अर्ध-रोजगार की चिंताएं


प्रधानमंत्री के पकौड़े वाला सम्बंधित बयान के साथ राजनीतिक और चापलूसिक बयानबाजी जारी है|
किसी की पकौड़े वाला अचानक सम्मानित रोजगार नजर आने लगा है तो किसी को बेरोजगार| पता नहीं मोचियों और रिक्शेवाले को कभी सम्मान न देने वाले लोग कब समझेंगे कि वह भी एक रोजगार है जिसे जाति और आर्थिक पिछड़ेपन से ऊपर उठकर रोजगार की तरह देखने  की जरूरत है|

इस सारी बहस का मूल मुद्दा है कि रोजगार क्या है?

सामान्य भाषा में सामान्यजन की समझ के अनुसार “किसी दुसरे व्यक्ति द्वारा किया जा रहा कोई भी काम जिससे वेतन या लाभ का एक तिनका भी उसके घर जा रहा है, रोजगार है|”

जब यह बात अपने पर आती है तो बात बदल जाती है, “ऐसा कोई कार्य या व्यवसाय, जिससे सामाजिक सम्मान के साथ समुचित जीवन यापन करने के लिए वेतन या लाभ कमाया जा सके, रोजगार है|”

अर्थशास्त्रियों और समाज विज्ञानियों की निगाह में “अपनी योग्यता के इच्छा अनुकूल समुचित उपयोग से किया जा रहा कोई कार्य जिससे सामाजिक सम्मान के साथ समुचित जीवन यापन करने के लिए वेतन या लाभ कमाया जा सके, रोजगार है|”

सारी बहस में दिक्कत यह है कि अपने निजी दृष्टिकोण बहस में शामिल है| अचानक इस बात पर जोर दिया जाने लगा है कि पकौड़े का खोखा लगाना रोजगार है या नहीं है| इसका उत्तर कभी भी हाँ या न में नहीं हो सकता| अगर एक आंठवी कक्षा उत्तीर्ण व्यक्ति पकौड़े बेचता है तो यह सम्मानित रोजगार हो सकता हैं, मगर किसी चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा पकौड़े बेचना रोजगार नहीं हो सकता|मामला यहीं ख़त्म नहीं होता| अगर पकौड़े का खोखा न होकर भीखाजी कामा प्लेस पर पकौड़े की बड़ी दूकान हो तो किसी स्नातक के लिए यह न सिर्फ रोजगार हो सकता हैं वरन वह चार और लोगों को रोजगार दे सकता है|

इस सारी बहस में हस्यास्पद स्तिथि बड़ी बड़ी कंपनियों में रोज बारह घंटे काम करने वाले सफ़ेदपोश कर्मियों की है| यह जमात अपने को रोजगार में लगा हुआ अक्लमंद समझती है| मगर उचित रोगजार की परिभाषा में यह लोग नहीं आते| उचित रोजगार वह है जिसमें आप कार्य और निजी जीवन में संतुलन बना पायें| जब आप बारह घंटे काम करते हैं तो किसी दुसरे की रोजगार सम्भावना नष्ट कर देते हैं| आप अपने पक्ष में जो तर्क देते हैं वो जंगल के तर्क हैं – “अगर मैं नहीं करूंगा तो दूसरा करेगा”| प्रकृति इस सब मूर्खता का जबाब आपके मालिक को नहीं आपको देगी आपके बुढ़ापे में|आपका शरीर थक चूका होगा और बच्चे आपको ठीक पहचानेंगे नहीं|उचित रोजगार वह है जिसमें आप रोजगार को आठ, अपने को चार और परिवार को चार घंटे दे सकें|अब यह न कहें कि हम अपनी बारह घंटे की कार्यालय अवधि में चार घंटे की चोरी करते हैं अपने लिए|

 

आतंकित सरकारें


किसी भी देश में आतंकवाद को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब उस देश की सरकारें और उन सरकारों को चुनने वाली जनता डरपोक हो| जब भी हम किसी व्यक्ति या संगठन को आतंकवादी कहते हैं वो उसका सीधा अर्थ है कि हम डरे हुए हैं|

