हत्यारे तीमारदार!!


क्या कोई तीमारदार वाकई बीमार के मरने पर गुस्सा हो सकता है? ऐसा करने वाला पागल होना चाहिए या बेहद डरपोक| बीमारों के मरने पर डॉक्टर को पीटने वाले समाज की पतली गलियों में रहने वाले आवारा कुत्ते जैसे है| जिस प्रकार उन आवारा कुत्तों को पिटने का डर लगा रहता है, तीमारदारों को सामाजिक बुराई का डर लगा रहता है| डॉक्टर को पीटने में इनका मरीज से प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि मरीज तो कष्ट से मुक्त हो गया| उसके जीवन चक्र का एक चक्र समाप्त| शायद मोक्ष भी मिला हो|

हमारे तीमारदार को लगा रहता है – समाज क्या कहेगा, ठीक से इलाज नहीं कराया? सही जगह नहीं ले गए| पैसा नहीं खर्च किया होगा| अधिकतर तीमारदार का हल्ला यही होता है कि साले डॉक्टर जब पैसा फैंक रहे थे तो मरीज कैसे मर गया?

हमें इलाज कब चाहिए? हमें तो खर्च की फेहरिश्त चाहिए तो समाज के मुंह पर मार सकें| डॉक्टर पर हमला करने वाले तीमारदार अपनी रकम का जादू असफल होने का गुस्सा डॉक्टर पर उतार रहे होते हैं|

कोई कर्तव्यनिष्ठ डॉक्टर मरीज को क्यों मारेगा? कर्त्तव्यविमुख डॉक्टर के लिए तो खैर मरीज सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है| डॉक्टर तो इस जिद्दोजहद में लगे रहते हैं कि मरीज ठीक हो न हो मगर जिन्दा रहे| अगर मरीज जिन्दा रहे, आता जाता रहे, तो डॉक्टर का महीने का खर्च भी निकलता रहे| डॉक्टर को पता है इंसान चाहता क्या है – जिन्दगी| भले ही वो जिन्दगी कद्दू हो जाए| देश भर में लाइलाज बीमारियों के सालों महीनों से मराऊ पड़े मरीजों का लेखा जोखा करा लीजिये| बिना किसी सफलता की आशा के बाद भी उन्हें जिन्दगी की पगडण्डी पर घसीटा जा रहा है| आखिर क्यों? समाज का डर, क़ानून का कमीनापन, तीमारदारों का भोलापन और सबसे अंत में डॉक्टर का लालच|

वास्तव में डॉक्टर पर ऊँगली उठानी भी है तो पूछिए कि दस साल एक मरीज को वेंटिलेटर पर क्यों लटका रखा है? एक गोली के जगह अठारह गोली एंटीबायोटिक क्यों लिख दी? बिना मतलब के महीने महीने अलाना फलाना टेस्ट क्यों हो रहा है? बेचारा डॉक्टर दवा कंपनी का दबाव तो फिर भी सह ले मगर मरीज के मामा की गालियाँ कैसे सहे?

घसीट घसीट कर जिन्दगी जीता मरीज विज्ञान या चिकित्सक से अधिक समाज की असफलता है| इस पर कोई नहीं बोलना चाहता| अपने चिकित्सकों पर अविश्वास कीजिये – लम्बे इलाज पर अविश्वास कीजिये| कभी कभी यह भी सोचिये कि कहीं आपका डॉक्टर मरीज को जबरन जिन्दा रखने के सहारे आपका परिवार तो नष्ट नहीं कर रहा| मगर उसपर अपने मरीज की मौत का इल्जाम नहीं लगाइए|

बेरोजगारी – निजी समस्या


“आजकल क्या कर रहे हो?” जब भी रिश्तेदार यह सवाल पूछते हैं तो भारत का हर जवान जानता है कि वांछित उत्तर है – “बेरोजगार हूँ” और देय उत्तर है – “तैयारी कर रहा हूँ”| वास्तव में देश में कोई बेरोजगार नहीं है – नालायक, अच्छा  निकल गया, प्रतियोगी, प्रतिभागी, हतोत्साहित, कुछ तो करना ही है, कुछ तो कर ही रहे हैं, और आत्महत्यारे|

हमारी मानसिकता ही ऐसे बनी हुई है – कोई शिक्षक नहीं पढ़ता, खुद पढ़ना होता है|कोई नौकरी नहीं देता – खुद ढूंढनी पड़ती है| कोई रोजगार नहीं देगा, खुद अपने लिए रोजगार पैदा करो|

