सुपर का उत्सव #CelebratingSuper


कुछ बदलाव सुखद होते हैं| सुखद बदलाव तात्कालिक लाभ के लिए नहीं किये जाते बल्कि उनके पीछे दीर्घकालिक भावना रहती है| यह जरूरी नहीं की हर बदलाव जो हमें सुखद लगता हो वो दीर्घकालिक तौर पर सुखद ही हो| पिछली दो तीन शताब्दियों में होने वाला औद्योगिक विकास सुखद तो रहा पर दीर्घकालिक रूप से सुखद नहीं है| यह बात समझने में मानवता को समय लगा है| दुर्भाग्य से आज भी हम में से अधिकांश लोग जब विकास की बात करते हैं, तब हम दीर्घकालिक विकास की बात नहीं करते| इस तरह का तात्कालिक विकास भले ही आज की पीढ़ी को सुख दे परन्तु आने वाली पीढ़ियों के लिए दुःख के पहाड़ खड़े कर रहा है|

तात्कालिक विकास से उत्त्पन्न समस्याएं मानवता को कष्ट देतीं हैं, परन्तु प्रायः वह मानव जो उस अंध-विकास का ध्वजवाहक होता है – वह अपने कार्यों के दुष्परिणाम न देख पाता है न भुगत पाता है| आज समय आ गया है कि जो लोग तात्कालिक विकास के पीछे है, उस से लाभान्वित होते हैं वह  अपनी जिम्मेदारी समझें और उठायें| कॉर्पोरेट सोशल रेस्पोंसिबिलिटी (CSR) इस दिशा में एक कदम है| परन्तु यह अपर्याप्त होगा अगर यह भी दिशाहीन रहे|

विकास यात्रा में बहुत सी चीजें आज जरूरी हैं – जैसे यातायात साधन| परन्तु यह जरूरी नहीं कि हर घर पर कार हो, न यह जरूरी है कि कार से प्रदुषण पैदा हो, न यह जरूरी है कि कार हर समय प्रयोग की जाए| लेकिन यदि कोई कार्य होगा तो उसके अच्छे बुरे परिणाम होंगे ही| यदि कार से कोई प्रदूषण होता है तो उस का निवारण करने के लिए शायद हर कार के साथ एक बड़ा पेड़ शहर में हो| यह एक उदाहरण है, जरूरी नहीं कि पेड़ ही प्रदूषण से बचाएं कोई तकनीक हो जो प्रदूषण को दूर करने में मदद्गार हो| क्या यह हो सकता है कि प्रदुषण फ़ैलाने वाले वाहनों, यंत्रो, तंत्रों, कल और कारखानों के साथ प्रदूषण रोकने के तकनीकि उपाय लगा दिए जाएँ? हर नाक के ऊपर मास्क न होकर हर चिमनी के ऊपर मास्क हो|

आप सारे कारखाने मास्क से नहीं ढक सकते तो आपको इस उपाय की भी जरूरत है| खासकर जब आप किसी कारखाने के मालिक नहीं है तब तक तो आप उसमें प्रदूषण नियंत्रक यंत्र नहीं लगा सकते| यह काम या तो मालिक का है या सरकार का| कारखाने ही क्या आज हर घर से प्रदूषण पैदा होता है| हमारी एलपीजी गैस के चूल्हे घर के सुरक्षित माहौल में कार्बन मोनो ऑक्साइड जैसे जहर का उत्पादन होता है| हमारे कमरों में हरपल प्रतिपल छिड़का जाने वाला रूम फ्रेशनर भी प्रदूषण है –एक प्रदूषण के जबाब में दूसरा प्रदूषण|

अब प्रदूषण इतना है कि हम और आप उस से बचने के लिए तात्कालिक उपाय भी कर रहे हैं| आजकल दुनिया भर के कई शहरों में जगह जगह एयर प्योरिफायर लग रहे हैं| जन मन और धन के हिसाब से यह उचित कदम हो सकता है –समुचित कदम नहीं| परन्तु अच्छे प्रयास के रूप में इसकी सराहना होनी ही चाहिए|

