नाकारा सरकारी कर्मचारी या व्यवस्था


किसी भी व्यस्त रेलवे स्टेशन की टिकिट खिड़की पर जाइये| एक लम्बी लाइन लगी होगी| परेशानहाल, बेचारे, थके – मांदे खीजते, पसीने से तर-बतर आम जनता की| उस लाइन में लगे सभी पचास लोगों को एक ही उम्मीद होती है – जल्दी टिकट मिलजाने की| एक ही देवता होता है – बुकिंग क्लर्क| एक ही भजन होता है – गलियां|

साला काम चोर! हाथ धीरे चला रहा है|

दरअसल खिड़की पर मौजूद बन्दे ने अभी जेब से ही पैसे नहीं निकाले हैं|

साले को अभी मूतने  जाना है; *** *** ***; मुफ्तखोर साला|

आपकी तरह उसे भी किसी तयशुदा समय पर मूत नहीं आता, किसी भी टाइम आता है, दिन में एक दो बार|

देखो सूअर कैसे चाय की चुस्की ले रहा है|

चाय की चुस्की उस समय लेता है जब आपका खिड़की वाला भाई पैसे गिन रहा होता है|

सामान्यतः बुकिंग खिड़की पर बैठा व्यक्ति कान बंद रखता है और लगभग एक मिनिट में एक टिकट की दर से टिकट काटता रहता है, जिसमें से लगभग १० सेकंड ही टिकट काटने में लगते हैं, 15 सेकंड पैसा गिनने में और बाकी समय ग्राहक के पैसे देने और उसे बकाया पैसा लौटाने में| यदि ग्राहक पहले से पैसा निकल कर रखे तो लगा समय लगभग 40 फीसदी कम किया जा सकता है|

किसी भी सरकारी विभाग, बैंक, अस्पताल में चले जाइये| लाइन में लगी भीड़ गालियाँ जपती रहती है|

इसके विपरीत अगर निजी क्षेत्र के संस्थानों की ओर देखे तो…|

पहले तो भीड़ नहीं होती| भीड़ को कम करने के कई तरीके अपनाये जाते हैं| जैसे निजी भ्रमण के लिए कीमत मांगना, समान सुविधाओं के लिए भी अधिक कीमतें, छद्म शान्ति का माहौल|

यदि निजी संस्थाओं में भीड़ होती है तो ऐसा नहीं है कि उन्हें कोई जल्द या अच्छी सुविधा दे जाती है| इसके उलट जल्दी सुविधा के लिए यह संस्थान कानूनन कीमत मांगते हैं, (सरकारी क्षेत्र में कानूनन कीमत तो होती नहीं, रिश्वत का सहारा हो सकता है)| साथ ही भीड़ के लिए वातानुकूलन और छद्म शांत वातावरण का सहारा लेकर ग्राहक के मन को शांत रखा जाता है| सरकारी क्षेत्र के विपरीत निजी क्षेत्र के संस्थान इन्तजार कर रहे ग्राहक के लिए कुर्सियों का इंतजाम रखते हैं|

सरकार आपके पैसे से चलती है, इसलिए आपका पैसा बचाने के लिए इस प्रकार की व्यवस्था प्रायः नहीं की जाती| अब इस प्रकार की व्यवस्था की जाने लगी है|

मगर मैं मूल मुद्दे पर वापिस आता हूँ| क्या टिकट खिड़की पर बैठा व्यक्ति नाकारा है? क्या पब्लिक डीलिंग पर बैठा कोई अन्य व्यक्ति नाकारा है? क्या सरकारी स्कूल का वो मास्टर नकारा है जिसे बहुत से अन्य सरकारी काम करने की बाध्यता रहती है और कई बार अतिरिक्त सरकारी कमाई का लालच भी|

कभी सोचिये जिन हालत में सरकारी कर्मचारी काम करते हैं, उन हालत में आप काम कर पाते|

उन्हें अपनी मेहनत का पैसा मिलने दीजिये| सातवें वेतन आयोग में हुई कम वृद्धि का विरोध कीजिये| यह पैसा देश की अर्थव्यवस्था में ही वापिस आकर इसे गति प्रदान करेगा|

 

शाकाहारी – हाहाकारी


हमारे देश की शाकाहारी – हाहाकारी परंपरा में शाकाहार कम हाहाकार ज्यादा है| देश में अगर खाने को लेकर वर्गीकरण कर दिया जाए तो शायद लम्बी सूची तैयार हो जाएगी|

