समान नागरिक संहिता


समान नागरिक संहिता पर वर्तमान बहस की पृष्ठभूमि कुछ अलग तरीके से पैदा हुई मगर इसने पहली बार इसपर चर्चा का अवसर दिया है|

एक मुस्लिम महिला ने कुछ सुन्नी मुस्लिम समुदायों में प्रचलित तलाक – उल – बिद्दत (जिसे अधिकतर मुस्लिम उचित नहीं मानते) भारत में समाप्त करने के लिए अदालत से गुहार की| मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अतिरिक्त विश्वभर में कुछेक मुस्लिम ही इस तलाक प्रणाली के समर्थक होंगे| दुनिया के तमाम मुस्लिम देश इसे ख़त्म कर चुके हैं, अतः मुझे नहीं लगता कि इसपर बहस करने की जरूरत है| मगर, कोई भी भारतीय राजनीतिक दल तलाक़ – उल – बिद्दत का विरोध नहीं करना चाहता और समान नागरिक संहिता पर बहस उसी विषयांतर का प्रयास मात्र है|

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक और असंख्यक सभी समुदाय अपनी विविधता और पहचान को बचाय रखना चाहते हैं| कोई भी व्यक्ति धार्मिक क्या, पारवारिक रीति-रिवाज तक नहीं छोड़ना चाहता| विविधता में एकता ही हमारी राष्ट्रीय पहचान है और इसे बचाए रखना समान नागरिक संहिता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है|

अगर समान नागरिक संहिता में अब तक की आम सहमति पर बात की जाय तो बात सिर्फ इतनी है –

“सभी स्त्री और पुरुष अपनी अपनी रीति – रिवाज, परम्पराओं और विचारों के अनुसार “विषमलिंगी” विवाह, तलाक, संतान, नामकरण, मृत्यु और उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रिया का पालन करते हुए, जन्म, विवाह, मृत्यु और उतराधिकार का पंजीकरण कराएँगे और बिना वसीयत के मामलों में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम का पालन करेंगे|”

अगर सारी बहस के बाद भी मामला इतना ही निकलना है तो मुझे लगता है कि यह सारी बहस मात्र अतिवाद और अतिरंजना है| बात अगर निकली है तो दूर तक जानी चाहिए|

समान नागरिक संहिता के सन्दर्भ में दहेज़, सती, विधवा विवाह, विधुर विवाह, बालविवाह, मैत्री करार, विधवा अधिकार, सगोत्र परन्तु विधि सम्मत विवाह, विजातीय विवाह, विधर्मी विवाह, समलैंगिक सम्बन्ध, बेटियों का उत्तराधिकार, बलात्कार, बलात्कार जन्य बालक का उतराधिकार, विशिष्ठ परिस्तिथियों में स्त्रियों और पुरुषों की दूसरे विवाह की आवश्यकता, नियोग, सरोगेसी, स्त्री – पुरुष खतना, विवाह पूर्व यौन सम्बन्ध, विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध, विवाह उपरांत अवांछित आकस्मिक यौन सम्बन्ध, मासिक धर्म, राजोनोवृत्ति, पारिवारिक हिंसा, व्यवसायिक हिन्दू संयुक्त परिवार, समान सम्पत्ति अधिकार संबंधी राष्ट्र व्यापी कानून, आदि पर गंभीर चर्चा का अभाव है| बहुत से लोग वर्तमान कानूनों के हवाले से इनमें से कुछ मुद्दों पर बात नहीं करना चाहते| तो कुछ इनमें से कुछ मुद्दों को मुद्दा नहीं मानते| मगर समान आचार संहिता को बिना गंभीर चर्चा किये नहीं बनाया जाना चाहिए|

एकल विवाह आज अतिवादी रूप से आधुनिक माना जा रहा है, परन्तु इस अतिवाद के चलते बहुत से लोग छिपा कर दूसरे विवाह करते हैं या विवाहेत्तर सम्बन्ध रखते हैं| इन छिपे विवाहों और विवाहेत्तर संबंधों से होने वाली संतान को अकारण एकल विवाह अतिवाद का शिकार होना पड़ता है|

मुद्दे बहुत हैं, मगर बहस और चर्चा की इच्छा शक्ति की हमारे वर्तमान इंस्टेंट नूडल समाज में बेहद कमी है|

 

