वडपलनी मुरुगन मंदिर


कभी कभी अचानक कहीं जा पहुँचने का संयोग बनता है| उस दिन भी यही हुआ| देर शाम तय हुआ कि वडपलनी में कामकाज की सिलसिले में पहुँचने से पहले मुरुगन मंदिर भी पहुंचा जाए| उत्तर भारतीय हिन्दू मंदिरों के आसपास रहने वाली गंदगी, भीड़भाड़ और पंडा पुजारी की रेलमपेल मेरे शृद्धा भाव को छू-मन्तर कर देती है| मगर दक्षिण भारत में मंदिर अक्सर साफ़ सुथरे रहते हैं| एक बात और भी है ध्यान देने की, दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर सरकारी नियंत्रण में हैं| वडपलनी मुरुगन मंदिर भी सरकारी विभाग द्वारा नियंत्रित मंदिर है| इन सरकार नियंत्रित मंदिरों को देखकर मुझे हमेशा लगता है कि सरकारी तंत्र के अकुशल और प्रभावहीन प्रबंधन की बात सही नहीं है और जान बूझकर पैदा की गई है|

सुबह सुबह मंदिर पहुँचे| कोई हो- हल्ला नहीं था| वैसे भी यह किसी त्यौहार वाला दिन नहीं था| प्रसाद खरीदने की कोई इच्छा नहीं थी| आखिर घर लौटने में दिन थे| दो फूल मालाएं खरीदी गई| सड़क किनारे बैठे उस फूल वाले ने बात टूटी फूटी हिंदी में की मगर दाम तमिल में बताये| मैंने सौ रुपये का नोट दिया तो वो टूटे पैसे लेने चला गया| पंद्रह रुपये में दो बढ़िया फूलमालाएं|

किसी दुकानदार ने आवाज नहीं लगाई| कोई पंडा पुजारी नहीं आया| किसी ने भगवान से अपने सीधे सम्बन्ध का दावा नहीं किया| भीड़ नहीं थी| पहले से बताए गए हिसाब से हम चुपचाप टिकट काउंटर की तरफ़ बढ़ गए| दस का नोट बढाया और दो टिकट प्राप्त कीं| मुख्य मंदिर की तरफ पहुँचते ही पता लगा यह अर्चना की टिकट है, स्पेशल दर्शन का नहीं| स्पेशल दर्शन के लिए बीस रुपये का टिकट था| पहले अर्चना के लिए लाइन में लग गए| यहाँ वास्तव में कोई लाइन नहीं थी| अंतिम छोर तक पहुँचते ही, पुजारी आया| हमारी पूजा सामिग्री लेकर गर्भगृह में अन्दर चला गया| हम देखते रहे| देवता से अधिक मेरा ध्यान पुजारी पर था| मगर उसने वापिस आने से पूर्व पूरे विधि विधान संपन्न किये| ऐसा नहीं कि दूर से ही चढ़ावे की फूलमाला देव-मूर्ति की तरफ उछाल कर वापिस आ गया हो| वापिस आकर उसने आचमन का जल और माला के आधे फूल हमें दे दिए, वही हमारा प्रसाद था| हम कोई खाद्य पदार्थ तो प्रसाद के लिए लेकर आये नहीं थे|

हमने कोई देव-दर्शन तो किये नहीं थे| सारा ध्यान तो पुजारी पर था| दोबारा काउंटर पर जाकर स्पेशल दर्शन का टिकट लिया| इस लाइन में हम बिल्कुल अकेले थे| पूरा पांच मिनट सबसे बढ़िया लगने वाली जगह पर खड़े हुए अपने मन, भाषा और विचार के अनुसार मन ही मन पूजा संपन्न की| कोई पुजारी हमें रोकने टोकने समझाने बुझाने लूटने खसोटने नहीं आया| जिस पुजारी ने हमारी पूजा करवाई थी, वह भी दूर से मुस्करा कर अपने काम में लग चुका था|

इसके बाद हमने प्रांगण में मौजूद अन्य मंदिरों का दर्शन किया| ऐसे ही एक मंदिर के पुजारी ने हमारे प्रसाद के फूल और टीके के लिए दी गई भस्म को बाकायदा कागज में बांध दिया| कोई शब्द नहीं बोला सुना गया| धन्यवाद और उसके स्वीकार के रूप में नमस्कार ही रहा|

