होली में भरें रंग


जब कोई पटाखों के बहिष्कार की बात करे और होली पर पानी की बर्बादी की बात करे, तो सारे हिंदुस्तान का सोशल मीडिया अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए पगला जाता है| कुछ तो गली गलौज की अपनी दबी छिपी दादलाई संस्कृति का प्रदर्शन करने लगते हैं|

मगर हमारी दिवाली में दिये और होली में रंग गायब होते जा रहे हैं| बहुत से त्यौहार अब उस जोश खरोश से नहीं मनाये जाते जो पहले दिखाई देता था, तो कुछ ऐशोआराम (रोजीरोटी का रोना न रोयें) कमाने के दबाब में गायब हो रहे हैं| समय के साथ कुछ परिवर्तन आते हैं, परन्तु उन परिवर्तनों के पीछे हमारी कंजूसी, लालच, दिखावा और उदासीनता नहीं होने चाहिए|

दिवाली पर पटाखों पर प्रतिबन्ध के विरोध में पिछली दिवाली इतना हल्ला हुआ कि लक्ष्मी पूजन और दिए आदि जैसे मूल तत्व हम भूल गए| मैं दिवाली पर दिवाली पर जूए, वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण का विरोधी हूँ| प्रसन्नता की बात है कि रंगोली, लक्ष्मी पूजन, मिठाइयाँ, दिये (और मोमबत्ती), मधुर संगीत, आदि मूल तत्व वायु प्रदुषण, ध्वनि प्रदूषण, और प्रकाश प्रदूषण नहीं फैलाते| पटाखों और बिजली के अनावश्यक प्रकाश की तरह यह सब हमारी जेब पर भारी भी पड़ते|

यही हाल होली का है| पानी की बर्बादी पर हमें क्रोध हैं| पानी की बर्बादी क्या है? मुझे सबसे अधिक क्रोध तब आता है जब मुझे बच्चे पिचकारियों में पतला रंग और फिर बिना रंग का पानी फैंकते दिखाई देते हैं| अच्छा हो की इस पानी में रंग की मात्रा कम से कम इतनी हो कि जिसके कपड़ों पर पड़े उसपर अपना रंग छोड़ें| इस से कम पानी में भी अच्छा असर और प्रसन्नता मिलेगी| टेसू आदि पारंपरिक रंग का प्रयोग करें| इसमें महंगा या अजीब क्या हैं?

होली मेरा पसंदीदा त्यौहार हैं| पिचकारी लिए बच्चे देखकर मैं रुक जाता हूँ और बच्चों से रंग डालने का आग्रह करता हूँ| अधिकतर निराश होता हूँ| बच्चों को भी अपना फ़ीका रंग छोड़ने में निराशा होती है|

दुःख यह है कि जो माँ बाप दिवाली के पटाखों पर हजारों खर्च करते हैं, हजारों की पिचकारी दिलाते हैं, वो होली पर दस पचास रुपये का रंग दिलाने में दिवालिया जैसा बर्ताव करते हैं|

मेरे लिए उड़ता हुआ गुलाल और रंग गीले रंग से अधिक बड़ी समस्या है, क्योंकी यह सांस में जाकर कई  दिन तक परेशान करता हैं| गीले रंग से मुझे दिक्कत तो होती है, परन्तु चाय कॉफ़ी पीने से इसमें जल्दी आराम आ जाता है| हर व्यक्ति को गीले और सूखे रंग में से चुनाव करने की सुविधा रहनी चाहिए| बच्चों के पास गीले रंग हो मगर सूखे रंग गुलाल भी उनकी पहुँच में हों, जिस से हर किसी के साथ वो प्रेमपूर्ण होली खेल सकें|

हाँ, कांजी बड़े, गुजिया, पापड़, वरक, नमकीन आदि पर भी ठीक ठाक खर्च करें| हफ्ते भर पहले से हफ्ते भर बाद तक नाश्ते की थाली में त्यौहार रहना चाहिए| व्यायाम और श्रम कम करने की अपनी आदत का दण्ड त्यौहार और स्वादेंद्रिय को न दें|

शौर्य बनाम शहादत


शहीदों की जय है| वीरगति जैसे अधिक उपयुक्त शब्दों को छोड़कर शहीद का प्रयोग बढ़ गया है| वीरगति प्राप्त करने के लिए शौर्य की जरूरत हैं, शहीद होने के लिए एक मकसद और मरने की| शहीद शब्द के प्रयोग में बहुत सारी सुविधा रहती है| किसी दुर्घटना, आतंकवादी या छापामार हमले, से लेकर प्राकृतिक आपदा तक में बिना किसी वीरता का प्रदर्शन मारे जाने वाले सेनिकों या असेनिकों के किये शहीद का प्रयोग करने की सुविधा है|