डरना उस कायरता का परिचायक है| कोई भी बहादुर देश किसी व्यक्ति या संगठन को अपराधी या अपराधिक संगठन कहे, तो समझ आता हैं| नियम क़ानून तोड़ने वाला व्यक्ति अपराधी है|कोई भी व्यक्ति एक देश काल में अपराध हो सकता है किसी अन्य देश काल में नहीं| उदाहरण के लिए मानहानि पहले बहुत से देशों में अपराध माना जाता था, परन्तु अब अधिकांश देश इस अपराध नहीं मानते|

जब हम किसी व्यक्ति या संगठन के उचित या अनुचित किसी भी कार्य से डरते हैं और उस डर को स्वीकार करते हैं तो उसे आतंकवादी कहते हैं|हम आतंकवाद का अपनी आतंरिक शक्ति में सामना नहीं कर पाते| यही कारण हैं कि सुदूर यूरोप में हुए बम धमाके हमारे “बहादुर” भारतियों को सोशल मीडिया में सक्रिय कर देते हैं| दूसरी ओर हम अपने देश में होने वाले बलात्कार, हत्याओं, रोज रोज की सड़क दुर्घटनाओं और चिकित्सीय लापरवाही से नहीं डरते| हम किसी सड़क दुर्घटना या दंगों में मारे गए 10 लोग नहीं डराते वरन हम सुदूर देश में किसी बम धमाके से डर जाते हैं|हमें गुजरात, राजस्थान या मुंबई में पत्थर फैंकते और बस जलाते उपद्रवी लड़के आतंकवादी नहीं लगते बल्कि कश्मीर में बम फैंकते लड़के हमारी नींद उड़ा देते हैं|हमारा अपना चुना हुआ डर ही हमें अधिक डराता है|

आतंकवाद दरअसल आतंकवादियों से अधिक उन लोगों का हथियार है जो इससे पैदा होने वाले डर से लाभान्वित होते हैं या डरने में जिन्हें प्रसन्नता मिलती हैं| दुनिया के दर्जन भर देश तबाह करने के बाद भी अमेरिका दुनिया का सबसे आतंकित मुल्क हैं – उसकी डरी हुई बहादुरी आतंकवाद के मुकाबले कहीं इंसानों की हर साल जान ले लेती है| कश्मीर में जितने लोग हर साल कुल मिला कर अपराधी और आतंकवादी घटनाओं में मारे जाते हैं कम से कम उतने लोग राजधानी दिल्ली या मुंबई में अपराधी घटनाओं में मारे जाते हैं| मगर हम नहीं डरते|अपराध और अपराधी हमें नहीं डराते| अपराधों से लड़ने वाले पुलिसवालों को उतना बड़ा मैडल नहीं मिलता जितना किसी कथित आतंकवादी से लड़ने वाले पुलिसवाले को मिलता है|

आतंकवाद की एक खास बात है, दुनिया की कोई भी सरकार आतंकवाद के आगे घुटने नहीं टेकती| आतंकवाद से लड़ने की कसमें खाना दुनिया भर की राजनीति में रोजमर्रा का शगल है| मगर छोटे छोटे अपराधियों और गुंडों के समूह के आगे सरकारें जब तब घुटने टेकती रहती हैं| भारत देश में पिछले सौ सालों में बहुत सी किताबें, नाटक और फ़िल्में सिर्फ इसलिए प्रतिबंधित हो गई कि सरकारों को कानून व्यवस्था के लिए ख़तरा लगा| हम सब जानते हैं यह ख़तरा उन किताबों, नाटकों और फिल्मों से नहीं बल्कि उनका कथित तौर पर विरोध करने वालों से था| सरकारें उनसे लड़ने में असमर्थ थीं और इतनी डरी हुयीं थी कि उन्हें आतंकवादी या अपराधी कहने का भी साहस न जुटा सकीं| उनसे लड़ने की बात तो दूर की बात है, पिछले सौ सालों में बहुत से हलफनामे सरकारों ने अदालत में दिए हैं कि किताबें, नाटक या फ़िल्में क़ानून व्यवस्था बिगाड़ देंगी – मतलब इतना बिगाड़ देंगी कि सरकार संभाल न पायेगी|

