शौर्य बनाम शहादत


शहीदों की जय है| वीरगति जैसे अधिक उपयुक्त शब्दों को छोड़कर शहीद का प्रयोग बढ़ गया है| वीरगति प्राप्त करने के लिए शौर्य की जरूरत हैं, शहीद होने के लिए एक मकसद और मरने की| शहीद शब्द के प्रयोग में बहुत सारी सुविधा रहती है| किसी दुर्घटना, आतंकवादी या छापामार हमले, से लेकर प्राकृतिक आपदा तक में बिना किसी वीरता का प्रदर्शन मारे जाने वाले सेनिकों या असेनिकों के किये शहीद का प्रयोग करने की सुविधा है|

आधिकारिक शब्दावली के किल्ड इन एक्शन में एक विशेष बात है| यह शब्द सेन्य मृत्यु को अनावश्यक चमकदमक से दूर रखता है| इसका अपना उचित कारण है| सोचिये अगर शहादत की चमकदमक सेन्य मृत्यु के साथ जोड़ दी जाए तो सेनिक लड़ेंगे या शहीद होंगे? यह बहुत ही चिंताजनक स्त्तिथि हो सकती है| सेनिक का काम शहीद होना नहीं है, शौर्य प्रदर्शन है| यह बाद सुनने समझने में निंदनीय लग सकती है कि कोई सेनिक शौर्य प्रदर्शन के स्थान पर शहीद होना पसंद करेगा| परन्तु यह निश्चित रूप से सही है कि एक अनावश्यक शब्द उसके लिए साहस और शौर्य बनाये रखने की प्रेरणा कम कर सकता है| उसकी साहसपूर्ण वीरगति का अगर सामाजिक मूल्य न रह जाए तो उसके लिए एक प्रेरणा की स्पष्ट कमी दिखाई देती है|

अगर आप समाचार माध्यमों पर गौर करें तो पाकिस्तान सीमा पर या कश्मीर में होने वाली सेन्य मृत्यु को जिस प्रकार चमकदमक प्रदान की जाती है उससे क्या ऐसा भाव नहीं आता कि अन्य क्षेत्र में होने वाली सेन्य मृत्यु कम गरिमावान हैं? यही और इसी तरह की बातें हमारी चिंता का विषय हैं|

वीरगति को प्राप्त करना एक वीर की कामना है| वह देश रक्षा करे, युद्ध में अपना कौशल और शौर्य दिखाए| वह अगर मरे तो कायर की मौत न मरे – ऐसा अक्सर वीर कहा करते हैं| क्या वो कायर होते हैं जो उन्हें कायर की जैसी मौत की चिंता होती है? नहीं, मगर वीर मृत्यु का उचित वरण जानते हैं|

कोई सेन्य मृत्यु कम नहीं होती| परन्तु युद्ध में अपना कौशल और शौर्य दिखाने का अवसर हर वीर को नहीं मिलता| यह दुर्भाग्य वीरों की चिंता और प्रेरणा है, कुछ वीरों को ही वीरगति दिखाने का अवसर मिलता है|

लच्छेदार शब्दजाल हानिकारक हो सकता है|

युद्ध का नशा


जब देश पिछले तीन युद्ध जीत चुके हो तब जनता के लिए युद्ध का विचार सरल होता है| परन्तु अगर देश पिछले पैतालीस साल से कोई युद्ध नहीं लड़ा हो तो यह विचार युद्ध के उन्माद में बदलना सरल होता है| किसी को यह याद नहीं रहता कि विजेता पक्ष से कितने लोग मारे गए, कितने घायल हुए, कितने बंदी बना और लौटे नहीं, कितने भगौड़े घोषित किये गए| सब जीत की कहानियाँ कहते हैं, जीत के घाव सीने पर नहीं होते| यह सब उस जनता के लिए अधिक सरल होता है, जिसका युद्ध से वास्ता मात्र टेलिविज़न पर पड़ता है| जिन्हें घर में सोफ़े पर बैठकर रिमोट हाथ में लेकर युद्ध देखना होता है उनके लिए युद्ध का अर्थ किसी विडियो गेम से अधिक नहीं होता|

युद्ध मूर्खों का मनोरंजन है, महामूर्खों का बदला है, और अपरिपक्व राजनीतिज्ञ की रणनीति है|

बहुत मित्र गीता और महाभारत को बार बार युद्ध के समर्थन में सामने लाते हैं| परन्तु सब जानते हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण युद्ध की तैयारियां होने के बाद भी शांतिदूत बनकर कौरवों से मिलने गए थे| उन्होंने सालों साल टलते युद्ध को एक बार फिर टालने का प्रयास किया| महाभारत में हुई तबाही कथा के रूप में सबके सामने है| क्या मानवता, क्या भारतवर्ष, क्या जम्बूद्वीप विजयी हुआ? जिन्हें लगता है कि भारत और पाकिस्तान भारतवर्ष का भाग नहीं हैं, उन्हें सिर्फ क्षणिक इतिहास का बोध है| वह भूल रहे हैं कि गंधार से गंगासागर तक भारतवर्ष का अमूर्त स्वरुप है, इस भूमि में राज्य बनते बिगड़ते रहते हैं| वह भूल रहे हैं, देशों के मानचित्र समय बदलता है| महाभारत में रहे राष्ट्र आज नहीं हैं, मगर भारतवर्ष आज भी अपने घाव सहला रहा है|

