परहेज़ से पार


मेरे पास असंभव कामों की एक लंबी सूची है। परहेज़ करना उनमें से एक है। नापसंद से नापसंद स्थान, वस्तु, खाद्य, व्यक्ति, कार्य, पुस्तक, कविता या कल्पना, किसी से भी परहेज़ कर पाना कठिन होता है।

ज़िंदगी भर आप कितना भी सोचें बुढ़ापे में अपने बाप जैसा न बनेंगे। अगर परहेज़ में डॉक्टर सिर्फ इतना लिख दे कि अपने बाप जैसा नहीं बनना तो बस तुरंत बुढ़ापा क्या आज के पहले ही हम बाप जैसे बन जाते हैं।

अब चिकित्सक ने लिखा कि नमक मीठा कम करो तो दाल सब्जी में नमक कम कर दिया जाता है खीर, चाय और कॉफी में मीठा। मगर सलाद, आचार चटनी जो ज़िंदगी भर देखे भी न हों, पूरी तरह नमकीन चटपटे होकर मेज पर सवार हो जाते हैं। मीठी चाय पीने वाले, एक नंबर के नशेड़ी लगते हैं और कड़वे पेय में बिना लेबल पढ़े मीठा लेमोनेड मिला लिया जाता है। मीठे से परहेज़ पर दो ग्लास गन्ने के जूस दो दाने चीनी से कम ख़तरनाक लगता है। गुड़ का तो कहिए ही मत, हिंदुस्तान में मधुमेह से मरने से एक मिनिट पहले तक कोई नहीं मानता कि गुड़ मधुमेह के लिए मीठा होता है। शहद या मधु का तो मधुमेह से नाम का ही संबंध ज्ञात प्रतीत होता रहता है। यदि इनमें से कुछ भी निजी सीमा से अधिक हो जाए तो चिकित्सक आप को और आप चिकित्सक को अल्पबुद्धि समझने लगते हैं। यदि इनमें से कोई एक वृद्ध हो तो दोनों एक दूसरे को मूर्ख से कम नहीं समझते। दोनों वृद्ध हों तो कुछ कहना बेकार हो जाता है।

नमक का तो मामला ही गड़बड़ है। नमक छोड़कर सेंधा बनाम लाहौरी बनाम मुल्तानी बनाम अलाने बनाम फलाने वाले तो विख्यात रसायन शास्त्री होते हैं। कुछ तो इतना कमाल करते हैं कि इस प्रकार के नमक को एनएसीएल की जगह एच2ओ कर देते हैं। सुना, रसायनशास्त्र के भारत विख्यात प्रोफसर तो इस प्रकार के नमक के रासायनिक संरचना पर कोई बड़ी फ़ेलोशिप घोषित करने के जुगाड़ में हैं। कुछ कदम आगे जाकर काला नमक लोगों का तारणहार बनता है।

क्या साधारण नमक को पिघलाने/उबालने या उसे हर्र के साथ पिघलाने/उबालने से उस की रासायनिक संरचना कुछ और हो जाती है? यदि बीमारों के विश्वास पर चलें तो ऐसा ही कुछ होता है। काला नमक अगर दही, सलाद, चटनी, अचार, या शिकंजी में काला नमक डाल कर खाया जाता है कि फीकी दाल सब्जी में आम तौर पर पड़ने वाले से अधिक नमक शरीर में जा टिकता है।

अब मुझे ही देख लीजिए, डॉक्टर ने दूध बंद किया तो केसर-इलायची-बादाम-काजू वाला दूध प्रारम्भ कर दिया। चाय कॉफी पीना तो दूध बंद होने के बाद ही प्रारम्भ किया। अभी-अभी समझ आया, गाय तो दूध ही नहीं देती, अमृत देती है। इतने साल से अमृत खरीदकर मैं नादान उसे दूध नामी विष समझ रहा था।

आज से अपना अमृत-महोत्सव प्रारम्भ।

वृद्धाश्रम – वानप्रस्थ की ओर


पिछली पोस्ट भूला गया वानप्रस्थ में मेरा कहना यह रहा कि माता पिता की मोह माया में लिप्त लंबी उम्र बच्चों के लिए सिरदर्द न बने, इसीलिए भारतीय परंपरा वानप्रस्थ आश्रम की बात करती है। आज के वृद्धाश्रम इस व्यवस्था का पूरक या सरलीकरण के रूप में सामने आ सकते है। वानप्रस्थ जंगल जाने का नाम यानि वनवास नहीं है, वन की तरह सहज सरल उपजाऊ सामाजिक और सार्वभौम हो जाने का नाम है, सबके हो जाने और सबको अपना लेने का नाम है। वन भारतीय परंपरा से सार्वजनिक स्थान है। राम और पांडवों के वनवास वानप्रस्थ नहीं हैं। 