रोजगार की अर्थशास्त्रीय परिभाषा से भी हमें कुछ नहीं करना| हमारे यहाँ गड्ढा खोदता लंगड़ा लूला और नाला साफ करता हुआ स्नातक अभियंता रोजगार में ही माने जाते हैं| जबकि यह साफ़ है कि पहला उदहारण सामाजिक शोषण है और दूसरा बेरोजगारी या छद्म रोजगार| बेरोजगारी की सामाजिक स्वीकृति पढ़ना शुरू करते ही शुरू हो जाती है|

शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षक और विद्यालयों से अधिक हमारे अभिभावकों के कारण है| दस अभिभावक विद्यालय या शिक्षक से जाकर नहीं भिड़ते की पढ़ाते क्यों नहीं|स्कूल से तो हमें हमें केवल पढ़े होने का ठप्पा चाहिए| विद्यलय में हम बच्चे के लिए वातानुकूलन, आदि सुविधाएँ देखते हैं| पढाई के स्तर जानने के लिए उत्तीर्ण होने वाले छात्रों की संख्या /प्रतिशत और स्नातक होने पर पहली नौकरी देखते हैं| हम निजी विद्यालय जाना पसंद करते हैं मगर यह नहीं देखते कि उनके पास कैसा पुस्तकालय है, कैसी प्रयोगशाला है| यह निजी विद्यालय भी विद्यार्थियों को वाणिज्य और कला आदि विषय लेने ले लिए प्रेरित करते हैं| उदहारण के लिए निजी विद्यालयों में विज्ञान विषयों का घटता स्तर देख सकते हैं| यही बात निजी महाविद्यालयों और निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है| उसके बाद भी हम निजी कोचिंग में रटने का अभ्यास और महत्वपूर्ण प्रश्नों का तोतारटंत करते हैं| मगर जिन समाचारतन्त्र  में बिहार के प्रथम आये छात्रों का ज्ञान टटोला जाता है, वह निजी क्षेत्र के विद्यालयों पर तफ्सीश करने की हिम्मत भी नहीं करते| निजी विद्यालयों में शिक्षक अभिभावक बैठकों में अभिभावक मात्र उपदेश सुनने जाता है या अधिक हिम्मत करने पर उसे मात्र आश्वासन मिलता है| मगर सरकारी शिक्षकों पर लानत भेजने वाले हम निजी विद्यालय के अधपढ़ शिक्षक से प्रश्न करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते|

यहाँ से ही बेरोजगारी की स्वीकृति शुरू हो जाती है| हमारा बच्चा नालायक है, क्या पढ़ना है यह तय नहीं कर पाता और हमें इसे पैसा फैंक और दो लट्ठ मार कर किसी भी लायक बनाना है|

यहाँ से प्रतियोगिता और साक्षात्कार की तैयारी का अंतहीन सिलसिला शुरू होता है| सरकारी नौकरियां अस्वीकार्य तर्कों के साथ कम की जा रहीं है, मगर हम राजकोषीय घाटे के घटिया बहाने से बहला दिए गए हैं| क्या सरकार बिना संसाधन – मानव संसाधन के काम कर पायेगी| लगभग हर सरकारी विभाग कर्मचारियों की कमी का शिकार है| अधिकतर विभाग अनुबंध यानि गुलामीपत्र यानि संविदा पर अप्रशिक्षित कर्मचारी भर्ती कर रहे हैं| सरकार को अपने सचिव तक बाहर से अनुबंध पर लाने पड़ रहे हैं| मगर अगर सरकारी नौकरियां कम नहीं होंगी तो निजी क्षेत्र के सस्ती सेवा में कौन जाएगा| ध्यान दें कि जब सरकारी नौकरियां थीं तब लोग दोगुने वेतन में भी निजी क्षेत्र में नौकरी करने से कतराते थे| जब सरकारी नौकरियां नहीं है तो आरक्षण तो खैर बेमानी नाटकबाजी ही है|आरक्षण के समर्थन में मूर्ख और विरोध में महामूर्ख ही बात कर सकते हैं|

इस सब के बाद हमारे पास तर्क होता है कि क्या नौकरियां पेड़ पर उग रहीं हैं?  हमारे छात्र पढाई पूरी करने के बाद या तो घर पर बैठ कर तैयारी का प्रपंच करते हैं या फिर अपनी लिखित योग्यता से कमतर कोई भी रोजगार पकड़ लेते हैं| किसी शिकायत का न होना यह स्पष्ट करता है कि उन्हें पता है कि उनके कागज़ की असली कीमत क्या है|

