आरक्षण और कुशलता


आरक्षण के विरोध में सबसे अधिक मजबूत तर्क है कि आरक्षण योग्य लोगों को योग्य लोगों से अधिक तरजीह देता है| हाल में कोलकाता में पुल ढ़हने के बाद भी आरक्षण को सोशल मीडिया में कोसा गया| क्या यह तर्क सत्य है?

आरक्षण का समर्थन या विरोध इस तथ्य को नजरअंदाज करता है कि संसाधन, अवसर या विकास की कमी आरक्षण को जन्म देती है| जब समाज के सभी लोगों में संसाधन नहीं बांटे जा सकें तब उनको किसी न किसी अनुपात में सभी लोगों को मुहैया कराया जाना होता है| अन्यथा ताकतवर तबका कमजोर तबके तक संसाधन नहीं पहुँचने देता| इस से कमजोर तबका या तो हीनता से ग्रस्त पस्त होकर पशु तुल्य हो जाता है या अपनी पूरी ताकत से उठकर संसाधन की लूट में शामिल हो जाता है| आरक्षण या राशनिंग न होने से ताकतवर तबका सफेदपोश तरीकों से सीमित संसाधन पर कब्ज़ा करता है तो कमजोर स्याह तरीकों से|

आरक्षण के बाबजूद मध्यप्रदेश में ताकतवर माने जाने वाले तबकों के बीच भी व्यापम घोटाले जैसे सफेदपोश तरीके सामने आयें हैं तो बहुत से लोग मानते हैं कि नक्सलवाद आदि कमजोर तबके का संसाधन के लिए संघर्ष है| आरक्षण या संसाधन की कमी के कारण उत्पन्न समस्याओं का हल संसाधन की उपलब्धता को सभी प्राकृतिक नियमों के अन्दर रहकर यथा – संभव पूरा करना ही हो सकता है|

आईये मूल प्रश्न पर लौटें| भारत में शिक्षा और रोजगार के अधिकतर क्षेत्रों में गिरावट को आरक्षण से जोड़कर देखा जाता है| भारत में आरक्षण तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार द्वारा पिछड़े और आती पिछड़े वर्ग को आरक्षण दिए जाने से पहले काफी कम था और “योग्य” लोगों के बहुमत का सरकार और संस्थानों पर कब्ज़ा था| परन्तु, उस से पहले विकास की दर बहुत कम थी| पिछले बीस सालों में आरक्षित पदों पर आये लोग अब आकर महत्वपूर्ण पदों पर आना शुरू हुए हैं|

मैं इस सन्दर्भ में चार्टर्ड अकाउंटेंट और कंपनी सेक्रेटरी के पेशेवर क्षेत्रों का उदाहरण दूंगा| यह दोनों व्यवसाय आरक्षण विहीन हैं और आरक्षण के अधिकारी लोग इन व्यवसायों में बहुत कम संख्या में हैं| यह पेशेवर लोग उद्यमों के सही रास्ता दिखाने और गलत कार्य करने से रोकने के लिए तैयार किये जाते हैं| मगर इन व्यवसायों से इनका उपभोक्ता वर्ग संतुष्ट नहीं माना जाता| सरकार, विनियामक संस्थाएं, निवेशक आदि इनके कार्यों को सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की तरह देखते हैं| इन पेशों में लगे पुराने लोग, लगातार गिरते स्तर पर जोर देते हैं, जबकि आरक्षण का इसमें दूर तक कोई हाथ नहीं है|

एक दूसरा सवाल भी है| सभी मानते हैं कि सरकारी विद्यालयों में पढाई और अस्पताल में ईलाज ठीक से नहीं होता| इसके लिए आरक्षित तबके तो दोषी मान कर चला जाता है| मगर उन क्या इन सरकारी विद्यालयों और अस्पतालों में ५०% संख्या “योग्य” गैर आरक्षित लोगों की नहीं होती| वो लोग क्यों काम या कहें अच्छा काम नहीं करते| मेरे विचार से यह सिर्फ सर्वव्यापी मुफ़्तखोरी की समस्या है|

आरक्षण का मुद्दा और मांग करते हुए केवल उन लोगों देखा जाता है, जो न तो आरक्षण ख़त्म होने पर और न ही उनकी जाति को आरक्षण मिलने पर प्रतियोगिता में सफल हो सकते हैं| कर्मठ और योग्य लोग अपने लिए गिनी चुनी सरकारी नौकरियों के बाहर भी रोजगार खोज लेते हैं, शेष सरकारी नौकरी न मिलने का दोष आरक्षण को देते हैं|

