तीन घंटा बनाम मेरी मर्जी


फिल्म और टेलिविज़न कम या कहें कि नहीं देखने की आदत का मेरे जीवन में बड़ा योगदान रहा है| मगर ऐसा भी तो नहीं है कि मुझे दृश्य साहित्य पसंद नहीं है| टेलिविज़न का नारदीय रूप यानि देशी समाचार चैनल कभी पसंद नहीं आये| परन्तु शुद्ध दूरदर्शन के शुद्ध ज़माने में वृत्तचित्र देख लेता था| वर्ना रेडियो कहीं बेहतर उपाय है| कहीं भी बैठ उठ कर सुन लिया| बीबीसी, दुयुचे वैले, वॉयस ऑव अमेरिका से लेकर रेडियो पाकिस्तान तक दुनिया भर के दोनों तीनों पक्ष से समाचार सुन लिए जाते थे| टेलीविज़न समाचार में नाटकीयता अधिक और गंभीरता कम है|

दृश्य साहित्य के तौर पर मैं कभी कुछेक टेलिविज़न नाटकों और गिने चुने सीरियल से आगे नहीं बढ़ पाया| फिल्मों का हाल यह कि तीन घंटे बैठना हमेशा भारी पड़ता था| मैं टिक कर नहीं बैठ सकता| हर आधा घंटे के भीतर अन्दर का ऊदबिलाब ऊलने लगता है| कोई फिल्म टीवी पर दो-तीन बार आ गई या किसी वजह से लेटे पड़े हैं तो साल दो साल में फिल्म पूरी हो गई| हॉल में फिल्म देखने का यह हाल रहा कि सिनेमा हॉल में देखी गई फिल्मों की संख्या अभी तक दर्जन नहीं पकड़ती| लगता है घुट कर मर जाऊँगा इस कैद में|

फिर सूचना क्रांति हुई| आपको कभी भी फ़िल्म रोकने चलाने की सुविधा हो गई| जब जिनता मन आये देख लो| मगर उसमें भी कई हाल में आपका मोबाइल आपके समय और आपकी जगह पर फ़िल्म सीरियल और समूचा दृश्य साहित्य उपलब्ध कराने लगा है| कई बार एक दृश्य देख कर रुके और ढेर सारा मनन चिन्तन और विश्लेषण कर लिया| मन हुआ तो प्यारी सी दोस्ताना किताब की तरह लगे रहे|

जिस प्रकार अच्छी किताब यह करती है कि वह कब तक आपको पढ़वाती जाएगी, ये फ़िल्में और सीरियल भी खुद तय करते हैं| मगर आपको कैद में नहीं बंधना पड़ता|

फिर भी मैं किताबों को पसंद करता हूँ, भले ही वह किन्दल, मोबाइल या लेपटॉप पर क्यों न हो| किताबें आपसे अधिक बात करती हैं और आपकी समझ को खुला वितान देतीं हैं| दृश्य माध्यम में आप शांत निर्लिप्त प्रेक्षक होते हैं जिन्हें निर्देशक और अभिनेता की निगाह से दुनिया देखनी होती है|

सुना है, कुछ इंटरैक्टिव कहानियों पर काम हो रहा हैं| परन्तु… शरद पूणिमा की पीली गुलाबी सी बेलाई ठंडक को निर्देशक की निगाह से समझने की जो मजबूरी इन माध्यम में है वह किताब में नहीं है|

फिर भी जो है, स्वागत योग्य है|

अच्छी फिल्मों और सीरियल के बाद उनकी मूल कहानी पढ़ी जाए तो नए सोपान अब भी खुलते हैं और शायद आगे भी खुलते रहेंगे|

भेदभाव उत्पादक यंत्र


मोटर वाहन एक ऐसा यंत्र है जो अपने मालिक और चालक को मनुष्य के स्तर के उठा कर सांड के स्तर पर लाकर रख देता है| जिस की जितनी बड़ी गाड़ी, उतना बड़ा सांड| मोटरवाहन की कुर्सियाँ उस सिंहासन की तरह है जहाँ से दूसरों ख़ासकर पैदल चलने वालों और कीड़े मकौड़े में कोई फर्क नहीं दिखाई देता|

एक हिन्दुस्तानी सड़क दुनिया का सबसे ख़तरनाक इलाका है जहाँ किसी को भी गाली गलौज कर सकते हो, पुलिस को अपने बाप का नाम बता सकते हो, दरोगा से उसकी औकात पूछ सकते हो, छोटी गाड़ी में बैठे बूढ़े पर हाथ उठा सकते हो, और सबसे बड़ी बात बिना गलती माफ़ी मांग लेने वाले को खानदानी पापी मान सकते हो| अगर आपको वर्णभेद और जातिभेद हमारी पुश्तैनी भेदभावी आदतें समझनी हैं तो हिन्दुस्तानी सड़क बढ़िया ठिकाना है| यहाँ आपके रंग, आपके कपड़े, आपकी गाड़ी और आप की सहनशील स्वभाव आपको वर्णभेद का शिकार बना सकता है| यह ऐसा भेदभाव है जिसमें आपके कर्म, जन्म, रंग आपके बारे में कुछ तय नहीं करते| आपको पददलित बनाने का काम इस बात से भी तय हो सकता है कि आप अपनी दसकरोड़ी गाड़ी को मरम्मत के लिए दे आये हैं और पिताजी की दो लाखी गाड़ी लेकर सड़क पर उतरे हैं| यह भेदभाव ही है जिसके कारण एक सस्ती मगर बढ़िया गाड़ी हिन्दुस्तानी बाजार में बिक भी नहीं सकी|