पूर्ण जैन, अर्ध जैन, शुद्ध शाकाहारी, लहसुन – प्याज शाकाहारी, लहसुन – प्याज अंडा आहारी, मांसाहारी, गौ-मांसाहारी, शूकर – मांसाहारी और न जाने क्या क्या| कुछ विद्वान कीटाहारी, मूषकाहारी, विशिष्टाहारी  आदि की बातें भी करते हैं|

इन सभी वर्गों में दोगले लोगों का भी अपना अलग वर्ग भी है| कुछ लोग घर पर शाकाहारी और बाहर मांसाहारी होते हैं| कुछ हफ्ते में तीन दिन सर्वभक्षी होते हैं मगर अन्य दिन शुद्ध वाले सात्विक शाकाहारी| कुछ केवल ईद वाले दिन प्रसाद समझ कर ग्रहण कर लेते हैं| आजकल फेसबुकिया जात वाले  कुछ लोग केवल बकर ईद वाले दिन शाकाहारी रहते हैं मगर अगले दिन…|

अब यह मत पूछिए कि मेरा आहार पुराण क्यों चल रहा है|

अभी एक यात्रा के दौरान मित्र मिले| उन्हें बताया गया था कि मैं शुद्ध शाकाहारी हूँ और अंडा – दूध का सेवन नहीं करता| सौभाग्य से हम एक लम्बी दूरी की बस में सहयात्री थे, जिस निर्जन स्थान पर बस रोकी गई वहां अंडा और चाय के अलावा कुछ खाने के लिए नहीं था| मेरी पत्नी जी ने मेरे लिए भी आमलेट बोल दिया, मगर बेचारे हमारे (हाहाकार – ग्रस्त) मांसाहारी मित्र अपनी शुद्ध शाकाहारी पत्नी के हाहाकार में विदेशी ब्राण्ड का वरक (चिप्स) चबा कर काम चला रहे थे| मुझ “शाकाहारी” के सहारे उन्होंने अपनी पत्नी को समझा बुझा कर आमलेट की अनुमति प्राप्त की| मगर मुझसे बार बार हकीकत में आने का आग्रह करते रहे| मैंने उन्हें बताया कि दूध चिकित्सक ने बंद किया है और अंडा स्वभाव बस नहीं खाता| मेरी पत्नी द्वारा आमलेट खाने के बाद भी उन्हें लगता रहा कि या तो मैं पत्नी के दबाब में शाकाहारी हूँ या हम दोनों ही डरपोक हैं|

मजे की बात यह रही की उस शाम जब हम कई लोग मिलकर साथ खा रहे थे तो अपनी मांसाहारी थाली लेकर आ पहुंचे| उनकी पत्नी बिफर गयीं, सब “अच्छे लोगों” के बीच “जंगली खाना” खाना लेकर क्यों आ गए| उन्होंने हम सबकी थालियों की ओर कसकर निगाह डाली, और बात बढ़ने से पहले वो सरक लिए| अगले शाम चुपके से मेरे पास आये और साथ टहलने चलने का आग्रह हुआ| जैसे ही अंडे का ठेला दिखा बोले चलो, एक एक आमलेट हो जाए; मेरी हालत हँस हँस कर ख़राब हो गई|

मैंने बोला, भाई आप खाइए, स्वाद से खाइए, मन से खाइए, मन में अपराधबोध मत पालिए, दूसरे का बहाना मत देखिये, सुखी रहेंगे|

बोले आप वाकई नहीं खाते| मैंने कहा; वाकई खाने न खाने का पता नहीं, मगर जीभ पर स्वाद नहीं चढ़ा है|

बोले मेरी पत्नी को मत बताना, कि मैं आमलेट खा रहा हूँ| मैं मुस्करा कर रह गया|

तीसरी जात


भारत में आप जातिवादी (या कहें, भेद्भावी) न होकर भी जाति के होने से इंकार नहीं कर सकते| जाति व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था से जन्म आधारित में परिवर्तित हुआ माना जाता है, और आज यह भेदभाव के आधार के अलावा आदतों, परम्पराओं, भोजन, रिहायश और वंशानुगत बीमारियों का प्रतीक है| इनमें जाति विशेषों से सम्बंधित कई बातें दुर्भावना से भी प्रेरित मानी जाती हैं|

