बिचौलिया – 2


समाज बिचौलियों के विरुद्ध क्यों है| इसके ऐतिहासिक कारण है| पहले समय में बिचौलिए का काम गाँव या शहर में एक दो लोग करते थे और उनके बीच कोई प्रतियोगिता न थी| एकछत्र व्यापार का  ऊँचा लाभ था| कुछ हद तक इस तरह देखिए- हस्तशिल्पी अपना शिल्प एक हजार में बिचौलिए को देता है जो बड़े ब्रांड दो हजार में लेकर दस हजार में उपभोक्ता को देते हैं| सब इस “लूट” को जानते हैं परन्तु क्योंकि इन मामलों में उपभोक्ता बड़ा व्यक्ति है तो वह समय और वितरण तंत्र के खर्च और आवश्यकता समझते हुए मांगी गई कीमत दे देता है| इन मामलों में बिचौलिया अपने ब्रांड और दुकान की चमक भी जोड़ देता है तो उपभोक्ता थोड़ा खुश भी रहता है|

परन्तु यदि यह मामला नमक का हो तो उत्पादक से दस पैसे का नमक लेकर गाँव तक पहुँचते पहुँचते जब दस बीस रूपये का हो जाता है| यह खलता है| खासकर तब, जब बिचौलिए ने कोई अतिरिक्त सुविधा न जोड़ी हो जैसे – नमक पीसना, उसमें न जमने देने वाले रसायन मिलाना, पैकिंग करना, या अपनी ब्रांड वैल्यू जोड़ना| बल्कि बोरीबंद दानेदार नमक तो घर लाकर धोना भी पड़ता था| अगर गाँव के विक्रेता के पास अवसर हो और प्रतियोगिता न हो तो वह इसके चालीस रुपए भी वसूल सकता है|

भारत बिचौलियों का इतिहास पहले भी खराब रहा है| वितरण तंत्र वैश्य समुदाय के रूप में आदर पाता रहा, परन्तु उत्पादक और सेवा प्रदाता शूद्र कहलाते रह गए| अरब और अंग्रेज भी वितरण तंत्र को परिष्कृत करते करते शासक बन बैठे| व्यापार यानि वितरण यानि बिचौलिया आज भी स्थानीय से लेकर वैश्विक व्यापार का केंद्र है|

बिचौलिया विरोधी यह अनुभव भावना के रूप में आज भी कायम है| उदहारण के लिए दवाओं के मामले में सब जानते हैं कि दस पैसे मूल लागत की दवा उपभोक्ता को दस रूपये से लेकर सौ रूपये तक मिलती है| गाँव से एक रुपये किलो में चलने वाली सब्ज़ी शहर में उपभोक्ता को चालीस रुपए से अस्सी रुपये में पड़ती है| हम यह भी नहीं समझते कि बिचौलिया वितरण तंत्र का आवश्यक अंग है| हम वितरण तंत्र के खर्च नहीं देख पाते पर मुनाफ़े को देखते और चिड़ते हैं| जैसा मैंने पिछली पोस्ट में लिखा था, बड़ी कंपनियां अपने लाभ के लिए इस वितरण तंत्र को आत्मसात कर रही हैं और बिचौलिया विरोधी हमारी भावना का अस्त्र के रूप में प्रयोग कर रही हैं|

साथ में मानसिकता की भी बात है| जिन उत्पादों पर मूल्य लिखा हो हम उन्हें ऊँचे दाम पर सरलता से खरीद लेते हैं ख़ासकर ऐसे उत्पादकों का उत्पाद जिसका अच्छा प्रचार किया गया हो| क्योंकि हमें लगता है कि हम सीधे उत्पादक से खरीद रहे हैं| जब भी वितरण तंत्र हमें उत्पादक के साथ जुड़ा हुआ दिखता है तो हम सरलता से उत्पाद महंगे दाम पर खरीद लेते हैं|

दिल्ली संशोधन विधेयक


दिल्ली संशोधन विधेयक पर आपत्ति दर्ज आखिर क्यों की जाए? मुझे इसकी कोई आवश्यकता नहीं लगती| जिन्होंने जो बोया वो काटा| दिल्ली वालों, दिल्ली में रहने वालों और दिल्ली में आते जाते रहने वालों की लोकतंत्र में कोई आस्था नहीं| दिल्ली की आस्था तो सत्ता है, सत्ता दिल्ली का धर्म कर्म सब रहा है| दिल्ली वाले किसी को पाँच गाँव की चौकीदारी न दें ये तो सत्ता सुख देने की बात है|

दिल्ली को राज्य बनाने की मांग जनसंघ – भाजपा की थी| मगर सत्ता के फेर में उप-राज्य से समझौता किया| मगर दिल्ली को भाजपा ने ऐसी शानदार सत्ता दी कि जल्द ही दिल्ली की सत्ता तो क्या विपक्ष में भी उनका नामलेवा न रहा| कांग्रेस सत्ता में आई और शान शौकत के साथ राज किया| तथाकथित विपक्ष में बैठकर भाजपा हड्डियाँ चबाती रही| विपक्ष के नाम पर एक अस्तित्वहीनता का माहौल बना जिसमें आन्दोलन-जीवियों को विपक्ष का काम करना पड़ा आज भी आन्दोलन जीवी ही दिल्ली में विपक्ष का काम कर रहे हैं और उनकी जिम्मेदारियां बढ़ी ही है| भाजपा (संघ की बात नहीं कर रहा) विपक्ष में भी इतना सोती है कि वर्तमान विपक्ष के राष्ट्रीय नेता राहुल गाँधी भी शर्मा जाएँ| वैसे भी शीला जी इतना काम दिल्ली में कर गयीं कि किसी नेता को और अधिक काम की गुंजाईश नहीं दिख रही| केजरीवाल ने दिल्ली में इनता खैरात कर दिया कि अम्बानी के खजाने खाली हो जाएँ| भाजपा के लिए अगले दस साल दिल्ली में सत्ता पाना कठिन है| अब जिसे खट्टे अंगूर की बेल समझा जाए उसे कौन अपने बागीचे में सजाता है? तो दिल्ली राज्य या उपराज्य भाजपा के लिए बेकार है|

