पानी रखिये…


 

 

रहिमन पानी राखिये,

बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरे,

मोती, मानुष, चून॥

सोलहवीं सदी में महाकवि अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने जब यह दोहा कहा था, शायद सोचा भी न होगा कि इसके मायने विशेष होने की जगह साधारण हो जायेंगे और वह साधारण मायने अतिविशेष माने जायेंगे| इस दोहे में पानी शब्द का कोई भी अर्थ शाब्दिक नहीं है|[i] परन्तु तब से लगभग पांच सौ वर्ष के बाद पानी (water) का शाब्दिक अर्थ बहुत महत्वपूर्ण हो चुका है|

पानी अर्थात जल के बिना मोती, मनुष्य और आटा (यानि खाद्य पदार्थ) अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकते| पानी को बचाए रखिये| बिना पानी दुनिया बंजर उजाड़ हो जाएगी| लगता है रहीमदास इक्कीसवीं सदी की इस आशंका की चेतावनी दे रहे हैं|

पानी कैसे बचे? इसके कई उपाय सुझाये जा रहे हैं| उनमें से बहुत से सुझाव अपनाये भी जा रहे हैं| दशक – दो दशक पहले तक पानी की साफ़ बनाये रखने पर जोर था| आजकल पानी बचाने पर सारा ध्यान है| अब पानी की कमी पहली दुश्वारी है, पानी को साफ़ रखना बाद की बात है|

किस काम में और किस उत्पाद में पानी कितना बर्बाद हो रहा है, यह आँका जा रहा है| औद्योगिक जगत इस समस्या पर कितना गंभीर है कोई नहीं जानता| शायद विकास और रोजगार की मांग देश और दुनिया की हर सरकार पर हावी है| ऐसे में पानी बचाने के ज़िम्मा साधारण घर-गृहस्थी पर ही है| पानी का पहला संकट घर में झेलना ही होगा –- वह भी अचानक दिन के पहले पल में|

पुराने समय में जब कूएं से पानी निकालना होता था तो सोच समझ कर खर्च होता था| पांच लीटर पानी की जरूरत हो तब दस लीटर पानी खर्च करने का अर्थ था दुगनी मेहनत, दुगना समय| मशीनी युग में पानी बर्बाद करने से पहले हम कम ही सोचते हैं| बटन दबाकर पानी पा जाने वाले हम लोग नहीं जानते पानी का वो महत्व; जो घर से दूर किसी ताल-पोखर से पानी वाली बूढ़ी माँ जानती है|

क्या यह जरूरी है कि एक बाल्टी पानी से नहाने की जगह दस बाल्टी पानी बाथटब में बर्बाद की जाएँ? यह नहीं कहता में कि आप कभी भी बाथटब का प्रयोग न करें, मगर उसे सीमित किया जा सकता है| ऐसे बहुत से उदहारण हो सकते हैं| नहाना, कपड़ा धोना, हाथ-मूँह धोना, खाना बनाना और खाना-पीना सब काम में पानी की जरूरत है|

जब भी मेहमान आते हैं, तो चाय-पानी पूछना हमारी पहली सांस्कृतिक ज़िम्मेदारी होती है| शायद ही हम कभी आधे ग्लास पानी से उनका स्वागत करते हों| अगर मेहमान पानी को ग्रहण करने से मना कर दें, तो यह मेजबान के अपमान के तौर पर देखा जाता रहा है| इसीलिए आजकल मेहमान पानी की जरूरत न होने पर पहले ही बोल देते हैं| मगर शायद ही मेहमान के सामने लाये गए पानी का कुछ प्रयोग होता हो| यह पानी फैंक दिया जाता है|

आजकल दावतों, सभाओं, समाजों, जलसे, मजलिसों और शादी – ब्याह में पानी की बोतल देने का चलन बढ़ रहा है| अधिकतर मेहमान अपनी जरूरत जितना पानी पीकर बोतल या बचा पानी फैंक देते हैं| अगर यह झूठा पानी न भी फैंका जाए तब भी कोई और उसे नहीं पीयेगा| घरों में भी अक्सर हम पूरा ग्लास पानी लेते हैं| ग्लास में बचा हुआ पानी बर्बाद हो जाता है| पानी की यह सब बर्बादी भी रोकी जा सकती है – save water|

