कृषक आंदोलन सफलता के कुछ पहलू


कृषि कानून विरोधी आंदोलन की वर्तमान सफलता भले ही देर सबेर तात्कालिक साबित हो परन्तु, यह एक दूरगामी कदम हैं| हम लगभग सौ वर्ष पहले सीखे गए सबक को पुनः सीखने में कामयाब रहे हैं कि हिंसक क्षमता से युक्त तंत्र को अहिंसक और नैतिक मार्ग पर रहकर ही हराया है सकता है| साथ ही भारत की वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली और व्यवस्था की सम्पूर्णता की तमाम खामियाँ इस दौरान उभर और चमक कर सामने आईं हैं| 

भारतियों के लिए शास्त्रार्थ आज एक प्राचीन और विस्मृत परंपरा से अधिक कुछ नहीं है| हम चर्चा के आमंत्रण देते हैं और लम्बी लम्बी बहस करते हैं| परन्तु  हमारा सिद्धांत आज यही है कि पंचों की राय का सम्मान हैं पर पनाला यहाँ गिर रहा है भविष्य में भी वहीं गिरेगा| हम किसी विदूषक द्वारा हमारा मजाक उड़ाए जाने की क्षमता से अधिक दोगले हैं| 

अक्सर हम आपसी वार्तालाप, चर्चा, बहस आदि का समापन गाली गलौज से करते हैं| सामाजिक माध्यमों और समाचार माध्यमों में गाली गलौज की बहुत अधिक सुविधा हो गई हैं| लोग आमने सामने नहीं होते तो न निगाह की शर्म रह जाती हैं, न टोक दिए जाने का उचित असर| 

हाल के कृषि कानूनों की लम्बी बहसें चर्चाएं आदि सब इसी प्रकार की चर्चाएं रहीं हैं| 

हर कानून में कमियाँ होतीं हैं, इसलिए किसी भी कानून का अंध समर्थन नहीं किया जा सकता| अगर आप किसी भी कानून को अंध समर्थन देते हैं तो आप उसे बदलते समय के साथ बदल नहीं पाएंगे| तीव्रता से बदलते समय में हर कानून दो -तीन साल में सुधारा जाना होता हैं, कम से कम हर कानून को पुनः पुनः झाड़ना पौंछना होता है| वर्तमान सरकार का दूसरा अतिप्रिय अधिनियम दिवालिया और शोधन अक्षमता संहिता इसका प्रमुख उदाहरण हो सकता हैं| वस्तु और सेवा कर कानून तो खैर पुनः नवीनीकरण की राह देख रहा हैं| यही बातें दशकों से हर साल बदलते रहने वाले आयकर कानून को लेकर भी कही जा सकती है| कृषि कानून का समर्थन वास्तव में कानून का नहीं, उसके प्रणेता का अंध समर्थन था| मेरा पिछले दशक में यह विचार बना है कि समर्थकों के मुकाबले नेतृत्व और विचार-प्रणेता अधिक संवेदन शील हैं| 

इस परपेक्ष्य में कृषि कानूनों पर कोई वास्तविक चर्चा न होना या न हो पाना भारतीय जनमानस, समाचार व् संचार माध्यमों, सामाजिक माध्यमों और सामजिक तंत्र के लिए शर्मनाक उपलब्धि रही है| यह भी दुःखद रहा कि विरोध के लोकतान्त्रिक तरीकों का न सिर्फ़ विरोध हुआ, मजाक उड़ा, झूठी तोहमत लगीं, उसे हिंसक बनाकर पथभ्रष्ट करने के प्रयास हुए, बल्कि एक समय तो लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षक उच्चतम न्यायलय में भी इस आंदोलन के लिए प्रश्नचिन्ह का प्रयोग किया| पिछले एक वर्ष का सबसे अधिक सुखद पहलू यही रहा ही तमाम उकसावे, तोहमतों, प्रलोभनों और नाउम्मीदी के बाद भी कृषि कानून विरोधी आंदोलन हिंसक नहीं हुआ| कमजोर की हिंसा कभी भी ताकतवर को नहीं रहा सकती| अहिंसा के तमाम उपहास के बाद भी यह तह है कि दीर्घकालिक और सर्वकालिक विजय अहिंसा के माध्यम से प्राप्त होती हैं| 

