चिकुनगुनिया की रात


गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तेरे प्यार की टूटन की तरह टूटता तन बदन,

पोर पोर से दर्द – दर्द से रिसता हुआ गगन,

मेरे अंतर उतरती प्यार की पहली पहली चुभन,

हौले हौले चुभती तेरी साँसों की बहकी पवन|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

तंदूर की तलहटी में भुनता तंदूरी चिकन,

छिटक छिटक जाता चरमराता अंतर्मन,

इश्क़ की कड़ाही के जलते तेल में तलते

आखिरी उम्मीद का चढ़ता इश्क़न बुखार|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

चौपड़ की बिसात पर शकुनि का पासा,

धृतराष्ट्र की धूर्तसभा में विदुर की भाषा,

अंधे भीष्म का जोशीला सांस्कृतिक प्रलाप,

अस्पताल में दम तोडती मरीज की मुनिया|

 

गुनिया की माई के चिकुन और गुनिया,

बचपन की सोनचिरैया जैसा चिकुनगुनिया,

बढ़ई की गुनिया सा चिकना चिकुनगुनिया|

बन्दूक की नौक पर||


दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

हर सुबह लाऊड स्पीकरों से सर्वव्यापी के कान फोड़कर

बता दूंगा जता दूंगा अपनी भक्ति

सर्वशक्तिमान को बचा लूँगा मैं शैतानी फंदों से

दुनिया के तमाम दरिंदों से, जो नहीं पूजते उसे,

या पूजते हैं उसे किसी और नाम से,

या चुपचाप रहकर उसे अपना काम करने देते हैं|

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

 

दुनिया की हर रसोई में जाकर कच्चा चबा जाऊंगा

जो गाय खाता है जो सूअर खाता है

जो घोड़ा खाता है जो घास खाता है

जो खाता है जो खाता है जो खाता है जो खाता है जो खाता है

चबा जाऊंगा उसका ज़िगर दिमाग कलेजा खून के थक्के

थूक दूंगा इंसानियत उसकी नीली पीली धूसर लाल लाश पर|

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

 

फौड़ दूंगा उन घबराई सहमी आँखों को

जो नहीं देखेंगी वासना में छिपे मेरे प्रेम की ऊँचाई

फंसाना चाहती है मुझे अपने प्रेम जाल की गुलामी में

चीर दूंगा टांगों से छाती तक मखमली खूबसूरत बदन

जो मेरे मर्द को नहीं पहचान पायेगा मेरी मर्जी के वक्त

दिल जीत लूँगा

दुनिया के सारे हत्थे निहत्थे मूर्ख बर्बर पापियों के

बन्दूक की नौक पर||

जूते


मेरे पिता उस दौर में जन्में थे, जब (उनके हिसाब से) जूते की पालिश की चमक आपके भाग्य की चमक को दर्शाती थी।
पापा जब भी चमकदार जूता देखते, खरीद लेते।
मगर बाद में उन्हें पोलिश करने का समय नहीं निकाल पाते।

यह बात  नीचे दी फेसबुक पोस्ट  की वजह से याद आई|