कुछ समय पहले मैं एक कंपनी के लिए साक्षात्कार ले रहा था| मानव संसाधन विभाग की तरफ से सीधा संकेत था कि सरकारी डिप्लोमा होल्डर को निजी विद्यालय के स्नातक अभियंता से अधिक तरजीह देनी है| उनके तर्क साधारण थे| लाटसाहब ने पैसा फैंक कर कागज खरीदा है| यह बात हर अभिभावक और प्रतिभागी जानता है| किसी स्नातक ने अपने से कम पढ़े व्यक्ति के आधीन काम करने से मना नहीं किया|वह अनुभव और वास्तविक ज्ञान को समझते थे|

पिछले तीस वर्ष में सरकारें जनता को यह समझा पाने में कामयाब रहीं है कि शिक्षा और रोजगार सरकारी “खैरात” नहीं हैं, यह आपका निजी प्रश्न है|हमारे सरकारों के पास कोई नक्शा नहीं कि यह बता सकें कि अगले तीन पांच साल में कौन से और कितने रोजगार मिलने की सम्भावना हो सकती है| क्या पढाई की जाये, क्या नहीं? दूसरा इस जनसंख्या बहुल देश में भी हमने अपने कर्मचारियों को बारह घंटे काम करने की प्रेरणा दी है, जबकि अगर सब लोग केवल आठ घंटे काम करें तो डेढ़ गुना लोगों को रोजगार मिल जाये| संविदा आदि के चलते कर्मचारियों की गुणवत्ता घटी है| यह सब छद्म रोजगार और आधुनिक गुलामी या बंधुआ मजदूरी है|

देश में कश्मीरी पंडितों के पलायन से भी अधिक भयाभय तरीके से रोजगार सम्बन्धी पलायन हो रहा है| किसी भी योग्य युवा को अपने घर के आसपास उचित रोजगार अवसर नहीं मिल रहे| दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगर पलायन से भरे पड़े हैं| सब जानते हैं कि असंतुलित विकास इस रोजगारी पलायन का कारण है| मगर न हम विकास पर प्रश्न उठा रहे हैं, न बेरोजगारी पर| विकास के नाम पर दो चार चिकनी सड़के हमारा दिल खुश कर देतीं हैं| हम पलायन कर रहे हैं, विस्थापित हो रहे हैं, हम पढ़ लिख कर अग्रीमेंट मजदूर बन रहे हैं जैसे कभी अनपढ़ गिरमिटिया मजदूर बनते थे|(अग्रीमेंट और गिरमिट एक ही अंग्रेजी शब्द के रूप हैं)

कोई प्रश्न नहीं है| प्रश्न तब ही नहीं था जब सत्तर साल पहले आरक्षण घोषित करते हुए सरकार ने ऐलान किया था कि सबको रोजगार नहीं हो पायेगा| प्रश्न तब भी नहीं है जब बेरोजगारी की सबसे भयाभय स्तिथि की सरकारी सूचना आती है| प्रश्न तब भी नहीं जब बेरोजगारी की बढ़ती संख्या देखकर सरकार पकौड़े तलने की सलाह देने लगती है

आखिर हतोत्साहित, शिकायतहीन और सस्ता मजदूर किस मालिक को अच्छा नहीं लगता – मालिक सरकार हो या बनिया|

कृपया, इस पोस्ट पर सकारात्मक आलोचना करें – नकारात्मक आलोचना हमें सुधरने पर विवश कर सकती है|

 

 

नाक कटना


उन दिनों कहाँ पता था की नाक काटना कोई मुहावरा है| वो बात बात पर ताव देते थे – आजतक किसी ने मेरी नाक नहीं काटी| जब ही अपनी प्रशंषा और अनुशंषा के आवेग में होते अपनी शुद्ध साबित नाक का जरूर दावा करते| उनका सीना उस समय दो गुना फूला रहता| माथा आसमान की तरफ थोड़ा ऊपर उठा| सीधे हाथ को हवा में स्वछन्द उछालते और मुक्त गुरुत्वाकर्षण के साथ जांघ पर पटकते| उस समय जो ताल निकलती वह किसी भी ढोल की आवाज को मात देती| उनके स्वर का गर्व हर किसी श्रोता के हृदय को प्रभावित किये बिना न रहता| उनकी इस बात का मोहल्ले की सामाजिक अवचेतना में गहरा असर था| लोग उनका सम्मान करते| अपने घर से किसी भी दिशा में निकलते चाय नाश्ते के बिना वापिस नहीं लौट पाते| पुराने लोगों को आज तक बात याद है कि सन बासठ की लड़ाई से वह गाजे बाजे के साथ सही सलामत लौटे थे| आजकल के बच्चे शायद न जानें मगर सन बासठ की बहादुरी का वजन पैसठ और इक्कत्तर वालों पर भारी पड़ता था और उनका अलग ही सम्मान था|