कैद में सृजन


अभी हाल में मध्य प्रदेश की जेलों के कैदियों द्वारा सृजित की गई कलाकृतियों को प्रदर्शनी देखने का अवसर प्राप्त हुआ| हम बीस मार्च को भोपाल के भारत भवन में घूम रहे थे| कोई इरादा नहीं था कि इस प्रदर्शनी में जाएँ| अचानक पुलिसिया सरगर्मी की तरफ ध्यान गया और उस हॉल के अन्दर की तरफ निगाह डालने पर कुछ आकर्षण पैदा हुआ| साथ में मौजूद पत्रकार मालिक साहब का ध्यान तो एक कलाकृति पर टिक गया, जो बाद में उनका बटुआ हल्का के होने में परिवर्तित हुआ| बताया गया कि इस प्रदर्शनी का समापन होने वाला है| परन्तु हमें समय दिया गया|

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यह कला एवं चित्र प्रदर्शनी मध्य प्रदेश के आठ केन्द्रीय कारावासों के रहवासियों की भिन्न भिन्न माध्यमों पर की गई रचनाओं का छोटा सा संसार था|

यहाँ विषय की विविधता और बहुलता है| कैदी श्रृंगार, भक्ति, देशप्रेम, प्रकृति, गाँधी, इन्तजार आदि महत्वपूर्ण विषयों पर अपना संसार रच रहे हैं| लकड़ी पर उकेरे गए गाँधी जी के तीन बन्दर एकदम अलग और भिन्न रचना है, एकदम अनूठी| पहले से ही बिक चुकी थी| इसकी रचना में कल्पना शीलता और सादगी का अनूठा संगम है|

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ब्रह्मा – विष्णू – महेश की त्रिमूर्ति और शिव परिवार का चित्रांकन निराला था|

IMG_20160320_173321IMG_20160320_173543 कैदियों में विषय की गहराई में उतरने और डूबने की अद्भुद क्षमता दिखाई देती है| समकालीन समाज पर उनके शांत मगर गंभीर व्यंग देखते ही बनते हैं| जब हम चलने लगे तब तक जेल अधीक्षक शैफाली राकेश पहुँच गईं| संक्षिप्त बातचीत हो पाई| उन्होंने बताया कि कैदियों में लिखने और रचने की शानदार क्षमता है| उनके लिए माध्यम की कमी और स्वतंत्रता कोई बाधा नहीं बनते|

अंत में, यह चित्र मेरे मन में बस गया जो किसी कैदी की जिन्दगी का महत्वपूर्ण आत्मकथ्य बन गया है|

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सभी चित्र: ऐश्वर्य मोहन गहराना

मांडू के राजमहल


मांडू जाकर लगा कि कभी यहीं जन्नत बसती होगी| अगर पुरातत्व विभाग के सूचनापट्ट की मानें तो ४८ पुरातत्व महत्त्व के स्थान आज भी मांडू में हैं| बताया गया कि कभी मांडू में ७०० मंदिर थे जिनमें से ४०० जैन मंदिर थे| अपने स्वर्णकाल में विश्व के सबसे बड़े महानगर में से एक मांडू को देखने से उस समय की वास्तुकला के गौरव को समझा जा सकता है| बहुत से समकालीन भवनों में मुझे उस भव्यता और समझ – बूझ का अनुभव नहीं होता जितना पंद्रहवीं शताब्दी के जहाज महल में होता है| खासकर महल के जल प्रबंधन को देखकर प्रभावित हुए बिना नहीं रहा जा सकता| जिस वर्षा जल संचयन (rain water harvesting) की बात आज हम रोज कहते सुनते हैं, वो वहां बहुत सुन्दर रूप में मौजूद है| आज भी मांडू में पानी की किल्लत है मगर उस काल के संघर्षपूर्ण जीवन में पानी का न होना राज्य के लिए तुरंत जीवन – मरण का प्रश्न हो सकता था| शायद, मांडू का पतन पानी के रख रखाव के पुराने तरीकों को छोड़ दिए जाने के कारण ही हुआ होगा| इस माह जब फरक्का शहर के विद्युत् संयंत्र को पानी की कमी के कारण बंद करना पड़ा, मांडू का बूढ़ा जल – प्रबंधन हमारी आधुनिक मूर्खता का मजाक उड़ाते हुए खड़ा है| मुझे लगता है केवल जहाज महल का जल – प्रबंधन देखना ही मांडू जाने को सार्थकता देने के लिए काफी है| जहाज महल में आपको चौथे और छठे मंजिल पर तरणताल (swimming pool) देखने को मिलते है तो उन तक साफ पानी पहुँचाने का शानदार तरीका भी मिलता है| पानी के साफ़ करने के लिए पूरा संयंत्र भी उस समय बनाया गया था, जिसके अवशेष मन मोह लेते हैं|

छत पर तरणताल

छत पर तरणताल

मांडू पहुँचते ही सबसे पहले आपको आदिवासी घरों की बाहरी दीवारों पर बने चित्रण का देखकर आनंद होता है| आज मांडू की अधिकतर आबादी आदिवासी है जो छोटे छोटे घरों में रहती है|

मांडू में यूँ तो हर चप्पे पर इतिहास मौजूद है, मगर शाही महल परिसर का आनंद अलग ही है| हम मांडू पहुँचते ही जहाज महल और हिंडोला महल देखने चल देते हैं| मगर परिसर विशाल है और इसमें बहुत से भवन हैं| हिंडोला भवन की दीवारें आज भी दावत देतीं हैं किसी राजसभा के लिए|

मुझे शाही हमाम बहुत आकर्षित करता है| बहुत रूमानी हैं, उसकी छत में बनाये गए चाँद –सितारे| उस ज़माने में गर्म और ठण्डे पानी के दो नल एक साथ मौजूद हैं| जन्नत का शाही गुसल और कैसा होता होगा?