खुद भारत में आदिवासी, जनजाति, कृषक समुदायों के हितों के लिए लड़ी जाने वाली लम्बी लड़ाई हिंसक प्रवृत्ति के कारण  आतंकवादी आंदोलन के रूप में सर्वमान्य हो चुकी है| यहाँ तक कि आदिवासी, जनजाति, कृषक मानवाधिकार के पूर्ण अहिंसक समर्थकों के भी आतंकवादी कह देने में आजकल कोई संकोच नहीं बरता जाता| नक्सलवादी आंदोलन की गलतियों और असफलताओं से सभी लोकतान्त्रिक आंदोलनों को जो सीख लेनी चाहिए कृषि कानून विरोधी आंदोलन उसे भली भांति लेने में सफल रहा हैं| 

यह मानना जल्दबाजी होगी कि सत्ता और सत्ताधारियों का शतरंज शह मात का कोई खेल न खेल कर अपने पूर्ण मानस के साथ पीछे हट गया है| यह चुनावी चौपड़ का नया दांव हो सकता है| 

लड़ाई लम्बी है| संघर्ष इस बात का नहीं कि इसे विजय में बदला जाए; संघर्ष इस बात का है कि इसे भटकने से बचाकर अहिंसक लोकतान्त्रिक सतत और समग्र बनाकर रखा जाए| 

पूरी तरह बंद हों पटाखे


2021 10 25 Business Standard Hindi

पटाखे ने केवल वायु प्रदूषण बल्कि ध्वनि प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण और अंत में जल प्रदूषण का कारक हैं| प्रकाश प्रदूषण को हमने अनुभव तो किया होता है पर नुकसान भी झेले होते हैं पर समझ नहीं पाते| यह मानवेतर जीव जगत को अधिक प्रभावित करता हैं| जैसा कि अक्सर होता है सभी प्रदूषक साफ सफाई कि प्रक्रिया में जल को प्रदूषित करते हैं|

हमारे समाज कि विडम्बना है कि दीपक आदि चक्षुप्रिय प्रकाश को हमने चुपचाप छोड़ दिया, पहले मोमबत्ती पर आए अब बिजली कि झालरों आदि का प्रयोग हो रहा है| जबकि दिवाली के मूल स्वरूप के हर वर्णन में दीपकों का महत्वपूर्ण विवरण है| दीपक दिवाली का मूल हैं| परंतु दीपकों के लिए कोई संघर्ष नहीं कर रहा| हमने बिना हो हल्ला किए दीपक जलाना छोड़ दिया है|

दूसरी ओर हम हानिकारक पटाखों के लिए जज्बाती हो रहे हैं| पटाखे चीन से आए और मुग़ल ‘आक्रांताओं’ के साथ भारत आए पर हमने अपना लिए| बुराई – खासकर विदेशी बुराई अपना लेना हमारा स्वभाव रहा है| पटाखे हम सब के लिए हानिकारक हैं| न तो यह दिवाली का मूल आधार हैं, न मूल परंपरा, न कोई आध्यात्मिक अनुभव| पटाखों से होने वाली हानि हम सब की मिलीजुली हानि है|

दुर्भाग्य से पटाखा व्यवसाय और धार्मिक अतिवाद का पूरा तंत्र दिवाली के आध्यात्मिक, धार्मिक और सामाजिक सरोकारों से इतर केवल दिखावा और उपभोकतवाद का प्रचार करने में लगा है| यह व्यवसायी पटाखों को दिवाली का कर्म कांड बनाने में काफी हद तक सफल रहे हैं|

दुर्भाग्य से पटाखा नीतियाँ भी इस प्रकार बन रहीं हैं कि आम जन को यह महसूस होता है कि यह नीतियाँ मात्र दिवाली पर ही पटाखे चलाने से रोकती हैं| यह भी प्रचारतंत्र का हिस्सा है कि गलत नीतियों के विरोध के नाम पर ही लोग अधिक पटाखे चलाने कि कसमें खा रहे हैं| जबकि यह गलत हैं| पटाखे पूरी तरह बंद होने चाहिए – सरकारी नीतियाँ बने या न बने|