कटिंगपानी #CuttingPaani इसका उपाय हो सकता है| हम भारतीय लोग जरूरत न होने पर पूरी चाय नहीं लेते| कटिंगचाय से हमारा काम चल जाता है| यह उदहारण पानी के लिए भी अजमाया जा सकता है| जब जरूरत न हो तो ग्लास में पूरा पानी लिया ही क्यों जाए? अगर पूरा पानी लिया गया है, तो क्या जरूरत से ज्यादा होने पर उसे किसी और काम में प्रयोग नहीं कर सकते? बचे हुए पानी का प्रयोग बाद में पीने के अलावा भी पौधों को पानी देने, झाड़ू-पोंछा करने, और पालतू जानवरों को पिलाने के लिए किया जा सकता है| हमारे भारतीय परिवारों में झूठा पानी पौधों या पालतू जानवरों को नहीं दिया जाता| इसलिए कोशिश करें कि यह अतिरिक्त पानी झूठा होने से पहले ही अगल निकाल दिया जाए|

आइये पानी बचाने की शपथ लें| अगर आप अभी भी सोच रहे हैं तो यह तीन वीडियो भी देखते चलें|

[i] इस दोहे में पानी का पहला अर्थ सच्चे मोती की चमक, दूसरा मनुष्य की विनम्रता और तीसरा रोटी बनाने के लिए गूंथे गए आटे की लोच से है| उचित चमक, उचित विनम्रता और उचित लोच के बिना इमोटी, मनुष्य और आटे का कोई प्रयोग नहीं है|

राष्ट्रवाद बनाम मानवता


किसी देश का नागरिक होना मानव होने के बड़ा है, तो मानव जीवन पर धिक्कार है| दुनिया भर में तमाम कीट-पतंगे है तो अपने जन्म-स्थान के हाथ दो हाथ की दूरी अपने जीवन भर में यह नहीं करते, तमाम जानवर है जाने अनजाने अपने आपको निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में बांधे रहते हैं| मगर उन्हें खुद अपनी नस्ल और किसी दूसरी नस्ल की कोई परवाह नहीं होती| अगर आप मानव हैं तो आप अपनी, अपनी नस्ल की और तमाम प्रकृति की परवाह कर सकते हैं| मगर आप मानव हैं तो आपके पास वो सारे दुर्गुण भी हैं जो किसी और नस्ल के पास नहीं हैं| मानव झूठ, लालच फ़रेब और कमीनेपन की तमाम हरकतें कर सकता है| मानव जीवन के सबसे बड़े फरेबों में से धर्म और राष्ट्र हैं|

रहती दुनिया में अनेकों देश और धर्म बने, बनेगें, बिगड़ेंगे और दुनिया चलती रहगी| दुनिया का प्रकृति प्रदत्त नक्शा और मानव का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव नहीं बदल सकता| मानव होना मानव की पहचान है|

राष्ट्र एक समूह के रूप में अपने हित रखता है| मगर राष्ट्रवाद हास्यास्पद परिकल्पना है| दुनिया के किसी भी राष्ट्र के नक्शे को आप एक हजार साल भी बिना बदले हुए नहीं देख सकते| आज भारत में राष्ट्रवाद का उबाल है| हर बात में राष्ट्रवाद को खड़ा किया जा रहा है| मगर हकीकत है की एक राष्ट्र के रूप में हमारे पास आज भी एक पक्का नक्शा नहीं है| भारत, पाकिस्तान और चीन जैसे बड़े बड़े देशों के अपनी सीमा को लेकर दावे और हकीकत में बहुत फर्क है| यहाँ तक की हमारी सेनाओं में राष्ट्रीय शुध्दता नहीं है| अगर राष्ट्र ही सब कुछ है तो भारतीय सेना में नेपाल की राष्ट्रीयता रखने वाले लोग कैसे हैं, कैसे अपने ओहदे से जुड़ी तमाम जिम्मेदारी वो लोग पूरी तरह निभा लेते हैं? कभी सोचा है?

राष्ट्रवाद किसी भी सत्ता के द्वारा फैलाये जाने वाला फ़रेब है, जो सत्ता की तमाम असफलताओं पर पर्दा डालने के लिए जनता में पैदा किया जाता रहा है| आजकल बड़े व्यापारी अपना माल बेचने और अपने ऊपर लगे आरोपों को नकारने के लिए भी राष्ट्रवाद का प्रयोग करते हैं| जो लोग थोड़ा टैक्स बचाने के लिए भारत की नागरिकता छोड़ देते हैं वो भी आम भारतियों के लिए राष्ट्रीयता के गाने गाते हैं| देश के तमाम बड़े व्यापारी, अभिनेता और करदाता भारत के नागरिक नहीं हैं| कर बचाने के लिए तमाम बड़े भारतीय लोग साल में छः महीने अलग अलग देशों में रहते हैं कि उन्हें आयकर विभाग भारत का आम निवासी न मान ले| भारत के पास बर्फीले पहाड़ों से लेकर गहरे समंदर तक तमाम नियामतें प्रकृति ने दी हैं, मगर भारत का राष्ट्रवादी समुदाय अक्सर छुट्टियों में देश से बाहर जाने के सपने देखता है| मुझे किसी से आपत्ति नहीं है| मगर जरूरत है, करनी में राष्ट्र का ध्यान रखने की| अगर आप अच्छे इंसान हैं तो धर्म और राष्ट्र मानव निर्मित हास्य हैं, उनपर विचार करने की आपको कोई जरूरत नहीं|

