चतुर सहायक, सकुशल जीवन


जिन्दगी की रफ़्तार पर दौड़ने के लिए वक़्त से आगे दौड़ना होता है| ज़िन्दगी रोज रफ़्तार बढ़ा देती है| इसी रफ़्तार को पाटने और बढ़ाते जाने की कोशिश का नाम विज्ञान और तकनीक है| इस तकनीक का कुशल प्रयोग करना चतुर होना है, चतुर  होना है|

इंसान के लाखों सालों के इतिहास में कुछ हजार ही हुए हैं पहिया ढूंढे हुए| पिछले हजार साल में इंसान में बैलगाड़ी से लेकर चतुर कार तक का सफ़र तय किया है|

इंसान को अपनी जिन्दगी के थपेड़ों का सामना करने के लिए जिस सच्चे साथी की जरूरत हैं, वह वैज्ञानिक तकनीक ही है| जब गहरी नींद के बाद आँख नहीं खुलती, कलाई में पड़ा हुआ कड़ा हौले हौले आपकी कलाई सहला कर ही जगा आपको देता है| आपकी रात भर की नींद का पूरा खाका आपके सामने है| अपने दिन की योजना करने से पहले आपको अपनी आज की क्षमता और स्वास्थ्य का पता चल चुका है| आपका चतुर  कड़ा आपसे कहता है, आज थोड़ा सा और पैदल चलो मेरे आका|

चतुर पहनावा (Smart Wearable)

आप तैयार होकर ताकत और ऊर्जा से भरा कलेवा करते हैं| अपनी लखटकिया बाइक पर बैठते ही आपका हेलमेट गंतव्य का ट्रेफ़िक मुक्त रास्ता बताने लगता है| आप निश्चित ही सुरक्षित और मित्रवत हेलमेट के साथ है| लम्बे और शांत मार्गों पर अपने इस मित्र से कुछ गाने या कहानी सुनाने की फ़रमाइश भी कर सकते हैं|

दिन भर आप अपने लिए रोजी रोटी, ऐश-ओ-आराम, शान-ओ-शौकत और ढेर सारा अहम कमाने के लिए परिश्रम करते हैं| शाम तक आपका थकना स्वाभाविक है|

शाम को कार्यालय से आप अपना चतुर ऐनक लगा कर निकल लेते हैं| आपका ऐनक आपको राग भैरव में “मोहे भूल गए साँवरिया” सुना कर आपका मन हल्का कर रहा है और आप अपने साहब को “ऐ मालिक तेरे बन्दे हम” गाते गाते कार्यालय से निकल लेते हैं|

चतुर घर  (Smart Home)

घर में घुसते हुए आपको पता लगता है की बच्चों ने धमाचौकड़ी मचा रखी है| आपके बैठक में जलती हई तेज नर्तक रोशनियाँ, आपकी आँखें बहुत दूर से ही चौंधा देती हैं| मगर घर के अन्दर आपका पहला कदम एकदम शानदार हैं| आप पाते हैं कमरे में शांत संगीत हैं, मध्यम रौशनी हैं और आपके कुछ प्यारे प्यारे से दो बच्चे मुस्कुरा रहे हैं| आप खुश होते हैं कि यह कमाल बच्चों का नहीं, आपका है – आपके चतुर  घर का है| आपका कॉफ़ी पीने का मन है और कमरे की रोशनियाँ अपना रंग बदल कर उस रंग में रंग जाती है|

सामने दीवार पर लगा मोनिटर बता रहा है, आपके घर के दरवाजे पर आपका बचपन का वो यार आया है, जिसके साथ बचपन में आपने मंदिर के पिछवाड़े बैठकर पहली बार दारू पी थी| ये पठ्ठा खुद तो दारू पीता नहीं, मगर आपको पीना सिखा गया| आप खुश है, थकान उतर गई है| आप सोफे पर बैठे बैठे ही दरवाजे को खुल जाने का हुक्म दे देते हो| वो अन्दर आकर अपने मोबाइल रिमोट से आपके टेलिविज़न पर सहगल के “ग़म दिए मुस्तकिल” की जगह “देशी दारू इंग्लिश बार” लगा देता है|

बात से बात निकलती है, बातों में वक़्त बदलता है| आप याद करते हैं, जब आप जब भी दिल्ली या कलकत्ता जाते थे तो रास्ता भूल जाते थे| कभी समझ नहीं आता था कितनी रेड लाइट के बाद वो तीसरी रेड लाइट आएगी जिससे तीसरा लेफ्ट कट लेना है| अब हाल ये है कि न रास्ता पूछने की जरूरत, न याद रखने की| आपको हर कदम पर रास्ता बताने वाला मौजूद है| अनजान शहरों में भी आप सिर्फ एक ऐनक के सहारे अपने रस्ते चले जाते हैं| यह रास्ते शायद ही गलत होते हैं| कोई गलती हो तो आप उसे सुधारने में मदद कर सकते हैं|