मांडू - शाही हमाम : स्नानागार

मांडू – शाही हमाम : स्नानागार

नाट्यशाला में आवाज को सबसे पीछे तक पहुंचाने के लिए दीवारों में खोखले रास्ते बनाये गए हैं| प्रकाश संयोजन बेहद उम्दा बन पड़ा है| रिहायश के लिए शानदार इंतजाम है| आप अन्दर रहकर भी दुश्मन से बच सकते हैं| पानी और ठंडी ताजी हवा की कोई कमी नहीं होती| आज यहाँ उस ज़माने में अफ्रीका से लाई गयीं चमगादड़ें अमन – शान्ति से रहतीं है|

मांडू लोहानी दरवाज़े से आप शानदार सूर्यास्त देख सकते हैं| यह दिन का आख़िरी पड़ाव है| हम बहुत बड़ी झील के किनारे बने मध्य प्रदेश पर्यटन के मालवा रिसोर्ट में पहुँच रहे है| शांत सुन्दर सुरीली शाम हमारा स्वागत करती है| हम आराम करने के लिए खुली हवा में बैठे खिरनी के बड़े पेड़ के नीचे बैठे है| देशी विदेशी सेलानी रानी रूपमति और बाज बहादुर के बारे में चर्चा कर रहे हैं| संगीत के दो महान फ़नकारों का मांडू में प्रकृति का संगीत हमें रूमानी रूहानियत की ओर ले जा रहा है| सामने पहाड़ी के पीछे हो तो उन दोनों की आत्माएं बसती हैं|

मालवा की शाम ख़ूबसूरत और सुबह शानदार है| हम सुबह छः बजे रानी रूपमती के महल के लिए चल देते हैं| नर्मदा मैया का प्रतीक रेवाकुण्ड यहीं पास में है| रानी रूपमती बिना नर्मदा के दर्शन किये अन्नजल ग्रहण नहीं करेंगी| इसलिए नर्मदा की ओर अंतिम पहाड़ी पर है रानी रूपमती का महल| वैसे रहती हो रानी बाज बहादुर के साथ ही हैं, मगर रोज आती हैं, मीलों दूर स्तिथ नर्मदा के दर्शन करने के लिए| आज धुंध है, हमें नर्मदा मैया दर्शन नहीं देतीं| इतना दूर देखना यूँ भी मुश्किल है| यहाँ अस्तबल होता था और यह दूर पूर्व में होने वाली गतिविधि पर निगाह रखने के लिए निगरानी चौकी भी था| बाज बहादुर का महल यहाँ से दिखाई देता है|

बाज बहादुर का महल, जहाँ संगीत रचता – बसता था| यहाँ की दीवारें और कमरे संगीत के हिसाब से बनवाए गए हैं| अन्यथा यह महल साधारण दिखाई देता है| यहाँ पर होतीं थीं रानी रूपमती, बाज बहादुर और अन्य बड़े संगीतकारों की महफ़िलें|

थोड़ी दूर पर हैं दाई माँ के मकबरे| बताया गया, यह कभी जच्चा – बच्चा अस्पताल की तरह प्रयोग हुए और बाद में मकबरे बने| मगर आज यह इको – पॉइंट की तरह प्रयोग होते हैं|

अब जामी मस्जिद की ओर जा रहे हैं| यह देखने में काफी शानदार ईमारत है| इसके पीछे है होशंगशाह का मकबरा, जिसमें वास्तव में कोई दफ़न नहीं हैं मगर ताजमहल बनाने वालों ने इस से प्रेरणा ली| इसे भारत में संगमरमर की सबसे प्राचीन इमारतों में माना जाता है| इसके साथ बने दालान को हिन्दू शैली में बने होने के कारण धर्मशाला कहा जाता है| एक कथा यह भी है कि जामी मस्जिद, मस्जिद के रूप में प्रयोग होने से पहले यह शाही दरबार के रूप में प्रयोग होती थी और तब शायद यह धर्मशाला शाही मेहमानों के लिए अतिथि गृह रही हो|

मांडू अपने शानदार समय में मालवा की दीर्घकालीन राजधानी धार से टक्कर लेता रहा| मगर इसका इतिहास और भूगोल धार से हमेशा प्रभावित रहा| राजा भोज की नगरी धार के लिए भले ही यह सेन्य दुर्ग के रूप में बसाया गया हो, मगर यह पूरी शान से धार या किसी भी अन्य ऐतिहासिक महानगरी को टक्कर देता है|