किसी भी युद्ध का अंत अंतिम विनाश से होता है या फिर वार्तालाप से| यह सही है कि विजेता इतिहास रचता है| बार बार बांग्लादेश का उदाहरण न दें, वहाँ का सत्य मात्र भारतीय सेना नहीं है, जन विद्रोह, गहन कूटनीति, गंभीर राजनीति, सामरिक रणनीति और उचित समय का इन्तजार उसका मूल था| मगर उस जीत से भी भारत को क्या मिला – अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी, असम समस्या, जलता हुआ उत्तर पूर्व, अप्रशिक्षित, घरेलू नौकर, और ढेर सारे युद्ध उन्मादी !!

किसी भी उन्माद से बचें| युद्ध की देवी बलि मांगती हैं – केवल दुश्मन की बलि नहीं|

मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ


मनीषा कुलश्रेष्ठ का मल्लिका ऐतिहासिक ताने बाने में बुना साहित्यिक पृष्ठभूमि का उपन्यास है| इस उपन्यास की नायिका मल्लिका के बारे में हिंदी में हमेशा चर्चाएँ रहीं हैं और उनके बारे में गंभीरता से छपता भी रहा है| परन्तु उनके बारे में बहुत कम वर्णन मिलता है| यह विडंवना है कि शुद्धतावादी भारतीय समाज हिंदी की प्रथम महिला साहित्यकार और अनुवादक मल्लिका का नाम बड़ी आसानी से भुला देता है| यह जानकारी तो मिल जाती है कि हरिश्चंद पत्रिका का नाम हरिश्चंद चन्द्रिका रख दिया गया था परन्तु चन्द्रिका यानि मल्लिका के बारे में हम मौन हो जाते हैं| दुर्भाग्य है कि हिंदी की प्रथम महिला होने का गौरव रखने वाली इस स्त्री को हम भारतेन्दु हरिश्चंद्र की प्रेमिका के आगे कोई परिचय नहीं दे पाते| प्रसंगवश कह दूँ कि हम प्लासी युद्ध में अंग्रजों के सहायक रहे अमीचंद के प्रपोत्र होने के लिए आज तक हरिश्चंद के पक्ष विपक्ष में चर्चा कर लेते हैं परन्तु मल्लिका के बारे में कोई चर्चा भी नहीं होती|

कहा सकता है कि यह उपन्यास उस महिला के बारे में है जिसने हिंदी में बंगला उपन्यासों का अनुवाद कर कर इस विधा से न सिर्फ हिंदी का परिचय करवाया, साथ ही हिंदी का पहला मौलिक उपन्यास –  कुमुदनी – भी लिखा|

इस उपन्यास में मनीषा कुलश्रेष्ठ में मल्लिका के सामाजिक और साहित्यिक पक्ष को उभारने का प्रशंसनीय प्रयास लिया है| स्पष्टतः यह प्रयास जानकारियों के अभाव के चलते साहित्यकार मल्लिका के साथ पूरा न्याय नहीं कर पाया है| परन्तु मेरा मानना है कि मल्लिका खुद भी अपने जीवन संघर्ष में अधिक नहीं टिक पाई| उस समय का समाज, देशकाल और घिसीपिटी परम्पराएँ हिंदी, राष्ट्र और स्वयं मल्लिका के लिए भारी पड़ीं| उन स्तिथियों में यह उपन्यास उनके समय के संघर्षों को उभारने में सक्षम रहा है|

उपन्यास में निजी वर्णनों में सच्चाई का पुट ढूँढना बुद्धिमत्ता नहीं होगी| लेखिका ने उपलब्ध जानकारियों के आधार पर उन्हें वास्तविकता के साथ गढ़ा है और स्वाभाविकता प्रदान की है|

आम पाठक और हिंदी प्रेमी के लिए यह उपन्यास वरदान की तरह है जो उस समय के भाषाई संघर्षों, सामाजिक अवचेतना, सामाजिक पुनर्निर्माण, व्यक्तिगत और राजनैतिक विरोधाभासों को स्पष्टतः रेखांकित करने में सफल रहा है| यह उपन्यास एक बार में पूरा पढ़ लिए जाने ले लिए पाठक को प्रेरित करता है|

जिन पाठकों को अमीचंद, बंकिमचन्द्र, ईश्वरचंद विद्यासागर, भारतेंदु हरिश्चंद, हिंदी के आदिकाल के बारे में समुचित जानकारी है, उनके लिए इसे पढ़ना और गुनना बेहद रुचिकर है|

मल्लिका – मनीषा कुलश्रेष्ठ

 

पुस्तक – मल्लिका
लेखक – मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक – राजपाल प्रकाशन
प्रकाशन वर्ष – 2019
विधा – उपन्यास
इस्ब्न – 9789386534699
पृष्ठ संख्या – 160
मूल्य – 235 रुपये
यह अमेज़न पर यहाँ उपलब्ध है|