जूते मंदिर के बाहर दरवाजे के के ओर असुरक्षित रखे थे, मगर सुरक्षित ही मिले| पास की एक दुकान से स्थानीय चाय नाश्ता किया| नाम आदि नहीं पता| सारा कार्य-व्यवहार संकेतों में चलता रहा| दालवडा, प्याज आदि का पकौड़ा, एक समौसे जैसा कुछ और अलग अंदाज की एक चाय| दो लोगों में सौ रुपये भी खर्च न हुए| एक चाय में मधुमक्खी गिरने पर उस के स्थान पर दूसरी चाय भी बिना कुछ कहे सुने मिल गई|

चलते चलते बता दें यह मंदिर तमिल फ़िल्म इंडस्ट्री में बहुत प्रसिद्ध है| चेन्नई के बहुत सारे विवाह कार्य यहीं संपन्न होते हैं| तमिलनाडू हिन्दू धार्मिक विभाग द्वारा मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट भी बनाई गई है| जहाँ सभी जानकारियां उपलब्ध हैं| मैंने यह वेबसाइट बाद में देखी|

 

तिवारी जी की सरकारी हत्या


तिवारी जी की सरकारी हत्या “उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग” के लिए कानफोड़ू धमाका साबित हुए।

सवाल को कई थे मगर पूछे न गए, न जाएंगे। वो तो तिवारी की की सहकर्मी मुस्लिम हुईं, वरना “मुहब्बती जिहाद” का मीडियाई मामला बन जाता। ख़ैर ये तो बाद में किस्से गढ़ने की बात हुई कि मुस्लिम लड़कियां जिहादी क्यों नहीं होती और मुहब्बत वाला जिहाद क्यों नहीं करतीं। प्याज, सरकारी फ़ाइल और मीडियाई मामलों की परतें तो खुलती उतरती रहतीं हैं, सो अभी के लिए मामले का यह पहलू मुल्तवी। मुद्दा खास पर चलते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग को तिवारी जी की सरकारी हत्या के कानफाड़ू धमाके से झटका ऐसा लगा है कि हलाल हुए जाते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग इंसानी बिरादरी का वो हिस्सा है जो स्वयंपोषी बने रहने के लिए कुत्ते की दुम की तरह डोलने और कबूतर की तरह मिचमिचाने का आदि है।

यह हिंदुस्तानी समाज का जो नासूर है जिसे हर तरह के भेदभाव ढूंढ लेने में महारत है। बस इनकी चाकरी बनी रहे और इनके मालिकान की काली सफेद आमदनी।

सरकारी गोली से आदिवासी मरें तो यह पुलिसियों से पहले उन्हें नक्सल का दर्जा दे दें। दलित, पिछड़ा, मुसलमान, पूर्वोत्तरी, कश्मीरी, झोपड़पट्टी, किसान, मज़दूर, दाढ़ीवाला, सांवला, काला, औरतजात, औरतबाज, कुछ भी इनके निशाने पर आ सकता है। वो तो गनीमत हैं आजकल राष्ट्रवाद के जोर के चलते सैनिकों की इज्ज़त है वरना रेलवे की दूसरा दर्जा बोगी तबादले पर जा रहे दस सैनिक बैठा कर के देखिए।

अन्नदाता किसान भले ही उच्च कुलीन ब्राह्मण या सूर्यवंशी क्षत्रिय क्यों न हो, उसकी रैली में सरकारी लाठी तो चलवा दीजिये। उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग ऐसे खुश हो जाते हैं जैसे सब्सिडी वाला तिलचट्टा जूते से कुचल कर मारा जा रहा हो। सब्जी किसान को सब्सिडी न दो, और उस से प्याज़ दो रुपये किलो खरीद कर दिल्ली मुम्बई में पच्चीस रुपये किलो बेच दो। इनके पास दारू, दावत, टीवी, कार, मोबाइल सब के लिए बड़ा बटुआ है, बस किसान मज़दूर और रिक्शेवाले ही लुटेरे हैं। उन पर गोली चलाते रहो।

मुझे तिवारी जी से बैर नहीं है वरन उस मानसिकता पर है तो तिवारी ही की अपना मानकर हो – हल्ला कर रही है|मगर उस वक़्त सब को साँप सूंघ जाता है जब “कोई और मरता” है| दर्द केवल अपनों के मरने पर होता है| 