चतुर रोशनियाँ (smart lights)

अब तो हाल यह की घर के बाहर तो क्या घर में भी तकनीक आपको राह दिखाती है| आपका ख्याल रखती है| अब आपकी जरूरत के हिसाब से घर अपने आप की ढाल लेता है| रंग, रोशनियाँ, गीत, संगीत, फिल्म सब आपके मूड के हिसाब से बदल जाते है| जब आप यह महसूस करते हैं कि आपके मन के हिसाब से आपका घर अपने को ढाल लेता है तो अधिक सकारात्मक महसूस करते हैं| आप के घर में आज टेलिविज़न ही नहीं, और भी उपकरण चतुर  होते जा रहे हैं| इस सब से दैनान्दिक जीवन पहले की अपेक्षा और अधिक सरल होता जा रहा है| यह अलग बात है कि यह तकनीक आज भी बहुत से लोगों की पहुँच से बाहर है|

आपको अपने कैमरे को बार बार निर्देश नहीं देने पड़ते, आपके घरेलू उपकरण अपने काम पहले की अपेक्षा अधिक सरलता से और स्वयं ही कर लेते हैं|

तकनीक से शिकायतें भी हैं| बचपन की बहुत सी शरारतें अब मुश्किल हो गई हैं| आजकल के बच्चों को तो वो मजे भी नहीं कि दोपहर में किसी का दरवाज़ा खटखटा कर छुप जाए और पकड़े न जाएँ| अब तो दरवाजे दरवाजे कैमरा लगा है| अब बच्चे और चोर दोनों ही किसी बुजुर्ग को परेशान नहीं कर सकते|

बातों के साथ आपका मूड बदल जाता है और एक बार फिर आप कमरे की रौशनी का रंग और चमक बदल देते हैं| नाचने का मन भी होना ही चाहिए| आपके दुनिया भर के गानों का संग्रह है| आप अपने पालतू जिन्न को हुक्म देते हैं, पुराने गाने और हल्का पंखा चलाने के लिए| तकनीक की अदृश्य शक्ति आपके हुक्म की तामीर करने के लिए मौजूद है|

आप आज दुनिया के किसी भी कौने से अपने माता पिता के संपर्क में रह सकते हैं| उनकी यादों को अपने पास संजो सकते हैं| बूढ़े माँ-बाप को बार बार न रौशनी जलाने के लिए उठना, न दरवाजा खोलने के लिए| इस तरह की बहुत सी सुविधाएँ हैं| बस इतना है कि वो थोड़ा बहुत हाथ पैर चलाते रहे, आरामतलबी में बिस्तर न पकड़ लें| तो इस सब के लिए भी उनके पास नया कड़ा है तो कलाई में पड़ा पड़ा उनको चेताता रहता है|

आज सबसे जरूरी है किसान का चतुर होना| किसान को कब कहाँ क्या बोना है, कब कितना बोना है. अन्य किसानों की बीज बुआई के हिसाब से दाम की संभावित घट बढ़ का कुछ अंदाजा रहे, कब कहाँ भण्डारण करना है, कब उसे बेचने का फायदा है, क्या लागत क्या दाम, यह सब बताने के लिए चतुर  उपकरण हों| ट्रेक्टर या अन्य उपकरण खेत में स्वचालित तरीके से काम कर पायें| न अधिक खाद पानी लग जाये न अधिक जहर की खेत में फ़ैल पाए, इसका इंतजाम होना चाहिए| चतुर घर से ज्यादा जरूरी है चतुर खेत| खेतों को चतुर बनाने के काम में कोई चालाकी नहीं होनी चाहिए| भोजन ऐसी जरूरत है, जिसका विकप्ल हाल फ़िलहाल नहीं है, इसका ख्याल किया जाना चाहिए|

यह नई तकनीक आराम भी है तो संभावित आलस्य भी| इस बीच चाय आ गई| बात लम्बी चलती रही| और तभी ख़त्म हुई जब टेलिविज़न ने आपका पसंदीदा सॉप ओपेरा चला दिया| टीवी पर जब भी #GetFitWithFlipkart अथवा #SmartHomeRevolution का विज्ञापन आता है आप प्रसन्नता से मुस्करा उठते हैं|

हिंदी भाषी मजदूर: विकास और वापसी


विकास किसे पसंद नहीं? विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय नारा है – बिहार और उत्तर प्रदेश में तो विकास के नारे और विकास की सरकार को पहला स्थान मिला हुआ है| देश का समग्र विकास हिंदी क्षेत्र का सबसे बड़ा सपना है| पान से लेकर चाय की दुकान तक पर हमारे क्षेत्र में विकास वार्ता होती रहती है|