आधिकारिक शब्दावली के किल्ड इन एक्शन में एक विशेष बात है| यह शब्द सेन्य मृत्यु को अनावश्यक चमकदमक से दूर रखता है| इसका अपना उचित कारण है| सोचिये अगर शहादत की चमकदमक सेन्य मृत्यु के साथ जोड़ दी जाए तो सेनिक लड़ेंगे या शहीद होंगे? यह बहुत ही चिंताजनक स्त्तिथि हो सकती है| सेनिक का काम शहीद होना नहीं है, शौर्य प्रदर्शन है| यह बाद सुनने समझने में निंदनीय लग सकती है कि कोई सेनिक शौर्य प्रदर्शन के स्थान पर शहीद होना पसंद करेगा| परन्तु यह निश्चित रूप से सही है कि एक अनावश्यक शब्द उसके लिए साहस और शौर्य बनाये रखने की प्रेरणा कम कर सकता है| उसकी साहसपूर्ण वीरगति का अगर सामाजिक मूल्य न रह जाए तो उसके लिए एक प्रेरणा की स्पष्ट कमी दिखाई देती है|

अगर आप समाचार माध्यमों पर गौर करें तो पाकिस्तान सीमा पर या कश्मीर में होने वाली सेन्य मृत्यु को जिस प्रकार चमकदमक प्रदान की जाती है उससे क्या ऐसा भाव नहीं आता कि अन्य क्षेत्र में होने वाली सेन्य मृत्यु कम गरिमावान हैं? यही और इसी तरह की बातें हमारी चिंता का विषय हैं|

वीरगति को प्राप्त करना एक वीर की कामना है| वह देश रक्षा करे, युद्ध में अपना कौशल और शौर्य दिखाए| वह अगर मरे तो कायर की मौत न मरे – ऐसा अक्सर वीर कहा करते हैं| क्या वो कायर होते हैं जो उन्हें कायर की जैसी मौत की चिंता होती है? नहीं, मगर वीर मृत्यु का उचित वरण जानते हैं|

कोई सेन्य मृत्यु कम नहीं होती| परन्तु युद्ध में अपना कौशल और शौर्य दिखाने का अवसर हर वीर को नहीं मिलता| यह दुर्भाग्य वीरों की चिंता और प्रेरणा है, कुछ वीरों को ही वीरगति दिखाने का अवसर मिलता है|

लच्छेदार शब्दजाल हानिकारक हो सकता है|

युद्ध का नशा


जब देश पिछले तीन युद्ध जीत चुके हो तब जनता के लिए युद्ध का विचार सरल होता है| परन्तु अगर देश पिछले पैतालीस साल से कोई युद्ध नहीं लड़ा हो तो यह विचार युद्ध के उन्माद में बदलना सरल होता है| किसी को यह याद नहीं रहता कि विजेता पक्ष से कितने लोग मारे गए, कितने घायल हुए, कितने बंदी बना और लौटे नहीं, कितने भगौड़े घोषित किये गए| सब जीत की कहानियाँ कहते हैं, जीत के घाव सीने पर नहीं होते| यह सब उस जनता के लिए अधिक सरल होता है, जिसका युद्ध से वास्ता मात्र टेलिविज़न पर पड़ता है| जिन्हें घर में सोफ़े पर बैठकर रिमोट हाथ में लेकर युद्ध देखना होता है उनके लिए युद्ध का अर्थ किसी विडियो गेम से अधिक नहीं होता|

युद्ध मूर्खों का मनोरंजन है, महामूर्खों का बदला है, और अपरिपक्व राजनीतिज्ञ की रणनीति है|

बहुत मित्र गीता और महाभारत को बार बार युद्ध के समर्थन में सामने लाते हैं| परन्तु सब जानते हैं कि स्वयं श्रीकृष्ण युद्ध की तैयारियां होने के बाद भी शांतिदूत बनकर कौरवों से मिलने गए थे| उन्होंने सालों साल टलते युद्ध को एक बार फिर टालने का प्रयास किया| महाभारत में हुई तबाही कथा के रूप में सबके सामने है| क्या मानवता, क्या भारतवर्ष, क्या जम्बूद्वीप विजयी हुआ? जिन्हें लगता है कि भारत और पाकिस्तान भारतवर्ष का भाग नहीं हैं, उन्हें सिर्फ क्षणिक इतिहास का बोध है| वह भूल रहे हैं कि गंधार से गंगासागर तक भारतवर्ष का अमूर्त स्वरुप है, इस भूमि में राज्य बनते बिगड़ते रहते हैं| वह भूल रहे हैं, देशों के मानचित्र समय बदलता है| महाभारत में रहे राष्ट्र आज नहीं हैं, मगर भारतवर्ष आज भी अपने घाव सहला रहा है|

किसी भी युद्ध का अंत अंतिम विनाश से होता है या फिर वार्तालाप से| यह सही है कि विजेता इतिहास रचता है| बार बार बांग्लादेश का उदाहरण न दें, वहाँ का सत्य मात्र भारतीय सेना नहीं है, जन विद्रोह, गहन कूटनीति, गंभीर राजनीति, सामरिक रणनीति और उचित समय का इन्तजार उसका मूल था| मगर उस जीत से भी भारत को क्या मिला – अवैध बांग्लादेशी अप्रवासी, असम समस्या, जलता हुआ उत्तर पूर्व, अप्रशिक्षित, घरेलू नौकर, और ढेर सारे युद्ध उन्मादी !!

किसी भी उन्माद से बचें| युद्ध की देवी बलि मांगती हैं – केवल दुश्मन की बलि नहीं|