उनका प्रेम था मुझ पर| उस समय पूरे मोहल्ले में अकेला बच्चा था जो कभी भी उनकी पीठ पर लटक जाता| कान या नाक पकड़ कर उनमें चाबी भर देता| सुबह की चाय के साथ अगर वो अखबार पढ़ने के आदी थे तो शाम की चाय के साथ बच्चों का साथ उन्हें चाहिए था| और हम बच्चों का प्रिय विषय रहता उनकी बिना कटी नाक| हम सब बच्चे कभी न कभी इस बात की पुष्टि कर चुके थे कि नाक पूरी तरह साबित थी और उसके कटने का कोई चिन्ह नहीं था|

हल्की गर्मियों की उस शाम मैं उनकी गोद में था| हमेशा की तरह कुछ परिचित अपरिचित चहरे उनसे मिलने आये हुए थे| अधिकतर भूतपूर्व सेनिक, मोहल्लेवाले, जातिबंधु और आस पास के बच्चे उनके पास जमे ही रहते| अचानक वह समय आया जब उन्हें अपनी साबित नाक का हवाला देना था| इस बात की पूरी सम्भावना थी कि मेरा चेहरा उनके मजबूत फौजी हाथों और तावदार जंघा के बीच आ सकता था| परन्तु अपनी नाक एक बार लगभग तुड़ा लेने के बाद मुझे अभ्यास था कि अपने को उनके प्रहार से कैसे बचा लेना था|

“मुझे आप भूलकर भी ऐसा वैसा न समझ लीजिये, आज तक कोई गलत काम नहीं किया मैंने| कितने अफसर आये… … गए कोई मेरी नाक तक नहीं छु सका|” उनका हाथ स्वचालित स्वछन्द रूप से हवा में ऊपर उठा, “किसी आज कर किसी ने…” हाथ नीचे गिरने वाला है| मुझे उनके जांघ से हटना है, मेरा हल्का फुल्का सिर ऊपर की और उठा| उनका हाथ जंघा पर ताल देता है, “मेरी नाक नहीं काट पाई”| दूध के कच्चे दाँत मैंने उनकी नाक पर गढ़ा दिए हैं| “आआअ…. उल्लू के…” मैंने तेजी से करवट बदली और गोद से बाहर निकला| उन्होंने अपने सारे दांत जीभ में गढ़ा लिए| “अरी लली सुन…” उन्होंने एक दर्द भरी आवाज में मेरी माँ को आवाज दी| “हाँ चाचा…” मेरी माँ ही क्या पल भर में पूरा घर पूरा मोहल्ला उनके सामने खड़ा था| भरी शाम पूरा सन्नाटा| पिंजड़े में बंद तोता भी सहम कर बैठ गया| मेहमान घबराये हुए थे| और मैं… … विजय के उल्लास और पिटाई के डर के मारे चार छत कूदकर गायब|

जिनके घर जाकर छिपा था, उन्होंने शरणागत का पूरा लिहाज किया| उन्होंने मेरे दो हल्के थप्पड़ मारे मगर तुरंत मेरे वकील बनकर दौड़े गए| वाकया उन्हें मालूम न था, मगर घर में घुसते ही बोले, “देखो बालक ने नादानी में कर दिया, डर कर भाग गया है कहीं, कहीं दूर न चला जाए|” वहाँ नज़ारा अलग था – मेरा लाडला, मेरा बहादुर, आएगा तो जलेबी खिलाऊंगा, कचौड़ी खिलाऊंगा| हिम्मती है लड़का| मेरी पैरोकारी सुनते ही बोले, अगर लड़के ने आपके यहाँ लस्सी पी ली हो तो बुलवा लीजिये, सबके लिए जलेबी मंगवाईं हैं|