आख़िर क़ानून के राज्य में पुलिस द्वारा किसी की भी हत्या क्यों हो? सब गिरफ्तारियाँ हों, मुकदमा चले और सजाएँ मिलें या बरी हो जाएँ| मगर इस के लिए पूरा तंत्र चाहिये| सबूत जुटाने के लिए पूरा विभाग खड़ा करना होगा| गवाहों की सुरक्षा का मसला है| उस से ऊपर फ़र्जी मुकदमों और झूठे आरोपों के के मामलों में भी उचित कानून होने चाहिए|

ये मीडिया ट्रायल बंद होने चाहिए| पुलिस को शिकारी कुत्ता समझने की प्रकम वृत्ति ख़तरनाक है कि पट्टा खोला और शिकार हाज़िर| पुलिस को तहकीकात का समय मिलना चाहिए और अपनी तहकीकात पर अच्छे से सोच विचार का भी| यहाँ तक की नामजद मामलों में भी कम से कम हफ्ते भर का समय पुलिस के पास होना चाहिए| पुलिस को तत्काल जनता, नेता, पत्रकार, मंत्री, मुख्यमंत्री आदि दबावों से मुक्ति मिलनी चाहिए| हो सके तो दैनिक कानून व्यवस्था और आपराधिक मामलों की तहकीकात दोनों के लिए तुरंत अलग अलग व्यवस्था होनी चाहिए|

वरना सौ पचास “और लोगों” के बाद फिर कोई तिवारी जी या गुप्ता जी मारे जायेंगे और आप को दुःख झेलना होगा|

 

रणछोड़


रण छोड़ दिया और भाग निकले, कायर!!
किसी ने तो कहा ही होगा उन्हें; “रण छोड़ दिया और भाग निकले कायर!!” धिक्कारा गया होगा। क्षत्रिय होने का धर्म, जीवन का मर्म बताया गया होगा। सोचा भी न गया होगा कि रणछोड़ 64 कलाओं के ज्ञाता हैं। जीवन में बहुत से रगड़े झगड़े होते हैं। हमें अपने मतलब के रगड़े झगड़े चुनने होते हैं। मतलब नहीं कि रगड़े में हम अपना दिमाग़ रगड़ने लगें। मतलब नहीं कि बेकार के झगड़े में जीवन की लंबी लड़ाई गवां दी जाए। अर्थ यह नहीं कि सिद्धान्त से समझौता करना है। नहीं। सिद्धान्त पर कायम रहें। अपना विचार दृढ़ता से रखें। अगर यह छोटी लड़ाई है तो इस से हट जाएं। शांति रहेगी। बड़ी लड़ाई की ताकत और समझ बनी रहेगी। मगर ये छोटे मोटे झगड़े और रोज रोज के रगड़े छोड़ देना सरल काम नहीं है। आदत नहीं लत हो जाती हैं इनकी। रोज रोज के रगड़े में किसी को रगड़ देना संतोष देता है। इस संतोष का अपना सुख और नशा है। यह संतोष है कि कुछ तो किया प्रतिपक्ष का हमने, रगड़ दिया उसे। छोटी मोटी जीत भी यही आनंद प्रदान करती है। मगर इन छोटे मोटे रगड़ो झगड़ों में हम खोते भी बहुत कुछ हैं। यह उन झगड़ों में हार जाने और रगड़ों में रगड़ जाने के कहीं ज्यादा है। आप दिमाग़ का बेकार प्रयोग करते हैं जो कई बार नकारात्मक भी हो सकता है। आप को मन की शांति खो देनी होती है। आप का अहम आप पर राज करने लगता है कि आप को पता नहीं चलता। हाल में मैंने ऐसा ही एक और झगड़ा छोड़ दिया। इस तरह जब आप झगड़ा छोड़ कर चल देते हैं तो आपका प्रतिपक्ष हार जाता है। उन्हें जीत का नहीं उन के झगड़े को महत्व न दिए जाने का दुःख होता है। वो अक्सर हार महसूस करते हैं। आप का झगड़े से हट जाने शायद ही कभी उनकी जीत होती है। सावधान रहें, यह झगड़ा दोबारा आप के सामने नहीं आएगा, अगर खुद न चाहें।