे नालायक है” का गाना गाते हैं। ऊपर से तुर्रा यह कि उनका बुढ़ापा नहीं पचास साला सनक थी और हमारा साठ साला बुढ़ापा। मजे हैं, रहिए जिंदा लंबा – मत सुनिए – रहिमन विपदा हू भली, जो थोड़े दिन होय – आप महामारी बन कर अपने जीवन पर पड़े हैं। सोचिए न कभी जिस उम्र में आपके माँ बाप बूढ़े होने लगे आज आपके उस उम्र के बच्चे आपकी सेवा कर रहे हैं – पचास साल की उम्र। आपकी चारों उँगलियाँ घी में। बात हल्के ढंग से कही जा रही है पर हल्की नहीं है।

इंसान की लंबी उम्र बच्चों के जीवन पर सिरदर्द न हो, इसलिए ही तो वानप्रस्थ है। आप समाज के लिए और समाज आपके लिए। आपको पश्चिमी देशों के वृद्धाश्रम में दोष निकालने से फुर्सत हो तब न वानप्रस्थ समझिएगा। अब औलाद औरंगजेब न बने तो क्या करे, समय पर हज के लिए निकल लें तो पत्नी की कब्र पकड़ कर न रोना पड़े। जिन्हें इस बात से आपत्ति हो तो सोचें, इस्लाम ने वानप्रस्थ का नाश कर दिया वरना आप कान पकड़ कर जंगल भेज दिए जाते। फिर यह सोचें कि हर धर्म कहता है जीवन की जिम्मेदारियाँ पूरी होते ही हज या तीर्थ यात्रा आदि हो, निकल लें, समाज में समाज के लिए जीवन अर्पित करें। बच्चों को बांधने और उनके आपके बंद कमरे में आने का इंतजार करने के बेहतर है खुद को अपने आप से अपने कमरे से और अपनी सनक से आजाद करें। बूढ़ों के नाम पर लिखी हिन्दी कहानियाँ न पढ़ें, भले ही वनमाली-कथा में छपी हों।