मनभेद की नीति


कई बार सोचता हूँ, क्या राजनीति तुच्छ बात है? कम से कम इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए| राजनीति का यह नकार हमारे लोकतंत्र की खूबी है| कोई राजनीति पसंद नहीं करता – राजनीतिज्ञ तो बिलकुल ही नहीं| संसद में हल्ला मचा रहता है – राजनीति न करो| राजनीति यानि विचार-विमर्श, शब्द संघर्ष – शास्त्रार्थ|

कैसे तय हो क्या सही है| बिना विचार –विमर्श के| मतदान मुद्दे नहीं तय करता| बिना विमर्श के होने वाला मतदान सिर्फ भाई-भतीजावाद है| विमर्श से भागना भीड़तन्त्र को मजबूत करना है – लोकतंत्र को नहीं| लेकिन बात विमर्श की नहीं ही रही| सड़क का संघर्ष आज विचार को जन-जन तक पहुँचाने का संघर्ष नहीं है, सब जोर-जबरदस्ती का मामला है| हिंसक संघर्ष स्वीकार्य होने लगे हैं और अनशन और प्रदर्शन को कोई नहीं पूछता|

लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि पहले मुद्दा हो, उसपर विचार हो, विमर्श हो उसको जनजन तक पहुँचाने की बात हो और फिर जिसका विचार पसंद आये उसे मत दे दिया जाए| आज पहले नेता चुन जाता है बाद में उसका विचार खोजा जाता है| विचार का भी क्या है, सत्ता के बाहर रहकर जिसका विरोध हो, वही सत्ता में आते ही प्रिय विचार हो जाता है| जब विचार के यह हाल हैं तो विमर्श के लिए अवसर ही कहाँ है?

विचार अगर लोकतंत्र का मूल न हो तब लोकतंत्र का नष्ट होना तय ही है| पहले यह भीड़तंत्र बनेगा और बाद में तंत्रहीनता|

आज भले ही सूचना तकनीकि अपने चरम पर हो मगर हम सूचनाएं हमारे हाथ में नहीं हैं|उनका नियंत्रण कोई और कर रहा है| सूचना बिक रही हैं| असुविधाजनक सूचना उपलब्ध नहीं होती| आप जिस पक्ष को एक बार हल्का सा भी समर्थन देते हैं, आपका सूचना तंत्र आपके पास विरोधी या विपक्षी सूचना नहीं आने देता| भ्रम का मायाजाल बन रहा है| जब तक सूचना के दुसरे पक्ष तक पहुँच नहीं होगी, लोकतंत्र समृद्ध नहीं होगा|

राजनीति में मतभेद होने अच्छी बात है, मनभेद नहीं होने चाहिए| मतभेद के लिए मत होना चाहिए| मनभेद के लिए मन| मन का क्या है, किसी पर भी आ जाता है और बाकि सब शत्रु लगने लगते हैं| बस यही नहीं होना चाहिए|

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उर्दू जुबां हमारी…


हर हिंदी बोलने वाले, खासकर उर्दू को पराया मानने वाले को सामान्य उर्दू जरूर आती है| यह भी कह सकते है कि उर्दू में पलने बढ़ने वाले हर हिन्दुस्तानी को सामान्य हिंदी जरूर आती है| आखिर इन दोनों भाषाओँ का रिश्ता ही कुछ ऐसा है कि बिना दोनों भाषाएँ जाने आप दूसरी को सही से नहीं जान सकते| वर्ना आपको पता कैसे चलेगा कि दूसरी भाषा से कैसे बचा जाए|

इन दोनों भाषाओँ में गुत्थी इस तरह उलझी है कि पता नहीं चलता कि आम बोलचाल में कौन हिंदी बोल रहा हैं या कौन उर्दू| अक्सर माना जाता है की अगर प्रोफ़ेसर साहब ने संस्कृत पढ़ी है तो वो हिंदी बोल रहे हैं और अगर अरबी-फ़ारसी पढ़ी है तो उर्दू|