परन्तु, किसी भी व्यवस्था के प्रारंभ होने के समय उसके कुछ न कुछ कारण रहे होते हैं, भले ही बाद में वह सही साबित हो या गलत| मेरे मन में एक प्रश्न हमेशा रहा कि कर्म आधारित जाति व्यवस्था में जातियों के श्रेणीक्रम का क्या मापदंड था और क्यों था|

किसी भी सामाजिक व्यवस्था में ज्ञान को सुरक्षा और अर्थ से पहले रखा गया है| ब्राहमण यानि ज्ञान का पहले स्थान पर रखने पर कोई प्रश्न नहीं हैं| आज हम सुरक्षा को हमेशा धन के बाद रखते हैं और मानते हैं की धन ही धर्म और सुरक्षा का संवाहक है| मानवता और देश का विकास धन और धनपतियों की धरोहर मन जाता है| मजे की बात यह है कि अधिकांश भारत में ब्राहमण और वैश्य खान – पान की शाकाहारी आदतों की बहुलता के चलते स्वाभाविक रूप से निकट जाति समूह लगते हैं| साथ ही दानजीवी ब्राह्मणों के लिए भी यह सरल था कि वो राजाओं का मूँह देखने की जगह धन स्रोत वैश्यों को सम्मान देकर जातिक्रम में दूसरे स्थान पर आसन्न करते|

आज जब पूँजीवाद का समय है और पूंजीपति के आते ही धर्म के तमाम देवता, पंडित, फ़कीर, सन्यासी आदि विशिष्ट क्रम (VIP Line) में लग कर उन्हें दर्शन देते हैं| सत्ता ज्ञानवान के स्थान पर धनवान से पूछकर नीति – निर्धारण करती हैं| कहा जाता है कि विश्व का एक बड़ा देश अपने हथियार निर्माता धनपतियों को ख़ुश करने के लिए अपनी सेना को नरक में भी भेजने के लिए तैयार रहता है| ऐसे समय में मुझे लगता है कि जातिक्रम निर्धारित करते समय वैश्यों को अगर पहले नहीं तो दुसरे स्थान पर अवश्य होना चाहिए था|

परन्तु ऐसा नहीं हुआ| क्यों?

पिछले सप्ताह जब भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की संभावित विदाई और इस सप्ताह उनके पद पर न रहने के निर्णय के सन्दर्भ में क्रोनी – कैपिटलिज्म के सहारे भारतीय जाति व्यवस्था में वैश्यों यानि पूँजी को तीसरे सामाजिक पायदान पर रखने का निहित कारण समझ आया|

पूँजीपति पूँजीवाद के छद्म रूप बाजार और अर्थव्यवस्था के नाम पर अपने लोभ – लालच की व्यवस्था चलता हैं| इस लोभवाद में पूँजीवाद कहीं नहीं रहता केवल पूंजीपति रहता है जो अपने लोभ के लिए पूंजीवादी सिद्धांतों का दुरूपयोग करता है| उसके लोभ के लाभ पर आश्रित लोग उसके लिए विकास और खुशहाली के गीत लिखते है और कुतर्क रचते हैं| जिस प्रकार मदमस्त हाथी अपने सामने आने वाली हर अच्छी बुरी चीज को कुचल देता है, उसी प्रकार यह लोभवाद धर्म, कर्म, सुरक्षा आदि को अपने कुहित में कुचलता चलता है| रघुराम राजन इसके पहले शिकार नहीं हैं| इस्रायल में बैंक ऑफ़ इस्रायल के गवर्नर प्रोफ़ेसर स्टैनले फिशर लगभग सात साल पहले इसके और कहीं अधिक सीधे शिकार बने थे|[i]

हमारे प्राचीन विद्वानों को उस समय में लगा होगा कि पूँजी, पूंजीपति और पूँजीवाद का साथ आसानी से लोभवाद को जन्म देता है| अगर अगर पूँजीसत्ता को धर्मसत्ता और राजसत्ता से पहले या किसी एक के साथ दे दिया जाता जाता तो यह लोभवाद भारत को बहुत पहले विकास के नाम पर बर्बाद कर चुका होता|

 

[i] https://promarket.org/raghuram-rajan-stanley-fischer/