वेश्या की असहमति


माननीय अदालतें जब बलात्कार आरोपी को यह कहकर दोषमुक्त कर देतीं है कि उनकी शिकार महिला एक वेश्या थी, मुझे निराशाजनक आश्चर्य होता है| असहमति के साथ हुआ कोई भी यौन सम्बन्ध बलात्कार है| शायद वेश्या एक ऐसी स्त्री है, जिसकी सहमति लेना सबसे सरल है| अगर, कोई व्यक्ति/आरोपी एक वेश्या की भी सहमति नहीं ले सकता तो यह बेहद निम्न दर्जे की बात है| अगर वेश्या असहमति व्यक्त  करती है तो उसकी असहमति का भी माननीय अदालतों द्वारा सम्मान किया जाना चाहिए|

कुछ तर्क दिए जाते हैं, अधिक धन की लालसा से वेश्या ने यह आरोप लगाया है| इस तर्क पर न जाने कैसे माननीय अदालतें भरोसा कर लेतीं हैं| तथ्यों की गूढ़ता एक मुद्दा हो सकती है, मगर न्याय के हिट में समस्या नहीं| बेहतर हो, माननीय अदालतें इस मामले में कोटेशन (Quotation) और इनवॉइस (Invoice) की व्यवस्था कर दें|

मैं कौन???


मैं कौन हूँ?

कोई दार्शनिक प्रश्न नहीं| जी नहीं| इस प्रश्न की दार्शनिकता समय के इतिहास में अंकित हो चुकी है|

मैं कौन हूँ? लोकतान्त्रिक प्रश्न है| नहीं, नहीं| जी नहीं| मैं इसे राजनीतिक प्रश्न नहीं कहूँगा| मुझे राजनीति से भय होता है|

जिन युगों में…. जी हाँ इस प्रश्नों के उत्तर खोजने वाले पल, युगों जितने लम्बे होते है| जिन युगों में मैं इस प्रश्न का उत्तर खोजता हूँ, मेरे मुख में हलाहल विष जैसे उत्तर उड़ेल दिए जाते है| मेरी जीभ इन उड़ेले गए उत्तरों के विष से जल रही है|

उन्हें नहीं जानना, मैं कौन हूँ|

आचार्य शंकर चले गए – अहम् ब्रह्मस्मि| यह उनका समय नहीं, आचार्य शंकर को बताना होगा, ब्रहमुद्दीन या ब्रहमाशंकर या कि ब्रहमविलिंग्टन|

मैं आज ब्रह्म नहीं हूँ| मैं आज ईश्वर का भुला – भटका अंश भी नहीं हूँ| मैं आज आत्मा भी नहीं हूँ|

क्या मैं एक जीव हूँ? कदाचित्, कदाचित् परन्तु; परन्तु मेरी श्वास स्वतंत्र नहीं है, मेरा भोजन स्वतंत्र नहीं है, मेरा सहवास स्वतंत्र नहीं है| मेरी परतंत्रता ईश्वर के हाथ नहीं, ईश्वर मुझे कुछ नहीं कहता| ईश्वर ने मुझे दुर्गन्ध न सूंघने की समझ दी है, विष न खाने की समझ दी है, मुझे सहवास की समझ दी है| परन्तु समयखंड में में जीव नहीं हूँ| यदि जीव हूँ भी, तब भी मैं जीव नहीं बचा रहता, मैं नए कलेवर में ढाल दिया गया हूँ|

यदि मैं थोड़ा भी जीव हूँ, तो मुझे अणुमात्र तो मानव होना ही चाहिए| कदाचित्, मैं मानव नहीं हूँ| मानव मेरी पहचान नहीं है| मैं मात्र उतना ही मानव हूँ, जितना गाय को सम्मान देता हूँ और वाराह से घृणा करता हूँ|

जब मुझसे पूछा जाता हूँ, मैं कौन हूँ| मैं अपने प्रतिबिम्ब के पीछे छिप जाता हूँ| मैं अपना छद्म प्रतिबिम्ब ओढ़ लेता हूँ|

मैं भारतीय, अमरीकी, ब्रितानी, जर्मन, होने से पहले मानव होना चाहता हूँ| मैं हिन्दू मुस्लिम ईसाई होने से पहले मानव होना चाहता हूँ| मैं ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य होने से पहले मानव होना चाहता हूँ| मैं गोरा काला भूरा होने से पहले मानव होना चाहता हूँ|

मैं सबसे पहले मानव हूँ| मैं भारतीय –पाकिस्तानी, हिन्दू-मुस्लिम, ब्राह्मण – बनिया, बिहारी-मराठा, हिंदी-उर्दू, व्रज-अवध, आगरा – अलीगढ़, से पहले मानव हूँ|