कठिनाई है विकास करने की| ऐसा नहीं कि बिहार को विकास पसंद नहीं| जहाँ विकास की झलक भी दिखाई दे, हम पहुँच जाते हैं| देश का कोई नगर, कोई उद्योग, कोई सड़क, कोई भी विकास मंदिर ऐसा नहीं जहाँ हमारा श्रम न लगा हो|

हमारा विकास प्रेम भी ऐसा है कि जहाँ विकास की सम्भावना भी हो, वहाँ पहुँच जाते हैं| देश का विकास अगर हुआ है तो शायद हमारे मजदूरों के बाजुओं के बल पर ही हुआ है| मुंबई हो या चेन्नई उनकी सड़कों पर श्रम करता श्रमिक बिहार का नहीं तो हिंदी क्षेत्र का तो अवश्य ही है|

देश भर में हम हर स्थान पर हैं| विकास में हिंदी क्षेत्र के आप्रवासियों का योगदान मानने की जगह स्थानीय लोगों को लगता है कि हम उनके रोजगार छीनते हैं| अक्सर हम हम पर अपराध और गंदगी से हमें जोड़कर देखा जाने लगा है| किसी भी प्रदेश में स्थानीय अप्रशिक्षित मजदूरों की बेरोजगारी का कारण भी हमें ही माना जाने लगा है| पहले मुंबई और अब मध्यप्रदेश में हमारे विरुद्ध बातें उठने लगीं हैं| आज अनामंत्रित अतिथि का व्यवहार झेलना हमारी विडंवना है|

क्या हम जबरन वापसी के लिए विवश होंगे? क्या हमें उन गाँवों और शहरों में लौटना होगा जहाँ हम केवल यादें छोड़ आये हैं?

मगर ऐसा क्यों?

पहला यह कि अनामंत्रित अतिथि किसी को कोई पसंद नहीं करता| हम पहले पहुँचते हैं और फिर नौकरी ढूंढते हैं| अक्सर उन लोगों को टेड़ी निगाह से नहीं देखा जाता जिन्हें नौकरियाँ देकर आमंत्रित किया गया हो जैसे इंजिनियर या डॉक्टर|

दूसरा अप्रशिक्षित मजदूर आसानी से दिखाई दे जाने वाला समुदाय है| यह दिन भर सड़क या सार्वजानिक स्थानों पर दिखाई देने के कारण निगाह में जल्दी आता है| जब स्थानीय लोगों के मुकाबले आप्रवासी मजदूर अधिक दिखाई दें तो लोग सरलता से संज्ञान लेते हैं| हिंदी क्षेत्र में जनता और सरकारों के पास धन की कमी भी एक बड़ा कारण है| जब तक समृधि नहीं होती, लोग आदर नहीं करते| पंजाबी शरणार्थी हो या तिब्बती, सभी अपने साठ सत्तर के दशक की ऐसी कहानियां रखते हैं जब स्थानीय लोग हेयता का भाव रखने लगे थे| बाद में समृधि आने और हिंदी सिनेमा में पंजाबी दबदबे के चलते पंजाबी आज देश का प्रभावशाली सांस्कृतिक समुदाय है| इसी प्रकार, समृद्धि के साथ गुजरात का डांडिया और बिहार का छट भी प्रसिद्ध होने लगा है|

तीसरी और इन सब से बड़ी बात हैं – मतदाता के रूप में इस वर्ग की उदासी| यह तबका अपने स्थानीय चुनावों में ऐसा नेतृत्त्व नहीं चुन सका जो हिंदी प्रदेश विकास के सतत पथ पर ले जा सके| स्थानीय रोगजार, उद्योग और व्यवसाय नष्ट होते रहे| पलायन शुरू हो गया| हिंदी क्षेत्र सबसे बड़ा मानव संसाधन में सर्वाधिक धनी होने का कोई लाभ नहीं ले सका| दुर्भाग्य से देश की सरकारों का भी विकास सम्बन्धी नीति निर्माण गाँवों और छोटे कस्बे शहरों के हित में नहीं रहा| आज स्थानीय रोजगार की कमी के कारण हमें पलायन करना पड़ता है|

मुझे लगता है कि यह उचित है कि महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश ही नहीं, देश के सभी राज्यों की सरकारें और कंपनियाँ स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथिमिकता दें| पलायन को सस्ते मजदूर के लालच में बढ़ावा न दिया जाये| हिंदी प्रदेशों में विकास पर स्थानीय राज्य सरकारें समुचित ध्यान दें|

 

