शरणार्थी और भारत


भारत को बहु-सांस्कृतिक सभ्यता बनाने में अलग अलग समुदायों का योगदान निर्विवादित है| हमारी अतिउप-संस्कृतियाँ महीन ताने-बानों से बनीं हैं| भारतीय सजातीय विवाहों में भी आधा समय इस बात में हंसी-ख़ुशी नष्ट हो जाता है कि वर-वधु पक्ष के रीति-रिवाज़ों में साम्य किस प्रकार बैठाया जाए| उप-संस्कृतियों के विकासक्रम में बहुत से तत्व रहे हैं, जिन्हें ठीक से न समझने वाला व्यक्ति विदेशी आक्रमणों से जोड़ कर शीघ्र निष्कर्ष पर पहुँच सकता है| परन्तु निर्विवाद रूप से हमारे उन-सांस्कृतिक विकास में अन्तराष्ट्रीय व्यापार और शरणार्थियों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता|

अन्तराष्ट्रीय व्यापार के प्रमाण सिन्धु घाटी सभ्यता के समय से मिलने प्रारंभ हो जाते हैं| आक्रमण वाले सिद्धांत के विपरीत अन्तराष्ट्रीय व्यापार ने इस्लाम को अरब आक्रमणों से काफी पहले भारत पहुंचा दिया था|

भारत के सर्वांगीण विकास में शरणार्थियों का योगदान इनता मुखर और सामान्य स्वीकृत है कि हम उसपर विवेचना की ज़हमत नहीं उठाते| जिन शरणार्थियों को “खीर के एक कटोरे” से वचन में बाँट दिया गया था, उनका बेचा नमक आज सारा भारत खाता है| ग़दर के बाद भारत में आजादी की नियोजित लड़ाई का प्रारंभ करने वाली इंडियन नेशनल एसोसिएशन और उसके बाद इन्डियन नेशनल कांग्रेस के एक सह-संस्थापक दादा भाई नौरोजी उन्हीं पारसी शरणार्थियों के वंशज थे| आज जिन प्राचीन ईरानी कथा कहानियों को हम फारस और मुस्लिमों से जोड़ते हैं वो कदाचित पारसियों के साथ भारत चुकीं थीं|

भारत में पारसी अकेला समुदाय नहीं है जो शरणार्थी बनकर भारत आया| आजादी के बाद आये शरणार्थी तिब्बती समुदाय के साथ भी स्थानीय समाज के सामान्य रिश्ते हैं| बंटवारे के समय पाकिस्तान से आने वाले लोग भी वास्तव में शरणार्थी ही हैं| अफगान संकट के समय आने वाले अफगानों का भी भारत में शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व है|

पिछले कुछ दशकों में अक्सर बाहर से आने वाले शरणार्थियों को उपद्रव का कारण माना जा रहा है| यह उत्तरपूर्व में होने वाले त्रिकोणीय सामुदायिक संघर्ष के कारण है| देश के किसी क्षेत्र में शरणार्थियों का कैसा स्वागत होगा, इसमें क्षेत्रीय विकास महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| आप उत्तरपूर्व भारत में अवैध बंगलादेशी आप्रवासियों का मुद्दा रोज सर उठाते देखेंगे| जबकि दिल्ली मुंबई के चुनावों में यह मुद्दा हाशिये से आगे नहीं बढ़ पाता| जब शरणार्थी (और रोजगार की तलाश में आने वाले लोग) देश के कम विकसित क्षेत्र में आकर रहते है, तब इस प्रकार के संघर्ष स्वाभाविक हैं| जहाँ संसाधनों सभी के लिए पूरे नहीं पड़ते| दलगत राजनीति इन संघर्षों की आड़ में अपनी नीतिगत खामियां छिपाने और वोट की फ़सल काटने का काम करती है|

रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध बताकर वापिस भेजा जा रहा है| अपनी मर्जी से तो लोग रोजगार के लिए भी अपनी जन्मभूमि नहीं छोड़ते| मुझे नहीं पता कि वैध शरणार्थी कैसे होते हैं? क्या उन्हें देश से भागने वाली सरकारें वीज़ा पासपोर्ट बनाकर भेजतीं हैं? क्या अपने देश से जान बचाकर भागता भूखा नंगा आदमी आपको डरा देता है? क्या इस बात के प्रबंध नहीं हो सकते कि उनपर दया और निगाह एक साथ रखी जा सके|

 

पुनश्च – शरणार्थियों के अपने राजनीतक महत्व भी हैं, अगर पाकिस्तान के शरणार्थी भारत न आने दिए गए तो शायद दक्षिण भारत का इतिहास अलग होता| इस पर हो सका तो फिर कभी|

हिंदी में विनम्रता


Please, remove your shoes outside.