शाहजी पकौड़े वाले


कल बहुत दिनों बाद, फिर वो पकौड़ेवाला दिखाई दिया| मैंने उसे काफी इज्ज़त से अपने पास बुलाकर हालचाल पूछा और हालत – ए – हाजिरा पर उसका ख्याल जानना चाहा| कहने लगा, धंधे में पैसा तो कभी भी ज्यादा न था, रुपया कभी इस धंधे में देखा नहीं; मगर कुछ दिन से धंधे में इज्ज़त आ गई है| मैंने कहा, क्या पहले इज्ज़त नहीं थी| बोला, पहले केवल इज्जतदार लोग ही इज्ज़त दिया करते थे या फिर छोटे छोटे बच्चे| आजकल तो गली-कूचे में घूमते आवारा गुंडे मावली भी इज्ज़त देने लगे हैं| कहने लगा कि छठी गली का छुट्टा सांड बजरंगी भैया तो कभी कभी प्यार से बात करते करते पकौड़े बनाने के गुर सीखने लगा है| ख़ुशी से चहककर बोला भैया इस बार स्वतंत्र दिवस पर हम आपको गरम गरम जलेबी खिलाएंगे| मैंने पुछा, क्यों भाई? क्या अगस्त में बिटिया की शादी कर रहे हो| बोला नहीं भैया जी, सुना हैं मोदी सरकार उस दिन पकौड़े बेचने को भारत का राष्ट्रीय रोजगार घोषित कर देंगे| उस दिन से सब डाक्टर इंजीनियर डॉक्टर साइंटिस्ट सब लोग अपनी बेरोजगारी के दिनों में पकौड़े बेचा करेंगे| आप तो भैया, दिल्ली है कोर्ट के बाहर ही पकौड़े बेचना – वकील साहब पकौड़े वाले| और चिंता न करना, आपको गर्म गर्म पकौड़े हम बनवा कर भिजबा देंगे| आखिर इसने सारे लोग जब पकौड़े बेचेंगे तो कोई तो उन्हें पकौड़े बना बना कर सप्लाई करेगा|

अचानक, पुराने दिन याद करने लगा| बोला, जब अपने शहर के सरस्वती शिशु मंदिर में जब पढ़ते थे तो वहां के गुरूजी जलेबी बंटवाते थे गणतंत्र दिवस पर| इसबार गणतंत्र दिवस पर अपने शहर में था तो गुरूजी ढूंढते हुए आ पहुंचे| कहने लगे शाह जी, चलो.. बच्चों के लिए बीस किलो पकौड़े बना दो और पच्चीस किलो का बिल दे दो| मैंने कहा, गुरूजी पकौड़े चाहे पचास किलो बनवा लो मगर बिल की न कहो, एक तो हमको सात साल शिशु मंदिर रहकर नाम लिखना न आया तो बिल बनाने में तो ससुर हमको हाथरस जाकर ग्रेजुएशन करना पड़ेगा| गुरूजी बड़े प्यार से बोले, नालायक कितना कहा कि बात समझा करो| ये लो, बिल तो हम कम्पूटर से बना कर लाये हैं तुम इसपर अपनी चिड़िया मारो|

मैंने कहा, कि इस किस्से से एक फायदा हुआ कि तुम्हारा नाम हमें पता चल गया – शाह जी| कहने लगा… नाम तो अपना घासीलाल फौलादी है सरकार| वो तो आजकल हम सबको कहने लगे हैं कि जब मोदी जी अपने पापा की बनाई चाय लेकर स्टेशन पर चाय गरम चाय गरम चिल्लाते थे तो उनके पीछे पीछे हमारे बड़े भाई ताजा गरम पकौड़े का जोर लगाते घुमा करते थे| इसलिए आजलक लोग हमें अध्यक्ष जी का छोटा भाई समझने लगे हैं|