तेजहीन तेजस


भारत स्वभावतः एक वर्णभेदी और वर्गभेदी राष्ट्र है| हमारे सामाजिक जीवन में वर्गभेद कदाचित वर्णभेद से कहीं अधिक है| जब से शिक्षा का निजीकरण बढ़ा है, लोग वर्ग के आधार पर अपने बच्चों के लिए विद्यालय का चयन करते हैं| जाति या वर्ण की बात वर्ग के बिना शहरी जीवन में करना बेकार है| शहरी सामाजिकता में जाति या वर्ण की बात करना असामाजिक माना जाने लगा है परन्तु वर्ग का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है|

कुछ वर्ष पहले जब में गृहनगर से ईएमयू ट्रेन से लौट रहा था तब किसी ने टोका की आजकल शताब्दी क्यों छोड़ दी आपने| सीधा सवाल यह कि आप निम्नवर्गीय ट्रेन में क्यों सफ़र कर रहे हैं? यही बात टाटा की बेहतरीन नेनो कार के बारे में भी है| इस साल २०१९ में पूरे देश में मात्र एक नेनो बिकी है| अगर देखा जाए तो आर्थिक मंदी, बढ़ते हुए निम्नमध्यवर्ग के चलते नेनो की बिक्री नहीं बढ़ी| कारण वर्ग व्यस्था में नीचे गिर जाने का भय| शायद ही किसी भारतीय घर में नेनो पहली कार के रूप में दिल से स्वीकार हुई है|वर्यग भेद की यह बात रेल और हवाई यातायात में भी लागू होती है|

अगर आप दिल्ली-मुंबई, दिल्ली लखनऊ, दिल्ली जयपुर, जैसे कमाऊ मार्गों के यातायात की बात करें तो हवाई यात्रा बहुत लोकप्रिय हैं जबकि इन मार्गों पर राजधानी या बढ़िया शताब्दी गाड़ियाँ सुलभ हैं और अधिक सुविधाजनक भी हैं| दिल्ली आगरा और दिल्ली जयपुर जैसे मार्गों पर उच्चस्तरीय टैक्सी और वातानुकूलित बसों को बहुत पसंद किया जाता है| रेल यात्रा उच्चवर्ग के लिए अधम होने जैसा विकल्प है|

दिल्ली आगरा मार्ग पर गतिमान एक्सप्रेस के सफल होने का कारण देशी विदेशी पर्यटकों के बीच इस ट्रेन का लोकप्रिय होना है| सरकार ने गतिमान एक्सप्रेस की सफलता के बाद अन्य उच्च स्तरीय गाड़ियों की सफलता की जो उम्मीद बाँधी है, वह भारतीय सन्दर्भ में उचित नहीं प्रतीत होती|

सरकार रेलवे को लाभ में लाना चाहती है| इसलिए सरकार का ध्यानबिन्दु उच्चवर्ग है जिसे बेहतर सुविधाओं के साथ रेलवे से जोड़ने की तैयारी चलती रही है| तेजस एक्सप्रेस इस प्रयास का एक हिस्सा है| लाभ को मूल आधार मानकर इसका निजीकरण भी किया गया है| परन्तु क्या यह महंगी ट्रेन मन चाहा लाभ दे पायेगी| मुझे इसमें संदेह है|

तेजस एक्सप्रेस को  हवाई मार्ग और स्वर्ण शताब्दी से कड़ी टक्कर मिलनी है| साथ ही इसका समय दिल्ली में कार्यालय बंद होने के समय से काफी पहले है| यदि आप किसी भी मंहगी गाड़ी को लाभ में रखना चाहते हैं तो उसका समय इस हिसाब से होना चाहिए कि उसके संभावित प्रयोगकर्ता समूह के समय से उसका मेल हो|हवाईयात्रियों को रेल की पटरी पर उतारने के लिए रेलवे को कड़ी मसक्कत करनी होगी| उनके हवाई यात्रा में लगने वाले समय और उसमें मिलने वाले आराम का बढ़िया विकल्प देना होगा| इसके साथ इसे हवाई यात्रा दर के मुकाबले लगभग पिचहत्तर प्रतिशत कम लागत पर उपलब्ध करना होगा|परन्तु मुझे इसका कोई आर्थिक लाभ और समाजिक औचित्य नहीं लगता|

