मतदान


कल मतदान का दिन है|

सालों ने एक छुट्टी बर्बाद कर दी| कोई इतवार को भी चुनाव रखता है क्या? इन कमीशन वालों को तो बस पाँच साल में एक बार काम करना होता है| मगर हम से इतवार को वोट दलवायेंगे| इन के सरकारी लोग भी सब थोड़े से पैसे और ओवरटाइम के लिए इतवार को दौड़ पड़ते हैं चलो वोट डालो|गर्मी भी तो कितनी है – हे भगवान ४२ पार|

चुनाव भी क्या है| लोग पैसा लेकर वोट डालने जाते हैं| दारू ठर्रे के लिए वोट हो जाता है| देखा है न सब मैले कुचले लोग कतार में खड़े रहते हैं जैसे कोई भंडारा हो| कोई मुफ्त में वोट डालने| कौन खड़ा हो इन कीड़ों के साथ| मैं तो नहीं जाता| गर्मी में मनाली जाएँ कि मतदान केंद्र?

कुछ नहीं होना इस देश का वैसे भी| सब एक थाली के चट्टे बट्टे हैं| कोई देश नहीं बदलता| देश अपने आप बदलता है|हर कोई चला आता है मैंने ये किया, उसने ये नहीं किया| अरे भाई, हमने अगर १२ घंटा कंपनी के ऑफिस में कुर्सी नहीं तोड़ी होती तो क्या कुछ कर लेते ये नेता लोग|

इन नेता लोग को तो वैसे भी कुछ नहीं करना होता| अफसर करते हैं अफसर| अब देखों अफसर ने कॉपी पेस्ट ड्राफ्ट कर के कोई टेढ़ा मेढ़ा कानून सा बना दिया| न बहस, न चर्चा, न बात न चीत, बस ये ये ये ये… …. हो गया पास|उखड़ गया घंटा|

कुछ भी कर लो, मंदिर नहीं बनेगा| न १९८४ वालों को सजा मिलेगी न २००२ वालों को| विकास की दर दुनिया ब्याज की दर की तरह ही थोड़ा थोड़ा बढ़ेगी| सरकार कोई भी हो| आरक्षण हटेगा नहीं, और हमें बिना काम वाली सरकारी नौकरी मिलेगी नहीं|

चुनाव क्या है, बड़े सेठ लोग का हँसी ठठ्ठा है| नेता नाचते हैं, मुजरे में भाषण करते हैं और वाह वाह सुनकर चल देते हैं| दस मिनिट में भाषण कूड़ा| कौन याद रखता है भाषण, अख़बार वाले| उनको तो बस रद्दी छापनी होती है| कोई काम की बात आती है अखबार में| वैसे आये भी तो क्या? कौन सा हमको पढ़ना है| हमें तो बस हीरोइन का फ़ोटो देखना है|

चल कहीं फ़िल्म देखने चलते हैं|

(अब यह बकबास कर ली हो या पढ़ ली हो तो चलें वोट डालने| हमारी दिल्ली में तो भैया कल है कल|)

आपातकाल का बोझ


आपातकाल भारत में आज चालीस साल बाद भी मुद्दा बन कर खड़ा है| एक पक्ष इन दिनों किसी अघोषित आपातकाल से कष्ट महसूस करता है| दूसरा पक्ष किसी परोक्ष आपातकाल को बिना सकारे और नकारे आपातकाल के दुःख आज भी याद करता हैं| कुल मिलाकर दोनों पक्ष मानते हैं कि आपातकाल दुःख भरा समय था और इसे दोहराया नहीं जाना चाहिए| विवाद केवल इस बात में हो सकता है कि आज आपातकाल जैसा माहौल है या नहीं| मुझे इस विवाद में दिलचस्पी नहीं है| भारत में हर सरकार किसी न किसी रूप में और किसी न किसी रूप में मानवाधिकार और नागरिक अधिकारों के विरुद्ध काम करती रही हैं|

आज का समय मह्त्वपूर्ण इसलिए है कि दोनों विरोधी धड़े किसी न किसी रूप में आपातकाल और उस के समर्थन से जुड़े रहे हैं|

आपातकाल की जिम्मेदारी का उत्तराधिकारी कौन हैं? इंदिरागांधी का कौन सा पुत्र अथवा पौत्र?