मेरे बाबा सेवानिवृत्ति के बाद कर्णवास जाकर रहने लगे और बहुत बीमार होने पर घर आए। यह सब उनकी स्वतंत्र इच्छा से हुआ। उनके द्वारा निर्माण कराया गया कमरा आज भी वहीं होगा, उनके आने के बाद इन चालीस बयालीस वर्षो में परिवार से कोई उसे देखने नहीं गया। कारण स्पष्ट है, बाबा ने यह अपने लिए नहीं समाज के लिए बनवाया था। मेरी पीढ़ी ने तो खैर कर्णवास मानचित्र में ही देखा है। 

इसके विपरीत, मेरे पिता के पास घर से जाने की सुविधा नहीं रही। सरकारी सेवानिवृत्ति होने के बाद भी, उनकी सेवानिवृत्ति पारिवारिक रूप से बहुत बहुत बाद में हुई। यथाशक्ति पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वाह करने के बाद वह कम से कम दस वर्ष अपने घर मे अकेले रहे। धन- साधन होने के बाद भी अपना नहाना-खाना खुद करते रहे। आम तौर पर वह बहुत सामाजिक नहीं रहे थे पर अब रिश्ते नाते के मोह बहुत कम हो गए थे| गिने चुने मित्र, पड़ौसी और संबंधियों से ही उनके संबंध रहे हैं। मगर इस पूरे समय में वह किसी पर आंशिक तौर पर भी आश्रित नहीं हुए। 

फोन होने के बाद भी सामान्य तौर पर फोन पर भी हमारे जीवन ने प्रायः दखल नहीं दिया। आज वह साथ रहते हैं तो भी घर में खास दखल देने की इच्छा नहीं रखते। यहाँ तक कि कई बार हम लोगों को कोफ़्त होती है कि यह आदमी सिर्फ़ अपने सुख – दुख, खाने-पीने, हगने- मूतने के अलावा कुछ नहीं सोचता। खाने पीने को लेकर उम्र, पुरानी आदतों और हमारी निगाह के हिसाब से सनक के कारण उनकी कुछ विशेष जरूरत रहती है। मगर दूसरी ओर वह बाकी किसी मामले ले बिना आमंत्रण राय भी नहीं देते। मैं समझता हूँ, इसे भी हम वानप्रस्थ की आदर्श स्थिति नहीं है। परंतु आम वृद्ध समाज की स्थिति से बहुत बेहतर है। 

मेरे पिता एक उदाहरण है कि यह जरूरी नहीं कि आप अपना घर छोड़ें या वनवासी हो जाएँ। मोह-ममता के साथ सेवा चाहने जैसी बातों से मुक्त ही जाना क्या वानप्रस्थ नहीं है। परंतु यदि परिवार का साथ आपको मोह माया में बांधता है तो घर से निकालना होगा कम से कम तब तक के लिए जबतक आप मोह माया को मन से न निकाल दें। यह स्थान वृद्धाश्रम हो सकता है। यदि हम वानप्रस्थ और वृद्धाश्रम में तुलना करें तो पाएंगे वृद्धाश्रम वानप्रस्थ का पासंग नहीं ठहरता। यदि आप वृद्धाश्रम को स्वेच्छा से अपनाते है तो यह वानप्रस्थ के मार्ग में एक कड़ी हो सकता है। वृद्धाश्रम आपको मोह-माया त्यागने के लिए बाध्य नहीं करता परंतु आप उस दिशा में इसे एक साधन के रूप में अपना सकते हैं।

आप भविष्य में अच्छे वानप्रस्थ बनें इसके लिए अपने गृहस्थ दिनों में ही वृद्धाश्रम विरोधी भावना से मुक्त हो जाना होना होगा। 

यथार्थवादी चित्रण – “सिर्फ एक बंदा काफी है”


मई 2023 भारतीय व्यावसायिक सिनेमा को दो महत्वपूर्ण फ़िल्में देने के लिए याद किया जाएगा। “कटहल” और “सिर्फ एक बंदा काफी है” बॉक्स-ऑफिस के आंकड़ों के इतर सफल हिन्दी फिल्मों के तौर पर याद की जाएंगी।