पान का बीड़ा


“जिन्हें पान खाने खिलाने की तमीज़ नहीं वो क्या जिन्दगी जियेंगे?” अक्सर कहते|

तब पान का जलवा था| मान का एक पान काफी था| रसास्वादन का शब्द पान का मान रखता है| मजाल क्या कोई दांत पान की कुतर भी जाए| जिन्हें पान चबाने की आदत होती है वो अक्सर ज़ाहिल होते हैं| इंसान की तहजीब, रुतबा, खानदान और तासीर का पता उसके पान खाने के तौर तरीके से लगता है|

पनवाड़ी उन्हें दूर से देखता तो उनका पान लगाना शुरू कर देता| बीच बीच में दो चार दस पान और लग जाते, मगर उनका पान ख़ूब वक़्त लेता| जब तक कत्था चूना अपना रंग एकसार न कर लेते, घोटा चलता रहता| वक़्त होता, जान पहचान, काम बेकाम, चेले – चंटारे उन्हें सलाम ठोंकने आते| एक दूसरे के नाम दुआ पढ़ते| नेहरू से लेकर मर्लिन मुनरो तक बहार होती| पनवाड़ी न  रुकता, घोटा चलता रहता| घड़ी आध घड़ी के बाद पनवाड़ी कहता, रंग मस्त आ रहा है, जजमान| एक उड़ती नज़र पान को चूमती हुई निकल जाती| कहते – पान को भावज बनाना है क्या, बस करो| इधर पान का नुस्खा आगे बढ़ता, उधर देश की ग़रीबी हटती और टाटा बिड़ला भीख मांगने ठंडी सड़क निकल जाते| दूसरी घड़ी बीतते बीतते उमराव जान की याद आती कि छप्पन छुरी  चलती| पूछा तो कभी नहीं मगर कहते है कत्था चूना घोटते हुए पनवाड़ी पान पर सरस्वती यंत्र बनाता|

पान का बीड़ा भक्तिभाव से ग्रहण करते| मन्त्रजाप भी करते होंगे| इसके साथ नगर परिक्रमा का काम शुरू होता| आप भले ही उसे क़स्बा कहें, मगर मील भर पदयात्रा उनका नियम था| कारवां में लोग आते जाते, अलग होते जाते| मंथर गति से कदमताल मिलते जाते| हूँ हाँ करते सबकी बात सुनते जाते| सरकारी ओहदेदार भी इसी क्रम में मेलजोल करते| शायद ही कभी कुछ बोलते| जिनके काम होने होते, चुपचाप हो जाते| कभी कभार कुछ बोलते तो अगले दिन सुबह शहर भर में चर्चा रहता| सोने से पहले मूँह से निचुड़ा हुआ पान कलई के पीकदान में संभाल कर रख देते| दांत का निशान न रहता मगर रस भी तो न रहता|

सुबह समय पूजा पाठ भोजन भजन करते बीतता, शेष विद्यालय में पढ़ाने लिखाने और पीटने चिल्लाने में| गला दर्द करता और थक कर बुरी तरह बैठ जाता| दोपहर घर पहुँच कर चाय चबैना के बाद अपने कुतुबखाने में बैठकर पानदान उठाते| पंडिताइन दोपहर में पुरानी फ़िल्मों के इश्किया गाने सुनती हुई यह पान लगाया करतीं| जिस दिन विविध भारती पर सुरैया के गाने बजते पान में सुर आ जाते| नूरजहाँ का नूर उन्हें बहुत भाता था| जब कभी सही गाना गुनगुनाने लगते, पंडिताइन फूले न समातीं|

पान खाना कला है| जितना देर मूँह में रहे, रस देता रहे| जब तक पत्ता ख़ुद न घुल जाए, उसे न छेड़ते| जिस पान पर कत्था चूना घोटने में घड़ी दो घड़ी लगती हो उसे भोगने में क्या छः घड़ी न लगें? पान मूँह में घुलता रहता| किताबें दिल में उतरती रहतीं| कभी कभी रात बेरात कविता कहानी बन कर पान कागज़ पर उतर जाता| कभी कभी रात होती, सुबह न होती|

पान का दौर चलता रहा, चलते चलते चला गया| इंस्टेंट कॉफ़ी का दौर आया| दो मिनट मैगी आई| तुरंत तैयार खाना आया| चालीसा पढ़ने वाले चार चक्कर अगरबत्ती घुमाकर भगवान को बहलाने लगे|  जिन्दगी जीने की फुर्सत किसे, सलीका किसे? हिंदुस्तान की तहजीब और तासीर किसे? किसे फुर्सत इश्क़ करे, बातें बनाये, घोटा करे, घूँट घूँट जिन्दगी के मज़े करे? किसे फुर्सत जिया करे??