जो आदमी सड़क पर गलत हाथ पर चलता हुआ बिना किसी लाल हरी रौशनी का ध्यान दिए अपने वाहन में आकर बैठता है वह भी चाहता है कि हर सूअर या कीड़ा मकौड़ा सारे नियम का पालन करे| वास्तव में उसे अपने लिए सब सुविधाएँ चाहिए मसलन – रास्ता साफ़ हो, चमकदार सड़क हो, कोई रास्ता जाम न मिले, पुलिस वाला बिकाऊ हो और हर अँधा-बहरा भी उस का वाहन देखे और फालतू बजता उसका भोंपू सुने और आपातचिकित्सा वाहन भी उसके लिए रास्ता छोड़ दें|

मोटर वाहन भेदभाव के सबसे बुरे शिकार मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोचालक, रेहड़ीवाले, टैक्सीवाले हैं| उनका कोई दिन मोटर वाहन वाले किसी न किसी दैत्य से बिना गाली सुने नहीं बीतता|

खस्ता कचौड़ी की अर्थव्यवस्था


प्रधान जी ने पहले ही पहचान लिया था कि मजेदार खस्ता बनेगा| बोले, खूब तलो, सब मिलकर तलो| नादान समझ न पाए| जब अर्थव्यवस्था के हालत खस्ता हों (या होने वाली हो) तो खस्ता तलने में ही भलाई है| मैं मजाक नहीं कर रहा  हूँ| अभी हाल में अलीगढ़ में कचौड़ी तलने पर सरकारी छापा पड़ा और सालाना बिक्री का आंकड़ा गरमागरम खस्ता निकला – पूरे साठ लाख सालाना|

मुझे अलीगढ़ी कचौड़ियों से प्रेम है| एक समय था, जब मेरी, मेरी पढाई की और देश की हालत ख़राब थे और देश का मण्डल कमण्डल हो रहा था| तब मैंने बहुत सारी चीज़े बनाना सीखा था| उस समय मेरी समझ यह विकसित हुई थी कि कपड़ा और खाना दो धंधे धड़ाकू आदमी के लिए और वकालत और वैद्यकी पढ़ाकू आदमी के लिए बहुत बढ़िया है| यह बात अलग है कि मुझे अब लगता है पहले दो धंधों में पढ़ाकू और दूसरे दो धंधों में धड़ाकू अधिक सफल हैं|

चाट पकौड़ी वाले भोजन में लागत के मुकाबले बाजार मूल्य अधिक होता है| देखा जाए तो जब तक आपको ग्राहक को बिठाने पर खर्च न करना हो तो लाभ पक्का और पका पकाया है| किसी भी ठीक ठाक चलती दूकान पर पहुँचें तो पाएंगे कि हर पांच मिनिट में उसके पास एक ग्राहक होता है और अगर हर ग्राहक औसतन पचास रुपये का माल उठाता है तो साल भर में इक्कीस लाख रुपये का धंधा हो जाता है| दाम अगर आधे हों तो ग्राहकी चार गुना बढ़ जाती है परन्तु बढ़ी हुई ग्राहकी को सँभालने में दिक्कत रहती है| अगर आपका माल सामान्य से अच्छा है तो आप की बिक्री को कुछ ही दिनों में दोगुना होने से कोई नहीं रोक सकता| इस प्रकार चाट पकौड़ी के बाजार में पचास साठ का धंधा होना एक सामान्य बात है|

आप दिल्ली या किसी भी शहर के किसी भी मोहल्ले के किसी भी चाट पकौड़ी वाले को लें तो पाएंगे कि जिस “भैया” से आप तू तड़ाक करते रहे हैं वह शायद आपके बॉस से अधिक कमाता है| यहाँ तक कि आपके ऑफिस के बाहर बैठा चाय वाला भी आपकी कंपनी खरीद सकता है| शायद आपको मेड इन हेवन –  सीजन वन का प्लम्बर याद हो जिसने वेडिंग प्लानिंग कंपनी में मोटा निवेश किया हुआ था| प्लम्बर का पता नहीं मगर दिल्ली शहर के कई बड़े चाट पकौड़ी वाले देश के महत्वपूर्ण निवेशक हैं| यह सब जीवन की मध्यवर्गीय खस्ता सच्चाई है|

कुछ नया खस्ता बनाइये, पकाइए, खिलाइए|