जब आप किसी कानूनी करिश्मे पर काम कर रहे हों तो आप पर कानून की सही ओर बने रहने का दबाब होता है। आप नहीं चाहते कि ऐसा कुछ कहा या किया जाए जिस आप मानहानि या अदालत की अवमानना का सामना करना पड़े। बात-बात में भावना आहत कर लेने वाले वर्तमान संदर्भों में फिल्म की कथावस्तु यथार्थ चित्रण की मांग करती है।

यह कटु यथार्थवाद की फ़िल्म है और उस उद्देश्य में निर्विवाद रूप से सफल रही है। यथार्थवादी चित्रण के बाद फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उसके प्रमुख अभिनेताओं का मँझा हुआ अभिनय है। अधिकतर अभिनेता कठिन स्थितियों में संयत रहकर भाव-विन्यास प्रदर्शित कर सके हैं। कम बोलकर अधिक समझने-समझाने पर ज़ोर दिया गया है।

अभिनय संवादों पर भारी पड़ता रहा है। फ़िल्म में सार्वजनिक सूचना की सीमा में कथानक और संवाद को बनाकर रखने का दुःसाध्य प्रयास हुआ है। स्वभावतः संवादों में कल्पना का नमक कम है। कानूनी और अदालती संवाद में उपलब्ध सूचना को आपस में जोड़ने मात्र से रचनात्मकता नहीं न्यूनतम आवश्यक श्रम किया गया है। यह बात सराहनीय और यदा कदा असहनीय हो जाती है। किसी भी फालतू शब्द को खर्च न कर-कर फिल्म अपने मूल आधार और गति पर कायम रहती है।

अपने नाम के अनुरूप इस फ़िल्म में मनोज बाजपेयी पूरी तरह छाए हुए हैं। सूर्य मोहन कुलश्रेष्ठ शब्दहीन दृश्यों में बेहद मुखर अभिनय करने में सफल रहे हैं। है। मां बाप की भूमिका में जयहिंद कुमार और दुर्गा द्वंद दिखाने में कामयाब रहे, परंतु उनसे अधिक बेहतर काम लिया जा सकता था। विपरीत परिस्थिति के बावजूद विपिन कुमार शर्मा प्रभाव छोड़ पाए हैं।

परंतु संवाद और सूचना की कमी के चलते वरिष्ठ अधिवक्ताओं की भूमिका में आते जाते अभिनेता प्रभाव डालने में सफल नहीं हो सके। जबकि यथार्थ में उनकी भूमिकाएँ केन्द्रीय होती हैं। क्योंकि फ़िल्म अधिवक्ता के दृष्टिकोण से बनाई गई जय, यह बात कहना महत्वपूर्ण है।

वास्तविक जीवन में वरिष्ठ वकील किसी मुकदमे में तथ्य या कानून की गलत ओर पाए जाते हैं तो उनका हावभाव अतिक्षुब्ध या कुटिल दिखाई देता है। अदालत के कमरे से बाहर आने तक उनका चेहरा सपाट नहीं होता और उसके बाद वह निर्लिप्त हो जाते हैं। फ़िल्म में केवल दो अधिवक्ता ही अपने मुकदमे में दिलोजानोदिमाग़ से लगे हैं, बाकी लगता है, चुपचाप नोट छाप कर चले गए। लगभग हारे हुये मामलों में ऐसा होता भी है, परंतु वास्तविक घटनाक्रम पर ध्यान दें तो इसकी संभावना कम लगती है। फिल्म में इन वरिष्ठ अधिवक्ताओं को अपनी जिरह का थोड़ा और मौका मिलता, तो अभियोजिका के वकील साहब भी अधिक निखरते।

वरिष्ठ वकीलों के बेहद महंगे चमकीले काले कोट, गाउन और कनिष्ठ अधिवक्ताओं की भीड़ गायब हैं। उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के अंदरूनी कमरों की कल्पना यथार्थ से मेल नहीं खाती। फिल्म अपने यथार्थवादी चित्रण, अभिनय और बजट के लिए जानी जाएगी। जहाँ कुछ भी फालतू खर्च नहीं किया गया है। पार्श्व संगीत का एक सुर भी नहीं। कसे हुए निर्देशन के लिए अपूर्व सिंह कर्की को बधाई देना बनता है। कुल मिलाकर फिल्म का निर्देशन, अभिनय, लेखन, स्क्रीनप्ले, एडिटिंग बेहतर कहा जाएगा।