इंदिरा गाँधी के बड़े पुत्र राजीव गाँधी की आपातकाल में किसी भूमिका का कोई उल्लेख नहीं रहा है| यह अलग बात हैं कि परोक्ष रूप से उन्होंने अपने छोटे भाई और माँ का समर्थन किया हो|

उस समय के युवराज माने जाने वाले इंदिरा गाँधी की छोटे पुत्र संजय गाँधी की आपातकाल में भूमिका जग जाहिर है| बल्कि आपातकाल को कई विश्लेषक उनके दिमाग की उपज मानते रहे हैं| परन्तु आपातकाल हटने संजय गाँधी के अपनी माँ से शायद अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे| उनकी मृत्यु के बाद उनका परिवार इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी परिवार के दूर हो गया| मेनका संजय गाँधी और वरुण संजय गाँधी, संजय गाँधी की उस विरासत को काफी हद तक कांग्रेस और राजीव गाँधी परिवार को सोंपने में कामयाब रहे हैं|

आपातकाल के संभावित लाभार्थी आज अपने राजनैतिक दल के साथ आपातकाल के विरोधियों के साथ गुपचुप खड़े दिखाई देते हैं| परन्तु, आपातकाल का यही विरोधी धड़ा उस समय की कई तथाकथित अच्छाइयों को मानक की तरह प्रयोग भी करता है| मुस्लिम विरोध, नागरिकों के सीमित अधिकार, कड़ा नागरिक अनुशासन उनके प्रिय गौरव हैं|

अभी हाल में मैंने फेसबुक पर एक मतदान करवाया था:

आज जनता को यह स्पष्ट नहीं है कि संजय गाँधी को वह किस राजनैतिक दल के साथ खड़ा कर आकर देखें| संजय गाँधी अपने पूरे जीवन में कांग्रेस में रहे| संजय गाँधी की पूरी राजनैतिक विरासत अपनी पूरी जिम्मेदारी और नकारात्मकता के साथ कांग्रेस के साथ हैं|

आश्चर्यजनक रूप से संजय गाँधी के सभी निजी विचार और कट्टरता उनके परिवार के साथ में भारतीय जनता पार्टी में मौजूत हैं| वास्तव में आज के दोनों बड़ी राजनैतिक दल संजय गाँधी की विरासत, आभा और प्रभा मंडल की प्रतिछाया हैं| दोनों दल इंदिरा गाँधी परिवार के एक एक धड़े के साथ खड़े हैं|

जनता के पास इस सब को देखने समझने और इस में उलझने के लिए अपने अपने चश्मे हैं|

बेवफ़ा


मेरी बेवफ़ा ने मुझे छोड़ा न था, दिल तोड़ा न था|

मेरी जिन्दगी से रूह निकाली न थी|

मेरी जिन्दगी में न जलजले आये, न सूखी आँखों में सैलाब, न बिवाई फटे पाँवों तले धरती फटी|

जिन्दगी यूँ ही सी घिसटती सी थी, नीरस, बंजर, लम्बी ख़ुश्क सड़क बिना मंज़िल चलती चली जाती हो|

उस के बिना कल दो हजार एक सौ सतासीवीं यूं ही सी उदास शाम थी|

कहवाखाने के उस दूर धुंधले कोने में उसका शौहर कड़वे घूँट पीता था|

काँगड़ा की उस कड़क चाय की चुस्की के आख़िरी घूँट पर ख़याल आया|

इश्क़ मेरे दिल से रिस रिस के तेरे हुज़ूर में सज़दे करता है, मिरे महबूब!

मेरे माशूक किस कहर से बचाया था तूने मुझे|