इस अंग्रेजी वाक्य का सही हिंदी अनुवाद क्या है?

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार|
  2. अपने जूते बाहर उतारें|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें|
  6. भगवान् के लिए अपने जूते बाहर उतार लीजिये|
  7. जूते बाहर उतार ले|
  8. जूते बाहर उतार ले, प्लीज|

हम हिन्दुस्तानियों पर अक्सर रूखा होने का इल्जाम लगता है| कहते हैं, हमारे यहाँ Please या Sorry जैसे निहायत ही जरूरी शब्द नहीं होते|

अक्सर हम तमाम बातों की तरह बिना सोचे मान भी लेते हैं| अब ऊपर लिखे वाक्यों को देखें|

हमारे क्रिया शब्दों में सभ्यता और विनम्रता का समावेश आसानी से हो जाता है तो रूखेपन का भी| हम प्लीज जैसे शब्दों के साथ भी रूखे हो सकते हैं और बिना प्लीज के भी विनम्र| आइये ऊपर दिए अनुवादों को दोबारा देखें|

  1. कृपया, अपने जूते बाहर उतार| यह एक शाब्दिक अनुवाद है और किसी भी लहजे से गलत नहीं हैं| मगर हिन्दुस्तानी सभ्यता के दायरे में यह गलत हैं क्योकि “उतार” में अपना रूखापन है जो प्लीज क्या प्लीज के चाचा भी दूर नहीं कर सकते|
  2. अपने जूते बाहर उतारें| यहाँ प्लीज के बगैर ही आदर हैं, विनम्रता है| क्या यहाँ प्लीज के छोंके के जरूरत है? इसके अंग्रेजी अनुवाद में आपको प्लीज लगाना पड़ेगा|
  3. अपने जूते बाहर उतारिये| क्या कहिये? ये तो आप जानते हैं कि इसमें पहले वाले विकल्प से अधिक विनम्रता है| अब इनती विनम्रता का अंगेजी में अनुवाद तो करें| आपको शारीरिक भाषा (gesture) का सहारा लेना पड़ेगा, शब्द शायद न मिलें|
  4. अपने जूते बाहर उतारियेगा| हम तो लखनऊ का मजाक उड़ाते रहेंगे| यहाँ आपको अंग्रेजी और शारीरिक भाषा कम पड़ जायेंगे| उचित अनुवाद करते समय कमरदर्द का ध्यान रखियेगा|
  5. अपने जूते बाहर उतारने की कृपा करें| क्या लगता है यह उचित वाक्य है| इसमें अपना हल्का रूखापन है| आपका संबोधित व्यक्ति को अभिमानग्रस्त या उचित ध्यान न देने वाला समझ रहे हैं और कृपा का आग्रह कर रहे हैं| यदि यह व्यक्ति आपके दर्जे से काफी बड़ा नहीं है तो यह वाक्य अनुचित होगा|
  6. कृपया, अपने जूते बाहर उतार लीजिये| लगता है न, कोई पत्नी अपने पति के हल्का डांट रही है|
  7. जूते बाहर उतार ले| यह तो आप अक्सर अपने बच्चों, छोटों और मित्रों को बोलते ही है| सामान तो है ही नहीं|
  8. जूते बाहर उतार ले/लें, प्लीज| यह विनम्रता है या खिसियानी प्रार्थना| हिंदी लहजे के हिसाब से तो खीज ही है|

वैसे आप कितनी बार विकल्प दो तीन और चार में कृपया का तड़का लगाते हैं?

