तू जो कह दे, उसे जुबां में हंसकर अपनी दे दूँ,


ये मौसम गुनगुना है, हवाओं में खुशबू है|

फ़िजाओं में घुला है, नशा तेरे होने का – साथी||

 

पत्थर भी गुनगुनाते हैं, गीत भौरों की जुबां में,

कौवे भी गाते हैं, मुहब्बत के मुस्कुराते तराने|

तेरी ही आवाज़ में, मैं आवाज आज देता हूँ,

गुमशुम सी हंसती है, हस्ती मेरे, मेरे होने की||

 

जिन्दगी में तरन्नुम है, तरानों में रस्मी रवानी है,

बचपन की बचकानी बातें, आज मेरी जवानी हैं|

अमावास की रातों में, अब पूनम की चाँदनी है,

तेरी दरियादिली में, मेरी मस्त जिन्दादिली है||

 

तू जो कह दे, उसे जुबां में हंसकर अपनी दे दूँ,

तेरे परचम की अदा पर, निछावर रंग मेरे दिल के|

मेरा हमसफ़र तू, मेरा सरमाया तू, तू ख़ुदा है,

आगोश में तेरे आने को, मेरा सिर यूँ झुका है||

 

भौकाल


कन्या पाठशाला चौराहे पर बजरंगी पनवाड़ी की दुकान,
बिक्री का समय शुरू होना चाहता है… पनवाड़ी कटे अधकटे पान सजा रहा है..
मजनूँ लौंडे सामने पुलिया पर पैर टिकाये वक्त काट रहे हैं..
चार मकान दूर से पंडिताइन का शोर शुरू…
पान खाना तो बहाना है… उम्र देखो पंडित अगली साल तुम्हारी बिटिया भी यहीं पढ़ने जाएगी…
पनवाड़ी ने एक कड़क बनारसी पान लगाना शुरू कर दिया… मिश्रा पंडित आते होंगे…
कॉलेज का घंटा टनटन कर जोर से दो बार बजा… पनवाड़ी ने बिना सर उठाये पान का बीड़ा पंडित की तरफ बढ़ा दिया…
फिर जोर से बोला भागो यहाँ से हरामजादो… जब देखो तब पिचपिचाये रहते हो… उसकी निगाह कॉलेज की तरफ उठी…
थानेदार की लड़की कॉलेज से निकल कर इधर ही आ रही है…
मिश्रा पंडित के ललियाए मूंह से पान की पीक चू कर बहने लगी है..
पनवाड़ी ने सोचा थाने से कोई आता होगा…
भागो सालो फ़िल्म शुरू हो रही है… बजरंगी पनवाड़ी के सुर में चेतावनी है या सूचना खुद नहीं पता…
मिश्रा पंडित सकपकाए… कल का भौकाल याद आया… मूंह में पान रख रखे बेसुरा गाने लगे…
जन गन मन जये हे..

कार्ड भुगतान का खर्च


विमुद्रीकरण के बाद जन सामान्य को नगद भुगतान न करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है| पुरानी दिल्ली की एक दुकान पर भुगतान करने के लिए जब हमारे मित्र ने भुगतान करने के डेबिट कार्ड निकला तब दुकानदार ने कहा, साढ़े छः प्रतिशत अतिरिक्त देना होगा| ध्यान रहे मॉल में भुगतान करते समय इस प्रकार का अतिरिक्त भुगतान नहीं करना पड़ता| आइये, मुद्दे की पड़ताल करते हैं|

पुरानी दिल्ली के दूकानदार प्रायः कम सकल लाभ (gross profit) पर सामान बेचते हैं| उनके द्वारा कमाया जाने वाला सकल लाभ मॉल वालों के सकल लाभ से बहुत कम होता है| कम सकल लाभ कमाने के कारण, इनके पास अतिरिक्त खर्चों की गुंजायश बहुत कम होती है| इस लिए हर अतिरिक्त खर्चे को टाला जाता है| नगद भुगतान लेने के बाद यह लोग अपने  सारे खर्च नगद में करते हैं, घर में ले जाये जाने वाला शुद्ध लाभ भी नगद होता है और बैंक में केवल घरेलू बचत ही जमा की जाती है| इस प्रकार इन्हें नगदी प्रबंधन में समय और पैसा नहीं खर्च करना पड़ता|

