तिवारी जी की सरकारी हत्या


तिवारी जी की सरकारी हत्या “उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग” के लिए कानफोड़ू धमाका साबित हुए।

सवाल को कई थे मगर पूछे न गए, न जाएंगे। वो तो तिवारी की की सहकर्मी मुस्लिम हुईं, वरना “मुहब्बती जिहाद” का मीडियाई मामला बन जाता। ख़ैर ये तो बाद में किस्से गढ़ने की बात हुई कि मुस्लिम लड़कियां जिहादी क्यों नहीं होती और मुहब्बत वाला जिहाद क्यों नहीं करतीं। प्याज, सरकारी फ़ाइल और मीडियाई मामलों की परतें तो खुलती उतरती रहतीं हैं, सो अभी के लिए मामले का यह पहलू मुल्तवी। मुद्दा खास पर चलते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग को तिवारी जी की सरकारी हत्या के कानफाड़ू धमाके से झटका ऐसा लगा है कि हलाल हुए जाते हैं।

उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग इंसानी बिरादरी का वो हिस्सा है जो स्वयंपोषी बने रहने के लिए कुत्ते की दुम की तरह डोलने और कबूतर की तरह मिचमिचाने का आदि है।

यह हिंदुस्तानी समाज का जो नासूर है जिसे हर तरह के भेदभाव ढूंढ लेने में महारत है। बस इनकी चाकरी बनी रहे और इनके मालिकान की काली सफेद आमदनी।

सरकारी गोली से आदिवासी मरें तो यह पुलिसियों से पहले उन्हें नक्सल का दर्जा दे दें। दलित, पिछड़ा, मुसलमान, पूर्वोत्तरी, कश्मीरी, झोपड़पट्टी, किसान, मज़दूर, दाढ़ीवाला, सांवला, काला, औरतजात, औरतबाज, कुछ भी इनके निशाने पर आ सकता है। वो तो गनीमत हैं आजकल राष्ट्रवाद के जोर के चलते सैनिकों की इज्ज़त है वरना रेलवे की दूसरा दर्जा बोगी तबादले पर जा रहे दस सैनिक बैठा कर के देखिए।

अन्नदाता किसान भले ही उच्च कुलीन ब्राह्मण या सूर्यवंशी क्षत्रिय क्यों न हो, उसकी रैली में सरकारी लाठी तो चलवा दीजिये। उत्तर भारतीय सवर्ण हिन्दू स्वयंपोषी शहरी मध्यमवर्ग ऐसे खुश हो जाते हैं जैसे सब्सिडी वाला तिलचट्टा जूते से कुचल कर मारा जा रहा हो। सब्जी किसान को सब्सिडी न दो, और उस से प्याज़ दो रुपये किलो खरीद कर दिल्ली मुम्बई में पच्चीस रुपये किलो बेच दो। इनके पास दारू, दावत, टीवी, कार, मोबाइल सब के लिए बड़ा बटुआ है, बस किसान मज़दूर और रिक्शेवाले ही लुटेरे हैं। उन पर गोली चलाते रहो।

मुझे तिवारी जी से बैर नहीं है वरन उस मानसिकता पर है तो तिवारी ही की अपना मानकर हो – हल्ला कर रही है|मगर उस वक़्त सब को साँप सूंघ जाता है जब “कोई और मरता” है| दर्द केवल अपनों के मरने पर होता है| 

आख़िर क़ानून के राज्य में पुलिस द्वारा किसी की भी हत्या क्यों हो? सब गिरफ्तारियाँ हों, मुकदमा चले और सजाएँ मिलें या बरी हो जाएँ| मगर इस के लिए पूरा तंत्र चाहिये| सबूत जुटाने के लिए पूरा विभाग खड़ा करना होगा| गवाहों की सुरक्षा का मसला है| उस से ऊपर फ़र्जी मुकदमों और झूठे आरोपों के के मामलों में भी उचित कानून होने चाहिए|