बेहतर है कि रेलवे गैरवातानुकूलित परन्तु तेज गति ट्रेन विकसित करने पर ध्यान दे| इन ट्रेन के लिए रेलवे उचित सुविधाएँ देते हुए इन्हें उचित किराये पर चलाये|अंधाधुंध अनारक्षित टिकट जारी करने की पुरानी प्रवृत्ति पर या तो रोक लगाये या अनारक्षित स्थानों की संख्या में वृद्धि करे|
वास्तव में एक करोड़ लोगों से एक रूपये प्रति व्यक्ति का लाभ लेना सरल है एक व्यक्ति से एक करोड़ रुपये का लाभ लेना कठिन|

अन्त में:

 

लम्बा चौड़ा कराधान दायरा


संभावित अमीर और नए अमीर अक्सर यह मांग करते हैं कि सरकार करों के नाम पर उन्हें न लूटे और कराधान का दायरा बड़ा कर कर अधिक लोगों से करवसूल करे| मुझे अक्सर उनकी मांग के भोलेपन पर दया नहीं, तरस आता है| अक्सर यह लोग इस प्रकार का बर्ताव करते हैं कि मानो देश में कोई साम्यवादी या समाजवादी व्यवस्था उन्हें उनकी मेहनत और अमीरी के लिए परेशान कर रही है| दुनिया के हर पूंजीवादी देश में पूंजीपतियों पर अधिक कर हैं| अमेरिकी कांग्रेस तो और बढ़ाने पर विचार भी कर रही है| आखिर कराधान का दायरा बढ़ाने से इन लोगों की मुराद क्या है? क्या सरकार गरीबों से कर लेना शुरू करे? क्या गरीब कर नहीं देते?

वास्तविकता यह है कि गरीब कुल प्रतिशत में अमीरों के मुकाबले अधिक कर देते हैं| यह बाद नए वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम के बाद बहुत अधिक विश्वास के साथ कही जा सकती है| भारत में दो प्रकार के कर लगते हैं:

  • प्रत्यक्ष कर यानि आयकर और
  • अप्रत्यक्ष कर यानि वस्तु एवं सेवा कर|

फिलहाल आयकर का दायरा बढ़ाने के दो तरीके हैं:

  • गरीबों से आयकर लेना;
  • अधिक लोगों को रोजगार देकर वर्तमान कर सीमा में लेकर आना;
  • वर्तमान कर सीमा के अन्दर के लोगों की कर चोरी पकड़ना|

गरीबों से कर लेना सरल तो हैं परन्तु एक गरीब की आयकर विवरणी को भरवाने और देखने मात्र में आयकर विभाग के कम से कम हजार रुपए खर्च होंगे| इतना ही पैसा कोई भी उनकी आयकर विवरणी भरने का भी लेगा| क्या आपको लगता हैं कि जिसका कर पांच हजार से कम हो उस की आयकर विवरणी भरवाने का कोई फायदा है| यही कारण है कि सरकार पांच लाख तक की आय वालों को आयकर विवरणी भरने से छूट देनी चाहिए| जिससे सरकार को फालतू खर्च न उठाना पड़े| परन्तु सरकार ऐसा नहीं कर पाती| बल्कि फालतू कर विवरणी को पढ़ने के लिए अब महंगी तकनीक का सहारा लिया जा रहा है|

सोचें क्यों? साथ ही यह भी सोचें कि इस प्रकार सरकार से आप कितना पैसा कर प्रशासन के मद में फालतू खर्च करवा रहे हैं|

पिछले बीस साल में सरकार और निजी क्षेत्र सबको खर्च कम करने की लत पड़ चुकी है| इसलिए नौकरियां नहीं दी जा रहीं| मगर क्या सोचा है कि हर नया नौकर अपनी नई आय खर्च करेगा तो हर साल में अपनी आय का लगभग २८% प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से रूप में मिलाकर सरकार को सीधे और लगभग ५०% दूसरों के माध्यम से लौटा देगा| मैं उन नौकरियों की बात कर रहा हूँ जिन्हें पैदा नहीं करना वरन भरना मात्र है| नई नौकरियों में जरूर कुछ अधिक खर्च होगा|

कर चोरी पर मुझे कुछ नहीं कहना| मुझे लगता है कि यही लोग हैं जो कराधान के दायरा लेकर रोते रहते हैं और अक्सर खुद तस्करों की श्रेणी में आते हैं|