ज्येष्ठ वैशाख (मई जून) के महीने में दिल्ली में बहुत गर्मी होती है| आजकल तात्कालिक उपाय है कि घर कार और कार्यालय में वातानुकूलन हो| वातानुकूलन अपने आप में गर्मी बढ़ाने का काम करता है| इस क्रिया में स्वयं ऊष्मा उत्पन्न होती है| हमारी पारंपरिक वास्तुकला इस प्रकार विकसित हुई कि घर हवादार हों और स्वाभाविक रूप से ठण्डे बने रहें| हमने उस तकनीक में विकास नहीं किया जो शायद अधिक सरल होता| यदि हर पक्के मकान दूकान कार्यालय की छत पर एक रूफ-टॉप गार्डन हो जाये और साथ में रेन-वाटर हार्वेस्टिंग की व्यवस्था हो तो गर्मी, पानी और पर्यावरण की समस्या को थोड़ा कम किया जा सके| जिन लोगों के पास अपनी छत नहीं है वो भी योगदान दे सकते हैं| बालकनी में गमले तो हो ही सकते हैं| अभी एक कंपनी ने दिवाली के मौके पर अपने स्टोरों से पौधों के बीज बाँटने का अच्छा कदम उठाया| बहुत लोगों ने पौधे लगाये होंगे| हम और आप भी अपनी बालकनी को प्राकृतिक सौंदर्य दे सकते हैं|

यह सब छोटी छोटी चीजें है, मगर अच्छे कदम है| मन में आशा भरते हैं| कुछ तो हो रहा है – #CelebratingSuper

इसकी हिंदी क्या है?


समाचार के अनुसार, एक व्यक्ति ने वित्तमंत्री अरुण जेटली से “बुलेट ट्रेन” की हिंदी पूछ ली| हिंदी वालों में हिंदी पूछ लेना उनता ही सामान्य हो चला है, जितना अंग्रेजी वालों का हर भाषा के शब्द उठाकर अंगीकार और आत्मसात कर लेना| हर बात की हिंदी करवाना गुलाम मानसिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है| हिंदीवादी लोग भाषा के स्वतंत्र व्यकित्त्व की चाह में हिंदी को मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दों समेट देना चाहते हैं| इस प्रकार हिंदी को संस्कृत की उपभाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| संस्कृत निष्ठता के पीछे फ़ारसी शब्दों को नकारने की भावना से प्रारंभ होकर अब अंग्रेजी शब्दों को नकारने तक जा पहुंची गई है| विरोध की यह भावना इस तथ्य को भी नकारती है कि फारसी और संस्कृत एक ही स्रोत को भाषाएँ हैं|

अंग्रेजी से पहले फ़ारसी विश्वभाषा के दर्जा रख चुकी है| फ़ारसी के प्रसार में उन पारसियों और ईरानियों  का हाथ कम रहा, जिनकी मूल रूप से यह भाषा है| भारत में आये अरब, तुर्क, अफगान, मंगोल, मुग़ल आदि सबने फ़ारसी को सामान्य और राजनितिक जीवन में अधिक महत्व दिया| कारण शायद यही है कि फ़ारसी में अंगीकार, आत्मसात और समाहित करने की भावना और क्षमता अधिक रही| यही स्वीकार वृत्ति एक समय में छोटे से समूह की भाषा मानी जाने वाली अंग्रेजी को विश्वभाषा बनाने में सफल रही| आज अंग्रेजी उन देशों में भी स्वीकार है जहाँ उनके लोगों का राज नहीं रहा था|

आज भारतीय समाज इस बात की चर्चा करता है कि अंग्रेजी में कितने भारतीय मूल के शब्द हैं| क्या अंग्रेजी उन भारतीय शब्दों को अपना पाती, अगर वह अपने रोमन या ग्रीक मूलों से अपने लिए शब्द गढ़ने में समय नष्ट करती| अपने भाषा मूलों से शब्द गढ़ना गलत नहीं है| परन्तु इसे हास्यास्पद नहीं हो जाना चाहिए| शब्द सरल और सर्वस्वीकार होने चाहिए| लोहपथगामिनी जैसे शब्द स्वीकार नहीं हो पाए| परन्तु इस प्रकार के शब्दों के कारण सरकारी हिंदी और साहित्यिक विश्व की सबसे दुरूह भाषाओँ में से एक बन चुकी हैं|

अगली बार अगर आपको किसी शब्द की हिंदी न आये तो शेम्पू के स्थान पर मूल भारतीय चम्पू का प्रयोग करने का प्रयास करें| बुलेट ट्रेन की हिंदी उसके बाद ढूंढेंगे| जैसा जेटली बुलेट ट्रेन की हिंदी पूछे जाने पर कहते हैं, “थोड़ा गंभीर होने का भी प्रयास कीजिये”|

 

शरणार्थी और भारत


भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|