उफ़!! पिछले सौ साल में कोई सरकार हलफनामों में यह न कहने की हिम्मत भी न जुटा सकी कि वो जिनसे डरी हुई है वो किताब, नाटक या फिल्म नहीं गुण्डा तत्व हैं|

 

 

 

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इसकी हिंदी क्या है?


समाचार के अनुसार, एक व्यक्ति ने वित्तमंत्री अरुण जेटली से “बुलेट ट्रेन” की हिंदी पूछ ली| हिंदी वालों में हिंदी पूछ लेना उनता ही सामान्य हो चला है, जितना अंग्रेजी वालों का हर भाषा के शब्द उठाकर अंगीकार और आत्मसात कर लेना| हर बात की हिंदी करवाना गुलाम मानसिकता की पराकाष्ठा का प्रतीक है| हिंदीवादी लोग भाषा के स्वतंत्र व्यकित्त्व की चाह में हिंदी को मात्र संस्कृतनिष्ठ शब्दों समेट देना चाहते हैं| इस प्रकार हिंदी को संस्कृत की उपभाषा बन जाने का ख़तरा बढ़ रहा है| संस्कृत निष्ठता के पीछे फ़ारसी शब्दों को नकारने की भावना से प्रारंभ होकर अब अंग्रेजी शब्दों को नकारने तक जा पहुंची गई है| विरोध की यह भावना इस तथ्य को भी नकारती है कि फारसी और संस्कृत एक ही स्रोत को भाषाएँ हैं|

अंग्रेजी से पहले फ़ारसी विश्वभाषा के दर्जा रख चुकी है| फ़ारसी के प्रसार में उन पारसियों और ईरानियों  का हाथ कम रहा, जिनकी मूल रूप से यह भाषा है| भारत में आये अरब, तुर्क, अफगान, मंगोल, मुग़ल आदि सबने फ़ारसी को सामान्य और राजनितिक जीवन में अधिक महत्व दिया| कारण शायद यही है कि फ़ारसी में अंगीकार, आत्मसात और समाहित करने की भावना और क्षमता अधिक रही| यही स्वीकार वृत्ति एक समय में छोटे से समूह की भाषा मानी जाने वाली अंग्रेजी को विश्वभाषा बनाने में सफल रही| आज अंग्रेजी उन देशों में भी स्वीकार है जहाँ उनके लोगों का राज नहीं रहा था|

आज भारतीय समाज इस बात की चर्चा करता है कि अंग्रेजी में कितने भारतीय मूल के शब्द हैं| क्या अंग्रेजी उन भारतीय शब्दों को अपना पाती, अगर वह अपने रोमन या ग्रीक मूलों से अपने लिए शब्द गढ़ने में समय नष्ट करती| अपने भाषा मूलों से शब्द गढ़ना गलत नहीं है| परन्तु इसे हास्यास्पद नहीं हो जाना चाहिए| शब्द सरल और सर्वस्वीकार होने चाहिए| लोहपथगामिनी जैसे शब्द स्वीकार नहीं हो पाए| परन्तु इस प्रकार के शब्दों के कारण सरकारी हिंदी और साहित्यिक विश्व की सबसे दुरूह भाषाओँ में से एक बन चुकी हैं|

अगली बार अगर आपको किसी शब्द की हिंदी न आये तो शेम्पू के स्थान पर मूल भारतीय चम्पू का प्रयोग करने का प्रयास करें| बुलेट ट्रेन की हिंदी उसके बाद ढूंढेंगे| जैसा जेटली बुलेट ट्रेन की हिंदी पूछे जाने पर कहते हैं, “थोड़ा गंभीर होने का भी प्रयास कीजिये”|