हमारी गोमती


अलीगढ़ शहर में जब आप थोड़ा बड़े होने लगते हो तो आगरा या दिल्ली में से एक आपको अपना दूसरा घर लगने लगता है| आजकल विकास की मार के कारण आगरा छूट गया है और दिल्ली – नॉएडा ही विकल्प बचे हैं| अलीगढ़ शहर से दिल्ली जाने के साधन कुछ भी हों, पर वो रेलवे ट्रैक पर ही चलते हैं| बस का विकल्प हमने एटा–मैनपुरी–कासगंज वालों के लिए छोड़ रखा है| पुराने समय में कभी एज़ीएन सुबह अलीगढ़ वालों को दिल्ली पहुंचा देती| बाद में ईएमयू ट्रेन नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली तक जाने लगीं| बचे खुचे लोगों को हाथरस वालों को एचेडी और टूंडला वालों की टीएडी का आसरा रहता| मगर जलवा अगर रहा तो गोमती का, जिसे मगध के अलावा किसी ने चुनोती न दी|[1] भले ही दोनों ट्रेन आजकल भारत सरकार की गति की तरह ही ढुलमुल चलतीं हैं, मगर जलवा कायम है|

जिस ज़माने में बिहार की राजधानी से मगध सुबह सवा नौ तक आ जाती थी, अलीगढ़ वाले औकात से गिरना कम ही पसंद करते थे| मजबूरी को छोड़ दें तो, छोटे बनिए और उनके कुली ही मगध से जाते थे| उन दिनों और आजकल भी, लटककर ही सही मगर आन बान के साथ गोमती से जाना ही समझदारी है| गोमती में भले ही दो- चार अनारक्षित डिब्बे होते हैं मगर ये कहाँ होते हैं इसका पता लेखक को नहीं है| इसके चौदह पंद्रह आरक्षित कुर्सीयान डिब्बों में आरक्षण पागल, सनकी, बूढ़े, गर्भवती, बच्चेवालियाँ या नई-नवेलियाँ करातीं है| ये तो होली मिलन के दिनों में टीटी मिलने और अपने सालाना टारगेट का रोना सुनाने न आये तो पता भी न चले कि इसका आरक्षण किधर होता है| इन डिब्बों में बैठना, खड़े होना, लड़ना और लटकना मिलकर दोसौ से तीनसौ भलेमानस प्रति डिब्बा यात्रा करते हैं| इन डिब्बों में आप नैसर्गिक मनोरंजन करते, लड़ते – झगड़ते, कूदते-फाँदते, कोहनीबाजी और उंगलबाजी करते हुए आराम से सफ़र कर सकते हैं, वर्ना गप्प मारने और ताश पीटने के काम तो निठल्ले भी कर ही लेते हैं|

नए पैसे वाले लौड़े–लौंडियाँ आजकल एसी वैसी में चलने लगे हैं| इनकों दादरी और गाज़ियाबाद तक ही टिकना होता हैं| ये मोबाइल पकड़ प्रजाति कंप्यूटर की गुलामी करने को देश का विकास समझती है और इन्टरनेट पर भगत सिंह की क्रांति करती रहती है| धीरे धीरे अधेड़, परिवारीजन भी इस एसी में जाने लगे हैं; मगर जाड़ों में इसमें इतना दम घुटता है कि लालू याद आते हैं और चारा चोटाला तेल लेने चला जाता है| बकौल रेलवे, वोट के अलावा कुल जमा इन दो डिब्बों के लिए ही हो तो पूरी गोमती चलाई जाती है|

एक नेताजी टाइप डिब्बा भी है, उसका न पूछे| एक बार हमने पूछा था तो पता चला उसमें अम्बानी का चाचा, अखिलेस का ताऊ, माया का भाया, टाइप कोई होता है – कभी कभी| डिब्बा इसलिए होता है कि कहीं चाइना पाकिस्तान को पता न चल जाये कि इत्ती बड़ी गाड़ी में एक पिद्दी एसी फर्स्ट क्लास नहीं है|

[1] कृपया भूलकर भी इन्हें मगध एक्सप्रेस और गोमती एक्सप्रेस के वाह्यात सरकारी नामों से न पुकारें, भावनाएं आहत हो सकतीं हैं|