कई बार लोग यह जानने के लिए कि बोलने वाला हिंदी बोल रहा है या उर्दू, उस से लिखवाकर देखते हैं| अगर देवनागरी लिपि में लिखा तो हिंदी और नश्तालिक़ में लिखा तो उर्दू| मगर मोबाइल के ज़माने में मामला थोड़ा पेचीदा हो गया है| नए लोग रोमन में लिखते हैं| अगर अंग्रेज बहादुर आज होते तो रोमन हिंदी या रोमन उर्दू के लिए शायद कोई नया नाम देते और हम उसे भी एक भाषा मान लेते| कई बार सोचता हूँ कि क्या लिपि बदलने से भाषा का नाम बदल जायेगा| किसी ज़माने में हिंदी कैथी लिपि में और पिछले ज़माने में संस्कृत ब्राह्मी में लिखी जाती थी| उस से भी पहले संस्कृत और अवेस्ता (पुरानी फ़ारसी) एक ही लिपि में लिखे जा रहे थे और उनके शब्द में एक दुसरे में घुले-मिले थे|

आज पंजाबी गुरुमुखी और शाहमुखी में लिखी जाकर भी एक भाषा है| खुद भारत में सिन्धी, एक साथ देवनागरी और अरबी लिपि में लिखी जा रही है| भारतीय प्रशासनिक सेवा में सिन्धी और संथाली भाषाओँ के प्रश्नपत्रों के लिए दो लिपियाँ तय की गई हैं|

वास्तव में हिंदी-उर्दू का झगड़ा ब्रिटिश इंग्लिश और अमेरिकन इंग्लिश के झगड़े से कहीं अलग नहीं है| मगर जिस तरह उर्दू को भारतीय नेताओं ने थाली में सजाकर पाकिस्तान को दे दिया है, उस तरह अमेरिकन इंग्लिश को थाल में सजाकर नहीं दिया गया है|

दो विचार


कागज़ी सम्बन्ध

जगत मिथ्या पर भरोसा करने वाली मानव सभ्यता, आज इस मिथ्या जगत में बनाई गई छद्म दुनिया में जी रही है| आज आपसी संबंधों में आपसी संवाद की जगह कागजों पर लिखे गए भावों ने ले ली है| चेहरे के भाव, शारीरिक भाव भंगिमाएं क्या लिखे हुए शब्दों में अभिव्यक्ति पा सकती हैं? क्या कभी जिव्हा से निकले स्वरों के आरोह अवरोह को लिखे हुए शब्द पकड़ पाएंगे? क्या प्रेमी-प्रेमिकाओं के आपसी नयनाचार को प्रेम पत्र अभिव्यक्तकर पाएंगे? क्या होगा जब लिखे हुए शब्दों का छद्म भोली भाली कन्याओं की समझ में नहीं आ पायेगा?

लिखित शब्दों में आज अश्लीलता परोसी जा रही है, उस पर नियंत्रण करना मुश्किल है| सबसे बड़ी बात है की सारी मानवता अपने लिए कोई एक भाषा या लिपि विकसित नहीं कर पायेगी|

वास्तव में भाव भंगिमाओं की आदिम भाषा ही मानवता का सत्य है|

 

कृत्रिम समझदारी

कृत्रिम समझदारी का विकास हो चुका है| हर चीज आज आभासी है| मिथ्या जगत में छद्म का विकास हुआ है| आज संबंधों को मोबाइल की स्क्रीन पर निभाया जा रहा है| क्या तरह तरह के निशान भाषा या लिपि का विकास कर रहे हैं या चित्रलिपियों की तरह के दुरूहता का गठन कर रहे हैं| क्या मुख से उच्चारित शब्द या हस्तलेख में लिखे गए भावों का नाश हो जायेगा| आज सब कुछ त्वरित है| समय का कोई आनंद नहीं| बच्चे समय से पहले बड़े हो रहे हैं| भले ही चिकित्सा जगत ने आयु पर विजय प्राप्त करने की ओर बड़े कदम उठाये हैं, मगर बूढ़े हृदयों से मानव समाज भरा हुआ है| मोबाइल के रूप में वो राक्षसी तोता सबके हाथ में लग गया है जिसमें हमने अपने अपने प्राण डाल दिए हैं| तोता मरा, राक्षस मरा| मोबाइल मरा हम मरे|

अब बच्चों को लिखने पढने की क्या भाषा सीखने की जरूरत नहीं रह गए| हमारे भाषा हीन विचारों को पकड़ने की तकनीकि सामने है|