केजरीवाल दुःख दिखा रहे हैं मगर उनसे कोई सहानुभूति नहीं| इसलिए नहीं की उनका दिल्ली में काम बेकार है| मगर इसलिए कि दूरदर्शिता उनसे दूर रहती है| प्रधानमंत्री का सोचकर वह मुख्यमंत्री पद साधने लगते हैं| जम्मू कश्मीर को जब राज्य से गिरा कर केंद्र शासित क्षेत्र में बदला गया तो क्या बोले थे केजरीवाल, सबको पता है| सोचा न होगा कि कल उनके झौपड़े पर भी अंगारा गिरेगा| केंद्रीय भाजपा को लगता है कि जब मन होगा विधेयक पलट कर दिल्ली सत्ता में बैठ जायेंगे| जो नारद लोग विधेयक पर नारायण नारायण कर रहे हैं वो पूछना या सोचना भी नहीं चाहते कि सालों पहले भाजपा को पूर्ण राज्य क्यों चाहिए था और आज पूर्ण केंद्रशासन क्यों चाहिए| मगर केजरीवाल को जम्मू कश्मीर की आह लगी है, बिना बात समझे सोचे आह-वाह करने लगते हैं|

कांग्रेस का क्या किया जाए उनका खुला खेल फरुखाबादी था तो भाजपा का खुल्लम-खुल्ला खेल अहमदाबादी है| आप राष्ट्रपति शासन लाते थे यहाँ राज्य का दर्जा ही ख़त्म| देखिये आगे क्या होता है – बंगाल केरल का नंबर भी आता होगा| सत्ता के खेल में विभीषण बनिएगा तो स्वायत्ता क्यों कर मिलेगी? अपनी अपनी लंका बनाइये और करते रहिए अपनेअपने रामभजन|

बिचौलिया


आजकल बिचौलियों के विरोध में बात की आने लगी है| हर कंपनी का नारा है¸ बिचौलिया हटाओ| सरकार भी यही कहती है| आपूर्तितंत्र में बिचौलियों का बड़ा योगदान रहता है| उत्पादक कंपनी माल को अपने थोक-वितरक को बेचती है जो आगे वितरक और उप-वितरक के माध्यम से थोक विक्रेता और उप विक्रेता को बेच देता है| इस आपूर्तितंत्र में थोकवितरक, वितरक, उप वितरक, थोक विक्रेता और विक्रेता सब बिचौलिए हैं| इन सबको अपना खर्च और लाभांश निकलना होता है| अगर उत्पाद उत्पादक के यहाँ एक रुपये में बनता है, तो थोक वितरक से लेकर वितरक तक पूरे तंत्र को इस उत्पाद को उपभोक्ता को पहुँचाने में लगभग दो से पांच रुपए तक की लागत आती है और उन्हें इतना ही लाभ भी चाहिए| इस लाभ में से लगभग तिहाई हिस्सा सरकार के आयकर विभाग के पास जाता है और बीस प्रतिशत वस्तु व् सेवा कर विभाग के पास|

मगर यहाँ एक विशेष बात मन में आती है| उत्पादक कंपनी का कर्त्तव्य है कि अपना लाभ बढाये जिससे अंशधारक को अधिक लाभांश मिल सकते| तो कंपनी की निगाह में आता है बिचौलिया| इस को हटाने के दो मार्ग हैं; बिचौलिए का काम कंपनी का कोई विभाग करे या कंपनी की कोई औलाद – जिसे सब्सिडियरी कहते हैं| इस से जनता को लगता है कि बीच से बिचौलिए कम हो गए मगर क्या तंत्र बदलता है? थोड़ा बहुत|

उपरोक्त दोनों माध्यम से कंपनी अपना वितरण तंत्र बनाती है तो इसमें एक तो स्तर कम हो सकते हैं समाप्त नहीं| प्रायः कंपनियां कई वितरण केंद्र बनातीं है और वहां से यह थोक विक्रेता और फिर विक्रेता के पास जाता है| यह वितरण केंद्र, थोक विक्रेता और विक्रेता बिचौलिया के रूप में बने रहते हैं|

सीधी बिक्री के मामले में भी एक बिचौलिया रहता है: कूरियर कंपनी – जिसका तंत्र भी लगभग उसी तरह काम करता है जैसे कोई और वितरण तंत्र|

कॉर्पोरेट के लिए बिचौलिया हटाने का एक और माध्यम है कि विक्रेता कंपनियां| मेगा स्टोर श्रृंखलाएं इसका उदहारण हैं| यह उत्पादक से सीधे माल खरीदकर सीधे उपभोक्ता को बेच देतीं हैं| पुनः इनका अपना अंदरूनी वितरण तंत्र होता है| सोचना यह है कि पुराने बिचौलियों का क्या होता है? वह स्वरोजगार छोड़ कर या तो कंपनी के बिचौलिया तंत्र का नौकर बन जाते हैं या बेरोजगार हो जाते हैं| बाद बाकि तो “शेष कुशल है” ही रहता है|