ये मीडिया ट्रायल बंद होने चाहिए| पुलिस को शिकारी कुत्ता समझने की प्रकम वृत्ति ख़तरनाक है कि पट्टा खोला और शिकार हाज़िर| पुलिस को तहकीकात का समय मिलना चाहिए और अपनी तहकीकात पर अच्छे से सोच विचार का भी| यहाँ तक की नामजद मामलों में भी कम से कम हफ्ते भर का समय पुलिस के पास होना चाहिए| पुलिस को तत्काल जनता, नेता, पत्रकार, मंत्री, मुख्यमंत्री आदि दबावों से मुक्ति मिलनी चाहिए| हो सके तो दैनिक कानून व्यवस्था और आपराधिक मामलों की तहकीकात दोनों के लिए तुरंत अलग अलग व्यवस्था होनी चाहिए|

वरना सौ पचास “और लोगों” के बाद फिर कोई तिवारी जी या गुप्ता जी मारे जायेंगे और आप को दुःख झेलना होगा|

 

रणछोड़


रण छोड़ दिया और भाग निकले, कायर!!
किसी ने तो कहा ही होगा उन्हें; “रण छोड़ दिया और भाग निकले कायर!!” धिक्कारा गया होगा। क्षत्रिय होने का धर्म, जीवन का मर्म बताया गया होगा। सोचा भी न गया होगा कि रणछोड़ 64 कलाओं के ज्ञाता हैं। जीवन में बहुत से रगड़े झगड़े होते हैं। हमें अपने मतलब के रगड़े झगड़े चुनने होते हैं। मतलब नहीं कि रगड़े में हम अपना दिमाग़ रगड़ने लगें। मतलब नहीं कि बेकार के झगड़े में जीवन की लंबी लड़ाई गवां दी जाए। अर्थ यह नहीं कि सिद्धान्त से समझौता करना है। नहीं। सिद्धान्त पर कायम रहें। अपना विचार दृढ़ता से रखें। अगर यह छोटी लड़ाई है तो इस से हट जाएं। शांति रहेगी। बड़ी लड़ाई की ताकत और समझ बनी रहेगी। मगर ये छोटे मोटे झगड़े और रोज रोज के रगड़े छोड़ देना सरल काम नहीं है। आदत नहीं लत हो जाती हैं इनकी। रोज रोज के रगड़े में किसी को रगड़ देना संतोष देता है। इस संतोष का अपना सुख और नशा है। यह संतोष है कि कुछ तो किया प्रतिपक्ष का हमने, रगड़ दिया उसे। छोटी मोटी जीत भी यही आनंद प्रदान करती है। मगर इन छोटे मोटे रगड़ो झगड़ों में हम खोते भी बहुत कुछ हैं। यह उन झगड़ों में हार जाने और रगड़ों में रगड़ जाने के कहीं ज्यादा है। आप दिमाग़ का बेकार प्रयोग करते हैं जो कई बार नकारात्मक भी हो सकता है। आप को मन की शांति खो देनी होती है। आप का अहम आप पर राज करने लगता है कि आप को पता नहीं चलता। हाल में मैंने ऐसा ही एक और झगड़ा छोड़ दिया। इस तरह जब आप झगड़ा छोड़ कर चल देते हैं तो आपका प्रतिपक्ष हार जाता है। उन्हें जीत का नहीं उन के झगड़े को महत्व न दिए जाने का दुःख होता है। वो अक्सर हार महसूस करते हैं। आप का झगड़े से हट जाने शायद ही कभी उनकी जीत होती है। सावधान रहें, यह झगड़ा दोबारा आप के सामने नहीं आएगा, अगर खुद न चाहें।

शौर्य अङ्ग दीनदयाल


शौर्य अङ्ग दीनदयाल के बारे में आप ने सुना।

नहीं नहीं, नहीं सुना होगा। कोई है भी नहीं इस नाम का। मगर जिस तरह साम्प्रदायिक उन्माद है, व्यक्ति के धर्म/सम्प्रदाय से देशप्रेम निर्धारित हो रहा है यह आम अस्तित्व में आ सकता है।