जब किसी व्यापार प्रणाली को कार्ड से भुगतान लेना होता है तब उसे एक महंगी सुविधा अपने साथ जोड़नी होती है| इसमें कार्ड प्रदाता कंपनी, भुगतान प्रक्रिया कंपनी, इन्टरनेट सेवा कंपनी, बैंकिंग कंपनी सब उस व्यापार प्रक्रिया में जुड़ते हैं| अतिरिक्त खर्चे इस प्रकार हैं –

  • कार्ड धारक का वार्षिक शुल्क,
  • गेटवे चार्जेज – प्रायः कार्ड रीडर मशीन, उनका प्रबंधन, और बैंक आदि से मशीन का संपर्क एक महँगी प्रक्रिया है| कोई न कोई इस कीमत को अदा करता हैं और बाद में ग्राहक से वसूलता है|
  • हर भुगतान पर शुल्क – जो डेबिट कार्ड के मामले में आधा से डेढ़ प्रतिशत और क्रेडिट कार्ड के मामले में डेढ़ से तीन प्रतिशत तक होता है| सरकारी भुगतान जैसे स्टाम्प ड्यूटी, सरकार समर्थित सेवा जैसे रेलवे आरक्षण, आदि के मामले में भुगतान करने वाला इस कीमत को अदा करता है, जबकि मॉल आदि अपने लाभ में से इसे भुगतते हैं| ध्यान रहे कि मॉल के बड़े दुकानदारों के लिए नगदी का प्रबंधन भी उतना ही महंगा होता है| भुगतान प्रक्रिया भुगतान कर्ता, कंपनी कार्ड कंपनी, भुगतानकर्ता के बैंक, विक्रेता के बैंक और विक्रेता, आदि को जोड़ती है| इसका खर्च दूकानदार को, या कहें कि ग्राहक को ही देना होता है|
  • दोनों बैंक अपने अपने ग्राहक से बैंक चार्ज के नाम पर वसूली करतीं हैं| डेबिट कार्ड के मामले में यह चार्ज सीधे ही वसूला जा सकता है| क्रेडिट कार्ड के मामले में अगर आप समय पर पैसा नहीं दे पाते तो कंपनी को लाभ होता है| इस प्रकार की उधारी पर कंपनी 24 से 48 प्रतिशत तक बार्षिक ब्याज़ वसूलती है| इस प्रकार के लापरवाह ग्राहक कंपनी के लिए कीमती होते हैं, न कि समय पर पैसा लौटाने वाले|
  • इन सभी सेवा प्रदाताओं को संपर्क में लेन के लिए इन्टरनेट सेवा का प्रयोग होता है|

आपको ऐसे दुकानदार भी मिलेंगे जिनके पास कार्ड रीडर मशीन बंद पड़ी होंगी| कई बार छोटे दुकानदार डेबिट कार्ड या क्रेडिट कार्ड के इस प्रबंधन को अपने निकट के बड़े दुकानदार की मदद से अंजाम (आउटसोर्सिंग) देते हैं| यह बड़ा दुकानदार इस सुविधा के लिए कुछ रकम चार्ज करता है| यह चार्ज सामान्य चार्ज से लगभग ढाई – तीन गुना होता है| इसमें बड़े दुकानदार के सारे खर्चे और लाभ शामिल होते हैं| मूल रकम बड़े दुकानदार को सेवा मांगने वाले बड़े दुकानदार को देनी होती है| यह व्यापर की दुनिया में, तमाम सरकारी निमयों और वैट के बीच, जटिल और खर्चीली प्रकिर्या है|

इस प्रकार मुझे उस छोटे दुकानदार द्वारा डेबिट कार्ड के लिए साढ़े छः प्रतिशत मांगना गलत नहीं लगता|

पुनःश्च – मोबाइल वॉलेट में भी छिपी हुई कीमत होती है, जो फिलहाल आपके निजी आंकड़े के रूप में वसूली जा रही हैं|

पुनः पुनःश्च – नेशनल पेमेंट कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया और आपके अपने बैंक द्वारा शुरू किया गया यूनिफाइड पेमेंट इंटरफ़ेस एक बेहतर विकल्प हो सकता है| अज्ञात कारणों से बैंक अपनी इस सुविधा का व्यापक प्रचार नहीं कर रहीं|