दिवाली पर पटाखा एक धार्मिक और सामाजिक प्रदूषण हैं और समाज को इस प्रकार के प्रदूषण को बंद करना चाहिए|

मन का लगना


ज़िंदगी को हर कोई हँस खेल कर बिता लेना चाहता है| सब चाहते हैं दूरियाँ मिट जाएँ मन की| मगर यह दुनिया की सबसे कठिन प्रार्थना है| 

जो दूरियाँ देश-काल स्थापित करता है, उनका अधिक महत्व नहीं रहता| मीरा का मन कृष्ण से जुड़ता है और सुदामा का भी – न काल आड़े आता न देश-परदेश| 

समय की दूरी का क्या है जब मन हो वाल्मीकि के राम से मिला जाए या मीरा के कृष्ण से; जब मन हो दोनों में साम्य पाया जाए या उन के अंतर को समझा जाए| एक ही गीता हर मन मंथन में अलग सुर-संगीत रचती है और हर तत्त्व विन्यास में अनेक होकर एक रहती है| यह मन की माया है, ज्ञान-विज्ञान को क्यों, कैसा, कब कितना निचोड़े| 

भौगोलिक दूरियाँ मिटाना भी अब सहज है| मन की दूरियाँ कोस और फ़र्लांग में नहीं होतीं| आज तो संचार के साधन है – जब चाहा बात हो गई, एक दूसरे को देख लिया| कुछ अनुरागियों का नियम होता है मन मिलें या न मिलें दिन में दो बार ध्वनि-संबंध और दृश्य संबंध अवश्य स्थापित हो जाए| दूसरे को हर रोज अच्छा खाते पीते पहनते देखा जाए और उलहना दिया जाए – कितना पैसा बर्बाद करते हो; या कि उबली लौकी क्यों खाते हो रोज?

विज्ञान और ज्ञान क्रमशः देश और काल कि दूरियाँ मिटा सकते हैं| मन की दूरियाँ पाटने के लिए तो मन चाहिए – मन की लगन चाहिए| एक समय, एक कक्ष, एक विचार, एक हित, एक तन और एक मन होकर भी मन न मिले| ओह, क्या हो तब दोनों का मन एक ही राजदंड पर आ जाए| कौन भोगे और कौन भुगते? 

मन तो मिल जाए पर लगे कैसे? दो मन न लगें तो उनका मिलना क्या और न मिलना क्या| मन लगने के लिए मन मिलना सहायक है, परंतु आवश्यकता नहीं| दो मित्रों में एक का मन राजसिंहासन में और दूसरे का राजकाज में हो तो मन आपस में सकता है| मन लगने के लिए आवश्यक है एक दूसरे के मन को समझना, एक दूसरे के मन को सहेजना, एक दूसरे के साथ का तारतम्य| यह ही तो कठिन है| दोनों के सुर ताल मिलने चाहिए, जैसे शास्त्रीय संगीत में मिलते हैं गायक से सुर से हर वाद्य के सुर मिलते हैं, ताल मिलती है, थाप मिलती है तब स्वार्गिक सुर उत्पन्न होता है| उस सुर में सरसता और सरस्वती आती है|

यह मन लगाना एक दूसरे के साथ दो मन का रियाज़ मांगता है, इसमें दो मन का रियाज़ कितना भारी होता है? हम यह नहीं कह सकते कि हमारे मन का सुर यही रहेगा, आप अपने मन का सुर ताल हमसे मिलाएं| ऐसा हो भी जाये तो कितना चलेगा? आप किसी दबाब में डालकर सुर भले ही मिलवा लें पर पर मन कैसे मिलेगा? सुर मिल सकते हैं, समझौते हो सकते हैं, जीवन जिए जा सकते हैं पर बलात मन नहीं हिलमिल सकता| इसके लिए न क़ानून काम करेगा न लठ्ठ| हाथ लगेगा तो ग़ुलामी या समझौता – मन नहीं मिलेगा| 

आपसी संबंधों में शक्ति प्रदर्शन के चलते एक पक्ष झुकता तो है और धीरे धीरे उसका मन में खटास आती ही है|