उन्मादी तत्व सकते में हैं, ये औरंगजेब कौन है? ये औरंगजेब नाम वाला कैसे देशभक्त हो सकता है। एक तो मुस्लिम, ऊपर से इतना ख़तरनाक हिन्दू विरोधी नाम। शायद सरकार ने गलत नाम लिख दिया होगा।

हालात यह है कि निजी बातचीत में उन्मादी लोग औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलना अपनी प्रिय सरकार का चुनावी दाँव पेच तक बता दे रहे हैं। क्या उनकी प्रिय सरकार वही सब कर रही है, जो पहले की तुष्टिकरण सरकार करती थी? फिर फ़र्क क्या रहा? क्या फ़ायदा हुआ आपको सरकार बदलने का। अपनी प्रिय सरकार पर तो भरोसा रखिये।

हालात ही ऐसे हैं। आम लोगों की दुनिया अक्सर अपनी गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदारों के आगे नहीं होती। प्रायः हमारे गली मोहल्ले और नाते रिश्तेदार हमारी अपनी जाति के होते है। यह जरूर है कि नई कॉलोनियों में सवर्ण, दलित, और मुस्लिम जैसे थोड़ा बड़ा समूह रहता है, एक जाति के मोहल्ले कम हुए हैं, पर अभी हैं।ऐसे में दूसरी जाति और धर्म तो लगभग पराई दुनिया की तरह होते हैं। जिन से हम मिले नहीं कभी तो अविश्वास बना रहता है।

यह अविश्वास औए बढ़ रहा है। आपसी संवाद तो अब घर परिवार नाते रिश्तेदारी में भी सामाजिक नहीं रह गया, सोशल मीडिया ज्यादा हो गया है। संवाद की कमी ने अफवाह और कही-सुनी ने ले ली है।

मुस्लिम होना ही गलत हो गया है। लोगों को नहीं समझ आता कि अकबर का सेनापति हिन्दू और राणा प्रताप का सेनापति मुस्लिम कैसे हो सकता है। मात्र दिमाग़ी फितूर के चलते नाम बदल जा रहे हैं। जगहों के, योजनाओं के और शायद लोगों के भी। यह सब आज से नहीं हो रहा, पिछले चार पाँच साल से नहीं हो रहा। यह लंबी प्रक्रिया है, काम से कम पचास साल का इतिहास है इसके पीछे।

अब औरंगजेब को लीजिये। देश के लिए लड़ा। मुस्लिम था इसलिए साम्प्रदयिक तत्वों को भरोसा नहीं हो रहा। मुस्लिम होने के साथ उसका नाम और बड़ी अड़चन है। उन्हें लगता है कि कहीं न कहीं वो या उसके मातापिता मुग़ल शासक औरंगजेब की तरह हिन्दू विरोधी होंगे। यह अलग बात कि शासक औरंगजेब का हिन्दू विरोधी होना भी बहस का मुद्दा रहा है। ख़ुद शासक औरंगजेब का सेनापति हिन्दू था।

हाल में दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम अब्दुल कलाम मार्ग रख दिया गया। यह उन्मादियों के दिमाग में बुरा मुसलमान बनाम अच्छा मुसलमान का द्वंद था। ऐतिहासिक तथ्य जहां हैं वहीं रहेंगे। इसकी परिणति कहाँ होगी किसी को नहीं पता। आज बुरे तालिबान अच्छे तालिबान, बुरे मुसलमान अच्छे मुसलमान, मुसलमान हिन्दू, बुरे हिन्दू अच्छे हिन्दू तक कहीं भी जा सकती है।

धर्म से अगर इंसान का बुरा इंसान या अच्छा इंसान होना तय हो जाता तो न रामायण होती न महाभारत। न रावण, न कौरव।

इन दिनों जिस तरह के हालात है, इस औरंगजेब को देशभक्त मानने के लिए साम्प्रदायिक उन्मादियों के पास एक ही सरल तरीका है। नाम बदल देना। क्या उसका नाम शौर्य अंग दीनदयाल रख दिया जाए?

औरंगजेब को शौर्य चक्र मिलने का यह मौका सटीक मौका है कि हम साम्प्रदायिक उन्माद से बाहर आएं।