(विशेष टिपण्णी: तस्कर अप्रत्यक्ष कर के चोर को कहते हैं, प्रत्यक्ष कर के चोर के लिए करचोर जैसे सम्मानित शब्द का विधान किया गया है|)

अगर अप्रत्यक्ष कर की बात की जाए तो हाल में देश के सबसे सुलभ और सबसे सस्ते बिस्कुट की बिक्री में कमी की बात सामने आई| कहा गया नोटबंदी और अप्रत्यक्ष कर के कारण लोग इसे नहीं खरीद पा रहे| जबाब में कहा जाता है कि उस बिस्कुट पर कर नया तो नहीं है| चीनी या मसाले सब पर कर लगता है| इतना ही है कि अब नमक सत्याग्रह नहीं हो सकता क्योंकि उसकर घरेलू नमक पर इस समय शून्य की दर से लगता है|

जब भी आप कराधान के दायरे की बात करें सोचें कि कौन है जो कर के दायरे में नहीं है?

चलते चलते इतना जरूर कहूँगा, किसी भी समझदार अमीर की कार पर कोई कर नहीं लगता| क्या वास्तव में उसपर कर लगता है?

#गहरानाज्ञान #तीसराशनिचर

भेदभाव उत्पादक यंत्र


मोटर वाहन एक ऐसा यंत्र है जो अपने मालिक और चालक को मनुष्य के स्तर के उठा कर सांड के स्तर पर लाकर रख देता है| जिस की जितनी बड़ी गाड़ी, उतना बड़ा सांड| मोटरवाहन की कुर्सियाँ उस सिंहासन की तरह है जहाँ से दूसरों ख़ासकर पैदल चलने वालों और कीड़े मकौड़े में कोई फर्क नहीं दिखाई देता|

एक हिन्दुस्तानी सड़क दुनिया का सबसे ख़तरनाक इलाका है जहाँ किसी को भी गाली गलौज कर सकते हो, पुलिस को अपने बाप का नाम बता सकते हो, दरोगा से उसकी औकात पूछ सकते हो, छोटी गाड़ी में बैठे बूढ़े पर हाथ उठा सकते हो, और सबसे बड़ी बात बिना गलती माफ़ी मांग लेने वाले को खानदानी पापी मान सकते हो| अगर आपको वर्णभेद और जातिभेद हमारी पुश्तैनी भेदभावी आदतें समझनी हैं तो हिन्दुस्तानी सड़क बढ़िया ठिकाना है| यहाँ आपके रंग, आपके कपड़े, आपकी गाड़ी और आप की सहनशील स्वभाव आपको वर्णभेद का शिकार बना सकता है| यह ऐसा भेदभाव है जिसमें आपके कर्म, जन्म, रंग आपके बारे में कुछ तय नहीं करते| आपको पददलित बनाने का काम इस बात से भी तय हो सकता है कि आप अपनी दसकरोड़ी गाड़ी को मरम्मत के लिए दे आये हैं और पिताजी की दो लाखी गाड़ी लेकर सड़क पर उतरे हैं| यह भेदभाव ही है जिसके कारण एक सस्ती मगर बढ़िया गाड़ी हिन्दुस्तानी बाजार में बिक भी नहीं सकी|

जो आदमी सड़क पर गलत हाथ पर चलता हुआ बिना किसी लाल हरी रौशनी का ध्यान दिए अपने वाहन में आकर बैठता है वह भी चाहता है कि हर सूअर या कीड़ा मकौड़ा सारे नियम का पालन करे| वास्तव में उसे अपने लिए सब सुविधाएँ चाहिए मसलन – रास्ता साफ़ हो, चमकदार सड़क हो, कोई रास्ता जाम न मिले, पुलिस वाला बिकाऊ हो और हर अँधा-बहरा भी उस का वाहन देखे और फालतू बजता उसका भोंपू सुने और आपातचिकित्सा वाहन भी उसके लिए रास्ता छोड़ दें|

मोटर वाहन भेदभाव के सबसे बुरे शिकार मजदूर, रिक्शाचालक, ऑटोचालक, रेहड़ीवाले, टैक्सीवाले हैं| उनका कोई दिन मोटर वाहन वाले किसी न किसी दैत्य से बिना गाली सुने नहीं बीतता|